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मूलभूत इलेक्ट्रॉनिकी – भाग १ (Basic Electronics – Part 1)

मैं एक इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर हूँ। हमेशा से महसूस करती आई हूँ कि काश हिंदी में पुस्तकें इससे संबन्धित जानकारी देती होतीं, तो कितने ही और लाभ ले पाते।  सो अपनी एक छोटी सी शुरुआत कर रही हूँ।  मुझे लगता है कि पहले २-३ भागों में जो आयेगा उसे विज्ञान से जुड़े सामान्य पाठक भौतिकी और रासायनिकी विषयों में पहले ही पढ़ चुके होंगे  किन्तु आगे बढ़ने से पहले नींव आवश्यक है इसलिए शुरुआत यहीं से कर रही हूँ।
इलेक्ट्रॉनिकी का आरम्भ भौतिक और रसायन क्षेत्र में होता है। पहले परमाणु (Atom)। परमाणु के मोटा मोटी दो मुख्य भाग हैं,  एक है धनावेशित  (Positively Charged, + ) भारी भीतरी भाग (जिसमे भारी धनावेशित प्रोटॉन और भारी अनावेशित न्यूट्रॉन (Protons and Neutrons)हैं, इसे नाभिक (Nucleus) कहते हैं और दूसरा इसके विपरीत ऋणावेशित (Negatively Charged, -) हल्के इलेक्ट्रॉन (Electron) जो भीतरी  नाभिक के चक्कर काटते रहते हैं। इलेक्ट्रॉन ही इलेक्ट्रॉनिकी विधा का मूल है। परमाणु के भीतर और भी बहुत कुछ है लेकिन इलेक्ट्रॉनिकी पढ़ते समय उस की गहराई में जाने की आवश्यकता नहीं।
ये दोनों चित्र देखिये :

परमाणु को सौर्य मंडल की तरह सोचिये। जैसे हमारी पृथ्वी और अन्य ग्रह सूर्य के केंद्र में रख घूम रहे हैं इसी तरह समझिए कि इलेक्ट्रॉन नाभिक के आस पास घूम रहे हैं।  भीतरी इलेक्ट्रॉन नाभिक के आकर्षण से बहुत मजबूती से जुड़े हैं जबकि बाहरी वालों पर आकर्षण कम है। जैसे सौर्य मंडल में “प्लूटो” ग्रह बहुत दूर (बाहरी कक्षा में) होने के कारण सूर्य की आकर्षण शक्ति के बाहर भी माना जा सकता है (हालाँकि यह पूरी तरह सूर्य से स्वतंत्र नहीं) कुछ ऐसे ही सोचिये कि बाहरी इलेक्ट्रॉन भी स्वतंत्र हो कर बाहर भाग जाना चाहते हैं।  बस कोई और उन्हें बाहर खींचने के लिए शक्ति लगाए और वे भाग जाएंगे। किसी भी पदार्थ का एक परमाणु क्रमांक (Atomic Number) होता है और उसके हर परमाणु में उतने (बराबर बराबर) प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन होते हैं।  दोनों बराबर और विपरीत आवेशित हैं इसलिए पूरा परमाणु विद्युतीय रूप से तटस्थ (Neutral) है।

जब ये इलेक्ट्रॉन  बाहर निकल जाएंगे तो वे बाहरी विद्युत बलों से प्रभावित होने लगेंगे और जिस ओर धनावेशित कण उन्हें खींचे वे उसी दिशा में बहते चले जाएंगे।  यही प्रवाह विद्युत धारा (Electric Current) कहलाता है जिसकी दिशा इलेक्ट्रॉनों के प्रवाह के विपरीत ‘मानी जाती’ है।  बाहरी इलेक्ट्रॉन के निकल जाने पर बाकी बचे धनावेशित भाग को धनावेशित आयन (Positive Ion) कहते हैं जिसमें इलेक्ट्रॉन पहले से ज्यादा कस कर नाभिक की आकर्षण शक्ति के वश में होते हैं।  बाहरी कक्षा में आठ (या शून्य) इलेक्ट्रॉन होने से परमाणु आसानी से इलेक्ट्रॉन लेता या देता नहीं है।  यदि बाहरी कक्षा में १ या २ या ३ इलेक्ट्रॉन हैं तो वे बाहर जाने की प्रवृत्ति दिखाते हैं।  यदि ५ , ६ या ७ हैं तो दूसरे से लेकर ८ बन जाने के प्रयास करते हैं। इन्हीं कारणों से परमाणु एक दूसरे के साथ बन्ध (Bond) बनाते हैं।
बिजली के परिप्रेक्ष्य में हम सोचें तो मुख्यत: तीन तरह के पदार्थ हैं – संवाहक (कंडक्टर, Conductor ) जो बिजली को आसानी से प्रवाहित होने देते हैं, जैसे धातुयें – अल्युमिनियम, तांबा आदि क्योंकि इनकी बाहरी कक्षा के इलेक्ट्रॉन १ या २ हैं जो आसानी से बाहर खींचे जा सकते हैं। दूसरे पदार्थ हैं- विसंवाहक (इंसुलेटर,  Insulator ) जो बिजली को प्रवाहित नहीं होने देते (जब तक अधिक विद्युतीय बल के कारण ब्रेकडाउन न हो जाय)। तीसरे हैं अर्ध संवाहक (सेमी कंडक्टर, Semiconductor ) जो साधारण परिस्थिति में तो विसंवाहक हैं लेकिन विशेष स्थितियों में संवाहक की तरह व्यवहार करते हैं।
ये अर्ध संवाहक आवर्त सारणी के चौथे समूह में हैं – कार्बन, सिलिकॉन, जर्मेनियम इनमे मुख्य हैं। इनकी बाहरी कक्षा में चार इलेक्ट्रॉन होते हैं  जिन्हें न तो बाहर खींचना आसान होता है और  न ही दूसरे परमाणु से ४ इलेक्ट्रॉनओ ले लेना ही। इसलिये ये परमाणु अपने आस पास के परमाणुओं के साथ इलेक्ट्रॉनों की संयुक्त  भागीदारी करते हैं जिससे कि सभी के ८ इलेक्ट्रॉन पूरे हो जाते हैं।  यह चित्र देखिये।
इस चित्र में हर सिलिकॉन परमाणु के अपने बाहरी ४ इलेक्ट्रॉनों की पड़ोसी ४ परमाणुओं के साथ भागीदारी कर रहा है।  सारे इलेक्ट्रॉन चार नाभिकों के आस पास घूम रहे हैं और मजबूती से बंधे हैं – इसे संयोजी बन्ध (कोवेलेंट बॉन्ड, Covalent Bond) कहते हैं।  इसलिए इन्हें कक्षा से बाहर खींचना बहुत कठिन है।  साधारण परिस्थितियों में (शून्य केल्विन ताप पर) इनमें से कोई भी बाहर नहीं निकल पाता और पदार्थ एकदम अवरोधी की तरह बर्ताव करता है।
जैसे जैसे तापमान बढ़ कर वातावरण के साधारण तापमान (३०० केल्विन) तक आता है कुछ बंधन टूटते हैं और कुछ इलेक्ट्रॉन कक्षा से बाहर कूद जाते हैं।  एक इलेक्ट्रॉन नाभिक से मुक्त हो विद्युत प्रवाह में सम्मिलित हो सकता है। इस असंतुलन के कारण बन्ध में जो कमी आती है उसे कोटर या रिक्ति  (होल , Hole) कहते हैं और यह भी विद्युत प्रवाह में शामिल होता है, धनावेश के साथ।  यह दूसरे बन्ध के इलेक्ट्रॉनों को अपनी तरफ खींचता है और जैसे ही एक रिक्ति भरती है वैसे ही ठीक वैसी ही दूसरी रिक्ति पड़ोसी बन्ध में बन जाती है।  इलेक्ट्रॉन ऋणावेशित होने के कारण विद्युत क्षेत्र के धनाविष्ट क्षेत्र की ओर खिंचाव महसूस करते हैं, रिक्तियाँ धनाविष्ट होने के कारण उनकी विपरीत दिशा में चलती हैं।
ऊपर का जो चित्र है वह एक विशुद्ध या नियमित अर्ध संवाहक (Intrinsic Semiconductor) है। इसमें केवल सिलिकॉन के परमाणु हैं।  इसी तरह जर्मेनियम का भी विशुद्ध अर्ध संवाहक होगा।
अब सोचिये इस सिलिकॉन में ५वे ग्रुप के कुछ परमाणुओं की मिलावट की जाए तो क्या हो? उनमें हर एक के पास ४+१ = ५ इलेक्ट्रॉन हैं – संयोजी बन्ध की क्षमता से एक इलेक्ट्रॉन अधिक।  ठीक इसी तरह आवर्त सारिणी के समूह ३ में हर एक परमाणु के पास ४-१ = ३ इलेक्ट्रॉन हैं।  ये अनियमित अर्ध संवाहक (Extrinsic Semiconductor) कहलाते हैं।
इन पर अगली पोस्ट में बात करूँगी।