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विलम्ब से किस्त (EMI) भरने पर सिबिल अङ्क (CIBIL Score) पर प्रभाव

CIBIL (सिबिल), Credit Information Bureau (India) Limited,
अब TransUnion CIBIL है। 2016 ई. में कम्पनी का 82% भाग TransUnion CIBIL द्वारा क्रय करने के कारण ऐसा हुआ।

विवेक रस्तोगी

CIBIL (सिबिल) का क्रेडिट स्कोर किसी भी व्यक्ति का वित्तीय स्वास्थ्य बताता है, और साथ ही यह भी बताता है कि यदि किसी व्यक्ति को ऋण दिया जाये तो वह ऋण को चुकाने की क्षमता और इच्छा रखता है या नहीं। बैंक एवं ऋण-दाता वित्तीय संस्थायें इससे व्यक्ति के बारे में यह जाँचती हैं कि उसे ऋण देना भी चाहिये या नहीं, यानि कि विभिन्न क्रेडिट स्कोर के विभिन्न मानदण्डों पर वह व्यक्ति खरा उतरता भी है या नहीं। अपना क्रेडिट स्कोर अच्छा रखने के लिये एक महत्वपूर्ण बिंदु होता है ऋण की EMI (Equated Monthly Installment, समीकृत मासिक किस्त) का समय से भुगतान करना। यदि EMI का भुगतान समय से नहीं किया जाता है तो इसकी बहुत ही अधिक संभावना है कि क्रेडिट स्कोर बुरी तरह से खराब हो जायेगा और बैंक उस व्यक्ति को कोई भी नया ऋण देने से मना कर सकते हैं।

सिबिल (CIBIL) संस्था को भारतीय रिजर्व बैंक की सिद्दिक़ी समिति की अनुशंसा पर 2000 ई. में निगमित किया गया। लगभग हर एक वित्तीय संस्था द्वारा हर व्यक्ति के क्रेडिट अर्थात ऋण के लेन देन को सिबिल के माध्यम से निगरानी में रखा जाता है। सिबिल व्यक्ति और संस्था या कंपनी के हर तरह के ऋण के लेन-देन और स्वास्थ्य को परखती है और उनका क्रेडिट स्कोर तय करती है। इन सबका आँकड़ा एक सूची (Database)  में रखा जाता है जो कि सिबिल के पास होता है।

बैंक या ऋणदाता वित्तीय संस्थान सरलता से किसी भी आवेदक के बारे में ऋण देने के पहले सिबिल की वेब साईट से क्रेडिट स्कोर और क्रेडिट इन्फर्मेशन रिपोर्ट के जरिये उसका वित्तीय स्वास्थ्य जान सकते हैं। क्रेडिट रिपोर्ट और क्रेडिट इन्फर्मेशन रिपोर्ट निकालना बहुत ही सरल और सुलभ है। क्रेडिट रिपोर्ट से वित्तीय संस्थान देने के पहले ही अपने ऋण को खराब ऋण होने से बचा लेते हैं, साथ ही वे आश्वस्त भी हो जाते हैं कि अच्छे क्रेडिट स्कोर वाला व्यक्ति ऋण भगतान कर देगा। यह भी जान लेना चाहिये कि सिबिल स्वयं से ही किसी भी व्यक्ति या कंपनी या संस्थान का क्रेडिट स्कोर नहीं सुधार या बिगाड़ सकता है किंतु यदि बैंक और वित्तीय संस्थान खराब ट्रांजेक्शन रिपोर्ट सिबिल को भेजते हैं तो क्रेडिट स्कोर खराब हो जाता है। बैंक और वित्तीय संस्थान सारे लेन-देन अपने सॉफ्टवेयर से निकालकर सीधे सिबिल की साईट पर अपलोड कर देते हैं जिससे मानवीय भूल होने की सम्भावना नहीं रहती।

विलम्ब से भुगतान और क्रेडिट स्कोर:

अच्छा क्रेडिट स्कोर रखने के लिये अपनी EMI का आपको समय पर भुगतान तो करना ही होता है, साथ ही ध्यान भी रखना होता है कि जितनी EMI है उतनी ही जमा हो, तो इसके लिये कुछ बातें ध्यान रखनी चाहिये जैसे कि यदि विलम्ब से भुगतान किया जाता है तो आपके क्रेडिट स्कोर का तो नुक्सान होता ही है, साथ ही आपको विलम्ब से जमा करने के शुल्क या पेनल ब्याज का भी भुगतना करना होता है।

विलम्ब से बैंक को हानि भी होती है: यदि आप बैंक को विलम्ब से भुगतान करते हैं तो बैंक को भी उसका नुकसान भुगतना पड़ता है क्योंकि बैंक ने भी यह सोचा हुआ होता है कि आप उनकी EMI चुकायेंगे तो वे कहीं और भुगतान करेंगे। विलम्ब होने पर बैंक आपसे भारी भरकम शुल्क तो लेते ही हैं साथ ही सिबिल को भी बताते हैं कि आपको ऋण देना निरापद नहीं है, आपका लेन-देन का व्यवहार ठीक नहीं है।

कम सिबिल स्कोर को हटाना बहुत कठिन होता है:  जब बैंक या वित्तीय संस्थान सिबिल को आपके खराब लेनदेन के व्यवहार के बारे में बताते हैं तो आपका क्रेडिट स्कोर बहुत ही कम हो जाता है, जो कि यह बताता है कि आपको ऋण देना  जोखिम का काम है और ऋण डूब सकता है। क्रेडिट स्कोर को ठीक करना बहुत सरल नहीं होता और ठीक करने में बहुत समय लगता है। जब आप समय पर सुचारु ढंग से अपनी EMI का भुगतान करते हैं, तो क्रेडिट स्कोर ठीक होता है। इसके लिये आप कोई छोटा सा ऋण ले लें और समय पर उसको जमा करते रहें।

एक खराब ट्रांजेक्शन क्रेडिट स्कोर को खराब करने के लिये काफी है: यदि आप वर्षों से सही समय पर सारे ऋण की EMI का भुगतान करते आ रहे हैं और क्रेडिट कार्ड का बिल समय से भरते आ रहे हैं तो भी एक बार भी यदि भुगतान करने में चूक हो गई तो वह क्रेडिट स्कोर को खराब करने के लिये काफी है।

आपको अधिक शुल्क भी चुकाने पड़ते हैं:  विलम्ब से भुगतान के लिये आपका क्रेडिट स्कोर तो खराब होता ही है, यह आपकी जेब पर भी भारी पड़ता है और आपको अधिक शुल्क चुकाने पड़ते हैं। यदि क्रेडिट कार्ड का भुगतान विलम्ब से करते हैं तो बहुत अधिक दण्ड (पैनल्टी) है, ब्याज तो बहुत अधिक होता ही है!

लगभग सभी तरह के ऋण की क्रेडिट हिस्ट्री सिबिल से लिंक हैं भले वे व्यक्तिगत ऋण, गृह ऋण, कार ऋण या स्कूटर ऋण कुछ भी हों। गृह ऋण एक ऐसा ऋण है जो अपना घर बनाने के लिये लगभग हर व्यक्ति लेना चाहता है। गृह ऋण लेने के लिये आपको अपनी क्रेडिट हिस्ट्री अच्छी रखनी ही होगी, जिससे कि क्रेडिट स्कोर अच्छा बना रहे और आपको गृह ऋण मिल जाये।

ऋणी के रूप में आपको क्या जानना चाहिये:

सबसे पहले तो आपको पता होना चाहिये कि किसी भी प्रकार के ऋण में, पर्सनल लोन हो या क्रेडिट कार्ड, विलम्ब से भुगतान और बकाया राशि न भरना सीधे आपके क्रेडिट स्कोर पर प्रभाव डालता है। यदि आपने कोई ऋण लिया है या आपके पास क्रेडिट कार्ड है तो क्रेडिट कार्ड का भुगतान तय आखिरी तारीख से पहले कर दें या ऋण है तो ऋण की EMI तय समय से भुगतान कर दें।

यदि आपका क्रेडिट कार्ड का बिल बाकी है और उसे आप आगे जारी नहीं रखना चाहते हैं तो जानबूझ कर विलम्ब कर कमी बेसी ‘सैटल’ करने के स्थान पर पूरा पैसा भरिये और बंद करवाइये। आप अपने किसी भी ऋण की किश्त यदि विलम्ब से भरते हैं तो भी बैंक या वित्तीय संस्था आपके इस व्यवहार को सिबिल में दी जाने वाली लेन-देन रिपोर्ट के रूप में सम्मिलित कर देते हैं।

अपनी जानकारी अद्यतन (Up-to-date) रखें:

जब हम ऋण लेते हैं या क्रेडिट कार्ड लेते हैं तो बहुत सी जानकारी समय समय पर हमें बैंक या क्रेडिट कार्ड कंपनी को बदलने पर दे देनी चाहिये, जैसे कि घर का पता, फोन नंबर या ईमेल आई.डी., जिससे आपके पास जब भी बैंक ऋण भुगतान संबंधी सूचना भेजना चाहें या क्रेडिट कार्ड कंपनी सूचना भेजना चाहें तो वह आपको समय पर मिल जाये। किसी भी तरह की असुविधा से बचने के लिये हमेशा अपनी सारी जानकारी बैंक या क्रेडिट कार्ड कंपनी के साथ अद्यतन रखें।

स्वत: भुगतना (ऑटो डेबिट) सुविधा का लाभ उठायें:

यदि आपका वेतन खाता ऋण देने वाले बैंक में ही है तो आप उनको स्थायी अनुदेश (स्टैंडिंग इन्स्ट्रक्शन) दे दीजिये कि भुगतान की तिथि को आप बकाया भुगतान ऋण खाते में या क्रेडिट कार्ड खाते में जमा कर दें। यदि किसी और बैंक के खाते में भी है तो आप अपने ऋण के लिये ECS (Electronic Clearing Service) के द्वारा भुगतान करने का विकल्प चुनिये। यह खासकर आपके लिये तब बहुत ही उपयोगी है जब आपके पास हर माह भुगतान के लिये समय न हो। इससे आप भुगतान की चिंता से मुक्ति पायेंगे और खुद ही भुगतान हो जायेगा। बस आपको यह सुनिश्चित करना है कि आपके बचत खाते में उतनी मुद्रा रहे।

यदि अधिक कार्ड रखते हैं तो सभी क्रेडिट कार्डों का उपयोग करें, इससे एक तो आप सभी क्रेडिट कार्डों का उपयोग कर रहे होते हैं और साथ ही सभी क्रेडिट कार्डों की अधिकतम सीमा का लाभ भी उठा रहे होते हैं। इससे एक लाभ और है कि सभी कार्डों की भुगतान तिथि अलग अलग होने पर आपको अतिरिक्त अवधि मिल जाती है और समस्त भुगतान एकसाथ नहीं करना पड़ता।

अपनी देयराशि की EMI बनवा लें:

यदि आपको लगता है कि आप अपने क्रेडिट कार्ड की देय राशि पूरी जमा नहीं कर पायेंगे, तो बेहतर है कि बड़े खर्चों की आप EMI करवा लें, और बाकी का पैसा भर दें। यदि वह भी नहीं भर पा रहे हैं तो आप क्रेडिट कार्ड कंपनी से बात करके पूरी देयराशि की EMI करवा लें, EMI आपको सस्ती पड़ेगी। यदि आप क्रेडिट कार्ड की राशि समय पर या उससे पहले नहीं चुकायेंगे तो आपको अधिक ब्याज और शुल्क तो भरना ही होगा, साथ ही क्रेडिट स्कोर पर भी सीधा प्रभाव पड़ेगा।

यदि चेक या बिल पे से भुगतान कर रहे हैं तो थोड़ा पहले कर दें:

यदि आप अपने ऋण या क्रेडिट कार्ड का भुगतान चेक या बिल पे से कर रहे हैं तो ध्यान रखें कि इन दोनों में ही 3 दिन का समय लगता है। बैंक द्वारा पूर्ण प्रक्रिया में लगने वाला समय लगभग 3 दिन का होता है, तो 3 दिन पहले ही आप अपने भुगतान इस माध्यम से कर दें। पहले NEFT से भुगतान में भी बैंक 3 दिन का समय लेते थे, परंतु आजकल अधिकतर बैंक उसी दिन भुगतान आपके खाते में अपडेट कर देते हैं।

भले मित्रों से उधार लें, पर वित्तीय संस्था के ऋण का समय से भुगतान करें:

यदि भुगतान तारीख पास ही है, और कहीं से भी मुद्रा की व्यवस्था नहीं हो पा रही है, तो अपने मित्रों या निकट सम्बन्धियों से बातकर उनसे थोड़े दिनों के लिये उधार ले लें और बैंक या क्रेडिट क्रार्ड कंपनी को भुगतान कर दें। भुगतान की अंतिम तिथि सर्वदा ध्यान में रखें नहीं तो चूक का सीधा प्रभाव आपके CIBIL क्रेडिट स्कोर पर पड़ेगा।

अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था: भाग – 1

अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर विचार करने से पहले यह जानना होगा कि अर्थशास्त्र क्या है?
अर्थशास्त्र वह विधा है जो इसका अध्ययन करती है कि समाज अपने अल्प संसाधनों से मूल्यवान उत्पाद या सेवाओं का किस प्रकार निर्माण तथा जनमानस में वितरण करता है।

अरस्तू के अनुसार मानव स्वभावतः एक राजनैतिक पशु है क्योंकि वह एक सामाजिक प्राणी है जिसे अभिव्यक्ति और नैतिक रूप से तर्क करने की शक्ति प्राप्त है।

अरस्तू की 'एथिका निकोमेकिया' का अंश

अरस्तू की ‘एथिका निकोमेकिया’ का अंश

अर्थशास्त्र में प्रथम अमरीकी नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल सैमुएल्सन ने अपनी पुस्तक में अर्थशास्त्र की परिभाषा बताई है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र वह विधा है जो इसका अध्ययन करती है कि समाज अपने अल्प संसाधनों से मूल्यवान उत्पाद या सेवाओं का किस प्रकार निर्माण तथा जनमानस में वितरण करता है। इन दोनों विचारों को स्वीकार करते ही राजनीति और अर्थव्यवस्था के मध्य परस्पर निर्भरता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्तुतः एडम स्मिथ से लेकर कार्ल मार्क्स और जॉन स्टुअर्ट मिल्स तक ने ‘राजनैतिक अर्थव्यवस्था’ की ही व्याख्या की थी। राजनैतिक अर्थशास्त्र एक विषय के रूप में राज-व्यवस्था एवं बाजार के मध्य अंतर्सम्बंध को प्रमाणित करने का कार्य करता है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके बाजार द्वारा संचालित होती है जहाँ आर्थिक गतिविधियों की उठा पटक के मापदण्ड क्रय-विक्रय के मूल्यों द्वारा निर्धारित होते हैं। इसमें नियामक की भूमिका उक्त देश की मौद्रिक नीति तथा कर की दरें निभाती हैं।

जब वस्तुयें अथवा सेवायें एक देश से दूसरे देश ले जाकर बेची जाती हैं तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार खड़ा होता है। यह बाजार किसी देश के घरेलू बाजार से कई मायने में भिन्न होता है। यहाँ हर प्रकार का उत्पाद न बेचा जा सकता है न क्रय किया जा सकता है। राजनेताओं की व्यक्तिगत उत्कण्ठा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कुण्ठित हो जाती हैं। अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की सीमायें लाँघना कई उत्पादों के लिए इतना कठिन हो जाता है कि उनका उत्पादन ही बन्द  हो जाता है। आयात किये जाने वाले माल पर जो कर लगाया जाता है उसे प्रशुल्क ‘टैरिफ ड्यूटी, Tariff Duty’ कहा जाता है।  इसकी दरें बढ़ा कर कोई देश किसी विदेशी उत्पाद को अपने बाजार में आने से रोक सकता है। सन् 1930 के दशक में कुछ देश ‘पड़ोसी को भिखमंगा बना दो – beggar-thy-neighbour’ की नीति पर चलते थे जिसके अनुसार ऐसी आर्थिक नीतियाँ बनाई जाती थीं जिनसे स्वहित के लिये पड़ोसी देश को भिखारी बना दिया जाये। एक समय में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ वणिकराष्ट्रवाद ‘mercantilism’ के यथार्थवादी सिद्धांत पर की जाती थीं जिसके अनुसार कोई देश किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था के नियमों को न मानकर वही निर्णय लेता था जो उसके हित में हो। कुछ देश अपने प्रमुख उद्योगों को व्यापार की सन्धियों से दूर रखते थे तो कुछ आत्मनिर्भर अर्थतंत्र ‘अटार्की, autarky’ में विश्वास रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में न्यूनतम भागीदारी निभाते थे। उनका मानना था कि सब कुछ बनाने में वे स्वयं सक्षम हैं, उन्हें किसी दूसरे देश के सहयोग की आवश्यकता नहीं। हालांकि ऑटर्की का यह सिद्धांत अधिक लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ और उन देशों को रोना पड़ा जो अतिशय स्वावलंबन में विश्वास रखते थे। नव-उदारवाद के साथ भूमण्डलीकरण की अवधारणा बली होती गयी परिणामस्वरूप आज सम्भवतः हर देश ने व्यापार के लिये अपने द्वार खोल दिये हैं।

यूरोप व अमरीका सदैव मुक्त व्यापार के पक्षधर रहे हैं। जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद का झण्डा बुलन्द था तब वे एशियाई देशों की सम्पदा पर अपना अधिकार मानते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही ऐसा प्रतीत होने लगा था कि ब्रिटिश उपनिवेश अधिक दिनों तक पराधीन नहीं रहेंगे। तब वैश्विक राजनीति में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए ब्रिटेन और अमरीका ने जुलाई सन् 1944 में न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स में 44 राष्ट्रों का एक सम्मेलन बुलाया। उसमें प्रसिद्ध ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स तथा अमरीका के वित्त मंत्रालय (Treasury Department) के हैरी वाइट ने जो प्रस्ताव रखे उनसे चार संस्थाओं का जन्म हुआ। युद्ध की समाप्ति के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु जिस बैंक ‘International Bank for Reconstruction and Development’ का गठन किया गया उसे हम आज विश्व बैंक (World Bank) के नाम से जानते हैं। व्यापार में विनिमय दरों के निर्धारण के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) बनाया गया जिसने अमरीकी डॉलर को स्थाई रूप से शक्ति प्रदान करते हुए एक ऑउंस (28.35 ग्राम)  स्वर्ण बराबर 35 डॉलर की दर निर्धारित कर दी। इसका अर्थ यह था कि अमरीकी डॉलर के अतिरिक्त अन्य देशों की मुद्रायें परस्पर परिवर्तित नहीं हो सकती थीं वरन् उतने मूल्य के स्वर्ण से बदली जा सकती थीं जिसका मान अमरीकी डॉलर द्वारा निर्धारित होता था। इसे बद्ध विनिमय दर प्रणाली (Fixed Exchange Rate System) कहा गया। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ की दरों पर सन्धिवार्ता (negotiation) हेतु मंच प्रदान करने के उद्देश्य से गैट (जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड ऐण्ड टैरिफ, General Agreement on Trade and Tariff) की स्थापना की गयी। यही संस्था 1995 में विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) बन गयी।

ब्रेटन वुड्स प्रणाली द्वारा निर्मित संस्थान सन् 1971 तक सही चले किंतु उसके पश्चात यह प्रणाली ध्वस्त हो गयी। सन् 1970 के दशक में अमरीका स्थिर-मुद्रास्फीति ‘stagflation’ के दौर से गुजर रहा था। स्थिर मुद्रास्फीति की दर और बेरोजगारी ने अमरीका की कमर तोड़ दी थी। सन् 1973 में ‘योम किपर, Yom Kippur‘ या रमज़ान युद्ध में इजराइल को समर्थन देने के विरोध में तेल बेचने वाले अरबी देशों ने अमरीका को तेल बेचने से मना कर दिया था। परिणामस्वरूप 1974 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली ध्वस्त हो गयी। इसका प्रभाव यह पड़ा कि डॉलर एक स्थिर विनिमय मुद्रा नहीं रह गयी बल्कि सभी देशों की मुद्रायें परस्पर विनिमय दर तय कर सकती थीं।

ब्रेटन वुड्स प्रणाली के अवसान के बाद सन् 1974 में नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order) का प्रस्ताव रखा गया।

(नयी व्यवस्था पर अगले अङ्क में)

 


लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

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