Daily Archives: April 11, 2017

सनातन धर्म का प्रसार आवश्यक – 1

सनातन धर्म का प्रसार आवश्यक : यह लेख Maria Wirth के मूल आलेख Hindu Dharma needs to spread का अनुवाद है। मूल आलेख यहाँ देखा जा सकता है: https://mariawirthblog.wordpress.com/2016/09/02/hindu-dharma-needs-to-spread/। दो भागों में बाँट कर प्रस्तुत किये जाने वाले इस आलेख में लेखिका ने बहुत ही सरलता से सनातन धर्म के विरुद्ध जारी षड़यंत्र और धर्म के प्रसार की आवश्यकता समझाई है।

अनुवाद: डॉ. भूमिका ठाकोर, उदयपुर

बौद्धिक निष्ठा तथा सत्य वर्तमान समय में स्पष्टतया अवांछित हैं। इन्हें ‘राजनैतिक औचित्य’ द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। ऐसा क्यों हुआ, रहस्य है किंतु मुख्यधारा में सम्मिलित मीडिया एवं ऐसी अन्य संस्थायें ‘राजनैतिक रूप से उचित’ धारणा का पुरजोर समर्थन दे लागू करती हैं। वे प्रभावशाली ढंग से हमारी सोच की दिशा तय करती हैं चाहे वह सहज समझ के विपरीत ही हो।

उदाहरण के लिये सन् 1999 में पोप ने जब भारत में घोषणा की थी कि चर्च 21 वीं सदी तक एशिया में ईसाई मजहब पूर्णतया स्थापित कर देगा तो मीडिया ने इसे साधारण घटना की भाँति प्रस्तुत किया। जो भी हो, चर्च का कर्तव्य सम्पूर्ण विश्व में ईसाई धर्म का प्रसार करना है और ऐसा कर के पोप अपने कर्तव्य का पालन कर रहा है।

जब जाकिर नाइक जैसों द्वारा हिन्दुओं का मुस्लिम मजहब में सामूहिक धर्म परिवर्तन किया जाता है तो मीडिया ऐसी घटनाओं को अनदेखा करती है अथवा यह सन्देश देती है कि ऐसी घटनायें सामान्य हैं। अंततोगत्वा इस्लाम का प्रसार भी तब तक होना चाहिये जब तक कि सारी मानवता मुसलमान न हो जाय।

लेकिन जब कोई हिन्दू समुदाय हिन्दू धर्म से परे अन्य मजहबों को स्वीकार कर चुके लोगों को पुन: हिन्दू धर्म में प्रतिस्थापित करने का प्रयास करता है तो मीडिया सहसा उत्तेजित हो जाती है। उनके अनुसार ऐसे हिन्दू समूह साम्प्रदायिक एवं विभाजनकारी शक्तियाँ हैं जो हमारे विविधतापूर्ण ढाँचे को अस्त व्यस्त करना चाहती हैं तथा एक असहिष्णु हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना चाहती हैं। कई दिनों तक टीवी चैनलों पर ऐसी घटनाओं की निन्दा की जाती है।

प्रश्न यह है कि मीडिया ऐसी घटनाओं की ग़लत व्याख्या क्यों प्रस्तुत करती है? जब कि सत्य इसके विपरीत होता है। तीन पंथों को देखें तो केवल हिन्दू अथवा सनातन धर्म ही ऐसा है जो विभाजनकारी तथा साम्प्रदायिक नहीं है। मात्र यही शाश्वत धर्म समस्त सृष्टि को एक कुटुम्ब के रूप में देखता है। यही धर्म बिना किसी निबन्धन के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत को परिलक्षित करता है।

इसके विपरीत ईसाई मजहब तथा इस्लाम आध्यात्मिक क्षेत्र में नये हैं। ये मनुष्य जाति को आस्तिक एवं नास्तिक के रूप में विभाजित करते हैं। उनके अनुसार ईश्वर की सत्ता में विश्वास रखने वाले सही हैं तथा अनीश्वरवादी ग़लत। परमात्मा आस्तिकों से प्रेम करता है तथा वे स्वर्ग जा सकते हैं जबकि नास्तिक सदाचार से जीवन जीने के उपरांत भी परमात्मा द्वारा नर्क में धकेल दिये जाते हैं। इन सभी दावों के पीछे कोई ठोस आधार नहीं है। क्या ये प्रमाणरहित परिकल्पनायें असत्य होने के अलावा साम्प्रदायिक तथा विभाजनकारी नहीं हैं?

‘विभाजनकारी शक्तियाँ’ शब्द निष्पक्ष रूप से ईसाई तथा इस्लाम मजहबों के लिये प्रयुक्त होना चाहिये न कि हिन्दू धर्म के लिये। केवल यह सुझाव ही तथाकथित उदारपंथी अभिजात्य वर्ग को उद्वेलित कर देगा। वे पूर्णरूपेण आश्वस्त हैं कि केवल हिन्दू धर्म ही विभाजनकारी है तथा इसका प्रसार रोका जाना चाहिये। किंतु वे इतने आश्वस्त क्यों हैं?

इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिये हम 18वीं तथा 19वीं शताब्दी में चलते हैं, जब सर्वप्रथम वेदों का ज्ञान पाश्चात्य विश्वविद्यालयों में पहुँचा था। वहाँ का प्रबुद्ध वर्ग इस प्राचीन ज्ञान से अत्यंत प्रभावित हुआ तथा इसके बारे में और अधिक जानना चाहता था।

वोल्तेयर, मार्क ट्वेन, शोपेनहावर, श्लेगल बन्धु, पॉल डेंसेन तथा ऐसे कई प्रतिभाशाली व्यक्तित्व भारत की विरासत का महिमामण्डन कर चुके थे। 20वीं शताब्दी के प्रारम्भ में हाइजनवर्ग, श्रोडिंगर, पौली, ओपेनहाइमर, आइंस्टीन और टेस्ला जैसे वैज्ञानिकों के शोधकार्य वेदांत से प्रभावित थे तथा उन्हों ने इस तथ्य को स्वीकार किया था।

मुझे इसका कारण तब समझ में आया जब हाल ही में मैंने पढ़ा कि वोल्तेयर ने भी वेदों को मानवता को प्राप्त सबसे बड़ा उपहार माना था। वोल्तेयर चर्च के विरोधियों में अग्रणी थे। इस कारण उन्हें कारागार भी जाना पड़ा। स्पष्ट है कि चर्च यह जान कर आश्चर्यचकित नहीं था कि पाश्चात्य बुद्धिजीवी भारतीय ज्ञान को ईसाई मजहब से श्रेष्ठ मानते थे। चर्च को आशंका इस बात की थी कि वह अपने अनुयायी उसी प्रकार खो देगा जिस प्रकार उसने चर्च के विरुद्ध होने का साहस करने वालों को दण्ड देने के अधिकार खोये थे।

ईसाई विचारधारा जो स्वर्ग के निवासी सच्चे ईश्वर में आस्था रखती है, अन्य देवी देवताओं से ईर्ष्या भाव रखती है। यह उन सभी को नर्क की शाश्वत आग में झोंक देती है, जिन्होंने ईसाई मजहब स्वीकार नहीं किया है। ईसाइयत की यह अवधारणा ब्रह्म की उस भारतीय अवधारणा से बराबरी नहीं कर पाई, जो चराचर जगत के विभिन्न स्वरूपों में उसी प्रकार व्याप्त होता है जिस प्रकार विभिन्न तरंगों में समुद्र व्याप्त होता है।

“ब्रह्म वह नहीं है जिसे आँखों से देखा जा सके बल्कि वह है जिसकी महिमा से आँखें देखने में सक्षम होती हैं। ब्रह्म वह  नहीं है जिसका मन से मनन किया जा सके, ब्रह्म वह है जिसकी महत्ता से मन मनन करता है।” – केनोपनिषद1

ब्रह्म के सम्बन्ध में ऐसी गूढ़ विचारधाराओं ने ईसाइयत के उस व्यक्तिगत ईश्वर के समक्ष चुनौती खड़ी कर दी, जो किसी अन्य रूप वाले ईश्वर में आस्था रखने वालों को निर्दयतापूर्वक सज़ा देता है। चर्च इस बात से निश्चित रूप से चिंतित होगा कि ईसाई ईश्वर को उसके अनुयायिओं को काबू में रखने और उनका दमन करने के लिये चर्च का एक आविष्कार माना जायेगा। यह बात सत्य के अत्यंत निकट है किंतु जनसाधारण इसकी सत्यता नहीं जान पाया।

अंत: यह कहना तर्कसंगत होगा कि चर्च ने राज्य के सहयोग से, जिसका कि उद्देश्य भी पाश्चात्य गुरुता को अक्षुण्ण रखना था, भारत की महान सभ्यता को कलंकित करने की व्यूहरचना की। यह व्यूहरचना सरल तथा जाँची परखी थी:

सम्पूर्ण विश्व के विद्यार्थियों को हिन्दुत्व के बारे में नकारात्मक तथ्य पढ़ाओ (अंग्रेजी भाषा में समस्त हिन्दू परम्पराओं के साथ ‘वाद’ जोड़ दिया गया जिससे वे संकीर्ण कट्टर प्रतीत होने लगे।) और लगभग पन्द्रह वर्षों पश्चात नई पीढ़ी सनातन धर्म के बारे में कुछ भी जानना तक नहीं चाहेगी। उन्हें यह विश्वास हो जायेगा कि हिन्दू धर्म व्यर्थ है क्योंकि उनके अध्यापक ऐसा कहते हैं! 

और वे ‘नकारात्मक’ दृष्टिकोण क्या थे जो विद्यार्थियों को हिन्दुत्व से सम्बद्ध करते थे? मुख्यतः ‘दमनकारी वर्ण व्यवस्था’ तथा दूसरा ‘मूर्तिपूजा’।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह था कि प्राचीन ज्ञान के स्रोत के रूप में इस नीति का भारत में क्रियान्वयन हुआ। थॉमस मैकाले ने सही विश्लेषण किया था कि भारत की सांस्कृतिक विरासत इसकी मेरुदण्ड है तथा ब्रिटिश साम्राज्य को देशवासियों को अधीन करने हेतु यह विरासत छिन्न भिन्न करनी आवश्यक है। मैकाले की इस सलाह का अनुकरण किया गया और संस्कृत शिक्षा प्रणाली को अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली से प्रतिस्थापित कर दिया गया। इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह थी कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली जारी रही। मैकाले की रणनीति काम कर गई।

एक छोटे बावेरियन प्राथमिक विद्यालय में रहते हुये भी मैं जानती थी कि भारत में घोर जाति प्रथा एवं अस्पृश्यता विद्यमान है। हम निर्धन और दयनीय भारतीयों के चित्र देखते थे और वे हम पर अपने अमिट प्रभाव छोड़ते थे। उस समय मैं जर्मनी में हुये यहूदियों और जिप्सियों के सर्वनाश के बारे में कुछ नहीं जानती थी। उच्च माध्यमिक विद्यालय में हमें प्रभावित करने हेतु हमारे लैटिन अध्यापक वृत्तचित्रों के माध्यम से यह दिखाते थे कि जर्मन यातना शिविरों में क्या होता था!

हमें विद्यालयों में न तो यह बताया गया कि सभी समाजों में एक जाति या वर्ग व्यवस्था होती है और न यह कि समाज का मानव शरीर के सदृश वैदिक निरूपण वास्तव में अद्भुत था। जाति का सिद्धांत स्वयं में दोषपूर्ण नहीं है। हर समाज को एक संरचना की आवश्यकता पड़ती है। निम्न जातियों को हेय दृष्टि से देखना अनुचित है, तब भी यह यह सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त एक मानवीय दुर्बलता है जिसका समर्थन पवित्र शास्त्रों द्वारा नहीं किया गया है। (जारी)


1 ‘यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् …. यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षू ँ्षि पश्यति’, केनोपनिषद (1.5-6) – संपादकीय टिप्पणी

ब्रह्माण्ड से महाकैलास तक की अनन्त यात्रा

कैलास दो बताये गये हैं- भूकैलास तथा महाकैलास। प्रचलित धारणा के विपरीत कुछ विद्वानों का यह मानना है कि भगवान् शिव का निवास परमधाम कैलास चीन में स्थित पर्वत नहीं है। पुराणों के अध्येता चीन स्थित पर्वत को वास्तविक भू-कैलास भी नहीं मानते। काशी के केदारखण्ड में भगवान् गौरीकेदारेश्वर का मन्दिर है। इस मन्दिर में खिचड़ी से निर्मित शिवलिंग के प्रादुर्भाव का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। भगवान् गौरी केदारेश्वर की महिमा ‘काशी केदार माहात्म्यम्’ नामक ग्रन्थ में वर्णित है। इस ग्रन्थ के चतुर्थ अध्याय में महाकैलास का वर्णन है:

अनेककोटिब्रह्माण्डाधारभूतमहोदके।
लक्षयोजनविस्तारा स्वर्णभूरिति शुश्रुम॥28॥
उन्नतं परमेशस्य स्थानं तल्लक्षयोजनम्।

महाकैलास इति च स्थानं वेदविदो विदुः॥29॥

चित्र आभार: काशी केदार माहात्म्यम्, श्री काशीकेदारखण्ड आध्यात्मिक संस्था

अर्थात्, अनेक कोटि ब्रह्माण्ड के आधारभूत महोदक में हम लोगों ने सुना है कि लाख योजन विस्तीर्ण स्वर्ण भूमि है। वहीं परमेश्वर का स्थान लाख योजन ऊँचा है, उसी को वेद के ज्ञाता महाकैलास कहते हैं।

यहाँ ‘आधारभूत महोदक’ पर विचार करना आवश्यक है। ग्रन्थ के अनुवादक ने इस जलरूपी महोदक को ‘परफेक्ट फ्लुइड’1 कहा है। फ्लुइड (fluid) अर्थात् वह जो बहे जैसे कि जल अथवा वायु। भौतिक विज्ञान में परफेक्ट फ्लुइड वह तरल होता है जिसमें चिपचिपापन अथवा श्यानता (viscosity) का अभाव हो तथा उसमें ऊष्मा प्रवाहित न हो सके। यह परफेक्ट फ्लुइड धरती के वातावरण में भी हो सकता है और तारों के अन्तःकरण में भी। उन्नीसवीं शताब्दी में जब माईकेल्सन और मोर्ले प्रकाश की गति ज्ञात करने में जुटे थे तब यह माना जाता था कि समूचे अंतरिक्ष की संरचना ईथर नामक अदृश्य द्रव से निर्मित है जिससे होकर गुजरते पृथ्वी आदि ग्रह घर्षण उत्पन्न करते हैं। आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण बल को सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत से समझाया और अपने इस सिद्धांत से ब्रह्माण्ड के दिक् काल संरचना की व्याख्या की। इस व्याख्या के लिए ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ऐसे द्रव की आवश्यकता थी जिसका व्यवहार परफेक्ट फ्लुइड जैसा हो। आज ‘टेन्सर एनालिसिस’ तथा ‘डिफरेंशियल ज्यामिति’ के समीकरणों में परफेक्ट फ्लुइड को रखना अनिवार्य तत्व है जिसकी सहायता से आधुनिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विस्तार का अध्ययन करता है।

शास्त्रों में यह परफेक्ट फ्लुइड कई रूपों में वर्णित है। शिवपुराण रुद्रसंहिता (प्रथम खण्ड) की कथा के अनुसार जब शिव ने अपने वाम अंग के दसवें अंश पर अमृत मला तो उससे श्रीविष्णु ने जन्म लिया। श्रीविष्णु ने सहस्रों वर्षों तक तप किया तो उनके अंगों से ‘नार’ रूपी दिव्य जल निकला और पूरे आकाश (अंतरिक्ष) में व्याप्त हो गया। श्रीविष्णु ने स्वयं इस जल में स्नान किया तत्पश्चात वे ‘नारायण’ कहलाए। उस समय उन परम पुरुष नारायण के सिवा कोई अन्य प्राकृत वस्तु नहीं थी। नारायण से ही यथासमय सभी तत्व प्रकट हुए। प्रकृति से महत्तत्व प्रकट हुआ तथा महत्तत्व से तीनों गुण। इन गुणों के भेद से ही त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति हुई। अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ हुईं और उन तन्मात्राओं से पाँच भूत प्रकट हुए।

यह वर्णन आधुनिक कणभौतिकी-ब्रह्माण्ड विज्ञान के सिद्धांत से मेल खाता प्रतीत होता है जिनमें कहा गया है कि ब्रह्माण्ड में सबसे पहले ‘बेरयॉन’ और क्वार्क जैसे कण उत्पन्न हुए जिनसे प्रोटॉन न्यूट्रॉन आदि की उत्पत्ति हुई। त्रिगुण को प्रकृति के तीन मूलभूत आकर्षण का स्वरूप माना जा सकता है जिनके द्वारा पदार्थ के कण एक दूसरे से बंधे होते हैं यथा- गुरुत्वाकर्षण, न्यूक्लिअर आकर्षण तथा विद्युतचुम्बकीय आकर्षण। ब्रह्माण्ड के आदिकाल में एक प्रकार का माइक्रोवेव रेडिएशन भी व्याप्त था जिसके छिटपुट लक्षण आज भी उन्नत उपकरणों द्वारा संसूचित किये जाते हैं।

ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 129वें सूक्त के 1 से 7 तक के मन्त्र नासदीय सूक्त कहलाते हैं। नासदीय सूक्त का तीसरा मन्त्र देखें:

तम आसीत् तमसा गूळहमग्रेsप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्
तुछ्येनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥

अर्थात्, सृष्टि से पूर्व प्रलयकाल में अंधकार व्याप्त था, सब कुछ अंधकार से आच्छादित था। अज्ञातावस्था में यह सब जल ही जल था और जो था वह चारों ओर होने वाले सत् असत् भाव से आच्छादित था। सब अविद्या से आच्छादित तम से एकाकार था और वह एक ब्रह्म तप के प्रभाव से हुआ। इस प्रकार वेद भी नार रूपी जल परफेक्ट फ्लुइड की व्याख्या करते हैं।

शिवपुराण और लिंगपुराण में कई जगह कहा गया है कि भगवान् शिव अनेक ब्रह्माण्डों की रचना एवं संहार करते हैं। महाकैलास के महोदक में स्थित होने की पुष्टि शिव अथर्वशीर्ष भी करता है। छठा मन्त्र देखें:

अक्षरात् संजायते कालः, कालाद् व्यापक उच्यते। व्यापको हि भगवान् रुद्रो भोगायमानो यदा शेते रुद्रस्तदा संहार्यते प्रजाः। उच्छ्वसिते तमो भवति तमस आपोsप्स्वङ्गुल्या मथिते मथितं शिशिरे शिशिरं मथ्यमानं फेनं भवति फेनादंडं भवत्यंडाद् ब्रह्मा भवति ब्रह्मणो वायुः वायोरोंकार ॐकारात् सावित्री सावित्र्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति॥

अर्थात्, अक्षर से काल उत्पन्न होता है। कालरूप होने से उसको व्यापक कहते हैं। व्यापक तथा भोगायमान रुद्र जब शयन करता है तब प्रजा का संहार होता है। जब वह श्वाससहित होता है तब तम होता है। तम से जल (आपः) होता है। जल में अपनी ऊँगली से मन्थन करने से वह जल शिशिर ऋतु के द्रव (ओस) जैसा हो जाता है। उसका मन्थन करने से फेन होता है। फेन से अंडा होता है। अंडे से ब्रह्मा होता है। ब्रह्मा से वायु, वायु से ॐकार होता है। ॐकार से सावित्री, सावित्री से गायत्री और गायत्री से सब लोक होते हैं।

यहाँ अंडे का अभिप्राय ब्रह्माण्ड समझा जा सकता है। फेन का मन्थन वह कालखण्ड हो सकता है जब बेरयॉन आदि कणों और पदार्थ की उत्पत्ति हुई। भगवान् शिव को काल (समय) का नियन्ता माना गया है। काल अर्थात् सृष्टि का प्रारंभ। शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी में आया है: नमः पूर्वजाय चापरजाय। अर्थात् समय से पूर्व और पश्चात विद्यमान रहने वाले रुद्र को नमस्कार है। सम्भवतः इसीलिए गन्धर्वराज पुष्पदंत ने भी शिवमहिम्नस्तोत्र के दूसरे श्लोक में ही कह दिया कि हे भगवान् आपकी महिमा का बखान तो वेद (श्रुति) भी नेति-नेति (नहीं नहीं) कहते हुए करते हैं अर्थात् डरते हुए करते हैं। महाकैलास द्वारा ही एक से अनेक ब्रह्माण्डों की रचना की जाती है इसमें कोई संशय नहीं। शिव अथर्वशीर्ष के पाँचवें मन्त्र में आया है:

एषो ह देवः प्रदिशो नु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अंतः। स एव जातः स जनिष्यमाणः सर्वतो मुखः। एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्मै य ईमाँल्लोकानीशत ईशनिभिः। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोप्ता।

अर्थात्, यही देव सब दिशाओं में रहता है। प्रथम जन्म उसी का है, मध्य में तथा अंत में वही विद्यमान है। वही उत्पन्न होता है और होगा। प्रत्येक व्यक्तिभाव में वही व्याप्त हो रहा है। एक रुद्र ही किसी अन्य की अपेक्षा न करते हुए अपनी महाशक्तियों से इस लोक में नियम रखता है। सब उसमें रहते हैं और अंत में सबका संकोच उसी में होता है।

यह विवरण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सिद्धांत बिग बैंग के ठीक उलट ‘बिग क्रंच’ कहे जाने वाले प्रतिपादन की ओर संकेत करता है। पॉल स्टाइनहार्ट और नील टुरोक के सिद्धांत के अनुसार तरंगों के रूप में कई ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं और जब भी एक ब्रह्माण्ड की परत दूसरे से स्पर्श होती है तब वहाँ कृष्ण विवर (ब्लैक होल) बन जाता है और यह दूसरे ब्रह्माण्ड तक जाने का मार्ग होता है। यह तभी सम्भव है जब पदार्थ पूर्ण रूप से ऊर्जा में परिवर्तित हो सूक्ष्म क्वॉन्टम अवस्था में गमन करे। इस अवस्था में स्थूल शरीर नहीं केवल ऊर्जा रूपी प्राण होता है।

पुष्पदंत ने शिव को कण रूपी व्यष्टि और ब्रह्माण्ड रूपी समष्टि दोनों प्रकार से प्रणाम किया है: नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः। वेद पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों में क्लिष्ट गणितीय समीकरण भले न हों किंतु वह दर्शन अवश्य है जिससे परमार्थ विज्ञान तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त हो। ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने की यात्रा महाकैलास धाम तक पहुँचने के प्रयास से कम नहीं। ॐ नमः शिवाय।


लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

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1 Perfect fluid अर्थात पूर्ण द्रव – Perfect लैटिन के per और facere से मिला कर बना है जिसका अर्थ होता है पूर्ण करना। perfectus का अर्थ ही completed होता है। Per की पूर्ण से समानता द्रष्टव्य है। द्रव की संगति द्रु से है – द्रु गतौ-भावे अप् जिसका अर्थ प्रवाह और (अश्व की तरह) गति से है। यहाँ dra मूल और draw शब्द को देखने से न्यून प्रतिरोध वाले श्यानहीन गति स्पष्ट होती है। विमानन विद्या में भी आगे बढ़ने के लिये draw शब्द का प्रयोग होता है जब कि ऊपर उठने के लिये lift का।
सम्पादकीय टिप्पणी


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