आदिकाव्य रामायण से – 22 : सुन्‍दरकाण्ड, [प्रशस्य तु प्रशस्तव्यां सीतां तां]

सुन्‍दरकाण्ड : संदिग्ध अर्थ वाली स्मृति, पतित ऋद्धि, विहत श्रद्धा, भग्न हुई आशा, विघ्न युक्त सिद्धि, कलुषित बुद्धि, मिथ्या कलङ्क से भ्रष्ट हुई कीर्ति। इन दो श्लोकों में कवि ने करुणा परिपाक के साथ ज्यों समस्त आर्य संस्कारों का तापसी पर अभिषेक कर दिया!

पुराणों में क्या है -1:विष्णु दशावतार तथा बुद्ध – 3 [राधा, परशुराम; ब्रह्माण्ड, वायु, ब्रह्म]

राम जामदग्नेय को प्रतिहिंसक द्वेषी दर्शाया गया है जिसका विस्तृत विवरण ब्रह्माण्ड पुराण में अन्यत्र कहीं से ला कर जोड़ा गया है। इसकी पूरी सम्भावना है कि उस स्वतंत्र पाठ को विकृत करने के पश्चात जोड़ा गया।

पुराणों में क्या है – 1 : विष्णु दशावतार तथा बुद्ध – 2 [मार्कण्डेय, वामन, कूर्म]

कलियुग के लक्षणों को गिनाते हुये इस पुराण में शुक्लदंताजिनाख्या, मुण्डा, काषायवासस: पद प्रयुक्त हुये हैं जिन्हें स्पष्टत: बौद्ध मत का परोक्ष उल्लेख कहा जा सकता है:

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः  । प्रमदाः केशशूलिन्यो भविष्यन्ति कलौ युगे  ॥
शुक्लदन्ताजिनाख्याश्च मुण्डाः काषायवाससः  । शूद्रा धर्मं चरिष्यन्ति युगान्ते समुपस्थिते  ॥

पुराणों में क्या है – 1 : विष्णु दशावतार तथा बुद्ध – 1

भूमिका  भारत में पुराण लेखन की बहुत प्राचीन परम्परा रही है जिसकी साखी अथर्वण संहिता1, शतपथ ब्राह्मण2, अर्थशास्त्र3 इत्यादि जैसे स्रोत हैं। पुराण शब्द का अर्थ ‘प्राचीन’ से ले कर ‘श्रुतियों अर्थात त्रयी के पूरक’ तक किया जाता रहा है। पुराणों का समग्र भारतीय जन जीवन पर बहुत प्रभाव रहा और है। पुराण प्राचीन काल…

आदिकाव्य रामायण से – 21 : सुंदरकाण्ड, सीता क्या नष्ट हुईं? [विनष्टा वा प्रनष्टा वा मृता वा जनकात्मजा]

मन जाने कितने अनिष्टशिखरों का आरोहण अवरोहण कर चुका था। कोई विकल्प शेष नहीं था, इतना स्पष्ट हो गया था कि जीवन बचाते हुये वहीं रहना था। मन की धुंध कुछ छँटी, स्पष्टता आई तथा कपि की दृष्टि भी स्वच्छ हुई। विशाल वृक्षों से युक्त अशोकवनिका दिखी – अरे! इसमें तो मैंने ढूँढ़ा ही नहीं!

अशोकवनिका चापि महतीयं महाद्रुमा
इमामभिगमिष्यामि न हीयं विचिता मया