अमात्य नियुक्ति : कौटलीय अर्थशास्त्र (विनयाधिकारिक)

कौटल्य इस पर विचार करते हैं कि राजा किसे अमात्य नियुक्त करे। उनके समय अमात्य और मंत्री (अमात्यसंपत) दो भिन्न पद थे और मंत्री का स्थान अधिक ऊँचा था। मंत्री बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण पद था और सामान्यत: एक ही होता था। कौटल्य ने मंत्री के लिये सर्वविद्या गुण सम्पन्न होना अनिवार्य माना है और पुरोहित के साथ उसके चयन को अलग अध्याय में स्थान दिया है। आज के परिप्रेक्ष्य में प्रधानमंत्री के अतिरिक्त जो मंत्री हैं उन्हें अमात्य की श्रेणी में रखा जा सकता है।
पहले वह अपने से पहले विद्वानों के मत मतांतर बताते आगे बढ़ते अपनी बात कहते हैं। यह भारतीय शास्त्रीय पद्धति का एक उदाहरण है।
 
भारद्वाजने कहा कि राजा अपने किसी सहपाठी को अमात्य नियुक्त करे क्यों कि साथ पढ़ने के कारण उसकी पवित्रता और कार्य सामर्थ्य जाने समझे होते हैं। ऐसा अमात्य राजा का विश्वासपात्र होता है।
 
विशालाक्षने खण्डन करते हुये कहा कि साथ खेले कूदे होने के कारण ऐसे व्यक्ति राजा का तिरस्कार कर सकते हैं। राजा अमात्य उसे नियुक्त करे जो समान गुह्य धर्म वाला हो, समान शील का व्यसनी हो। ऐसा व्यक्ति यह समझ कि राजा मेरे सारे मर्म जानता है, अपराध नहीं करेगा।
 
परंतु पराशर ने कहा कि यह दोष राजा और अमात्य दोनों के लिये समान होगा। राजा भी यह समझ कि अमात्य मेरे सारे गुह्य जानता है, अमात्य के अनुसार आचरण करने लगेगा। राजा अपना गोपन जितने लोगों से कहता है उतने के वश में होता जाता है। इसलिये राजा ऐसे व्यक्ति को अमात्य नियुक्त करे जिसने प्राण संकट की स्थिति में भी राजा पर अनुग्रह रखा हो। ऐसे व्यक्ति का राजा के प्रति अनुराग का ठीक ठीक पता होता है।
 
आचार्य नारदइसका खण्डन करते हुये कहते हैं कि प्राण संकट के समय भी राजा की रक्षा करना भक्ति भर है, बुद्धिगुण नहीं। बुद्धिसम्पन्न होना अमात्य का सर्वप्रथम गुण है। ऐसे पुरुष को अमात्य बनाना चाहिये जो बताये गये राजकीय कार्य को निपुणता पूर्वक सम्पन्न कर कुछ विशेष भी कर दिखाये, इससे उसके बुद्धि गुण की परीक्षा ठीक से हो जाती है।
 
परंतु आचार्य कौणपदंत भीष्म नारद के इस सिद्धांत को नहीं मानते। वे कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति अन्य अमात्योचित गुणों से हीन हो सकते हैं। अमात्य ऐसे व्यक्ति को बनाया जाना चाहिये जिनके पिता, पितामह आदि ऐसे पद पर कार्य करते चले आ रहे हों क्यों कि तब देख देख कर वह पहले से ही अमात्योचित सम्पूर्ण व्यवहारों से परिचित रहता है।
इसीलिये वह अपकार किये जाने पर भी सम्बन्ध के कारण स्वामी का साथ नहीं छोड़ता। गायें तक अपरिचित समूह के स्थान पर परिचित समूह में ही जा ठहरती हैं।
किंतु आचार्य उद्धव इसे नहीं मानते। उनके अनुसार ऐसे अमात्य राजा का सर्वस्व अपने वश में कर उसके समान स्वतंत्र प्रवृत्ति के हो जाते हैं। इसलिये नीतिशास्त्र में निपुण नये व्यक्ति को ही अमात्य नियुक्त करना चाहिये। पहले से अपरिचित अमात्य दण्ड धारण करने वाले राजा को यम के समान मानते हुये कभी उसका कोई अपराध नहीं करते।
 
बाहुदंतीपुत्र इन्द्र इसे नहीं मानते। उनके अनुसार नीति आदि शास्त्रों में निपुण अमात्य भी अमात्य कार्यों से अपरिचित होने के कारण असफल हो सकता है। ऐसे पुरुष को ही अमात्य नियुक्त किया जाय जो कुलीन, बुद्धिमान, पवित्र हृदय, शूर और स्वामी में अनुराग रखने वाला हो। अमात्य में गुणों की प्रधानता ही अत्यंत आवश्यक है।
 
 
अंत में आचार्य कौटल्य कहते हैं कि सभी आचार्यों के मत ठीक हैं। पुरुष के सामर्थ्य की व्यवस्था(निर्णय) उसके किये कार्यों के सफल होने तथा उसकी विद्या बुद्धि के बल पर ही की जाती है।  
राजा सहाध्यायी का सर्वथा परित्याग न करे वरन उसको कार्य करने की शक्ति के अनुसार, बुद्धि आदि गुण, देश, काल तथा कार्यों को अच्छी तरह विवेचित कर अमात्य पद पर नियुक्त करे किंतु उसे अपना मंत्री कदापि न बनाये। सर्वगुण सम्पन्न मंत्री कोई और होना चाहिये।   
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