Category Archives: हिंदी

अमेरिका में हिन्दी

अनुराग शर्मा

हिन्दी की शिक्षिका हिन्दी जैसी ही हैं, माँ सरीखी, प्रेममयी, लेकिन शिक्षण की मानक विधियों से अनभिज्ञ… अमेरिका में हिन्दी  शिक्षण की एक बड़ी ज़िम्मेदारी ऐसी संस्थाओं द्वारा उठाई जा रही है जिन्हें आमतौर पर हिन्दी सेवी श्रेणी में नहीं गिना जाता है। इन संस्थाओं में भारतीय संस्कृति से लेकर धर्म और अध्यात्म के लिये काम करने वाली संस्थायें हैं।

अमेरिका भी भारत सरीखा एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक वैविध्य से भरपूर राष्ट्र है। जिस प्रकार भारत विभिन्न संस्कृतियों का सागर और दक्षिण एशिया के देशों के नागरिकों के लिये एक शरणस्थली है, अमेरिका वही भूमिका वैश्विक स्तर पर निभा रहा है।

यद्यपि अमेरिका में संसार भर की लगभग सभी भाषायें बोलने वाले समूह उपस्थित हैं, यहाँ की सबसे बड़ी मातृभाषा और आधिकारिक कामकाज की भाषा अमेरिकी मानक वाली अंग्रेज़ी है। मातृभाषाओं में अंग्रेज़ी के बाद स्पैनिश का स्थान है जिसे मुख्यतः दक्षिण अमेरिकी मूल के नागरिक और आप्रवासी बोलते हैं। इसके बाद अन्य भाषाओं का स्थान आता है। इनमें अनेक भारतीय भाषायें भी शामिल हैं। अमेरिका आने वाले अधिकांश आप्रवासी अपनी संस्कृति और भाषा को पीछे छोड़कर अमेरिकी महासागर में पूरी तरह समाहित होते रहे हैं। आजकल यह दशा और दिशा बदलती दिख रही है। बहुत से नये लोग अपनी संस्कृति, धर्म, और भाषा की लौ ज्वलंत रखना चाहते हैं, कम से कम अपने घर की चारदीवारी में तो वे अपनी मातृभाषा बनाये रखना चाहते हैं।  यह एक बड़ी चुनौती है।

भाषाओं की विभिन्न धाराओं के इस अनूठे सागर में अंग्रेज़ी और स्पैनिश से इतर भाषाओं के लिये अपनी पहचान बनाये रखना आसान काम नहीं है। हिन्दी  के लिये यह काम और भी दुष्कर हो जाता है क्योंकि यहाँ उसे विदेशी भाषाओं के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं से भी प्रतियोगिता करनी पड़ती है। चूँकि भारत में हिन्दी एक प्रमुख सम्पर्क भाषा है, अहिन्दी भाषियों को भी इसे सीखने का अवसर आसानी से मिल जाता है। हिन्दी न बोलने वाले बच्चे भी अपने मित्रों, सहपाठियों, परिजनों, के साथ-साथ रेडियो-टीवी, तथा सिनेमा आदि के माध्यम से हिन्दी से दो-चार होते रहते हैं। लेकिन भारत से दूर होते ही वे हिन्दी  सीखने के इस सहज साधन से दूर हो जाते हैं। घर से बाहर तो अंग्रेज़ी का साम्राज्य होता है और घर में अंग्रेज़ी के साथ मातृभाषा बोली जाती है।

अमेरिका के विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम अंग्रेज़ी है। वैसे तो बच्चों को अन्य भाषायें सीखने की सुविधा है लेकिन शाला और विश्वविद्यालय, दोनों ही स्तरों पर पढ़ाई जाने वाली भाषाओं की संख्या सीमित है बल्कि अगर मैं यह कहूँ कि वहाँ सामान्यतः यूरोपीय भाषायें ही पढ़ाई जाती हैं तो गलत नहीं होगा। पिछले वर्षों में चीन के बढ़ते व्यापारिक महत्व के कारण अमेरिका में चीनी सीखने की ललक में वृद्धि हुई है और वह भी शिक्षालयों में स्थान पा रही है। चीनी सरकार और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने भी अपनी भाषा की प्रगति के लिये सतत प्रयास किये हैं। इस दिशा में आधिकारिक रूप से हिन्दी  शिक्षण की स्थिति कोई खास अच्छी नहीं है। शाला स्तर पर पढ़ाई जाने वाली भाषाओं में शायद ही कहीं हिन्दी  को स्थान मिला है। मतलब यही है कि बच्चे आमतौर पर स्कूलों में हिन्दी नहीं पढ़ पाते हैं। गिने चुने विश्वविद्यालयों में ही हिन्दी विभाग हैं। अन्य विषयों के अध्यापकों की तरह अमेरिका में छात्रों द्वारा हिन्दी  के शिक्षकों भी मूल्यांकन किया जाता है। हिन्दी  की एक शिक्षिका पर एक छात्रा की टिप्पणी ध्यान देने योग्य है – हिन्दी की शिक्षिका हिन्दी जैसी ही हैं, माँ सरीखी, प्रेममयी, लेकिन शिक्षण की मानक विधियों से अन्जान। एक वाक्य की यह टिप्पणी हिन्दी शिक्षण के बारे में काफ़ी कुछ कह जाती है।

अमेरिका में कुछ हिन्दी  समितियाँ भी यत्र-तत्र हिन्दी  की सेवा में लगी हैं। इनमें से कुछ हिन्दी  प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चला रही हैं। परदेश में एक अनपेक्षित वर्ग भी हिन्दी  की सेवा में उतरा है। अमेरिका में हिन्दी  शिक्षण की एक बड़ी ज़िम्मेदारी ऐसी संस्थाओं द्वारा उठाई जा रही है जिन्हें आमतौर पर हिन्दी सेवी श्रेणी में नहीं गिना जाता है। इन संस्थाओं में भारतीय संस्कृति से लेकर धर्म और अध्यात्म के लिये काम करने वाली संस्थायें हैं। उदाहरणार्थ पिट्सबर्ग में किसी हिन्दी संस्था द्वारा कोई हिन्दी कक्षा नहीं चलाई जाती है परंतु चिन्मय मिशन नामक आध्यात्मिक संस्था नगर में तीन स्थानों पर हिन्दी कक्षायें चलाती है जिनमें लगभग 200 छात्र छात्रायें हिन्दी सीखते हैं। स्थानीय हिन्दू-जैन मंदिर में भी सप्ताहांत में हिन्दी  शिक्षण की नियमित कक्षायें चलती हैं। अन्य नगरों में भी खासकर हिंदू मंदिरों में भारतीय भाषायें पढ़ाई जा रही हैं जिनमें संस्कृत, तमिळ, और तेलुगु तो हैं ही परंतु हिन्दी  शीर्ष स्थान पर है।

ये तो हुई प्रशिक्षण की बात। आइये, अब एक नज़र अमेरिका में हिन्दी  साहित्य के पठन-पाठन पर भी डालते हैं।

अमेरिका में हिन्दी  के विकास के उद्देश्य से बनी कई संस्थायें हैं जिनमें से कई नियमित रूप से कवि सम्मेलन आदि कराती रही हैं। कुछेक संस्थायें वार्षिक उत्सव आदि भी आयोजित करती हैं। लेकिन सामान्यजन तक इनकी पहुँच कम ही है। यद्यपि ऐसी कई संस्थाओं के नाम में अंतर्राष्ट्रीय, विश्व, अखिल विश्व, इंटरनेशनल आदि जैसे शब्द मिल जायेंगे लेकिन इनकी सदस्यता सीमित ही है। कुछ संस्थाएँ सदस्यता शुल्क भी माँगती हैं, सदस्यता अभियान भी चलाती हैं परंतु उनकी ओर से हिन्दी सेवियों की पहचान करने, उन्हें जोड़ने, और उन्हें सामने लाने के प्रयास अपेक्षाकृत कम ही हुये हैं। विशेषकर आत्म-विज्ञापन से दूर रहने वाले और अपनी अन्य व्यावसायिक ज़िम्मेदारियों में गम्भीरता से व्यस्त रहने वाले साहित्यकार और हिन्दी  सेवकों तक इनकी दृष्टि शायद ही पहुँचती हैं। हिन्दी  संसाधनों का प्रचार प्रसार तो दूर की बात, कितनी ही संस्थाओं के प्रबंधन मंडल में ही कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने-पढ़ने, यूनिकोड, व्याकरण, शब्दावली आदि की समुचित जानकारी का अभाव है। कुछ बड़े शहरों को छोड़कर ऐसी अधिकांश संस्थाओं के पास हिन्दी  साहित्य के प्रकाशन या हिन्दी  शिक्षण आदि की व्यवस्था का अभाव है। ऐसी कुछ संस्थायें अपनी पत्रिकायें भी प्रकाशित करती हैं, लेकिन ज़्यादातर संस्थागत पत्रिकाओं की आवृत्ति और पाठक वर्ग के साथ-साथ लेखक वर्ग भी सीमित है।

फिर भी हिन्दी  की स्थिति निराशाजनक नहीं है। हिन्दी  के विकास के लिये मंद ही सही, काम तो हो रहा है। हिन्दी प्रशिक्षण और परम्परागत साहित्यिक माध्यमों के अलावा आधुनिक तकनीक ने हिन्दी  के विकास के नये मार्ग भी खोले हैं। इनमें इंटरनेट, मोबाइल ऐप्स के साथ-साथ रेडियो स्टेशन समेत दृश्य-श्रव्य माध्यम भी प्रयोग में लाये जा रहे हैं।

यदि हम कुछेक छोटे से सुझावों पर गम्भीरता से अमल कर सकें तो अमेरिका में हिन्दी  का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। एक तो यह कि अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के हिन्दी संस्थान योग्य प्रतिनिधियों की सहायता से अमेरिका में हिन्दी  के विस्तार के प्रभावशाली कार्यक्रम चलायें और दूसरा यह कि अमेरिका में पहले से मौजूद हिन्दी संस्थायें हिन्दी को मनोरंजन के लिये प्रयोग करने से एक कदम आगे बढ़कर अपने आकार और भारत की सरकारी संस्थाओं तक अपनी पहुँच का सदुपयोग करके शैक्षणिक संस्थाओं में हिन्दी  आरम्भ कराने को अपना उद्देश्य बनायें, और हिन्दी  की वास्तविक सेवा में लगे चुपचाप व्यक्तियों और संस्थानों के कृतित्व को प्रोत्साहन दें। हिन्दी  के विकास के नाम पर चल रहे कार्यक्रमों की कड़ी पड़ताल हो और नियमित आकलन के द्वारा कार्यक्रम में वांछित परिवर्तन किये जायें।

इस देश में व्यक्तिगत स्तर पर काम बहुत हो रहा है पर उसका भौगोलिक क्षेत्र सीमित है। संस्थाओं का क्षेत्र विशाल है परंतु उनकी दिशा केंद्रित करने की आवश्यकता है। यदि संस्थायें थोड़ा सा प्रयास और करें तो हिन्दी  सेवा में लगे व्यक्तियों द्वारा किये जा रहे एकल प्रयासों को पहचानने और समर्थन देने भर से एक कठिन कार्य को सरलता से पूरा किया जा सकता है और संसार की शिरोमणि भाषा हिन्दी  को उसके जायज़ स्थान पर पहुँचाया जा सकता है।


हिन्दी में अरबी प्रदूषण पर, बँगला इतिहास के बहाने

हिन्दी सिनेमा की भाषा में अरबी प्रदूषण हिन्दीभाषी भारत को जड़ से काटने के लिये किया गयाi हिन्दी का अभिनेता उर्दू के लिए मानद पीएचडी पाए तो चौकन्ना हो जाना चाहिये।

बँगला इतिहास के बहाने

वर्तमान बँगलादेश (पूर्वी बंगाल) के मैमेनसिंह जनपद की स्थापना 1 मई 1787 को तत्कालीन ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा हुई। ब्रह्मपुत्र के किनारे स्थित इस नगर का पुराना नाम नसीराबाद था जो कालांतर में शासक मोमेन शाह के नाम से मोमेनशाही कहलाया जिसके ब्रिटिश उच्चारण (Mymensingh) ने मैमेनसिंह रूप ले लिया।

बीसवीं सदी तक यहाँ की जनसंख्या हिन्दू बहुल ही रही जब मुसलमानों ने यहाँ बाहर से आ कर बसना प्रारम्भ किया। वे अपने साथ उर्दू के फारसी और अरबी शब्द ले आये और बँगला भाषा प्रभावित होने लगी। इन पराये शब्दों को ले कर उहापोह की स्थिति रही किंतु धीरे धीरे ये शब्द ‘बँगला प्रगतिवाद’ और कथित ‘ब्राह्मण प्रभाव के विरोध’ की आड़ ले कर पैठ बनाते गये। लोकगीतों में भी इनका प्रदूषण बढ़ता चला गया।

हिन्दू मुस्लिम संवाद में प्रवाह और सहजता बनाये रखने के नाम पर उन शब्दों को स्थान तो मिलता गया किंतु साथ ही मुस्लिम हठधर्मिता की आँच का भी भान होता रहा। दिनेशचन्द्र सेन द्वारा 1923 में प्रकाशित The Ballads of Bengal में तत्कालीन स्थिति की मीमांसा मिलती है। उनके द्वारा सङ्कलित ‘मैंमनसिंह गीतिका’ की भूमिका में तनाव साफ परिलक्षित होता है।

हिन्दी सिनेमा की भाषा में अरबी प्रदूषण

The Ballads of Bengal – Preface

भाषिक प्रदूषण सांस्कृतिक रूप से निर्बल करता है और भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर अपनी संस्कृति से धीरे धीरे दूर भी करता जाता है। सहज रूप से दूसरी भाषाओं से शब्द आने एक बात है और जान बूझ कर किसी बृहत मंशा के तहत प्रदूषित करना और बात।

भारत विभाजन के समय निर्बल हिन्दुओं वाले भाग पूर्वी पाकिस्तान बन कर अलग हो गये। मजहब भाषा पर भारी पड़ा। पश्चिमी पंजाबियों कीथोपने वाली प्रवृत्ति ने अत्याचार नहीं किये होते, जिसमें कि उर्दू भी एक अस्त्र थी, तो बंगालियों की चेतना मजहब से ऊपर उठ कर ‘आमार सोनार बँगला’ तक पुन: नहीं पहुँचती और न ही बँगलादेश बनता।

आज के भारतीय पश्चिमी बंगाल में विचित्र स्थिति है। बँगला स्मिता और ऐक्य के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण चरम पर है और हिन्दू सिमटते जा रहे हैं। बँगलादेश में स्थिति तो भयावह है ही। ऐसे में बंगाली मुसलमानों की अरबी और उर्दू के प्रति मोह की तीव्रता कितनी है, इसकी जाँच रोचक होगी।

हिन्दी सिनेमा की भाषा का प्रदूषण

जैसा बंगाल में लघु स्तर पर किया गया वैसा ही कुछ वृहद स्तर पर हिन्दी सिनेमा की भाषा का प्रदूषण कर सम्पूर्ण हिन्दीभाषी भारत को उसके जड़ से काटने के लिये किया गया। सिनेमा का हिन्दी और उर्दू विवाद इतिहास है। इतिहास यह भी है कि कैसे पेट्रो डॉलर के धन का प्रयोग कर हिन्दी को उसी के सिनेमा में किनारे लगा दिया गया। आज तो स्थिति यह हो गयी है कि शुद्ध हिन्दी बोलने वाला हँसी का पात्र है और जाने कितने अबूझ अरबी शब्द हिन्दी सिनेमा के गीतों में घुसे बज रहे हैं जिन पर आपत्ति करने वाला कोई नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि अपने पाँव कुल्हाड़ी मारने में हिन्दू जन अगुवा बने हुये हैं, ठीक वैसे ही जैसे पुराने बङ्गाल में थे।

जो बंगाल में हुआ वह आगे उसके ‘हिन्दुस्तान’ में भी हो सकता है। अरब श्रेष्ठता स्थापित करने के राजनैतिक आन्दोलन का लक्ष्य यही है कि जनसंख्या अनुकूल होने तक अपनी सांस्कृतिक जड़ से पूरी तरह कटा प्रतिरोध इतना निर्बल हो चुका हो कि ‘मुगलिस्तान’ का स्वप्न साकार किया जा सके। क्या होगा और क्या नहीं, वह तो भविष्य के गर्भ में है लेकिन जिहादियों की मंशा स्पष्ट है।

किसी संस्कृति को मारने के लिये उसकी भाषा और उसके शब्दों की हत्या एक सफल अस्त्र है। हिन्दी सिनेमा का अभिनेता सिनेमा में उर्दू के उत्थान के लिये मानद पी एच डी प्राप्त करे तो चौकन्ना हो जाना चाहिये। एक पीढ़ी के अंतर में ही यदि पढ़े लिखों के लेखन में ‘नमन’ के स्थान पर ‘सलाम’ स्थापित हो गया है तो समझ लेना चाहिये कि रोग जटिल हो चुका है। इस समस्या का हल देसभाषाओं और संस्कृत के सक्रिय उपयोग में है। घर घर इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देना चाहिये और अरबी शब्दों के प्रदूषण आक्रमण पर प्रतिरोध के स्वर भी उठाये जाने चाहिये।