आदिकाव्य रामायण से – 19 : सुंदरकाण्ड, [चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम]

आदिकाव्य रामायण – 18 से आगे …  रावण वैसा ही लग रहा था जैसे स्वच्छ स्थान पर ऊड़द का ढेर पड़ा हो, जैसे गङ्गा की धारा में कुञ्जर अर्थात हाथी सोया हो, माष राशिप्रतीकाशम् नि:श्वसन्तम् भुजङ्गवत्। गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥  चहुँओर जलते स्वर्णदीपकों से रावण के सर्वाङ्ग वैसे ही प्रकाशित थे जैसे बिजलियों से…

प्रतिभूति (शेयर) बाजार में व्यापार (ट्रेडिंग) share market trading

बाजार के एक मित्र से बात हो रही थी कि कई लोग शेयर बाजार को गाली देते हैं और कहते हैं कि यह बाजार सही नहीं है, न निवेश के लिये, न ही कमाने के लिये और शेयर बाजार केवल जुआ या सट्टाबाजार जैसा ही है, और इससे अधिक कुछ और नहीं। सही बताऊँ तो…

Plum-Headed Parakeet (Male), टोइंया सुग्गा (नर), चित्र सर्वाधिकार: आजाद सिंह, © Ajad Singh, सरयू नदी के पास गुप्तार घाट, फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश, May 28, 2017

Plum-Headed Parakeet, टोइंया सुग्गा, टुई, तोता

Plum-Headed Parakeet, टोइंया सुग्गा, टुई। जैव विविधता की कड़ी में आजाद सिंह का आज का लेख भारत में पाए जाने वाले इस तोते पर। Plum-Headed Parakeet (Male), टोइंया सुग्गा (नर), चित्र सर्वाधिकार: आजाद सिंह, © Ajad Singh, सरयू नदी के पास गुप्तार घाट, फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश, May 28, 2017  हिंदी नाम: टोइंया सुग्गा, टुई (…

मध्यमान प्रत्यावर्तन (reversion to mean) सिद्धान्त : सनातन बोध – 14

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2, 3, 4 , 5 , 6, 7, 8, 9 , 10, 11,12, 13 से आगे मध्यमान प्रत्यावर्तन (reversion to mean),  सांख्यिकी, मनोविज्ञान और व्यावहारिक अर्थशास्त्र का एक सहज परन्तु महत्त्वपूर्ण सिद्धांत है। चार्ल्स डार्विन के चचेरे भाई फ़्रैन्सिस गॉल्टॉन को इसके प्रतिपादन का श्रेय दिया जाता…

यज्ञोपवीत संस्कार : अवधी लोकगीतों में अभिव्यक्ति

डॉ. अनीता शुक्ल हिंदी विभाग, महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा _______________________________________ वर्णाश्रमों में विभाजित भारतीय सामाजिक जीवन में पुत्र का अत्यंत महत्व है। पुत्र वंश को बढ़ाता है, पितृ ऋण से उऋण करता है – ‘पुनाति य: सुचरितै: पितरं स पुत्र:’। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है:  ऋणमस्मिन् संनयत्यमृतत्वं च गच्छति। पिता पुत्रस्य जातस्य पश्येच्चेज्जीवतो मुखम्॥…

यतो धर्मस्ततो जय:

धर्मक्षेत्र। भारत युद्ध में उपदिष्ट भगवद्गीता के चौथे अध्याय के आठवें श्लोक में श्रीकृष्ण वह कहते हैं जिसे राज्य के तीन आदर्शों के रूप में भी लिया जा सकता है: परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय दुष्कृताम् धर्म संस्थापनाय पहला सूत्र उपचारात्मक है, यदि सज्जन पीड़ित है तो उसे पीड़ा से मुक्ति दी जाय, अन्याय को समाप्त किया…