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अवधी चिरइयाँ : गोजा (Saxicola maurus)

Saxicola maurus, गोजा, गप्पीदास। अयोध्या, उत्तरप्रदेश।

वैज्ञानिक नाम: Saxicola maurus
हिन्दी नाम:
गोजा, गप्पीदास
अंग़्रेजी नाम: Siberian Stonechat, Asian Stonechat
चित्र स्थान और दिनाङ्क: ग्राम – नरियाँवा, अयोध्या, उत्तर प्रदेश, 13/01/2017
छाया चित्रकार (Photographer): आजाद सिंह

Kingdom: Animalia
Phylum: Chordata
Class: Aves
Order: Passeriformes
Sub Order: Passeri
Infra Order: Passerida
Family: Muscicapidae
Genus: Saxicola
Species: Maurus
Category: Perching birds
Size: Sparrow (12-14 cm)

प्रवासी स्थिति:
स्थानीय, अप्रैल से जुलाई तक हिमालय क्षेत्र और सितम्बर  से मार्च तक मैदानी क्षेत्रों में। .

वितरण (भारत के पड़ोसी के सन्दर्भ में):
जाड़े में पूरे भारत, पाकिस्तान, बँगलादेश और म्यान्मार में। श्री लङ्का में नहीं पाये जाते हैं।

भोजन: कीट पतंगे

रूप रंग:
द्विरूपी (Dimorphic) अर्थात नर मादा अलग रूप के होते हैं। नर का सिर काला, वक्ष नारंगी भूरा, गले के दोनों ओर और पूँछ के ऊपर श्वेत धब्बे होते हैं। मादा में ऊपरी हिस्से पर गहरी लकीरें होती हैं। अलग अलग जोड़े खुले क्षेत्र में धान एवं गन्ने के खेतों में पौधों के ऊपर बैठकर कीटों को देखते रहते हैं।
अङ्ग्रेजी नाम Stonechat का स्रोत नर की बोली से प्रतीत होता है जो दो पत्थर के टुकड़ों को लड़ाने से निकली ध्वनि के समान होती है।

नीड़ निर्माण और प्रजनन:
ये हिमालय क्षेत्र में अप्रैल से जुलाई तक अपना घोंसला भू कोटर, छिद्र तथा कटान में घास फूस के तिनकों, बालों आदि से बनाते हैं। मादा एक बार में ३ से ५ अंडे देती है जिनका रंग पीला, नीला तथा  सफेद होता है और उनपर  ललछौंह भूरी रंग की लकीरें और धब्बे होते हैं। अंडे सेने की प्रक्रिया प्रायः मादा ही करती है, नर केवल घोंसला बनाने और बच्चों को चुगाने में सहयोग करते हैं। 


लेखक: आजाद सिंह
शिक्षा: जंतुविज्ञान परास्नातक,
लखनऊ विश्वविद्यालय
व्यवसाय: औषधि विपणन

अभिरुचि: फोटोग्राफी

यज़िदी : एक करुण पुकार

सुभाष काक

DFID - UK Department for International Development (picture: Rachel Unkovic/International Rescue Committee)

चित्र आभार: UK Department for International Development (DFID), Rachel Unkovic/International Rescue Committee, under Open Government license

सम्भवत: किसी और नृवंश ने यज़िदी लोगों जैसा संत्रास नहीं झेला है। ईराक़ में अल-क़ायदा ने उन्हें काफिर घोषित कर उनके सम्पूर्ण नरसंहार की अनुमति दी। 2007 में सुनियोजित कार बमों की शृंखला ने उनमें से लगभग 800 की हत्या कर दी।  

इस्लामिक स्टेट ने 2014 में यज़िदी नगरों और गाँवों के विनाश का एक अभियान आरम्भ किया, और इसने उनमें से लगभग 3000 की हत्या कर दी है, 6500 का अपहरण किया है और 4500 यज़िदी महिलाओं और लड़कियों को यौनदासत्त्व हेतु बेंच दिया है। बहुत सी अपहृत लडकियों ने आत्महत्या कर ली है। इन वर्षों में आक्रमण के भय से यज़िदियों के धार्मिक नेता बाबा शय्ख ने लालिश स्थित मुख्य मन्दिर में होने वाले आधिकारिक वार्षिक समारोह निरस्त कर दिये। 

लालिश का विहंगम दृश्य By Ger Al Hamud Ser bahger (From Iraq) [GFDL or CC-BY-SA-3.0], via Wikimedia Commons

 यज़िदी (या येज़िदी) मुख्यत: उत्तरी इराक़ में रहने वाले कुर्दिश भाषी लोग हैं। सदियों से अपने मुस्लिम और ईसाई पड़ोसियों द्वारा ‘शैतान पूजक’ के रूप में घृणित इन लोगों ने 70 से अधिक नरसंहारों का सामना किया जिनमें 2 करोड़ से ऊपर यज़िदियों की मृत्यु का अनुमान है, और उनमें से अधिकांश अपनी संस्कृति का त्याग करने के लिये बाध्य कर दिये गये हैं।

यूरोप में शरण लिये हुये 150,000 को मिला कर यज़िदियों की संख्या लगभग 800,000 है। वे स्वयं को एक सच्चे ईश्वर में आस्था रखने वाले बताते हैं, और वे मयूर देवदूत ‘ताउस मेलेक’ की आराधना करते हैं जो अनंत ईश्वर का रूप (अवतार) है। छ: दूसरे देवदूत तौस मेलेक के सहयोगी हैं और वे सृष्टि के सात दिनों से सम्बद्ध हैं जिनमें से रविवार ताउस मेलेक का दिन है। यज़िदियों के मन्दिरों और पूजागृहों तथा दूसरे स्थानों की सज्जा मोर के चित्राङ्कन से की जाती है। उन पर हो रहे आक्रमण ईसाइयों और मुसलमानों के इस विश्वास का परिणाम हैं कि मयूरदूत इब्लिस या शैतान है।       

यज़िदी पंथ एक रहस्यवादी, वाचिक परम्परा है जिसके प्रार्थना गीत (क़व्ल qawls) क़व्वालों द्वारा गाये जाते हैं। परम्परा के कुछ अंश अब दो पवित्र पुस्तकों में संग्रहीत किये गये हैं जिन्हें ‘किताब अल-जिल्वा’ (Revelation उद्घाटन की पुस्तक) और मिशेफ़ रेश (काली पुस्तक Mishefa Reş) कहा जाता है।

यज़िदी अपनी उत्पत्ति भारत में होने का दावा करते हैं, और मोर के प्रति उनका श्रद्धाभाव इस मूल की स्मृति हो सकता है। भारत में मोर शिवपुत्र मुरुगन (स्कन्द और कार्तिकेय) देव का वाहन है। कृष्ण भी अपने केशों या मुकुट में मोरपङ्ख पहनते हैं। आदिम इन्द्रधनुष से उपजे सात रंगों में से नीला रंग तौस मेलेक से सम्बन्धित है जो कि कृष्ण का भी रंग है। 

यज़िदी सूर्योन्मुख हो प्रार्थना करते हैं परंतु दोपहर की प्रार्थना वे लालिश (कुर्दिस्तान) की दिशा में करते हैं। भारतीय परम्परा जैसे ही वे पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं और उनकी मान्यता यह है कि ताऊस मेलेक के अतिरिक्त अन्य सभी देवदूत धरती पर संतों और पवित्रात्माओं के रूप में अवतरित होते हैं। हिंदुओं की तरह ही वे पुनर्जन्म के लिये वस्त्र बदलने के रूपक का प्रयोग करते हैं। 

दूसरी भारोपीय संस्कृतियों की तरह यज़िदी समुदाय तीन वर्गों में विभाजित है: शेख (पुजारी), पीर (वयोवृद्ध) और मुरीद (जन-सामान्य) और वे विवाह सम्बन्ध अपने समूह में भी करते हैं। यज़िदियों में पंथ-परिवर्तन का विधान नहीं है। शेख समुदाय फक़ीर, क़व्वाल तथा कोचक समूहों में बँटा हुआ है। वंश आधारित प्रशासनिक प्रमुख ‘मीर’ या राजकुमार होता है जब कि ‘बाबा शेख’ धार्मिक पदक्रम के प्रमुख होते हैं।

यज़िदी अपने आप को दासेनी (बहुवचन: दावासेन) कहते हैं जो देवयस्नि (संस्कृत, देवयाज्ञि) देवपूजक से उद्भूत है। इसकी पूरी सम्भावना है कि यज़िदी शब्द संस्कृत के यजाता से व्युत्पन्न है, जो कि प्राचीन पारसी (और कश्मीरी) में यज़ाता कहलाता है। प्राचीन पारसी में देव को दॆवा (daeva) कहते हैं।

प्राचीन भारत, ईरान और पश्चिम एशिया में वेदपूजकों को  देवयाज्ञि या देवयस्नी कहा जाता था जिसके समानार्थी सनातन या वैदिक धर्म हैं। पारसी अपने पंथ को माज़्दायास्ना (संस्कृत: मेधा-यज्ञ) या अहुर माज़्दा (संस्कृत: असुर मेधा, मेधा के देव) का पंथ कहते हैं। ज़रथुष्ट्र ने अपने पंथ को देवपंथ या देवयास्ना के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया।

भारत से देवयास्ना के प्रसार की सबसे प्रबल सम्भावना हड़प्पा संस्कृति के क्षय के पश्चात लगभग 1900 ई.पू. की बनती है जिसके शीघ्र पश्चात वैदिक देवता मेसोपोटामिया और सीरिया में वर्णित होने प्रारम्भ होते हैं। ज़रथुष्ट्र बैक्ट्रिया से अफगानिस्तान के समीप उत्तर-पूर्व ईरान क्षेत्र में आये और उनके नये पंथ ने पश्चिम के निवासी देवपूजक समुदायों को भारत स्थित समुदायों से विखंडित कर दिया। यज़िदियों का 4000 वर्ष पूर्व भारत से लौटने का इससे मेल खाता है।  

प्रसंगवश, यह रोचक है कि अरस्तू का विश्वास था कि यहूदियों की मूलभूमि भी भारत है। इसके अतिरिक्त स्वयं को एकेश्वरवादी (अल-मुवह्हिदून) कहने वाला अरबभाषी ड्रूज़ समुदाय भी पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और उनके पवित्र धर्मग्रन्थों में रसाइल-अल-हिंद  (भारतीय पत्रावली) भी सम्मिलित है।  

पारसी पंथ के उदय के पश्चात पश्चिमी एशिया में देवयास्ना पंथ पर्याप्त लम्बे समय तक बना रहा। उनके बने रहने का प्रमाण ईरानी सम्राट ज़ैरज़ैस (Xerxes, 486-465 ईसापूर्व) के देव- या दैव-अभिलेख में मिलता है जिसमें देवयास्नी विद्रोह का सीधा उल्लेख है। ज़ैरज़ैस घोषणा करता है: “और इन क्षेत्रों में एक स्थान ऐसा था जहाँ पहले दैव पूजे जाते थे। तदोपरांत, अहुरमज़्द की कृपा से, मैंने दैव स्थान को नष्ट कर दिया, और मैंने घोषणा की: दैव नहीं पूजे जायेंगे!” यह, लगभग 2500 वर्ष पहले का, यज़िदियों के देवयास्नि पूर्वजों द्वारा झेले गये दमन का एक पुराना लिखित प्रमाण है। 

यज़िदी पंचाङ्ग 4750 ईसापूर्व तक जाता है जोकि यवन (ग्रीक) इतिहासकार एरियन (Arrian) द्वारा सिकन्दर अभियान के वर्णन में उल्लिखित, भारत के 6676 ईसापूर्व में उदित हुए पुराने सप्तर्षि पंचांग से सम्बंधित प्रतीत होता है। (सप्तर्षि पञ्चाङ्ग के बारे में अधिक सामग्री मेरी पुस्तक The Astronomical Code of the gveda में उपलब्ध है।)

यज़िदियों की आध्यात्मिक परम्परा समृद्ध है और उनकी वर्तमान संस्कृति परम्परा बारहवीं शताब्दी के शेख आदि (देहांत 1162 ई.) से प्रारम्भ होती है जो चौथे उमय्यद खलीफ़ा मर्वान प्रथम के वंशज थे। शेख आदि का मकबरा उत्तरी ईराक़ के लालिश में है जो अब प्रमुख यज़िदी तीर्थयात्रा का केन्द्रबिन्दु है।

1919 ई. में छपी इस पुस्तक में यज़िदियों के प्रति ईसाई घृणा स्पष्ट है। उनकी आराधना पद्धति को Devil Worship और मयूर दीप स्तम्भ को Symbol of Devil बताया गया है।

नववर्ष उत्सव में [भारतीय, अनुवादक स्पष्टीकरण] काँस्य मयूर आरती-दीपों जैसे ही मयूर गढ़े हुए काँस्य-दीप ‘संजक’ एक शोभायात्रा में क़व्वालों द्वारा मीर के आवास से ले कर यज़िदी गाँवों में घुमाये जाते हैं। मान्यता है कि संजक भारत से आये थे और सात पवित्र देवदूतों के प्रतीक के रूप में मूलत: उनकी संख्या सात थी जिनमें से पाँच तुर्कों द्वारा छीन लिये गये, अब मात्र दो ही बचे हैं।      

यज़िदी लोग मानवता की अदम्य संकल्पशक्ति के एक प्रतीक हैं। संसार के सर्वाधिक दमित और प्रताड़ित जन में से एक यज़िदी समुदाय चरम विपरीत परिस्थितियों में भी अपने साहस और वीरता के लिये प्रशंसा, सहयोग और समर्थन का पात्र है।

(मूल अंग्रेजी आलेख से अनुवाद: अनुराग शर्मा और गिरिजेश राव)


सन्दर्भ :
Acikyildiz, The Yezidis. I.B. Tauris, 2010.

Kak, On Aristotle’s Claim that the Jews Originated in India.
https://www.linkedin.com/pulse/aristotles-claim-jews-originated-india-subhash-kak?trk=mp-reader-card

The Achaemenid Royal Daiva Inscription of Xerxes:
http://www.livius.org/aa-ac/achaemenians/XPh.html


श्री सुभाष काक भारत विद्या के जाने माने विद्वान हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नई दिल्ली से विद्युत अभियांत्रिकी में पी.एच.डी. श्री काक वर्तमान में ओकलाहामा राज्य विश्वविद्यालय के विद्युत और संगणक अभियांत्रिकी संस्थान में रिजेण्ट आचार्य हैं।