अभिषेक ओझा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से गणित और संगणना में समेकित निष्णात। न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर। गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि। ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

शून्य – 5

शून्य – 1, शून्य – 2 , शून्य – 3, शून्य – 4 से आगे … शून्य के वर्तमान गोले के रूप में लिखे जाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई इसका ठीक ठीक पता नहीं पर ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर में अंकित शून्य ही प्रथम लिखित शून्य  के रूप में मान्य है वैसे शून्य…

शून्य – 4

सिद्धांत-शिरोमणि (लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित) गणित का अद्भुत ग्रंथ है, आज भी। संभवतः उनकी गणितीय रचना से अधिक टीकायें और अनुवाद गणित के किसी पुस्तक की नहीं हुईं। यह रचना भारतीय शिक्षा पद्धति में किस तरह बसी होगी इसका अनुमान मैं इस बात से लगाता हूँ कि भास्कराचार्य के लगभग ८५० वर्ष पश्चात मुझे किसी ने गणित सिखाते हुए कहा था कि ‘मैं जो सिखाऊंगा वह चक्रवाल गणित है। इससे कोई सवाल बन जायेगा लेकिन परीक्षा में ऐसे मत लिखना।’ उस घटना के वर्षों पश्चात पता चला कि चकवाली विधि सच में एक गणितीय विधि है जिसके प्रणेता भास्कराचार्य थे।

शून्य – 3

शून्य – 1, शून्य – 2 से आगे … ‘शून्य’ की प्रथम स्पष्ट गणितीय परिभाषा ब्रह्मगुप्त (628 ई.) के ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में मिलती है। यह वह युग था जब अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति वेदांग ज्योतिष से अलग गणित के रूप में लगभग स्वतंत्र पहचान बना चुके थे। आर्यभटीय ज्योतिष का पहला ग्रन्थ है जिसमें गणित के…

शून्य

१२०२ ई. में फिबोनाची ने ‘लिबेर अबाचि’ अर्थात ‘गणना की पुस्तक’ की रचना की। यह भारतीय अंक पद्धति से यूरोप का पहला परिचय था। फिबोनाची ने इस पुस्तक में मोडस इंडोरम – यानी भारतीय पद्धति का उल्लेख किया।