तिरुवानमियूर की मोचिन

आज बहुत दिनों के पश्चात घर से कार्यालय, कार्यालय से घर का चक्र छोड़ स्वयं के साथ बाहर निकला तो जाना पथ के भी पग होते हैं और वे कभी नहीं थकते। ‘रास्ता कहीं नहीं जाता‘ वाला हास्य केवल हास्य ही नहीं, असत्य भी है।   बच्चे के एक जूते ने मुँह खोल दिया था,…

ऋत, ऋतु और Ritual

ऋग्वेद 4.23.8-4.23.10   क्रिया धातु ‘ऋ’ से ऋत शब्द की उत्पत्ति है। ऋ का अर्थ है उदात्त अर्थात ऊर्ध्व गति। ‘त’ जुड़ने के साथ ही इसमें स्थैतिक भाव आ जाता है – सुसम्बद्ध क्रमिक गति। प्रकृति की चक्रीय गति ऐसी ही है और इसी के साथ जुड़ कर जीने में उत्थान है। इसी भाव के…