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अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था: भाग – 1

अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर विचार करने से पहले यह जानना होगा कि अर्थशास्त्र क्या है?
अर्थशास्त्र वह विधा है जो इसका अध्ययन करती है कि समाज अपने अल्प संसाधनों से मूल्यवान उत्पाद या सेवाओं का किस प्रकार निर्माण तथा जनमानस में वितरण करता है।

अरस्तू के अनुसार मानव स्वभावतः एक राजनैतिक पशु है क्योंकि वह एक सामाजिक प्राणी है जिसे अभिव्यक्ति और नैतिक रूप से तर्क करने की शक्ति प्राप्त है।

अरस्तू की 'एथिका निकोमेकिया' का अंश

अरस्तू की ‘एथिका निकोमेकिया’ का अंश

अर्थशास्त्र में प्रथम अमरीकी नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल सैमुएल्सन ने अपनी पुस्तक में अर्थशास्त्र की परिभाषा बताई है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र वह विधा है जो इसका अध्ययन करती है कि समाज अपने अल्प संसाधनों से मूल्यवान उत्पाद या सेवाओं का किस प्रकार निर्माण तथा जनमानस में वितरण करता है। इन दोनों विचारों को स्वीकार करते ही राजनीति और अर्थव्यवस्था के मध्य परस्पर निर्भरता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्तुतः एडम स्मिथ से लेकर कार्ल मार्क्स और जॉन स्टुअर्ट मिल्स तक ने ‘राजनैतिक अर्थव्यवस्था’ की ही व्याख्या की थी। राजनैतिक अर्थशास्त्र एक विषय के रूप में राज-व्यवस्था एवं बाजार के मध्य अंतर्सम्बंध को प्रमाणित करने का कार्य करता है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके बाजार द्वारा संचालित होती है जहाँ आर्थिक गतिविधियों की उठा पटक के मापदण्ड क्रय-विक्रय के मूल्यों द्वारा निर्धारित होते हैं। इसमें नियामक की भूमिका उक्त देश की मौद्रिक नीति तथा कर की दरें निभाती हैं।

जब वस्तुयें अथवा सेवायें एक देश से दूसरे देश ले जाकर बेची जाती हैं तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार खड़ा होता है। यह बाजार किसी देश के घरेलू बाजार से कई मायने में भिन्न होता है। यहाँ हर प्रकार का उत्पाद न बेचा जा सकता है न क्रय किया जा सकता है। राजनेताओं की व्यक्तिगत उत्कण्ठा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कुण्ठित हो जाती हैं। अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की सीमायें लाँघना कई उत्पादों के लिए इतना कठिन हो जाता है कि उनका उत्पादन ही बन्द  हो जाता है। आयात किये जाने वाले माल पर जो कर लगाया जाता है उसे प्रशुल्क ‘टैरिफ ड्यूटी, Tariff Duty’ कहा जाता है।  इसकी दरें बढ़ा कर कोई देश किसी विदेशी उत्पाद को अपने बाजार में आने से रोक सकता है। सन् 1930 के दशक में कुछ देश ‘पड़ोसी को भिखमंगा बना दो – beggar-thy-neighbour’ की नीति पर चलते थे जिसके अनुसार ऐसी आर्थिक नीतियाँ बनाई जाती थीं जिनसे स्वहित के लिये पड़ोसी देश को भिखारी बना दिया जाये। एक समय में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ वणिकराष्ट्रवाद ‘mercantilism’ के यथार्थवादी सिद्धांत पर की जाती थीं जिसके अनुसार कोई देश किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था के नियमों को न मानकर वही निर्णय लेता था जो उसके हित में हो। कुछ देश अपने प्रमुख उद्योगों को व्यापार की सन्धियों से दूर रखते थे तो कुछ आत्मनिर्भर अर्थतंत्र ‘अटार्की, autarky’ में विश्वास रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में न्यूनतम भागीदारी निभाते थे। उनका मानना था कि सब कुछ बनाने में वे स्वयं सक्षम हैं, उन्हें किसी दूसरे देश के सहयोग की आवश्यकता नहीं। हालांकि ऑटर्की का यह सिद्धांत अधिक लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ और उन देशों को रोना पड़ा जो अतिशय स्वावलंबन में विश्वास रखते थे। नव-उदारवाद के साथ भूमण्डलीकरण की अवधारणा बली होती गयी परिणामस्वरूप आज सम्भवतः हर देश ने व्यापार के लिये अपने द्वार खोल दिये हैं।

यूरोप व अमरीका सदैव मुक्त व्यापार के पक्षधर रहे हैं। जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद का झण्डा बुलन्द था तब वे एशियाई देशों की सम्पदा पर अपना अधिकार मानते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही ऐसा प्रतीत होने लगा था कि ब्रिटिश उपनिवेश अधिक दिनों तक पराधीन नहीं रहेंगे। तब वैश्विक राजनीति में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए ब्रिटेन और अमरीका ने जुलाई सन् 1944 में न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स में 44 राष्ट्रों का एक सम्मेलन बुलाया। उसमें प्रसिद्ध ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स तथा अमरीका के वित्त मंत्रालय (Treasury Department) के हैरी वाइट ने जो प्रस्ताव रखे उनसे चार संस्थाओं का जन्म हुआ। युद्ध की समाप्ति के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु जिस बैंक ‘International Bank for Reconstruction and Development’ का गठन किया गया उसे हम आज विश्व बैंक (World Bank) के नाम से जानते हैं। व्यापार में विनिमय दरों के निर्धारण के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) बनाया गया जिसने अमरीकी डॉलर को स्थाई रूप से शक्ति प्रदान करते हुए एक ऑउंस (28.35 ग्राम)  स्वर्ण बराबर 35 डॉलर की दर निर्धारित कर दी। इसका अर्थ यह था कि अमरीकी डॉलर के अतिरिक्त अन्य देशों की मुद्रायें परस्पर परिवर्तित नहीं हो सकती थीं वरन् उतने मूल्य के स्वर्ण से बदली जा सकती थीं जिसका मान अमरीकी डॉलर द्वारा निर्धारित होता था। इसे बद्ध विनिमय दर प्रणाली (Fixed Exchange Rate System) कहा गया। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ की दरों पर सन्धिवार्ता (negotiation) हेतु मंच प्रदान करने के उद्देश्य से गैट (जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड ऐण्ड टैरिफ, General Agreement on Trade and Tariff) की स्थापना की गयी। यही संस्था 1995 में विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) बन गयी।

ब्रेटन वुड्स प्रणाली द्वारा निर्मित संस्थान सन् 1971 तक सही चले किंतु उसके पश्चात यह प्रणाली ध्वस्त हो गयी। सन् 1970 के दशक में अमरीका स्थिर-मुद्रास्फीति ‘stagflation’ के दौर से गुजर रहा था। स्थिर मुद्रास्फीति की दर और बेरोजगारी ने अमरीका की कमर तोड़ दी थी। सन् 1973 में ‘योम किपर, Yom Kippur‘ या रमज़ान युद्ध में इजराइल को समर्थन देने के विरोध में तेल बेचने वाले अरबी देशों ने अमरीका को तेल बेचने से मना कर दिया था। परिणामस्वरूप 1974 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली ध्वस्त हो गयी। इसका प्रभाव यह पड़ा कि डॉलर एक स्थिर विनिमय मुद्रा नहीं रह गयी बल्कि सभी देशों की मुद्रायें परस्पर विनिमय दर तय कर सकती थीं।

ब्रेटन वुड्स प्रणाली के अवसान के बाद सन् 1974 में नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order) का प्रस्ताव रखा गया।

(नयी व्यवस्था पर अगले अङ्क में)

 


लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

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अभिषेक ओझा


विमुद्रीकरण:

भ्रष्टाचार, काला धन और जाली नोट को ख़त्म करने के लक्ष्य को लेकर भारत सरकार ने गत आठ नवम्बर की अर्द्धरात्रि से ५०० और १००० के नोटों की वैधानिकता समाप्त कर दी। सबसे पहली बात यह कि यह नवीकरण (करेंसी स्वैप)  है, यानि कि पुराने नोट ख़त्म नहीं कर दिये गये  उनकी जगह नये नोट निकाले गये।

यदि तुरंत प्रभाव से नये नोट अर्थव्यवस्था में पहुँच गये होते तो नये नोटों के सुरक्षा मानकों, छापने में लगे खर्च और कितनी मुद्रा काले धन के रूप में पकड़ी गयी; इनके अतिरिक्त आर्थिक विश्लेषण के लिये कुछ अधिक नहीं बचता। यदि कोई समस्या है तो वह है क्रियान्वयन की – संचालन में हो रही देर और उससे होने वाले समस्यायें।  
 इस स्तर का आर्थिक निर्णय और साहसी प्रयोग इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। अर्थशास्त्र की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण घटना है जिसका विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिये पर जब तक आंकड़े नहीं आ जाते विश्लेषण के नाम पर हम जो भी हम पढ़ रहे हैं वह मान्यता भर है जो कि अधिकतर पक्षपातपूर्ण है, पूर्वाग्रह से ग्रसित किंतु कोई ऐसा लेख पढ़ने को नहीं मिला जिसमें इस कदम के उद्देश्यको सराहा न गया हो। जिस युग में हम जी रहे हैं उसके हिसाब से ऐसा होना भी चमत्कार ही है!
राजनीतिक मतभेद होना स्वाभाविक है,  मानवीय प्रकृति है,  होना ही चाहिये परंतु एक् सीमा होनी चाहिये और वह सीमा है देशहित। जब किसी को अपनी विरोधी राजनीतिक विचारधारा से देश के लिये कुछ अच्छा देख दुःख होने लगे और कुछ बुरा होते देख प्रसन्नता तो उसे केवल राजनीतिक मतभेद नहीं कह सकते।
संसार की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित होने पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में कई विरोधाभासी बातें हैं।  भूमिगत या समानांतर अर्थव्यवस्था की समस्या, काला धन, भ्रष्टाचार, कर चोरी, आतंक, जाली मुद्रा, अवैध गतिविधियाँ एक अलग ही स्तर पर हैं। इतनी बड़ी किसी अन्य अर्थव्यवस्था में ऐसे हालात नहीं हैं। अधिकतर अनुमानों के अनुसार यहाँ भूमिगत अर्थव्यवस्था सकल घरेलु उत्पाद  का २०-२५% है! केवल १% लोग टैक्स भरते हैं।  वैसे इन अविश्वसनीय  से लगने वाले आँकड़ों को छोड़ भी दें तो हम सबने कितने व्यवसायियों को टैक्स भरते देखा है? किसी सी.ए. के पास चले जाइये वह टैक्स चोरी के तरीके बताना अपने पेशे का धर्म समझता है। यहाँ आर्थिक विकास की दर और कर में वृद्धि की दर समानुपाती नहीं है।  अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें तो करों की चोरी न सिर्फ चोरी है बल्कि एक् तरह से ‘निष्ठा और शुचिता पर दण्ड’ भी है,  निष्ठावान होने का जुर्माना। जो आर्थिक उत्पादन में अधिक सहयोग करते हैं, प्राय: ‘केवल’ उन्हें ही कर भी देना पड़ता है। एक् अर्थव्यवस्था के लिये इससे बुरा और क्या हो सकता है! पकड़े जाने की न तो कोई सम्भावना, न ही डर – इसे मोरल हैजर्डकहते हैं, व्यवस्था द्वारा कपटी और चोर बने रहने को प्रेरित करना। विगत दो दशकों में जैसे जैसे आर्थिक विकास होता गया भूमिगत अर्थव्यवस्था और घोटाले बढ़ते गये। आर्थिक विकास के साथ साथ अगर देश की मूलभूत संस्थाओं में सुधार नहीं हुआ तो उस विकास से पूरे देश को कैसे लाभ पहुँच सकता है? एक बार मैंने किसी से कहा था,”भारतीय अर्थव्यवस्था के आँकड़ों को मत देखो वरना तुम्हें अर्थशास्त्र से अधिक भगवान पर भरोसा होने लगेगा कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था चल कैसे रही है !”  
अब बात करते हैं विमुद्रीकरण की आलोचनाओं, तुरंत दिखने वाले प्रभाव और दूरगामी प्रभावों की:  
मौद्रिक झटका (मोनेटरी शॉक): 
सबसे बड़ा तर्क दिया जा रहा है कि यह एक् मोनेटरी शॉक है।  मुद्रा आपूर्ति एक् झटके में ८५% कम हो गयी, जिससे आर्थिक संकुचन होगा। जनता के पास मुद्रा की कमी से आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होगी, खासकर अनौपचारिक (इनफॉर्मल) अर्थव्यवस्था में – परिवहन, छोटे कारोबारी, किसान, मजदुर। लोग खर्च कम करेंगे, आमद कम होगी, व्यापार प्रभावित होंगे आदि, क्रय शक्ति कम होगी, महँगाई कम होगी और इन सबसे आर्थिक विकास कम होगा – अर्थव्यवस्था के यांत्रिकी का उल्टा क्रम।
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि  मुद्रा ८५% से कम नहीं हुई है – करेंसी स्वैप हुई है – बदली जा रही है और अल्पकाल के लिये बृहत मुद्रा (ब्रॉड मनी) की परिभाषा के हिसाब से नकदी (कैश) से जमा (डिपॉजिट) के रूप में मुद्रा का रूप परिवर्तित हुआ है। अर्थव्यवस्था संकुचित हुई है तो मात्र उस परिमाण से जो मुद्रा कभी जमा ही नहीं हो पायेगी अर्थात वह काला धन जो मुख्य धारा में पुनः वापस नहीं आ रहा। ऐसी मुद्रा वैसे ही अचल होती है।
आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होंगी पर तभी तक जब तक नोटों की समस्या ख़त्म नहीं हो जाती और यह  समस्या खासकर उन क्षेत्रों में सीमित है जहाँ नकदी के बिना काम नहीं चलता और वैकल्पिक व्यवस्था संभव नहीं।  इसे जिस तरह से बढ़ा चढ़ा कर मंदी तक से जोड़ दिया जा रहा है वह अतिशयोक्ति है।
आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन पर वास्तविक प्रभाव कितना होगा वह केवल समय ही बता सकता है। अभी जो भी आँकड़े हम देख रहे हैं वे केवल अनुमान हैं और लगभग हर ऐसे अनुमान राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं। पर इससे एक बात तो पता चलती है कि इस निर्णय के विरुद्ध इस एक तर्क के अलावा कोई बड़ा तर्क अर्थशास्त्रियों के पास नहीं है। फिलहाल विशेषज्ञों के आलेख से बेहतर आप अपने आस पास प्रभावित हो रही गतिविधियों को देखकर अनुमान लगा सकते हैं।
एक् और प्रभाव जिसकी उपेक्षा की जा रही है, वह है बचत में वृद्धि जो लंबी अवधि में आर्थिक विकास में सहायक सिद्ध होगी। जो भी धन मुद्रा के रूप में संचित रहता था वह अब मुख्यधारा में आयेगा। वित्तीय समावेश बढ़ेगा। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और छोटे कारोबारी बैकों का उपयोग अधिक करेंगे।  इस झटके से लोगों को बैंक में रुपया रखने को प्रोत्साहन मिलेगा। साथ में जो रुपया ऐसे ही पड़ा रहता था उस पर लोगों को ब्याज मिलेगा और वह मुद्रा बैंक से होती हुई अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेगी। बैंको में जमा धन बढ़ने से लघु अवधि में ब्याज दरों में कमी आ सकती है। काले धन में कमी आने से पारदर्शिता बढ़ेगी। व्यवसाय सक्षम होंगे। नये व्यवसाय करने में आसानी होगी और प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही सरकारी आमदनी में वृद्धि होगी। 
द्रवता (लिक्विडिटी) और मंदी: 
मुद्रा के कम होने से खरीद-बिक्री भी प्रभावित होगी। खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ काले धन का इस्तेमाल सबसे अधिक होता है। इनमें सबसे पहले ध्यान में आता है – भूमि-भवन जैसी अचल संपत्तियों वाला क्षेत्र – (रियल इस्टेट)। अनुमान है कि यह क्षेत्र मध्यम से लंबी अवधि के लिये प्रभावित हो सकता है। निकट भविष्य में मुद्रा की कमी और मध्यम से लंबे समय तक काले धन में आयी कमी से अचल संपत्ति की माँग और बिक्री में कमी आयेगी। कुछ समय के लिये काले धन से होने वाली खरीद बिक्री तो पूरी तरह ही थम जानी है। फिर आपूर्ति माँग से ज्यादा होगी, इन्वेंटरी बढ़ेगी और दबाव से कीमतें उचित मूल्य (फेयर वैल्यू)  की ओर आयेंगी पर इसे मंदी कहना उचित नहीं होगा।
बढ़ी हुआ कृत्रिम मूल्य यदि माँग-आपूर्ति के अनुसार उचित मूल्य पर आये तो उसे ‘मंदी’ नहीं कह सकते। पर यदि अचल संपत्ति की कीमतें गिरती हैं तो इससे बाजार में संशोधन होगा (मार्किट करेक्शन)। भारत और अन्य पारदर्शी अर्थव्यवस्थाओं की अचल संपत्ति बाजार में सबसे बड़ा अंतर काले धन से आता है। पारदर्शी अर्थव्यवस्था में जहाँ घरों की कीमतें आपूर्ति, मांग और उपयोगिता के हिसाब से शेयर बाजार की तरह ऊपर नीचे होती हैं, वहीं भारत में काले धन के चलते माँग में स्यात ही कभी कमी आ पाती है। अंतरराष्ट्रीय मंदी के समय भी भारत में कीमतें कम नहीं हुई, इस पर आगे चर्चा करेंगे।
बाजार पारदर्शी और कीमतें उचित मूल्य पर आने के दूरगामी प्रभाव होंगे। एक बार कीमतें स्थिर होंगी तो उचित कीमतों पर निवेश में बढ़त होगी। जरूरतमंद अधिक संपत्ति खरीद पायेंगे। साथ ही इस कदम से बैंको की द्रवता बढ़ेगी। ज्यादा लोग बैंकिंग से जुड़ेंगे। बैंकों के पास ऋण देने को अधिक रुपये होंगे तो नये व्यवसायों को लाभ होगा। ज्यादा पारदर्शिता आने से अचल संपत्ति,  शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के कृत्रिम बुलबुले समाप्त होंगे।
क्रियान्वयन:
विमुद्रीकरण में अगर कुछ वास्तविक समस्यायें हैं तो वे हैं इसके क्रियान्वयन में लोगों को हो रही परेशानी, अव्यवस्था, लंबी कतारें, ए टी एम को नये नोटों के लिये ठीक करने की आवश्यकता, दो हजार के नोट होने से लेन देन में दिक्कत, निरंतर बदलते नियम। ऐसे में प्रबंधन और क्रियान्वयन पर प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं। पर साथ ही इतने बड़े परिवर्तन के बाद समस्या होना भी स्वाभाविक ही है। खासकर ऐसे फैसले का क्रियान्वयन जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ जिससे सीख ली गयी होती। किंतु जिस देश में नमक कम होने की अफवाह से अफरा तफरी मच जाती हो वहाँ इस तरह के अप्रत्याशित कदम के बाद जिस तरह सहयोग और शांति से सब कुछ हुआ वह अपने आप में अतुलनीय है।
 लोगों को हो रही समस्याओं के बीच सहयोग की अद्भुत कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। आलोचक एक् साथ इतनी विरोधाभासी बातें कह रहे हैं जैसे –  इस योजना को इतना गुप्त क्यों रखा गया? साथ ही यह प्रश्न कि कुछ लोगों को इस कदम की जानकारी तो नहीं थी? और यह भी कि एक् सुनियोजित तरीके से धीरे धीरे पुराने नोट ख़त्म किये जाने चाहिये थे। इन तर्कों में आपस में ही इतना विरोधाभास है कि किसी पक्ष में कुछ तर्क देने की आवश्यकता नहीं। अगर सुनियोजित तरीके से, पहले से घोषणा कर इस योजना को लागू किया जाता तो फिर उससे कौन सा लक्ष्य हासिल होता? क्या गुप्त रखना इस योजना के सफल होने के लिये जरूरी नहीं था?  अगर इस फैसले के क्रियान्वयन का यह सही समय नहीं था तो सही समय कब होता? आर्थिक गतिविधियाँ कब नहीं रुक जातीं? अभी रबी की बुवाई का समय था तो कल क्या कुछ और नहीं होता?
पीछे मुड़कर अगर हम जन धन योजना, खातों में अनुदान (सब्सिडी) का आना और फिर काले धन को घोषित करने को दी गयी समय सीमा इत्यादि सरकारी कदमों को देखें तो इसे एक् सुनियोजित क्रियान्वयन ही कहेंगे। इतने बड़े फैसले के बाद अगर कुछ भी परेशानी नहीं होती तो वह चमत्कार होता।
 निरंतर बदलते नियम कहीं न कहीं  इंगित करते हैं कि हो रही हर परेशानी को पहले से देख पाना संभव नहीं था। क्रियान्वयन की घोर आलोचना के बीच कहीं भी यह पढ़ने को नहीं मिला कि इसे और बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता था? विशेषज्ञ सिर्फ आलोचना करने की जगह अगर इस पर बात करते तो संभवतः क्रियान्वयन बेहतर होता। लोगों को परेशानी हुई और होगी इससे कोई इनकार नहीं कर सकता पर फिर क्या ऐसे फैसले लिये ही नहीं जाने चाहिये? लोगों को विश्वास है कि लघु अवधि में हो रही तकलीफ दीर्घकालीन बेहतरी के लिये है नहीं तो इतनी आसानी से इतना बड़ा फैसला सफलतापूर्वक लागू नहीं हुआ होता।
काला धन:
मुझे नहीं लगता इस बात से कोई भी असहमत है कि विमुद्रीकरण के फैसले से काला धन, भ्रष्टाचार, जाली मुद्रा, आतंक और नक्सलवाद जैसी समस्याओं पर एकाएक रोक लगी – पॉवर ऑफ। पूरी दुनिया इस बात पर एकमत है कि वित्तीय आपूर्ति के स्रोतों पर आक्रमण आतंकी गतिविधियों पर रोक लगाने का सबसे प्रभावी तरीका है। बाकी सारे उपाय रक्षात्मक और पैबंद की तरह हैं। ५०० यूरो के नोट को बिन लादेन ऐसे ही नहीं कहा जाने लगा था! समस्या यह है कि आगे फिर से ये पुनर्जीवित न हों इसके लिये क्या उपाय किये जायेंगे वह सबसे महत्त्वपूर्ण है। लघु अवधि में विमुद्रीकरण से अगर कोई सबसे बड़ा फायदा हुआ है तो निर्विवाद इन क्षेत्रों में ही हुआ है।
कई लोगों ने तर्क दिया कि काला धन दरअसल एक जगह नहीं रहता। काले और सफ़ेद धन में कोई स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं है। काला धन जब लेन देन में इस्तेमाल होता है तो उस पर भी सेवा कर लगता है और ऐसे धन से भी अर्थव्यवस्था चलती है। साथ ही मंदी के समय भी ये मुद्रा आर्थिक गतिविधियों को चलाती रहती है। मैं समझ सकता हूँ कि ऐसे तर्क देने वाले लोग हैं – अर्थशास्त्री भी।
पहले तो यह कहना वैसे ही है जैसे यह कहना कि कैंसर होना बहुत अच्छी बात है क्योंकि कैंसर रोगियों के लिये अस्पतालों में मुफ्त की पार्किंग होती है। या ये कि विकलांग हो जाना ही अच्छा है, आरक्षण मिलेगा और ट्रेन के किराये में छूट!
एक तर्क है कि मंदी में भी भारतीय बैंक नहीं डूबे और विकास दर भी प्रभावित नहीं हुई क्योंकि समानांतर अर्थव्यवस्था चलती रही। उदाहरण के लिये मान लेते हैं कि अगर एक घर की कीमत १०० है और कोई ३० काले धन में भुगतान करता है और बाकी ७० पर सरकार को कर देकर बैंक से कर्ज लेता है। इससे कीमतें बढ़ती जाती हैं। मांग में कमी नहीं आती। और बैंक जो १०० की संपत्ति के लिये सिर्फ ७० ही लोन देते हैं उनके लिये कीमतें कम होना कोई परेशानी नहीं क्योंकि १०० की जगह वैसे ही उन्हें ७० बताया गया है। पारदर्शी अर्थव्यवस्था में पहले कीमतें कम होती हैं फिर हालात और बिगड़े तो पहले लोग, फिर बैंक एक के बाद एक डिफॉल्ट होते है। नैतिकता छोड़ भी दें तो सुनने में सही लगने वाला काला धन एक के बाद एक आर्थिक नुकसानों के सिलसिले के बाद एक आभासी सच बनाता है। मुझे कैंसर होने के बाद होने वाले साइड इफ़ेक्ट को फायदे के रूप में देखने से बेहतर उदाहरण नहीं सूझ रहा।
जो काला धन संचय करके रखते थे उनपर तो निर्विवाद सहमति है। पर बात उस तर्क की जिसमें कहा जा रहा है कि काला धन भी आर्थिक लेन देन का हिस्सा होता है और बहुत कम लोग ही मुद्रा के रूप में धन संचय करते हैं। जो चलायमान काला धन था उसके लिये क्या यह समझना इतना कठिन है कि उस मुद्रा के एक जगह ना रहने पर भी यानि अगर वह सात नवम्बर को उस इंसान के पास नहीं थी और नौ को भी नहीं रहती। पर किसी न किसी के पास तो वह आठ को थी? क्या वह वहीं ख़त्म नहीं हुई? तो ऐसा कैसे संभव है की चलायमान काले धन का कुछ नहीं हुआ? आठ नवम्बर के पहले चलन में जितनी मुद्रा ५००/१००० के नोटों के रूप में थी उनमें से जो मुद्रा वापस बैंकों में नहीं आ पायेगी उससे पता चलेगा कितना धन काले धन के रूप में ख़त्म हुआ।
हवाला, फेक करेंसी, टैक्स चोरी ख़त्म नहीं हो गयी। पर एक् पूर्ण विराम लगा। आर्थिक शब्दों में कहें तो ये गतिविधियाँ अब पहले से अधिक खर्चीली हो गयीं। इसमें दो राय नहीं कि लोग नये तरीके निकालेंगे। पर इन्हें करना जितना सरल हो गया था, वह नहीं रहा। विमुद्रीकरण काले धन और ऐसी गतिविधियों पर कर की तरह है। और मोरल हैज़र्डकी जो बात हमने की थी उसके इतर बेईमानी की जगह ईमानदारी को प्रेरित करने वाला कदम है।
मुद्राहीन/वित्तीय समावेश (कैशलेस/फिनांसियल इनक्लूजन):  
पिछले भाग में कैशलेस समाज की बात हुई थी। इस कदम का लक्ष्य कैशलेस को बढ़ावा देना रहा हो या नहीं, पर कहीं न कहीं इस कदम से बैंकिंग के साथ साथ डिजिटल भुगतान को अप्रत्याशित बढ़ावा मिलने वाला है, काले धन और बड़े कारोबारियों की बात छोड़ दें तब भी।
मेरा स्वयं का अनुभव है जब पिछले साल पूर्वी उत्तर प्रदेश में कार्ड ही नहीं चेक से भी वितरक ने टू व्हीलर देने से मना कर दिया था। मेरे लिये यह झटका था कि इतने नोट लेकर कौन चलता है! पर ऐसा होता है जो कि गलत है। बैंक एक ऐसी सुविधा है जिसके बस इस्तेमाल की आदत पड़नी है। पहले खाते नहीं थे। अब खाते हैं तो आदत नहीं। विमुद्रीकरण लोगों को बैंक तक खींच कर ले जाने वाला कदम है। गृहिणियाँ जो रुपया छिपा कर रखती थीं उनको अगर उसी पैसे के लिये ब्याज मिले तो वह क्यों नहीं बैंक में रखेंगी? आनन फानन में ही सही इसके दूरगामी फायदे होंगे – कई नये व्यवसाय जन्म लेने वाले हैं।
अमेरिका में टोल भुगतान के लिये एक् ईज़ी पास होता है,  पेन ड्राइव से थोड़ा सा बड़ा जिसे बस गाड़ी के भीतर रखना होता है। न टोल नाके पर रुकने की जरुरत, न छुट्टे की और न ही यह देखने की कि कितना टोल देना है।  जो एक बार इस्तेमाल कर ले वह दुबारा कभी सिक्कों और नोट का इस्तेमाल नहीं करना चाहेगा। बैंकिंग और मुद्राहीन सुविधायें ऐसी ही है। एक् बार बस लोग इस्तेमाल करने लगे फिर उन्हें दुबारा धक्का देने की जरूरत ही नहीं। इस्तेमाल करना आसान है। अगर नहीं हैं तो आसान बनाने वाले लोग हैं – ओला, उबेर, पेटीम, ई-कॉमर्स। इन क्षेत्रों में नयी कंपनियाँ बढ़ती ही जानी हैं और फिर जैसे जैसे डिजिटल मुद्रा बढ़ेगी व्यवस्था अपने आप पारदर्शी होती जायेगी।
कर और आँकड़े
विमुद्रीकरण के बाद जो आँकड़े जमा हो रहे हैं, वे नीतियाँ बनाने में बहुत ही उपयोगी होंगे। आयकर विभाग के पास स्वच्छ आँकड़े होंगे जिनसे कर देने वाले, न देने वाले, आय से अधिक संपत्ति इत्यादि की जानकारी जुटाना आसान होगा। संभवतः इससे पहले कभी पहचान के साथ इतना वित्तीय बड़ा आंकड़ा भारत सरकार के पास नहीं आया होगा। (वैसे इसके दुरुपयोग की भी सम्भावना है। भारत में आँकड़ों की गोपनीयता के कौन से कानून हैं मुझे इसकी जानकारी नहीं।) इन आँकड़ों से बहुत कुछ समझने और पता लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही हर लेन देन के लिये पहचान की जरूरत आगे भी की जानी चाहिये। वह अपने आप में एक बहुत बड़ा सुधार है।
जुगाड़
ज्यादातर विशेषज्ञ विमुद्रीकरण को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नियमों और प्रक्रिया की दृष्टि से देख रहे हैं लेकिन भारतीय परिवेश में कई चीजें अलग नियमों से चलती हैं और इसके कई दूरगामी परिणाम होने जा रहे हैं। सारे परिणाम तो समय के साथ ही पता चलेंगे। स्टीवन लेविट की पुस्तक फ्रीकोनॉमिक्स के उदाहरणों की तरह किसी और लक्ष्य से शुरू की गयी योजना के किसी और क्षेत्र में परिणाम दिखेंगे। डिजिटल मुद्रा और वित्तीय समावेश जैसे असर वह हैं जो हम अभी ही अनुमान लगा ले रहे हैं। हम केवल आर्थिक संकुचन की बात कर पा रहे हैं पर कोई इस बात की चर्चा नहीं कर रहा कि कितने ही मजदूर और घरेलू काम करने वाले नौकर इत्यादि को दो-ढाई लाख रुपये विनिमय करने को मिले। मजदूर जिन्हें दिन भर की मजदूरी के लिये २५० रुपये मिलते हैं, उन्हें काम छोड़कर ए टी एम में लगने के ५०० रुपये मिलने लगे! कहीं न कहीं इससे आर्थिक गतिविधि को नुकसान हुआ है तो साथ में एक समानांतर मुद्रा प्रवाह की प्रक्रिया भी चल रही है। इसका एक छोटा असर मिल्टन फ्राइडमैन के हेलीकाप्टर मनी की तरह भी होगा!  मुझे पता है विशेषज्ञ इसे तुरत नगण्य प्रक्रिया कह अस्वीकार कर देंगे। पर कहने का अर्थ यह है कि ऐसी कई प्रक्रियायें चल रही हैं जिन्हें हम जुगाड़ कहते हैं। अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो जितने काम सरल और सस्ते होंगे संतुलन उनकी तरफ अपने आप बढ़ता जायेगा।
संस्कृति/सोच
आर्थिक दृष्टि से सोचें तो हमारे जीवनकाल में ऐसे दुर्लभ प्रयोग का होना अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है जिससे पता चला कि मुद्रा की कीमत सिर्फ सरकार पर भरोसा है। भरोसे के बिना मुद्रा सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा है और कुछ नहीं। इस मुद्दे पर बहुत कुछ लिखा गया है पर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ऐसा फैसला लेने की हिम्मत किसी एक व्यक्ति में होगी। लोग चौतरफा आलोचना कर रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं। अगर राजनीतिक पूर्वाग्रह निकाल दें तो सवाल उठाना गलत नहीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पर्ल हार्बर हमले के बाद जब अमेरिकी संसद ने युद्ध का प्रस्ताव पारित किया तो उसके खिलाफ भी एक मत पड़ा था। लोकतंत्र में वह होना बहुत जरूरी है। इससे इस फैसले की अहमियत कम नहीं होती।
 इस एक् फैसले से जनमानस के सोच और व्यवहार में जो परिवर्तन आयेगा उसका सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है। बैंकिंग, डिजिटल और भुगतान के अन्य तरीकों के अलावा मानसिकता में आने वाला बदलाव जिसके नापने का कोई तरीका नहीं। आर्थिक फायदों से कहीं ज्यादा इस एक फैसले ने हर नियम कानून के अपवाद होते हैं वाली सोच के साथ-साथ देश, कानून और नेतृत्व की छवि में परिवर्तन किया है। हर व्यक्ति के अंदर ये सोच कि कानून के दायरे में रहना चाहिये, कुछ करने से पहले क्या नियम है वह जान लेना चाहिये, जमाखोरों में घबराहट, ईमानदारों में आत्मविश्वास –  एक झटके से लोगों के व्यवहार और सोच में कितना परिवर्तन आता है वह किसी भी आर्थिक लाभ/घाटे से कई गुना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
व्यवहार में परिवर्तन और सरल प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है यूरोपीय देशों में अंग दान करने वाले लोगों की संख्या। मैं आशा करता हूँ कि इस फैसले से ऐसे दूरगामी परिवर्तन होंगे।
उपसंहार
एकमात्र समस्या – क्रियान्वयन। बाकी सारी समस्यायें या तो लघु काल के लिये है या उन्हें संतुलन करने वाले अन्य आर्थिक कारक हैं। इसलिये मुद्रा बदलने की प्रक्रिया जितनी जल्दी पूरी हो यह योजना उतनी ही ज्यादा सफल होगी।  यह फैसला अर्थव्यवस्था को रिसेट करने की तरह है पर इसका दूरगामी असर तभी संभव है जब एक बार पुनः अर्थव्यवस्था वापस अपनी गति पर आये तो सिलसिलेवार सुधार हों – बेनामी संपत्ति, चुनाव, विदेशों में जमा धन। ५०० और १००० के नोटों पर प्रहार तो बस एक तरीका था! सिलसिलेवार सुधार नहीं हुये तो सोना, डॉलर, बेनामी संपत्ति, दो हजार के नोट आदि के उपयोग द्वारा लोग नये तरीके निकाल ही लायेंगे।
रिसेट के बाद फर्मवेयर अपडेट करने की जरूरत है नहीं तो कुछ सालों में वापस सब कुछ वैसे ही हो जायेगा। फिर सिस्टम हैंग ! यह निर्णय आने वाले सुधारों की शृंखला का एक संकेत होना चाहिये। इनमें सबसे आवश्यक है – कराधान की नीतियों में सुधार ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग टैक्स भरें। जितने अधिक लोग मुख्यधारा में शामिल होंगे अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत होगी। बेहतर नीतियाँ और पारदर्शी व्यवस्था किसी भी सजा से अधिक कारगर होंगी । काला धन इतनी बड़ी समस्या हो जाने के पीछे भी बीते समय में लिये गये निर्णय ही जिम्मेदार हैं। बेहतर नीतियाँ और उत्कृष्ट सरकारी संस्थायें रही होतीं तो काला धन आज इतनी बड़ी समस्या हुई ही नहीं होती।
 
 दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एक बात सबके लिये सच है, और वह है शक्तिशाली, उत्कृष्ट और पारदर्शी संस्थायें जिनके होने के लिये भ्रष्टाचार समाप्त होना सबसे आवश्यक है। जब तक वह नहीं होता देश ऐसी समस्याओं से जूझता रहेगा। यह उस दिशा में लिया गया मात्र एक पर बहुत महत्त्वपूर्ण कदम है। इस अचानक और साहसिक फैसले से आम जनता का प्रसन्न होना स्वाभाविक है। जो खुश नहीं हैं उनका न होना भी – जाकी रही भावना जैसी विमुद्रीकरण देखी तिन्ह तैसी।