आदिकाव्य रामायण से – 20 : सुंदरकाण्ड, [न हि मे परदाराणां दृष्टिर्विषयवर्तिनी]

आदिकाव्य रामायण – 19 से आगे …  आगे बढ़ते हनुमान जी को पानभूमि में क्लांत स्त्रियाँ दिखीं, कोई नृत्य से, कोई क्रीड़ा से, कोई गायन से ही क्लांत दिख रही थी। मद्यपान के प्रभाव में मुरज, मृदङ्ग आदि वाद्य यंत्रों का आश्रय ले चोली कसे पड़ी हुई थीं – चेलिकासु च संस्थिता:। रूप कैसे सँवारा…

आदिकाव्य रामायण से – 19 : सुंदरकाण्ड, [चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम]

आदिकाव्य रामायण – 18 से आगे …  रावण वैसा ही लग रहा था जैसे स्वच्छ स्थान पर ऊड़द का ढेर पड़ा हो, जैसे गङ्गा की धारा में कुञ्जर अर्थात हाथी सोया हो, माष राशिप्रतीकाशम् नि:श्वसन्तम् भुजङ्गवत्। गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥  चहुँओर जलते स्वर्णदीपकों से रावण के सर्वाङ्ग वैसे ही प्रकाशित थे जैसे बिजलियों से…

यतो धर्मस्ततो जय:

धर्मक्षेत्र। भारत युद्ध में उपदिष्ट भगवद्गीता के चौथे अध्याय के आठवें श्लोक में श्रीकृष्ण वह कहते हैं जिसे राज्य के तीन आदर्शों के रूप में भी लिया जा सकता है: परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय दुष्कृताम् धर्म संस्थापनाय पहला सूत्र उपचारात्मक है, यदि सज्जन पीड़ित है तो उसे पीड़ा से मुक्ति दी जाय, अन्याय को समाप्त किया…

कनकधारा स्तोत्र – आदिशङ्कराचार्य की परदु:खकातरता

अद्भुत संकल्पनाओं की आश्चर्यचकित कर देने वाली, पुलक से भर देने वाली, अनुभूतियों से हृदय को झकझोर देनेवाली महानिशा को हम दीपावली कहते हैं, हर वर्ष उस अनमोल ऊर्जा के उत्स आख्यान से आपादमस्तक उत्साह में स्नात, नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा की अंतरगुहा की आह्लाद यात्रा पर निकल पड़ते हैं।   बाह्य स्वरूप में तो केवल दियों, मिठाइयों…

आदिकाव्य रामायण से – 18 : सुंदरकाण्ड [विवेकः शक्य आधातुं]

इस सुषमा बीच भी मारुति चैतन्य थे। उन्हें रावण फुफकारते नाग समान लगा – नि:श्वसन्तम् यथा नागम् रावणम्, उद्विग्न और सभीत हो पीछे हट गये। वह वैसा ही लग रहा था जैसे स्वच्छ स्थान पर ऊड़द का ढेर पड़ा हो, जैसे गङ्गा की धारा में कुञ्जर सोया हो, माष राशिप्रतीकाशम् नि:श्वसन्तम् भुजङ्गवत्। गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥

आदिकाव्य रामायण से – 17 : सुंदरकाण्ड [मार्गमाणस्तु वैदेहीं सीतामायतलोचनाम्]

आदिकाव्य रामायण से – 16 से आगे … गंध प्रतिमा अनिल द्वारा प्रेरित हो अंत:पुर में हनुमान जी के प्रवेश से पहले वाल्मीकि ने सुंदर प्रयोग किये हैं। उस भवन का विस्तार बताने के लिये ‘आयत’ शब्द का प्रयोग करते हैं, एक योजन लम्बा और आधा योजन चौड़ा – अर्धयोजनविस्तीर्णमायतं योजनं हि तत्! 1:2 का…

आदिकाव्य रामायण से – 16

नथुनों में पेय और भक्ष्य अन्न पदार्थादि की दिव्य गंध के झोंके प्रविष्ट हुये जैसे कि स्वयं अनिल देव ने गंध रूप धर लिया हो। मधुर महा सत्त्वयुक्त गंध युक्त देव पुकार कर बता रहे थे – यहाँ आओ, यहाँ आओ! रावण यहाँ है। हनुमान को लगा जैसे कोई बंधु अपने बहुत ही प्रिय बंधु से कह रहा हो!