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PIE, प्राक् भारोपीय : एक छल

भाषा एक मानव समूह की दूसरे समूह के ऊपर और एक नृजाति के ऊपर दूसरे की श्रेष्ठता या आधिपात्य स्थापित करने और भाषा विज्ञान द्वारा विश्लेषित हो विकृत असत निरूपण हेतु एक उपादान के रूप में प्रयुक्त होती रही है। भाषिक प्रदूषण सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से भी जुड़ता है। वर्तमान में हिन्दी सिनेमा का अरबी फारसी के शब्दों द्वारा सजग प्रदूषण एक उदाहरण भर है।
 
विलियम जोन्स द्वारा समानरूपी समानार्थी शब्दों की पहचान के साथ ही भारत, ईरान और यूरोप की भाषाओं के एक कुल की बात सामने लायी गयी – भारोपीय Indo European। आर्य आक्रमण का सिद्धांत भी लाया गया क्यों कि यूरोप को यह स्वीकार्य ही नहीं था कि उस कुल की जो सबसे पुरानी भाषा भारत में सुरक्षित थी, वह देसी हो सकती थी। तबसे गङ्गा जी में बहुत पानी बह गया है और सिद्धांत एक कपोल कल्पना ही रह गया है।
 
उस सिद्धांत के ऊपर प्रश्न उठने के साथ ही भारत से बहिर्गमन का सिद्धान्त भी जोर पकड़ने लगा। समांतर ही भाषा विज्ञान में एक समस्या आने लगी। भारोपीय शब्दों की जब मूल धातुओं की बात आती तो संस्कृत सामने होती। वैदिक और पाणिनीय रूपों की विशाल सम्पदा को हठात झटक देना शंका उत्पन्न करता। ऐसे में यूरोपीय विद्वान एक दूसरा सिद्धांत ले कर आये – Proto Indo European (PIE) अर्थात प्राक् भारोपीय। उनके अनुसार भारोपीय कुल के वर्तमान रूप से भी पहले एक एकल भाषा थी। लगभग 5500 वर्ष पहले उसको बोलने वाले इधर उधर भटक कर स्थापित होने लगे। नयी भाषाओं ने रूप लिये। और सबसे बड़ी बात यह कि उस भाषा का मूल स्थान पूर्वी यूरोप में काला सागर के उत्तर में था अर्थात आर्य आक्रमण ने आर्य आव्रजन परिकल्पना का रूप में लिया। भाषा का मूल स्थान यूरोप ही रहा।
 
इस गढ़ंत भाषा का कोई सीधा प्रमाण नहीं है और न ही इसका कारण पता है कि अचानक उन सबको यूँ आव्रजित होने की आवश्यकता क्यों पड़ी! सैद्धान्तिक और तुलनात्मक भाषा विज्ञान द्वारा उस भाषा को गढ़ने के प्रयास 1874 ई. में प्रारम्भ हुये और 1900 आते आते विलुप्त अंतोलियाई भाषा की सहायता से कृत्रिम भाषा का एक प्रारूप गढ़ लिया गया।
 
अब चुनौती यह थी कि ऐसी भाषा क्या स्वाभाविक रूप से बोली भी जा सकती थी? आश्चर्यजनक रूप से इसके लिये अन्वेषकों ने किसी यूरोपीय भाषा के पुराने साहित्य को आधार न बना ऐतरेय ब्राह्मण (7.14) के पुत्रार्थी इक्ष्वाकु राजा हरिश्चन्द्र और वरुण देव के बीच सम्वाद को आधार बनाया। उस खण्ड को PIE में परिवर्तित कर 1997 ई. में बोल कर सुनाया भी गया। 2013 तक बस उन्हीं चन्द पंक्तियों के सुधार में लोग लगे रहे।
 
 
इस बीच यह भी निकल कर आया कि यूनानी यूरोपीय सभ्यता को अपने ऊपर सुमेर और मिस्र के प्रभाव को भी छिपाना था इसलिये भी PIE को गढ़ा गया। मजे की बात यह भी है कि जब PIE से सबसे अधिक समानता की बात की जाती है तो तमिळ से ले कर लाटवियाई और लिथुयानियाई भाषाओं तक के बखान किये जाते हैं लेकिन संस्कृत को नीचे ही रखा जाता है।
नस्लवाद, भाषिक घृणा और भेदभाव का इससे उपयुक्त उदाहरण नहीं हो सकता। चाहने से इतिहास और विद्या के विरूप गढ़े जा सकते हैं और उन्हें स्थापित भी किया जा सकता है।   
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अङ्ग्रेज़ी उद्धरण आभार:
https://warlockasyluminternationalnews.com/2011/04/27/origin-of-the-racist-term-proto-indo-european/