एकांगी तंत्र, कथ्य के गल्पी दबाव और विभ्रम

यत्र तत्र की घटनायें अतिशयोक्तियों और पुनरुक्तियों के दुंदुभिनाद बन असहनीय दबाव रच रही हैं और अर्थ चालित छवि के बिगड़ने के भय ने उस विभ्रम की रचना की है जिसके केंद्र से चिंता और चेतावनी के हास्यास्पद स्वर रह रह फूट पड़ते हैं। वे ऐसे संकेत हैं, जिनका आना ही दर्शा देता है कि दबाव कितना है। ऐसी स्थिति क्यों है?

श्री भगवान सिंह से बातचीत – 1 : ऋग्वेद

श्री भगवान सिंह ‘मघा’ के इस अंक से हम एक नयी शृंखला आरम्भ कर रहे हैं जिसमें विविध विषयों पर विद्वानों से बातचीत और साक्षात्कार प्रस्तुत किये जायेंगे। श्रीगणेश के लिये भारत की सबसे प्राचीन थाती ‘ऋग्वेद’ से अधिक उपयुक्त कौन सा विषय हो सकता है और ऋग्वेद पर बातचीत के लिये स्वनामधन्य श्री भगवान…

अपनी बात

आज आषाढ़ मास की पूर्णिमा है जोकि गुरु पूर्णिमा कहलाती है। क्यों? गुरु कौन? आज चन्द्र उत्तराषाढ़ नक्षत्र पर होंगे। कल से श्रावण मास आरम्भ होगा, वर्षाकाल अब संयम प्रधान होगा। ऐसे में विशेष अध्ययन अध्यापन हेतु गुरु वांछनीय होंगे ही। प्राय: 21 जून को सूर्य के आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश के साथ ही मृगशिरस…

शर्वरी लोरी : वैदिक साहित्य की एक बरसाती पूर्णिमा

शर्वरी लोरी : वर्षा ऋतु का चन्द्र वृषभ है। समुद्र का किनारा है, पूर्णिमा है और चन्द्र निकल आया है। स्वच्छ आकाश में तारक गण हैं और बरसती चाँदनी भी है।

भारतीय कृषि, कोई है खेवनहार?

इस शताब्दी के तीसरे चौथे दशक में भारतीय कृषि के सामने विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या का पेट भरने की चुनौती होगी। चुनौती का अर्थ मात्रा और गुणवत्ता दोनों से है जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य से जुड़ते हैं। वास्तविकता यह है कि जितना ध्यान अन्य क्षेत्रों पर है उसका अल्पतम भी इस क्षेत्र पर नहीं है।…