आदिकाव्य रामायण से – 21 : सुंदरकाण्ड, सीता क्या नष्ट हुईं? [विनष्टा वा प्रनष्टा वा मृता वा जनकात्मजा]

मन जाने कितने अनिष्टशिखरों का आरोहण अवरोहण कर चुका था। कोई विकल्प शेष नहीं था, इतना स्पष्ट हो गया था कि जीवन बचाते हुये वहीं रहना था। मन की धुंध कुछ छँटी, स्पष्टता आई तथा कपि की दृष्टि भी स्वच्छ हुई। विशाल वृक्षों से युक्त अशोकवनिका दिखी – अरे! इसमें तो मैंने ढूँढ़ा ही नहीं!

अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा
इमामभिगमिष्यामि न हीयं विचिता मया

अकादमिक चौर्य कर्म तथा भारतीय भाषाओं के लिये एक मञ्च

भारत के उच्च शिक्षा शोध संस्थानों की प्रतिष्ठा एवं वरीयता अंतर्राष्ट्रीय स्तर की न होने के ढेर सारे कारणों में से प्रमुख एक है – अकादमिक शुचिता का अभाव। निचले स्तर पर छिछ्लापन एवं चौर्य कर्म की प्रचुरता तो है ही, स्तरीय कहे जाने वाले संस्थान भी पीछे नहीं। ‘फ्रॉड’ करने में भी उनका नाम…

GREATER COUCAL CROW PHEASANT SOUTHERN COUCAL महोख डुगडुगी, चित्र सर्वाधिकार: आजाद सिंह, © Ajad Singh, सरयू नदी के पास, माझा, अयोध्या, फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश, May 07, 2017

GREATER COUCAL CROW PHEASANT SOUTHERN COUCAL महोख डुगडुगी

GREATER COUCAL महोख या डुगडुगी। महोख कौवे जैसा एक बड़ा पक्षी है तथा कोयल परिवार का होते हुए भी परजीवी नहीं। यह लाल और भूरे परों वाली चिड़िया है।     हिंदी नाम:  महोख, महोक, कूक, कूका, डुगडुगी, भारद्वाज/नपिता (मराठी), कुक्कुभ(संस्कृत) वैज्ञानिक नाम: Centropus Sinensis Kingdom – Animalia Phylum – Chordata Class – Aves Order –…

सुख, विभेदकारी बुद्धि एवंं उपद्रष्टा आत्मरूप : सनातन बोध – 15

हमारा नित्य आत्मरूप (true self) है क्या? अनुभूति और स्मृति आत्मरूप तो नहीं? और यदि ये अनुभूति और स्मृति आत्मरूप हमारे गुणसूत्रों में ही अंतर्निहित हैं तो इससे केवल यह पता चलता है कि हमारे गुणसूत्र भी हमारे नित्य आत्मरूप नहीं है, हमारा वास्तविक आत्मरूप इससे परे है एवं इस संज्ञानात्मक पक्षपात से बचने के लिये हमें उस वास्तविक स्वरूप का चिंतन करना चाहिए। श्वेताश्वतरोपनिषद, मुण्डकोपनिषद तथा कठोपनिषद में वर्णित दो पक्षियों की उपमा वाला यह दर्शन  मूलत: ऋषि दीर्घतमा औचथ्य द्वारा दर्शित ऋग्वेद की ऋचा (1.164.20) का यथारूप है।

आदिकाव्य रामायण से – 20 : सुंदरकाण्ड, [न हि मे परदाराणां दृष्टिर्विषयवर्तिनी]

आदिकाव्य रामायण – 19 से आगे …  आगे बढ़ते हनुमान जी को पानभूमि में क्लांत स्त्रियाँ दिखीं, कोई नृत्य से, कोई क्रीड़ा से, कोई गायन से ही क्लांत दिख रही थी। मद्यपान के प्रभाव में मुरज, मृदङ्ग आदि वाद्य यंत्रों का आश्रय ले चोली कसे पड़ी हुई थीं – चेलिकासु च संस्थिता:। रूप कैसे सँवारा…