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सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 3

बुद्ध का बोध : बुद्ध दुःख को निश्चित मानते हैं। दुःख किसी पाप का परिणाम नहीं बल्कि संसार का नियम है। दुःख का कारण भी विकासवाद के स्वार्थ की ही तरह इच्छा है।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1   और 2 से आगे  …

विकासवादी मनोविज्ञान पढ़ते पढ़ते प्रश्न उठता है – हमारी भावनायें कितनी सत्य हैं? और कितनी छलावा? यदि वे मिथ्या हैं तो फिर सत्य क्या है? सत्य और मिथ्या के बीच विभाजन की रेखा कहाँ है? यदि हमारी भावनायें प्रकृति द्वारा केवल उत्तरजीविता और प्रजनन के लिए बनायी गयीं तो इससे यह स्पष्ट है कि हमारे अचेतन मन में जो चल रहा है उस पर हमारा पूर्ण अधिकार नहीं है अर्थात विकासवाद ने हमें एक मायाजाल में उलझा रखा है जिसमें हमारी भावनायें केवल विकासवाद के लक्ष्य पूरे करने के लिए होती हैं। साथ ही एक रोचक बात यह भी है कि इनमें से कई भावनाओं की हमें आवश्यकता नहीं है क्योंकि मानव सभ्यता विकासवाद की गति, जो आज भी शिकारी-संग्रहकर्ता के युग की है, से बहुत आगे निकल आयी है। जीव संसार में इसका एक सटीक उदाहरण है कीट पतंगों का आग के प्रति आकर्षित होना और जल  जाना। विकासवाद ने कीट पतंगों के गुणसूत्रों में एक गुण यह भी भरा कि रात्रि के समय दिशा के ज्ञान के लिए वे प्रकाश को देख एक विशेष कोण पर उड़ें। कालांतर में कृत्रिम प्रकाश के आ जाने से यह उनके लिए जानलेवा हो गया। ठीक इसी तरह प्रवासी पक्षी भी चाँद तारों की अवस्था से अपनी दिशा का पता लगाते हैं पर कृत्रिम प्रकाश से उन्हें भी खतरा उत्पन्न हो गया।1 हर योनि के जीवों में प्रकृति ने ऐसे गुण भरे, मनुष्य के भीतर तो ऐसी मायारुपी भावनाओं का भण्डार ही भर दिया!

तथागत प्रकृति के इस स्वार्थी माया के विरुद्ध विद्रोह करते दिखते हैं। उनके ‘दुःख’ और विकासवाद के इस सिद्धांत की एक रोचक बात यह भी है कि बुद्ध दुःख को निश्चित मानते हैं। बुद्ध का दुःख किसी पाप का परिणाम नहीं बल्कि वह संसार का नियम है, प्रकृति है। उनके दुःख का कारण भी विकासवाद के स्वार्थ की ही तरह इच्छा है। तथागत वेदांत से प्रेरित हो कई सिद्धांतों को एक स्पष्ट गति देते हैं। जैसे हर एक नए आविष्कार के लिए सदियों से हुए आविष्कार उसका आधार बनते हैं, जैसे अंकों और गणित के बिना भौतिकी की कल्पना नहीं की जा सकती; उसी तरह वह वेदांत से मोती चुन आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग प्रतिपादित करते हैं। अनिच्छा और अनत्ता की बात करते हैं। विकासवाद के अन्धकार में उलझी भावनाओं को पढ़ते हुए बुद्ध के साथ गीता के – ‘य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह’ और वेदांत के ‘नेति-नेति’ के दर्शन अनायास ही मस्तिष्क में आते हैं।

‘क्योटो में कृष्ण ‘, जापानी सम्राट शोमू के आदेश पर 752 ई. में बने मन्दिर के ‘महा बुद्ध मण्डप ‘ में बाँसुरी बजाते हुये श्रीकृष्ण का अङ्कन , स्रोत : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/0/00/Krishna-in-Kyoto-1.jpg , Public Domain

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष को और प्रकृति के विविध प्रकार के प्रभाव रखने वाले गुणों को अलग अलग जान लेता है वही वास्तव में ज्ञानी पुरुष है। यहाँ भगवान स्पष्टतः दुष्चक्र  को तोड़ प्रकृति के गुणों से विलग रहकर उनका वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने को प्रेरित करते हैं। प्रकृति के विकारों और गुणों को जानने के लिए उनका द्रष्टा बन जाने को कहते हैं। ‘आत्मस्वरूप’ हो अविद्या नष्ट करने को कहते हैं। ये सारे सिद्धांत एक मूलभुत सत्य के तार से जुड़े दिखते हैं – एक ही ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलने वाले किसी प्रोग्राम के विभिन्न संस्करणों की तरह।

आधुनिक विकासवादी मनोविज्ञान मानव की वर्तमान अवस्था को जिन पूर्वाग्रहों और असंतोष से पीड़ित बताती है उनका कोई सटीक हल नहीं बताती। यदि हम विश्व के दर्शनों में इसका हल ढूँढना चाहें तो आत्मनियंत्रण और प्राचीन भारत के ऊपर वर्णित सिद्धांतों से उत्तम हल कहीं नहीं मिलता और आधुनिक विज्ञान इसका समर्थन करता है। न्यूरोसाइंस में मस्तिष्क के ‘डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क’ का सिद्धांत होता है – जब हम किसी काम में व्यस्त नहीं होते हैं उस समय मस्तिष्क का सक्रिय रहने वाला नेटवर्क। जिसे हम ‘खाली दिमाग शैतान का घर’ कहते हैं। जब बैठे बैठे मन बहकता है, हम बैठे बैठे सपने देखते हैं, जब हम  किसी और के बारे में सोचते हैं, ख़याली महल बना रहे होते हैं या अपने अतीत में विचरते हैं; अर्थात वर्तमान को छोड़ अतीत और भविष्य की चिंता में खोये रहना। यादृच्छ (रैंडम) विचार (विकासवाद के अनुसार प्रकृति के स्वार्थी तत्व) अपने काम में लगे होते हैं। यह सबमें एक समान नहीं होता। कुछ लोग सोचते ही रहते हैं तो कुछ लोग ‘व्यस्त रहें – मस्त रहें’ वाले। इसके विपरीत ‘टास्क-पॉजिटिव नेटवर्क’ उस समय सक्रिय होता है जब हम वर्तमान में जी रहे होते हैं। डिफ़ॉल्ट नेटवर्क ऑफ हो जाने का अर्थ हुआ – निराला !

डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की अतिसक्रियता का अध्ययन वैज्ञानिकों ने कई सन्दर्भों में किया जिनमें डिप्रेशन और मानसिक बीमारियाँ भी हैं। डिफ़ॉल्ट नेटवर्क की अतिसक्रियता और टास्क पॉजिटिव नेटवर्क की कम सक्रियता मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। येल विश्वविद्यालय में किये गए अध्ययन के अनुसार2 ध्यान योग से डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की सक्रियता में कमी आती है। ऐसे कई अध्ययन हैं जिनमें इस बात की पुष्टि होती है।3 हार्वर्ड विश्वविद्यालय में किये गए एक अन्य अध्ययन में भी ध्यान योग से होने वाले लाभों की न्यूरोसाइंटिफ़िक विधि से पुष्टि हुई।4 ऐसे अन्य कई अध्ययन हैं जो सदियों पहले कही गयी बातों की प्रायोगिक पुष्टि करते हैं। विकासवादी मनोविज्ञान के इस एक पहलू के अतिरिक्त संज्ञानात्मक विज्ञान (कॉग्निटिव साइंस) में प्राचीन भारतीय और बौद्ध सिद्धांतों के वैज्ञानिक अध्ययन की असीम सम्भावनायें हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान और प्राचीन भारतीय दर्शन दोनों से निष्कर्ष निकलता है कि अनेकों अनिच्छित नकारात्मक प्रवृत्तियाँ मानव में निर्मित होती हैं। उनका समाधान है, उन्हें पहचानना और आत्म नियंत्रण। इसे हम चाहे जिन शब्दों में कहना चाहें – सम व्यवहार; अनेक श्लोकों में वर्णित स्थितप्रज्ञ के लक्षण; मोह, चिंता और भ्रांतियों के दुष्चक्र से मुक्ति; बुद्ध के मार्ग पर चल धीरे धीरे पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ सत्य को देखने की क्षमता विकसित करना; न्यूरॉन्स को ध्यान भंग करने वाले संदेशों से विचलित न होने के लिए प्रशिक्षित करना, ध्यान से डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क को ऑफ करना या increased gray-matter density in the Hippocampus!5

(क्रमश:)


सन्दर्भ:

1. http://www.bbc.com/news/world-us-canada-32491715
2. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4529365/
3. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3250176/
4. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3004979/
5.  http://news.harvard.edu/gazette/story/2011/01/eight-weeks-to-a-better-brain/

लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

वैदिक साहित्य – 2

वैदिक साहित्य -1से आगे

चेतना के स्तर अनुसार वेदों के मंत्र अपने कई अर्थ खोलते हैं। कतिपय विद्वानों की मान्यता है कि किसी श्रुति के छ: तक अर्थ भी किये जा सकते हैं – सोम चन्द्र भी है, वनस्पति भी है, सहस्रार से झरता प्रवाह भी। वेदों के कुछ  मंत्र अतीव साहित्यिकता लिये हुये हैं। इस शृंखला में हम कुछ मंत्रों के भावानुवाद प्रस्तुत करेंगे।

शृंगार

यथा वृक्षं लिबुजा समन्तं परिषस्वजे।
एषा परिष्वज स्वयां यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः॥

यथा सुपर्णः प्रपतन् पक्षौ निहंति भूम्याम्।
एवा नि हन्मि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः॥

यथेमे द्यावा पृथ्वी सद्यः पर्येति सूर्यः।
एवा पर्येमि ते मनो
यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः॥
(अथर्ववेद, 6.8.1-3)

आ निकट प्रिये तूँ दूर न जा !
मेरे तन से निज तन लिपटा !!

जिस भाँति वृक्ष के सुघड़ तने से आ लिपटे एक नरम लता ।
मुझसे टिक कर निज अंग लगा॥
आ निकट प्रिये तूँ दूर न जा !

जैसे पर कटा गरुड़ कोई पृथ्वी पर वेग लिये गिरता ।
वैसे ही मेरी और लपक बन कर तूँ आज काम-विद्धा ॥
मेरे आलिंगन में बँध जा ।
आ निकट प्रिये तूँ दूर न जा !

पृथ्वी और अम्बर दोनों को जिस भाँति सूर्य है ढँक लेता ।
वैसे ही तुझ पर छा कर मैं निज बीज-भूमि दूँ तुझे बना ॥
तूँ भी मेरे मन पर छा जा ।
आ निकट प्रिये तूँ दूर न जा !

भावानुवाद: श्री त्रिलोचन नाथ तिवारी