विमुद्रीकरण (Demonetisation) – 1

‘विमुद्रीकरण’ समझने के लिये पहले समझते हैं उन बातों को जिनसे उस पर किये जा रहे विश्लेषण और दिए जाने वाले तर्कों को समझने में आसानी होगी।  
अर्थशास्त्र
अमेरिकी  राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन ने अर्थशास्त्रियों से परेशान होकर कहा था,”मुझे एक हाथ वाला अर्थशास्त्री चाहिए. जितने अर्थशास्त्री हैं वे कहते हैं ऑन वन हैण्ड… फिर कहते हैं ऑन दी अदर हैण्ड…”। (संभवतः ट्रूमैन को कोई वामपंथी अर्थशास्त्री नहीं मिला होगा क्योंकि वे अक्सर एक ही हाथ के होते हैं।) 
अर्थशास्त्र विज्ञान है या कला, यह बहस का मुद्दा है।
 अर्थशास्त्र को कला कहने वालों के अनुसार बाजार और इंसानों का व्यवहार बता पाना बहुत कठिन है, उन्हें उसे किसी नियम में नहीं बाँधा जा सकता।  इसलिये उन्हें अनुभवी लोगों के हाथ में छोड़ देना चाहिए।
 अर्थशास्त्र को विज्ञान कहने वालों के अनुसार आर्थिक व्यवहार में भी एक वैज्ञानिक, गणितीय सम्बन्ध – एक पैटर्न होता है जिसके लिये नियम और सूत्र बनाए जा सकते हैं, जिनकी सहायता से आर्थिक समस्याओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और आर्थिक निर्णयों के प्रभाव का पता लगाया जा सकता है।
वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं होती है। परन्तु अर्थशास्त्री प्राय: वैसे ही भविष्यवाणी करते हैं जैसे ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ हिलेरी क्लिंटन के जीतने की सम्भावना गणना शुरू होने के कई घंटो बाद तक ९५% बताता रहा। अर्थशास्त्र के सिद्धांत दर्शन-कला-राजनीति की तरह हैं – मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना। इसमें गलत कुछ नहीं, पर इस बात को पहले कह देने का अर्थ मात्र यह बताना है कि यदि कोई किसी आर्थिक सिद्धांत का सन्दर्भ देकर भविष्यवाणी कर रहा है तो उसके ठीक विपरीत मत का समर्थन करने वाले सिद्धांत भी मिल जायेंगे।  
ऐसा नहीं है कि अर्थशास्त्र का कोई उपयोग नहीं है पर भारत में विमुद्रीकरण के बाद जो कुछ पढ़ने को मिला वह प्राय: ऐसा लगा जैसे हाथी की केवल पूँछ देखकर बता देना कि हाथी कैसा होता है!  अर्थशास्त्र का हवाला देकर तर्क देते समय हम भूल जाते हैं कि मानवीय व्यवहार प्रकृति के नियमों की तरह स्थिर और पूर्वानुमानित नहीं होते। लगभग सारे आर्थिक सिद्धांत इस मान्यता के साथ प्रारम्भ होते हैं कि मानव हमेशा तर्कसंगत फैसले लेता है (वैसे पारंपरिक अर्थशास्त्र से भिन्न स्वभावजन्य अर्थशास्त्र – बिहैव्यरल इकोनॉमिक्स  एक उभरती हुई शाखा है)। फिर आप समझ ही सकते हैं कि वे कितने सच होते होंगे। यही कारण है कि इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक निर्णयों, योजनाओं, संकटों और सुधारों पर आज भी अर्थशास्त्री सहमत नहीं हो पाते कि क्या सही हुआ, क्या गलत! और क्या होना चाहिए, क्या नहीं।  विज्ञान की तरह यहाँ प्रयोग नहीं किये जा सकते और कुछ प्रयोग हुये भी तो उनकी संख्या इतनी अधिक नहीं कि उनसे निष्कर्ष निकाले जा सकें। इस स्तर का और इस विधि से विमुद्रीकरण इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। 

फ्रेडेरिक बस्त्या ने सिलेक्टेड एसेस ऑन पोलिटिकल इकोनोमी  में लिखा है: 
अर्थव्यवस्था की दृष्टि से, किसी कार्यवाही, क़ानून, आदत, संस्था का एक ही प्रभाव नहीं होता बल्कि प्रभावों की एक शृंखला होती है। इन प्रभावों में सबसे पहला प्रभाव तात्कालिक होता है जो कार्यवाही के साथ साथ होता है और तुरंत दिखने लगता है। बाकी प्रभाव बाद में  उभर कर आते हैं। वे पहले से नहीं दिखते। यदि हम भाग्यशाली हुये तो इन प्रभावों का पूर्वानुमान कर पाते हैं। अच्छे और बुरे अर्थशास्त्रियों में केवल एक अंतर होता है – बुरे अर्थशास्त्री अपने आपको सिर्फ दिखने वाले प्रभाव तक सीमित कर लेते हैं जबकि अच्छे दोनों का विचार करते हैं, वे प्रभाव जो तुरंत दिख जाते हैं और उन प्रभावों का भी जिनका अनुमान लगाया जा सकता हो। वैसे यह अन्तर ज़बर्दस्त होता है क्योंकि लगभग हमेशा ही या तो परिणाम तुरंत लाभदायक होते हैं और बाद के विनाशकारी या इसके उलट।
बुरे अर्थशास्त्री ऐसी नीतियों का अनुसरण करते हैं जो भविष्य के विनाशकारी परिणामों के बावजूद तुरंत अच्छे नतीजे दिखायें। एक अच्छा अर्थशास्त्री उन नीतियों का अनुसरण करता है जो वर्तमान की छोटी कठिनाइयों के बावजूद भविष्य में महान कल्याणकारी हों।
मुद्रा (मनी): 
मुद्रा – करेंसी यानी विनिमय का माध्यम, लेन देन का माध्यम। 

मुद्रा की अवधारणा और लक्ष्य है – विनिमय। उसका मूल्य सिर्फ इसलिये होता है कि सबको भरोसा होता है कि सभी उस कागज़ के टुकड़े को भुगतान के रूप में स्वीकार करेंगे। इस विश्वास के अतिरिक्त मुद्रा का कोई मूल्य नहीं होता। जब मुद्रा नहीं थी तब वस्तु-विनिमय (Barter) था। मुद्रा का संक्षिप्त इतिहास कुछ यूँ है – वित्तीय संस्थायें (बैंक) लोगों को नोट वितरित करती थी। उन दिनों बैंकों का दायित्त्व होता था कि उस नोट पर अंकित मूल्य के बदले वे नोट लाने वाले को सोना दें। इस तरह जितने नोट वितरित होते, बैंक को उतना सोना रखना पड़ता। पर धीरे धीरे बैंक लोगों को सोने से कहीं ज्यादा नोट (ऋण) देने लगे। यह कोई समस्या नहीं थी क्योंकि शायद ही कभी एक साथ सभी लोग अपना सोना वापस लेने आते।  वस्तु विनिमय और सोने की जगह मुद्रा का लेन देन आसान था और जिस किसी के पास वह कागज़ का टुकड़ा हो वह जब चाहे बैंक से सोना वापस ले सकता था। सोना क्यों? केवल भरोसे के चलते! सब का भरोसा कि सोना मूल्यवान होता है या फिर यह धारणा कि लोग सोना चाहते हैं, उसकी उपयोगिता के कारण नहीं। सोचें तो सोने से कुछ नहीं हो सकता पर लोगों की जो भी धारणा रही हो कि सोना सुन्दर है, मूल्यवान है, सभी उसे पाना चाहते हैं आदि आदि। मुद्रा की तरह ही इस भरोसे के अलावा सोने की कोई कीमत नहीं होती। 

कालांतर में मुद्रा का प्रचलन इतना बढ़ा और सोना ही क्यों, कितना सोना? जैसे प्रश्नों के कारण (मुद्रा छापने के लिये) सोने की आवश्यकता समाप्त कर दी गयी। भरोसा सोने से कागज की मुद्रा पर स्थान्तरित हो गया। सोने का स्थान बैंक के खाते में होने वाली एक प्रविष्टि ने ले लिया। सोना रखने की बाध्यता छोड़कर अब भी व्यवस्था वही रही। अब कितनी मुद्रा हो वह देश की अर्थव्यवस्था और कई अन्य बातों पर निर्भर करती है। एक मुद्रा, दूसरी की तुलना में कितनी होगी यह भी अर्थव्यवस्था की मजबूती, माँग और आपूर्ति जैसी बातों पर निर्भर हो गयी।
मुद्रा या नोट के बिना अर्थव्यवस्था संभव नहीं। कारोबार, खरीद, बिक्री, लेन-देन सबकुछ इसी से चलता है। मुद्रा कैसे काम करती है, प्राय: हम इस बात पर ध्यान नहीं देते पर अर्थव्यवस्था के लिये इससे जरूरी कुछ नहीं। मुद्रा के जरिये ही चीजें और सेवाएं एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती हैं। मुद्रा का इस्तेमाल आर्थिक गतिविधि के साथ धन संचय के लिये भी होता है।  
(अमेरिकी डॉलर की सोने पर निर्भरता हटाने के पीछे एक बड़ा कारण वह अवधारणा थी कि अमेरिकी डॉलर महँगा होने से अमेरिका को व्यापार में घाटा हो रहा था। हालाँकि इस कदम से कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ था।)
ऋण (क्रेडिट):  अर्थव्यवस्था में ऋण मुद्रा से कई गुना ज्यादा होता है। अर्थव्यवस्था मुद्रा से कहीं अधिक ऋण से चलती है। मुद्रा और ऋण अर्थव्यवस्था की मूलभूत इकाइयाँ हैं क्योंकि इन्हीं दोनों के जरिये सब कुछ होता है। जैसे हम मुद्रा बैंक में रखते हैं, बैंक उसे किसी को लोन देता है। मान लीजिये किसी ने कार ख़रीदा उससे कार कंपनी की बिक्री बढ़ी। कार कंपनी में काम करने वालों को वेतन मिला। वेतन का एक हिस्सा वापस बैंक में गया। कुछ इस तरह मुद्रा और ऋण से अर्थव्यवस्था चलती रहती है। छोटे से छोटा, बड़े से बड़ा, आम आदमी से व्यवसाय तक अर्थव्यवस्था लेन देन से बनती है और लेन देन के माध्यम मुद्रा या ऋण। मुद्रा और ऋण अर्थव्यवस्था रूपी मशीन के स्नेहक (लुब्रिकेंट)  हैं। 
द्रवता (लिक्विडिटी): द्रवता यानी कितनी आसानी से किसी चीज को खरीदा या बेचा जा सके। अगर किसी चीज को बेचने के लिये खरीदार ढूँढना पड़े या कीमत बहुत कम करनी पड़े तो उसे इल्लिकुइड कहेंगे। घर, कार, व्यवसाय, कृषि उत्पाद; हर चीज जो जितनी सरलता से मुद्रा में परिवर्तित हो सके उसकी द्रवता उतनी अधिक। स्वाभाविक है अगर मुद्रा कम हो तो अर्थव्यवस्था में द्रवता भी कम हो जायेगी। 
वित्तीय नीतियाँ और मुद्रा आपूर्ति: मुद्रा की आपूर्ति (और क्रेडिट का स्तर) केन्द्रीय बैंक की जिम्मेवारी होती है। मुद्रा की आपूर्ति बढ़ने का अर्थ है आर्थिक विस्तार किंतु आर्थिक विस्तार-संकुचन-महँगाई और मंदी में एक नाजुक संतुलन होता है।
अधिक मुद्रा का मतलब अधिक आर्थिक गतिविधि और अधिक व्यय। अधिक व्यय का मतलब किसी न किसी की आय में वृद्धि। आय में वृद्धि से लोगों द्वारा क्रय अधिक और क्रेडिट की क्षमता भी अधिक (कोलेटरल अधिक)। माँग अधिक तो उत्पादन अधिक पर साथ में महँगाई भी अधिक।
किंतु यदि महँगाई आय से अधिक होने लगे तो यही क्रम उल्टा हो जाता है। लोग कम खरीदने लगते हैं और फिर एक से दूसरा प्रभावित होता हुआ पूरा क्रम उलट जाता है, मंदी आ जाती है। जब मंदी (डिफ्लेशन) हो तो आर्थिक गतिविधियाँ कम हो जाती है। लोग खर्च कम कर देते हैं। जब भविष्य में कीमतें कम होने जा रही हों तो चीजें कोई नहीं खरीदता (जब तक अति आवश्यक न हो)।  कहने का अर्थ यह कि लेन देन/विनिमय अर्थव्यवस्था की मूलभूत इकाई है और हर लेन देन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, एक दूसरे को प्रभावित करता है। जब लोग अधिक धन बैंक में रखते हैं और बैंक उसे लोन के रूप में वितरित करते हैं तो भी मुद्रा आपूर्ति बढ़ती है। सरकार की राजस्व (फिस्कल) नीतियाँ जैसे टैक्स दर में कमी, मनरेगा जैसी योजनायें भी मुद्रा आपूर्ति करती हैं किंतु आपूर्ति के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण  होती हैं मौद्रिक (मोनेटरी) नीतियाँ जैसे ब्याज दर, सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री इत्यादि। उदाहरण के लिये देखें तो जब केन्द्रीय बैंक को मुद्रा आपूर्ति बढ़ानी होती है तो वह ब्याज दर में कटौती करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में क्रेडिट बढ़ता है। मुद्रा प्रसारण में वृद्धि होती है। इसके विपरीत अगर ब्याज दर बढ़े तो लोग और व्यवसायी कम लोन लेंगे, नये व्यवसाय कम चालू होंगे। वृद्धि कम होगी। आय कम  होगी। कम चीजें बनेंगी। कीमतें कम होंगी। 
ये नीतियाँ  अर्थव्यवस्था के लीवर की तरह काम करती हैं। एक को नियंत्रित करने से एक सिलसिला प्रारम्भ होता है जो पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।  (वैसे वास्तविकता में ऐसा इतना सरल नहीं होता वरना ब्याज दर बढ़ाने और घटाने से ही महँगाई और मनचाही विकास दर प्राप्त हो जाती।)
इसका एक साधारण सिद्धांत है – मुद्रा की गति MV = PY।  
M = मुद्रा आपूर्ति। V = मुद्रा की गति। P = मूल्य और Y = उत्पाद। अर्थात कीमतें मुद्रा आपूर्ति के समानुपाती होती हैं।
 (अर्थशास्त्र के  बाकी सिद्धांतों की तरह यह भी विवादित है। )
मूलतः केंद्रीय बैंक के तीन काम होते है – महँगाई को नियंत्रित रखना, वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और विकास को बढ़ावा देना। जिनके लिये उसके पास सीमित साधन होते हैं – मुद्रा आपूर्ति का संतुलन इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। 
मौद्रिक प्रक्रिया:
प्रक्रिया – यानि बृहत्अर्थशास्त्र की यांत्रिकी  
अर्थव्यवस्था में सब कुछ अन्योन्याश्रित है, एक दूसरेसे जुड़ा हुआ – एक दूसरेपर निर्भर। आपकी आमदनी किसी और का खर्च होती है और यह हर स्तर पर होता है – सरकार, बैंक, कम्पनियाँ। अगर इसे एक यंत्र की तरह समझना चाहें तो आर्थिक लेन देन और मनुष्य की प्रकृति इन दो बातों से पूरी आर्थिक प्रक्रिया की मशीन चलती है। मुद्रा और क्रेडिट से होने वाले सारे लेन देन (ट्रांजैक्शन) को मिला दें तो वह होता है अर्थव्यवस्था का कुल व्यय –  हमारे एक अकेले से लेकर, व्यवसाय हो या सरकार सबके लिये ही मुद्रा-क्रेडिट-विनिमय-उत्पादन। इतने में अर्थव्यवस्था की मशीन सिमटी हुई है।
कुल व्यय से शुरू करते हैं। खर्च है तो वे किसी की आमदनी होगी ही। आमदनी होगी तो फिर खर्च होगा। अधिक आय से ऋण लेने की योग्यता बढ़ेगी। अधिक ऋण वापस आयेगा तो ऋण देने वाले सहज होंगे और साख बढ़ेगी, साख बढ़ने से ऋण आयेगा – यह क्रम बनता है – चक्र (साइकल)। इससे उत्पादन में वृद्धि और विकास होता है। आर्थिक विस्तार – लहर प्रभाव (रिप्पल इफ़ेक्ट) – एक से दूसरा।
इस क्रम में उतार चढ़ाव भी होता है – आर्थिक संकुचन। छोटे उतार हों तो रिसेशन, बड़े हों तो डिप्रेशन। और बड़े हों तो ग्रेट डिप्रेशन!
 चढाव हो तो बूम!!  ये उतार चढ़ाव इसलिये  होते हैं कि अर्थव्यवस्था में मुद्रा के अलावा क्रेडिट भी होता है। केवल मुद्रा होती तो हम उतना ही खर्च कर पाते जितना हम कमाते हैं। हम ऋण ले घर नहीं खरीद पाते, गाड़ी नहीं खरीद पाते, व्यवसायी अपनी क्षमता के बाहर कारोबार नहीं कर पाते और उत्पादन ही विकास का एकमात्र उपाय होता। व्यय केवल एक ही विधि होता, मुद्रा के द्वारा।
क्रेडिट होने के चलते हम भविष्य से उधार लेकर उसे अभी खर्च कर पाते हैं और एक क्रम में यदि सभी यही करें यानि पूरी अर्थव्यव्स्था में जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च करें तो कभी न कभी हमें अपनी आय से कम खर्च भी करना पड़ेगा। जब क्रेडिट का उपयोग अर्थव्यवस्था में ऐसी चीजों के लिये होता है जिससे भविष्य में आमदनी नहीं हो सकती तो ये साइकल उलटती है और मंदी आती है। 
अधिक आर्थिक विस्तार हो जाय तो बुलबुला (बबल) बनता है। अर्थव्यवस्था में कितना क्रेडिट हो ये केन्द्रीय बैंक निर्धारित करते हैं। जब रिसेशन आता है तब केन्द्रीय बैंक आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिये ब्याज दर कम करते हैं पर यदि डिप्रेशन हो तो अधिकतर यह विधि काम नहीं करती क्योंकि तब ब्याज दर न्यूनतम पहले से ही हो चुके होते हैं। उसके बाद खर्च में कटौती, बैंक और संस्थायें दिवालिया (डिफौल्ट) होती हैं, अधिकाधिक नोट छापने पड़ते हैं, बेल-आउट इत्यादि। इसे अनुत्तोलन (डीलेव्रेजिंग) कहते हैं। क्रेडिट और मुद्रा आपूर्ति को वापस लाने के लिये केन्द्रीय बैंक प्राय: एक साथ कई उपाय अपनाते हैं। जैसे यदि केवल खर्च में कटौती हो तो अर्थव्यवस्था में संकुचन होगा जिससे क्रेडिट कम होगा। पुन: खर्च कम होगा। कीमतें गिरेंगी, आदि आदि। पर केन्द्रीय बैंक के पास इन उपायों के अलावा कोई और तरीका नहीं होता।
ऐसे समय में राजस्व और मौद्रिक नीतियाँ स्फीति दर बढ़ाने वाली (इन्फ्लेश्नरी), प्रोत्साहन (स्टिमुलस) और विस्तार वाली (एक्सपेंशनरी) होती हैं। सरकार का बजट घाटा बढ़ता है। अर्थशास्त्री मानते हैं कि ये लघु अवधि देनदारी (शोर्ट टर्म डे’ट) साइकिल और दीर्घ अवधि देनदारी (लॉन्ग टर्म डे’ट)  चक्र हर अर्थव्यवस्था में होते रहते हैं। परन्तु इन चक्रों के परे उत्पादन में वृद्धि होती रहनी चाहिये क्योंकि अर्थव्यवस्था का वास्तविक तत्व वही है।  
यह यांत्रिकी कई कारकों का एक भंगुर संतुलन है जिनमें राजनीति भी एक है। केन्द्रीय बैंक और सरकार के पास इनमें से मात्र कुछ को ही नियंत्रित करने के सीमित उपाय होते हैं। मनुष्य की प्रकृति और देश की संस्कृति बदलने के लिये कोई निर्धारित उपाय तो हैं नहीं! कहने का अर्थ यह कि मात्र एक या कुछ कारकों को देख बाकी को अनदेखा करना अर्थहीन है। 
मुद्राहीन (कैशलेस) समाज
मुद्राहीन समाज कम से कम निकट भविष्य में तो संभव नहीं है किंतु ‘कम से कम मुद्रा’ समय की आवश्यकता भी है और श्रेष्ठतर भी। पश्चिमी अर्थशास्त्रियों में केनेथ रोगोफ्फ़ मुद्राहीन अर्थ व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं। अपनी पुस्तक “द कर्स ऑफ़ कैश” में उन्होंने अपराध, आतंक और टैक्स चोरी जैसी समस्याओं से निपटने के लिये बड़े नोटों को समाप्त करने की वकालत की है। 

हालाकि उन्होंने पश्चिमी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को लक्ष्य कर पुस्तक लिखी थी और उनकी प्रणाली भी बहुत भिन्न थी किंतु लक्ष्य और सन्देश एक ही थे – बड़े नोट से जो भी विकास होता है वह मुख्यतः भूमिगत अर्थव्यवस्था में। उन्होंने एक निष्पक्ष और सुरक्षित दुनिया के लिये कम और छोटे नोटों की वकालत की। अमेरिका, जापान और यूरोप के उदाहरण देते हुये उन्होंने कहा कि बड़े नोटों को हटा कर भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी, आतंक, जाली नोट और अन्य गैर क़ानूनी गतिविधियों को कम किया जा सकता है। पेरिस की आतंकवादी घटना के पश्चात ५०० यूरो के नोट बंद किये गये। स्थिति ऐसी थी कि ५०० यूरो के नोटों को बिन-लादेन कहा जाने लगा था!

बड़े नोटों के बिन लादेन हो जाने से बचाव के अतिरिक्त भी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग और डिजिटल मुद्रा के कई लाभ हैं। व्यक्तिगत तौर पर अगर मैं यात्रा नहीं कर रहा होता हूँ तो मेरे पास किंचित ही कभी एक नोट होता है। यात्रा करते समय भी जहाँ कहीं भी कार्ड चल सकता है मैं कभी नोट लेकर नहीं जाता। झंझट नहीं, विनिमय् दर की चिंता नहीं और हिसाब रखने की आवश्यकता नहीं, पारदर्शिता तो होती ही है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव संभवतः बिन-लादेन नोटों के अनुभव का विपरीत छोर है ।
भारत मुद्राविहीन (कैशलेस) अर्थव्यवस्था और डिजिटल मुद्रा से अभी बहुत दूर है। कैश और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात तुलनात्मक अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक है किंतु यह स्थिति उस दिशा में अग्रसर होने का अवसरहै। पुन: यदि अपना अनुभव कहूँ तो क्रेडिट कार्ड, मोबाइल, नेट बैंकिंग, स्क्वायर जैसी कम्पनियों और लेवल अप जैसे ऐप से मेरा सारा काम हो जाता है। चेक तक फ़ोन से जमा हो जाता है।  जिन्हें लगता है कि भारत में यह सब संभव नहीं, उन्हें भारत में मोबाइल फ़ोन और ई-कॉमर्स की सफलता देखनी चाहिए। 
डिजिटल मुद्रा की सुरक्षा से जुडी हुई अपनी समस्यायें हैं किंतु एक  संतुलन बन सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था अभी उस संतुलन से बहुत दूर है। पर उसे एक विकल्प के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है। वास्तव में हम नोटों को भुगतान का माध्यम समझने के स्थान पर धन संचय का माध्यम समझ लेते हैं। धन संचय की जगह बैंक या संपत्ति होने चाहिये।
मुद्रा केवल भुगतान का माध्यम है लेकिन उसकी जगह भी हमें संतुलन को डिजिटल भुगतान की ओर मोड़ना  चाहिये। 
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3 thoughts on “विमुद्रीकरण (Demonetisation) – 1

  1. बेनामी

    अंतिम 3 या 4 पैरा अल्टीमेट हैं।
    (संजय अनेजा)

    Reply
    1. Krishna Kumar AGRAWAL

      P.m. ki note bandi ke bad economy ke nfe nuksan KO samjhana ki bhukho is LEKHNI SE shan’t Hui chuki mai kam pada hu for v is LEKHNI SE itna to jarur samajh paya ki notbandi kaledhan par shri aur Puri chot nhi hai yah kora aashwasan bhar hai jo janta me saf economy ki aashara JAGAYA hai . Thanks

  2. Yogendra Singh Shekhawat

    superb, सच कहूँ तो मुझे ऐसे ही लेख का इंतज़ार काफ़ी समय से था। मैंने कई विशेषज्ञों से अर्थशास्त्र की इन पेचीदा अवधारणाओं पर कई बार चर्चा की पर शांत करने वाला उत्तर इतनी आसानी से कभी नहीं मिला। गागर में अर्थसागर भर दिया है ओझा भाई, इस लेख में अर्थशास्त्र का ज्ञान शुरू से अंत तक और उसके झोल-झाल को भी स्पष्ट कर दिया गया है।

    ये भी सही है कि अर्थशास्त्र की सभी क्रियाएं अन्यान्योश्रित हैं और कोई भी दो अर्थशास्त्री किसी नीति के भावी परिणामों को कभी सटीक नहीं बता सकते, नॉबेल विजेता अर्थशास्त्री भी नहीं। क्योंकि जनता भविष्य में आने वाले बदलावों को लेकर अपना-अपना दिमाग अलग-अलग तरीके से लगा लेती है और नीति वापस उलट हो जाती है। अगले भाग का भी इंतज़ार रहेगा।

    Reply

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