शून्य – 3

शून्य – 1, शून्य – 2 से आगे … ‘शून्य’ की प्रथम स्पष्ट गणितीय परिभाषा ब्रह्मगुप्त (628 ई.) के ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में मिलती है। यह वह युग था जब अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति वेदांग ज्योतिष से अलग गणित के रूप में लगभग स्वतंत्र पहचान बना चुके थे। आर्यभटीय ज्योतिष का पहला ग्रन्थ है जिसमें गणित के…

ईशावास्योपनिषद (ईशोपनिषद)

भारतीय दर्शन समन्वयवादी और विश्लेषणात्मक है। उसमें तू-तू मैं-मैं नहीं, हम ही हम है। एक ही ईश्वर का अंश होने के कारण हम सभी एक वैश्विक स्वरूप का अंशमात्र हैं। इसलिये किसी को किसी के आगे झुकाने की आवश्यकता नहीं है।

अरस्तू की 'एथिका निकोमेकिया' का अंश

अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था: भाग – 1

एक समय में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ वणिकराष्ट्रवाद के यथार्थवादी सिद्धांत पर की जाती थीं जिसके अनुसार कोई देश किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था के नियमों को न मानकर वही निर्णय लेता था जो उसके हित में हो।

साफ-सफाई : सांस्कृतिक कर्तव्य और गुण

आत्मा का मैल हटाने का श्रेष्ठ उदाहरण है क्यों कि बारंबार घर बाहर में सफाई होती देख यह दृष्टांत हमारी सांस्कृतिक कहानियों का अंतर्निहित तत्व भी बनकर उभरा।