आदिकाव्य रामायण से – 31, सुन्‍दरकाण्ड [कीदृशं तस्य संस्थानं रूपं रामस्य कीदृशम्]

आदिकाव्य रामायण : उपस्थिति सुहावन थी किन्‍तु जनस्थान की स्मृति भी थी। वानर सौम्य है, मन विश्वास करने को कहता था। अविश्वास भी, कहीं मैं सपना तो नहीं देख रही?

आदिकाव्य रामायण से – 30, सुन्‍दरकाण्ड [अहं रामस्य संदेशाद्देवि दूतस्तवागतः]

आदिकाव्य रामायण , सुन्‍दरकाण्ड से : जाने कितने ताप भरे दिन बीते थे, शोक एवं प्रताड़ना के जाने कितने कर्कश शब्द सुनने के पश्चात कोई प्रियवादी कुशल क्षेम पूछने वाला मिला था, हर्षित सीता अपनी रामकहानी कहती चली गयीं … श्रीराम के बिना मुझे स्वर्ग में भी निवास भी नहीं रुचता – न हि मे तेन हीनाया वासः स्वर्गेऽपि रोचते।

लघु दीप अँधेरों में tiny lamps – 9

लघु दीप अँधेरों में : जो पुरुष शत्रुओं द्वारा दिये गये बिना लोहे का बना शस्त्र ग्रहण कर लेता है, वह साही के घर में प्रवेश कर हुताशन से बच जाता है। विचरण करते रहने से मार्गों का ज्ञान हो जाता है, नक्षत्रों से दिशा को जाना जाता है। अपने पाँच को पीड़ा पहुँचाने वाला पीड़ित नहीं होता।

आदिकाव्य रामायण से – 29, सुन्‍दरकाण्ड [तथा सर्वं समादधे]

आदिकाव्य रामायण : सुंदरकांड: तिरछे देखा, उचक कर ऊपर देखा, किञ्चित नीचे देखा। पिङ्गाधिपति सुग्रीव के अमात्य, अचिन्त्य बुद्धि सम्पन्न वातात्मज हनुमान उदित होते सूर्य की भाँति दिख गये। सा तिर्यगूर्ध्वं च तथाप्यधस्तान्निरीक्षमाणा तमचिन्त्यबुद्धिम् सूर्यवंशी श्रीराम के दूत हनुमान आन पहुँचे थे। दु:खों की रजनी बीत चुकी थी।

लघु दीप अँधेरों में tiny lamps – 8

लघु दीप अँधेरों में : जो उद्योग करने के समय उद्योग न करने वाला, युवा एवं बली हो कर भी आलस्य से युक्त होता है, जिसने उच्च आकांक्षाओं को छोड़ दिया है एवं जो दीर्घसूत्री है, वह आलसी प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं होता।

आदिकाव्य रामायण से – 28, सुन्‍दरकाण्ड […प्रणष्टं, वर्षेण बीजं प्रतिसंजहर्ष]

काली पुतली, रक्ताभ कोर वाली स्वच्छ सुंदर आँखों की फड़कन का सौंदर्य दर्शाने के लिये आदिकवि ने अद्भुत कोमल प्रभावमयी उपमा का सहारा लिया है – सजल आँखें सरोवर भाँति जिसमें कमल एवं तैरती मछली, सहसा ही चित्र खिंच जाता है। क्षण को शब्दकारा में बन्‍दी बना लेना इसे कहते हैं।

आदिकाव्य रामायण से – 27, सुन्‍दरकाण्ड [न च मे विहितो मृत्युरस्मिन्दुःखेऽपि वर्तति]

आदिकाव्य रामायण से सुन्‍दरकाण्‍ड : जिनके अन्त:करण वश में हैं, कोई प्रिय या अप्रिय नहीं हैं,उन अनासक्त महात्माओं को नमस्कार है जिन्होंने स्वयं को प्रिय एवं अप्रिय भावनाओं से दूर कर लिया है। प्रीति उनके लिये दु:ख का कारण नहीं होती, अप्रिय से उन्हें अधिक भय नहीं होता।