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सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 3

बुद्ध का बोध : बुद्ध दुःख को निश्चित मानते हैं। दुःख किसी पाप का परिणाम नहीं बल्कि संसार का नियम है। दुःख का कारण भी विकासवाद के स्वार्थ की ही तरह इच्छा है।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1   और 2 से आगे  …

विकासवादी मनोविज्ञान पढ़ते पढ़ते प्रश्न उठता है – हमारी भावनायें कितनी सत्य हैं? और कितनी छलावा? यदि वे मिथ्या हैं तो फिर सत्य क्या है? सत्य और मिथ्या के बीच विभाजन की रेखा कहाँ है? यदि हमारी भावनायें प्रकृति द्वारा केवल उत्तरजीविता और प्रजनन के लिए बनायी गयीं तो इससे यह स्पष्ट है कि हमारे अचेतन मन में जो चल रहा है उस पर हमारा पूर्ण अधिकार नहीं है अर्थात विकासवाद ने हमें एक मायाजाल में उलझा रखा है जिसमें हमारी भावनायें केवल विकासवाद के लक्ष्य पूरे करने के लिए होती हैं। साथ ही एक रोचक बात यह भी है कि इनमें से कई भावनाओं की हमें आवश्यकता नहीं है क्योंकि मानव सभ्यता विकासवाद की गति, जो आज भी शिकारी-संग्रहकर्ता के युग की है, से बहुत आगे निकल आयी है। जीव संसार में इसका एक सटीक उदाहरण है कीट पतंगों का आग के प्रति आकर्षित होना और जल  जाना। विकासवाद ने कीट पतंगों के गुणसूत्रों में एक गुण यह भी भरा कि रात्रि के समय दिशा के ज्ञान के लिए वे प्रकाश को देख एक विशेष कोण पर उड़ें। कालांतर में कृत्रिम प्रकाश के आ जाने से यह उनके लिए जानलेवा हो गया। ठीक इसी तरह प्रवासी पक्षी भी चाँद तारों की अवस्था से अपनी दिशा का पता लगाते हैं पर कृत्रिम प्रकाश से उन्हें भी खतरा उत्पन्न हो गया।1 हर योनि के जीवों में प्रकृति ने ऐसे गुण भरे, मनुष्य के भीतर तो ऐसी मायारुपी भावनाओं का भण्डार ही भर दिया!

तथागत प्रकृति के इस स्वार्थी माया के विरुद्ध विद्रोह करते दिखते हैं। उनके ‘दुःख’ और विकासवाद के इस सिद्धांत की एक रोचक बात यह भी है कि बुद्ध दुःख को निश्चित मानते हैं। बुद्ध का दुःख किसी पाप का परिणाम नहीं बल्कि वह संसार का नियम है, प्रकृति है। उनके दुःख का कारण भी विकासवाद के स्वार्थ की ही तरह इच्छा है। तथागत वेदांत से प्रेरित हो कई सिद्धांतों को एक स्पष्ट गति देते हैं। जैसे हर एक नए आविष्कार के लिए सदियों से हुए आविष्कार उसका आधार बनते हैं, जैसे अंकों और गणित के बिना भौतिकी की कल्पना नहीं की जा सकती; उसी तरह वह वेदांत से मोती चुन आर्य सत्य और अष्टांग मार्ग प्रतिपादित करते हैं। अनिच्छा और अनत्ता की बात करते हैं। विकासवाद के अन्धकार में उलझी भावनाओं को पढ़ते हुए बुद्ध के साथ गीता के – ‘य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह’ और वेदांत के ‘नेति-नेति’ के दर्शन अनायास ही मस्तिष्क में आते हैं।

‘क्योटो में कृष्ण ‘, जापानी सम्राट शोमू के आदेश पर 752 ई. में बने मन्दिर के ‘महा बुद्ध मण्डप ‘ में बाँसुरी बजाते हुये श्रीकृष्ण का अङ्कन , स्रोत : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/0/00/Krishna-in-Kyoto-1.jpg , Public Domain

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो पुरुष को और प्रकृति के विविध प्रकार के प्रभाव रखने वाले गुणों को अलग अलग जान लेता है वही वास्तव में ज्ञानी पुरुष है। यहाँ भगवान स्पष्टतः दुष्चक्र  को तोड़ प्रकृति के गुणों से विलग रहकर उनका वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने को प्रेरित करते हैं। प्रकृति के विकारों और गुणों को जानने के लिए उनका द्रष्टा बन जाने को कहते हैं। ‘आत्मस्वरूप’ हो अविद्या नष्ट करने को कहते हैं। ये सारे सिद्धांत एक मूलभुत सत्य के तार से जुड़े दिखते हैं – एक ही ऑपरेटिंग सिस्टम पर चलने वाले किसी प्रोग्राम के विभिन्न संस्करणों की तरह।

आधुनिक विकासवादी मनोविज्ञान मानव की वर्तमान अवस्था को जिन पूर्वाग्रहों और असंतोष से पीड़ित बताती है उनका कोई सटीक हल नहीं बताती। यदि हम विश्व के दर्शनों में इसका हल ढूँढना चाहें तो आत्मनियंत्रण और प्राचीन भारत के ऊपर वर्णित सिद्धांतों से उत्तम हल कहीं नहीं मिलता और आधुनिक विज्ञान इसका समर्थन करता है। न्यूरोसाइंस में मस्तिष्क के ‘डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क’ का सिद्धांत होता है – जब हम किसी काम में व्यस्त नहीं होते हैं उस समय मस्तिष्क का सक्रिय रहने वाला नेटवर्क। जिसे हम ‘खाली दिमाग शैतान का घर’ कहते हैं। जब बैठे बैठे मन बहकता है, हम बैठे बैठे सपने देखते हैं, जब हम  किसी और के बारे में सोचते हैं, ख़याली महल बना रहे होते हैं या अपने अतीत में विचरते हैं; अर्थात वर्तमान को छोड़ अतीत और भविष्य की चिंता में खोये रहना। यादृच्छ (रैंडम) विचार (विकासवाद के अनुसार प्रकृति के स्वार्थी तत्व) अपने काम में लगे होते हैं। यह सबमें एक समान नहीं होता। कुछ लोग सोचते ही रहते हैं तो कुछ लोग ‘व्यस्त रहें – मस्त रहें’ वाले। इसके विपरीत ‘टास्क-पॉजिटिव नेटवर्क’ उस समय सक्रिय होता है जब हम वर्तमान में जी रहे होते हैं। डिफ़ॉल्ट नेटवर्क ऑफ हो जाने का अर्थ हुआ – निराला !

डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की अतिसक्रियता का अध्ययन वैज्ञानिकों ने कई सन्दर्भों में किया जिनमें डिप्रेशन और मानसिक बीमारियाँ भी हैं। डिफ़ॉल्ट नेटवर्क की अतिसक्रियता और टास्क पॉजिटिव नेटवर्क की कम सक्रियता मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। येल विश्वविद्यालय में किये गए अध्ययन के अनुसार2 ध्यान योग से डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क की सक्रियता में कमी आती है। ऐसे कई अध्ययन हैं जिनमें इस बात की पुष्टि होती है।3 हार्वर्ड विश्वविद्यालय में किये गए एक अन्य अध्ययन में भी ध्यान योग से होने वाले लाभों की न्यूरोसाइंटिफ़िक विधि से पुष्टि हुई।4 ऐसे अन्य कई अध्ययन हैं जो सदियों पहले कही गयी बातों की प्रायोगिक पुष्टि करते हैं। विकासवादी मनोविज्ञान के इस एक पहलू के अतिरिक्त संज्ञानात्मक विज्ञान (कॉग्निटिव साइंस) में प्राचीन भारतीय और बौद्ध सिद्धांतों के वैज्ञानिक अध्ययन की असीम सम्भावनायें हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान और प्राचीन भारतीय दर्शन दोनों से निष्कर्ष निकलता है कि अनेकों अनिच्छित नकारात्मक प्रवृत्तियाँ मानव में निर्मित होती हैं। उनका समाधान है, उन्हें पहचानना और आत्म नियंत्रण। इसे हम चाहे जिन शब्दों में कहना चाहें – सम व्यवहार; अनेक श्लोकों में वर्णित स्थितप्रज्ञ के लक्षण; मोह, चिंता और भ्रांतियों के दुष्चक्र से मुक्ति; बुद्ध के मार्ग पर चल धीरे धीरे पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर वस्तुनिष्ठ सत्य को देखने की क्षमता विकसित करना; न्यूरॉन्स को ध्यान भंग करने वाले संदेशों से विचलित न होने के लिए प्रशिक्षित करना, ध्यान से डिफ़ॉल्ट मोड नेटवर्क को ऑफ करना या increased gray-matter density in the Hippocampus!5

(क्रमश:)


सन्दर्भ:

1. http://www.bbc.com/news/world-us-canada-32491715
2. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC4529365/
3. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3250176/
4. https://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC3004979/
5.  http://news.harvard.edu/gazette/story/2011/01/eight-weeks-to-a-better-brain/

लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

राष्ट्र की शक्ति पूजा: अपारंपरिक युद्ध एवं भारत के विशेष बल

विशेष बल ( Special Forces ) : सेना के विभिन्न अंगों से विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिकों के दल जिन्हें शत्रु की सीमा के भीतर किसी विशिष्ट प्रयोजन को पूर्ण करने हेतु नियुक्त किया जाता है।

यशार्क पाण्डेय

पहले भाग से आगे …

दन्तकथाओं के अनुसार एक बार मुग़ल बादशाह शाहजहाँ रावलपिंडी से श्रीनगर जा रहा था। मार्ग में एक दर्रा पड़ा जहाँ उसने विश्राम किया। नींद में शाहजहाँ ने स्वप्न देखा कि जिस स्थान पर उसकी सेना ने डेरा डाला है वहाँ किसी पीर की मजार प्रकट हो गयी है। तभी से उस पहाड़ी ‘उभार’ (bulge) और दर्रे का नाम हाजी पीर हो गया। सन् ’65 के युद्ध में हाजी पीर दर्रे को पाकिस्तानी कब्जे से छुड़ाने का दायित्व ‘ऑपरेशन बक्शी’ के तहत मेजर रंजीत सिंह दयाल को दिया गया था। मेजर दयाल भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट की बटालियन 1 के सेकण्ड-इन-कमांड थे। मेजर दयाल को हाजी पीर पर भारतीय तिरंगा लहराने के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। सामरिक इतिहासकार नितिन गोखले हाजी पीर विजय को 1965 युद्ध की निर्णायक लड़ाई मानते हैं। विडंबना यह रही कि ताशकंद समझौते में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने हाजी पीर पाकिस्तान को लौटा दिया था। जब भारतीय सैनिक हाजी पीर से उतर रहे थे तो उनकी आँखों में आँसू थे क्योंकि इसे हासिल करने के लिए उनके साथियों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। हाजी पीर दर्रा पीर पंजाल पर्वत श्रृंखला पर उरी और पुंछ के मध्यमार्ग पर स्थित है। यह कश्मीर घाटी में घुसपैठ करने का अपेक्षाकृत छोटा और सरल मार्ग है। गत वर्ष 18 सितंबर 2016 को भारतीय सुरक्षा बलों पर जो आक्रमण किया गया था उसके आक्रांता इसी हाजी पीर दर्रे से भारत में घुस आये थे। इस प्रकार के आक्रमण और वर्तमान घटनाक्रमों में भारतीय सैनिकों के शीश काट कर ले जाने जैसे घृणास्पद कार्य विश्व के प्रथम ‘इस्लामिक स्टेट’ पाकिस्तान के छद्म युद्ध का छोटा सा हिस्सा मात्र हैं। प्रचलित मान्यता है कि भारत में सीमापार घुसपैठ ‘इंटर सर्विस इंटेलिजेंस’ (ISI) ने प्रारंभ करवाई थी परन्तु वास्तविकता यह है कि जहाँ आईएसआई मूल रूप से पाकिस्तानी सेना के साथ सम्बद्ध थी वहीं भारत में शांति भंग करने की मौलिक पटकथा ‘पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ब्यूरो’ ने लिखी थी। बाद में पाकिस्तानी सेना और आईएसआई भी इस छद्म युद्ध में सम्मिलित हो गये। यह उल्लेख इसलिये आवश्यक है कि पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ब्यूरो का जन्म उसी ब्रिटिश व्यवस्था से हुआ था जिससे भारतीय पुलिस तथा अन्य सुरक्षा एजेंसियों का गठन किया गया था। पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ब्यूरो आंतरिक गुप्तचर एजेंसी होने के कारण भारत के मानस और भूगोल से भली भाँति परिचित थी इसलिये समय के साथ पाकिस्तान ने भारत में गुप्त ऑपरेशन करने की सभी युक्तियों में महारत प्राप्त कर ली है। इन युक्तियों में मुख्य हैं: जाली मुद्रा और उससे जुड़े कार्य व्यापार, स्लीपर सेल के माध्यम से अकस्मात बम विस्फोट करना तथा कश्मीर में अशांति फैलाना।

गत चार वर्षों से इस छद्म युद्ध का एक नया स्वरूप सामने आया है। 8 जनवरी 2013 को पाकिस्तानी फ़ौज ने भारतीय सेना के जवान लांस नायक हेमराज और लांस नायक सुधाकर सिंह का शीश काट कर धड़ ऐसे ही छोड़ दिया था जो सम्भवतः दो तीन दिन बाद प्राप्त हुआ था। उरी, पठानकोट और अन्य आक्रमण जनसामान्य को नहीं अपितु भारतीय सेना को लक्षित कर किये गये हैं। पूंछ सेक्टर की कृष्णा घाटी में 30 अप्रैल 2017 को पुनः शीश काटने की घटना घटी। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित छद्म युद्ध में जहाँ भारतीय सीमा में कश्मीर के भीतर जिहादी गुटों के आतंकियों को भेजा जाता है वहीं नियंत्रण रेखा के आसपास शीश काटने जैसे ऑपरेशन पाकिस्तान के एक विशेष बल ‘बॉर्डर एक्शन टीम’ (BAT) द्वारा किये जाते हैं। पन्द्रह से बीस फौजियों की संख्या वाली बैट टुकड़ियों की विशेषता यह है कि इसमें तीन प्रकार के लड़ाके होते हैं: पाकिस्तानी फ़ौज के सामान्य फौजी, पाकिस्तानी फ़ौज द्वारा प्रशिक्षित जिहादी आतंकी तथा पाकिस्तानी स्पेशल फ़ोर्स के जवान। इनका उद्देश्य और कार्यक्षेत्र दोनों सीमित होते हैं।

प्रश्न यह है कि इस प्रकार के छद्म अपारंपरिक युद्ध को किस रणनीति से लड़ा जाये कि भारत की क्षति न्यूनतम हो। कुछ विचारकों के अनुसार भारत पाकिस्तान से सीमित युद्ध लड़ सकता है जिसमें कहा जाता है कि तोपखाने (artillery) का मुँह नियंत्रण रेखा की ओर खोल दिया जाये और न्यून स्तर की बमबारी हेतु वायुसेना की सहायता ली जाये। परन्तु भविष्य में इस सीमित युद्ध की तीव्रता की सीमा निर्धारित करना सैद्धांतिक रूप से कठिन है। दूसरा प्रचलित तर्क यह दिया जाता है कि असमान प्रतिकारात्मक कार्यवाही (asymmetric retaliatory action) की जाये जिसमें नौसेना द्वारा अरब सागर से बम गिराये जाएँ। वस्तुतः यह दोनों ही सिद्धांत प्रतिकारात्मक कार्यवाही के उदाहरण हैं जिसमें हम परवर्ती आक्रमण करने के पक्षधर हैं जबकि समय की माँग यह है कि हम प्रतिकारात्मक नहीं अपितु दण्डात्मक कार्यवाही करें। अपरम्परागत युद्ध पारम्परिक विचारों से अभिभूत होकर नहीं किये जा सकते। आक्रामक कूटनीतिक विकल्पों के अतिरिक्त सैन्य कार्यवाही अत्यावश्यक है जिसका स्वरूप स्पेशल फ़ोर्स के रूप में उपलब्ध है।

Image in Public Domain (Source : Wikipedia)

 भारत की स्पेशल फ़ोर्स का प्रदर्शन द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही उत्कृष्ट रहा है। स्पेशल फ़ोर्स का अर्थ है सेना के विभिन्न अंगों से विशेष रूप से प्रशिक्षित सैनिकों का दल जिसे शत्रु की सीमा के भीतर किसी विशिष्ट प्रयोजन को पूर्ण करने हेतु नियुक्त किया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमरीकी सेना ने ‘एयरबॉर्न’ (airborne) डिवीजन बनाई थी जिसके सैनिकों को युद्ध के बीचोंबीच शत्रु के खेमे में वायुसेना द्वारा उतारा जाता था। ये दल शत्रु की कमर तोड़ने के लिए विशिष्ट निर्धारित लक्ष्य को बेध कर वापस भी आते थे। कालांतर में अनेक देशों ने स्पेशल फ़ोर्स का गठन किया और उन्हें अत्याधुनिक बनाया। सन् 1962 में सीआईए और अमरीकी स्पेशल फ़ोर्स ने भारत को गुप्त रूप से ‘स्पेशल फ्रंटियर फ़ोर्स’ (SFF) अथवा Establishment-22 कहे जाने वाले बल के निर्माण में सहयोग दिया था। सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से स्वीकार न किये जाने पर भी यह स्वतंत्र भारत का प्रथम स्पेशल फ़ोर्स बल था। तदुपरांत सन् 1965 में मेजर मेघ सिंह के नेतृत्व में ‘मेघदूत फ़ोर्स’ का गठन किया गया। ध्यातव्य है कि हाजी पीर में विजय के नायक मेजर (कालांतर में लेफ्टिनेंट जनरल) रंजीत सिंह दयाल (महावीरचक्र) भारतीय सेना की पैराशूट रेजिमेंट के अधिकारी थे। आज हम इसे PARA SF के नाम से जानते हैं क्योंकि इसके सैनिक शत्रु के खेमे में आकाश से छलांग लगाने में दक्ष हैं। इनकी पहचान मरून रंग की ‘बेरे’ (beret) टोपी है। पैरा एसएफ की मरून बेरे सेना के सभी अधिकारियों और जवानों को नहीं मिलती अपितु इसे कड़े प्रशिक्षण द्वारा अर्जित करना होता है। यह प्रशिक्षण धरती पर मानव की शारीरिक एवं मानसिक क्षमताओं की असाधारण परीक्षा होती है। स्पेशल फ़ोर्स ऑपरेशन में समय का कड़ाई से पालन किया जाता है। स्पेशल फ़ोर्स के चार ‘सत्य’ माने जाते हैं:

  1. मानव उपकरणों से अधिक महत्वपूर्ण है।
  2. गुणवत्ता संख्याबल से उत्तम है।
  3. स्पेशल फ़ोर्स का पुंज उत्पादन नहीं किया जा सकता।
  4. आपात स्थिति उत्पन्न होने के उपरांत योग्य स्पेशल फ़ोर्स गठित नहीं की जा सकती।

स्पेशल फ़ोर्स विशिष्ट इसलिए है क्योंकि इनके पास विशेष रूप से घातक अस्त्र, उच्चतम तकनीक से युक्त उपकरणों के साथ ही तीक्ष्ण मनोवैज्ञानिक क्षमता भी होती है। विश्व की अनेक सेनाओं ने अपनी स्पेशल फ़ोर्स को जिहादी आतंक निरोधक बल के रूप में विकसित किया है। रूस की स्पेट्ज़नात्ज़, इस्राएली सायेरेत मत्काल, यूनाइटेड किंगडम की स्पेशल एयर सर्विस और अमरीकी ग्रीन बेरे, सील तथा रेंजर विश्व की प्रमुख़ स्पेशल फ़ोर्स हैं जो अपने देश की विदेश नीति के लक्ष्यों को प्राप्त कराने में सहायक सिद्ध हुई हैं। भारत की स्पेशल फ़ोर्स ने सन् 1988 में ऑपरेशन कैक्टस के तहत मालदीव में तख्तापलट के प्रयास विफल किये थे। सन् 2000 में अफ्रीका के सिएरा लीओन के जंगलों में संयुक्त राष्ट्र शांतिबल में सम्मिलित 200 भारतीय सैनिक बन्दी बना लिए गए थे। तब भारतीय सेना ने ऑपरेशन खुकरी के तहत अफ्रीका के बीहड़ों में से अपने सैनिकों को वापस लाने का पराक्रम किया था। इन विदेशी अभियानों के अतिरिक्त भारतीय स्पेशल फ़ोर्स ने पाकिस्तान के साथ प्रत्येक युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्पेशल फ़ोर्स थलसेना का ही अंग नहीं अपितु भारतीय नौसेना और वायुसेना के पास भी है। नौसेना में इसे मार्कोस (MARCOS) तथा वायुसेना में गरुड़ बल के नाम से जाना जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा दल (NSG) आंतरिक आतंकवादी गतिविधियों एवं बंधक जैसी परिस्थितियों ने निबटने के लिए गठित की गयी थी।

सामरिक विशेषज्ञ भरत कर्नाड लिखते हैं कि यदि भारत को अपने दूरगामी सामरिक हित साधने हैं और दक्षिण एशिया क्षेत्र में अपनी सीमाओं के पार दूरवर्ती परिधि में सुरक्षा के मानक स्थापित करने हैं तो हमारे पास तीन मूलभूत क्षमताओं का होना अनिवार्य है: आणविक आयुध सम्पन्न इंटर कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल, नेटवर्क-केंद्रित विद्युत-चुम्बकीय युद्धक प्रणाली तथा सुगठित सर्व साधन युक्त स्पेशल फ़ोर्स कमान।

ध्यातव्य है कि अमरीका ने 1987 में ही स्पेशल ऑपरेशन कमान का गठन किया था। यह कमान संयुक्त रूप से अमरीका के सभी स्पेशल फ़ोर्स बल की एकीकृत कमान है। यही नहीं अमरीकी रक्षा प्रणाली में सामरिक चिंतन एक महत्वपूर्ण अंग है। आश्चर्य नहीं कि उन्होंने स्पेशल फ़ोर्स के महत्व को देखते हुए स्पेशल फ़ोर्स विश्वविद्यालय का निर्माण किया है। लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश कटोच लिखते हैं कि विकिपीडिया जैसी वेबसाइट भारत में पचासों प्रकार की स्पेशल फ़ोर्स का उल्लेख करती हैं। ऐसे में सर्वप्रथम यह चिह्नित करना आवश्यक है कि कौन से बल स्पेशल फ़ोर्स कहे जाएंगे तत्पश्चात उन्हें स्पेशल फ़ोर्स कमान के अंतर्गत लाया जाये। चूँकि स्पेशल फ़ोर्स कमान सशस्त्र सेनाओं की संयुक्त कमान होगी अतः दशकों से लम्बित चीफ़ ऑफ़ डिफेंस स्टाफ के स्थाई पद का सृजन करना अब अनिवार्य है। ज्ञातव्य है कि विश्व के 67 देशों ने CDS (Chief of Defence Staff) की व्यवस्था को अपनाया है क्योंकि भविष्य के युद्ध सशस्त्र सेनाओं के सभी अंगों द्वारा संयुक्त रूप से लड़े जाएंगे अतः परस्पर सामंजस्य बाध्यकारी अनिवार्यता है। कुछ दिन पहले ही चीफ़ ऑफ़ नेवल स्टाफ एडमिरल सुनील लान्बा ने सशस्त्र सेनाओं की जॉइंट डॉक्ट्रिन (India’s 2017 Joint Armed Forces Doctrine) का लोकार्पण किया है। उसमें स्पेशल ऑपरेशन डिवीजन बनाने की बात कही गयी है किंतु भारत सरकार ने अभी तक ऐसा कोई आधिकारिक निर्णय नहीं लिया है।

डॉ प्रेम महादेवन पाकिस्तान के विरुद्ध स्पेशल ऑपरेशन के चार स्तरीय सुझाव देते हैं। पहला यह कि लक्ष्य निर्धारित करें। किसी भी स्पेशल फ़ोर्स ऑपरेशन के राजनीतिक व कूटनीतिक लक्ष्य होते हैं जिनकी प्राप्ति ही उस विशेष कार्यबल का एकमेव उद्देश्य होता है। जिस प्रकार इस्राएल ने मिस्र के ‘संनिघर्षण युद्ध’ (War of Attrition) के विरुद्ध सन् 1969 में स्पेशल ऑपरेशन कर उन्हें बलविहीन किया उसी प्रकार के विकल्प भारत के पास भी हैं।

दूसरा यह की गुप्तचर व्यवस्था सुदृढ़ करें। पाकिस्तान के भीतर क्या हो रहा है हमें इसकी जानकारी होनी चाहिये। किसी भी स्पेशल ऑपरेशन की रीढ़ इंटेलिजेंस से प्राप्त सूचना होती है। स्पेशल ऑपरेशन कमान के अंतर्गत रॉ, आइबी, NTRO समेत सभी एजेंसियों का समुचित सहयोग होना चाहिये।

तीसरा, लॉजिस्टिक्स का सहयोग होना चाहिये अर्थात् तीव्र गति से उड़ने एवं शत्रु के रडार से बच निकलने की क्षमता वाले अत्याधुनिक विमान समय की माँग हैं। लॉजिस्टिक्स सहयोग का एक अर्थ यह भी है कि शत्रु के क्षेत्र में हमसे सहानुभूति रखने वाले लोग उपस्थित हों। यह इंटेलिजेंस एजेंसियों का कार्य है जिसे मनोवैज्ञानिक युद्ध (PSYOPS- Psychological operations) का विस्तार समझा जा सकता है। बलोचिस्तान में उठ रहे स्वतंत्रता के स्वर भारत के लिए इस प्रकार के युद्ध में बढ़त हासिल करने का स्वर्णिम अवसर हैं।

चौथा स्तर प्रशिक्षण है। नागरिकों में से चयनित होकर लोग सेना में जाते हैं और सेना में विशिष्ट प्रशिक्षण की प्रक्रिया को पार कर सैनिक स्पेशल फ़ोर्स में जाता है। पाकिस्तानी सेना के दमन के लिए हम उस प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त कर उनके क्षेत्र में आक्रमण नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने भी वही प्रशिक्षण लिया है। भारतीय और पाकिस्तानी दोनों सेनायें पश्चिमी देशों की प्रशिक्षण पद्धति पर आधारित हैं। अत्याधुनिक घातक अस्त्र जो सामान्यतः सेना उपयोग में नहीं लाती वे स्पेशल ऑपरेशन में प्रयुक्त होते हैं जिनकी हमें आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त नाईट विजन गॉगल्स, थर्मल इमेजिंग सेंसर इत्यादि का उपयोग होता है। हाल ही में करेंट साइंस शोध पत्रिका में प्रकाशित लेख के अनुसार भारत ने अँधेरे में देखने वाले गॉगल्स की स्वदेशी तकनीक विकसित कर ली है।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि यद्यपि स्पेशल ऑपरेशन बारम्बार नहीं किये जा सकते अन्यथा शत्रु को हमारी रणनीतिक दुर्बलता का पता चल जाता है तथापि स्पेशल ऑपरेशन कुछ विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये जा सकते हैं जिनसे दूरगामी हित सधते हों।


सन्दर्भ:

  1. Brave Men of War: Tales of Valor 1965 by Lt Col Rohit Agarwal
  2. 1965 Turning the Tide by Nitin Gokhale
  3. Army and Nation by Steven I Wilkinson
  4. Eye for an Eye: Decoding Global Special Operations and Irregular Warfare by Prem Mahadevan
  5. India’s Special Forces: History and Future of India’s Special Forces by Lt Gen Prakash Katoch and Saikat Datta
  6. Mission Overseas: Daring Operations by Indian Military by Sushant Singh
  7. Special Forces: Doctrine, Structures and Employment Across the Spectrum of Conflict in the Indian context edited by Lt General Vijay Oberoi
  8. SAS and Elite Forces Guide: Special Forces in Action by Alexander Stillwell
  9. http://www.thehindu.com/news/cities/mumbai/iit-bombay-develops-first-indigenous-thermal-imaging-devices/article18460017.ece
  10. https://swarajyamag.com/defence/the-downside-of-bat-actions

लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

ब्लॉग: https://sciencediplomat.wordpress.com