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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा बैंक ग्राहकों की सुरक्षा के लिये नये निर्देश

हाल ही में भारतीय रिज़र्व बैंक ने इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजेक्शन फ्रॉड में ग्राहकों की सुरक्षा हेतु बैंकों की जिम्मेदारी बढ़ाते हुए दिशा-निर्देश (RBI Limiting Liability Customers )जारी किया हैं।

क्या आप जानते हैं जितनी भी बार आप अपना डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड या फिर इंटरनेट बैंकिंग अकाउंट उपयोग में लाते हैं उतनी ही बार आप हैकर या फ्रॉड करने वालों के निशाना बनने की संभावना में रहते हैं। कुछ अनाधिकृत वित्तीय व्यवहारों (Transaction ट्रांजैक्शन ) की शिकायतों की सुनवाई करते समय हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने यह कहा है।

सन 2016 में बहुत से बैंकों ने कई बार डाटा ब्रीच (Breach) की शिकायत दर्ज करवाई है, खासकर डेबिट कार्ड और एटीएम कार्ड के मामलों में यह शिकायद दर्ज हुई हैं। यहाँ तक कि वर्ष 2013 में भी कई बैंकों ने कई बार डेटा ब्रीच की शिकायत दर्ज करवाई थी, जिसमें अधिकतर भारतीय क्रेडिट कार्ड विदेशों की वेबसाइट पर खरीददारी के उपयोग में लाए गए थे। आज भी ऑनलाइन फ्रॉड के ट्रांजैक्शन पता ही नहीं चलते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने ऑनलाइन इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शंस ना करें।

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को निर्देश देते हुए कहा है कि ग्राहक के इलेक्ट्रॉनिक ऑनलाइन ट्रांजैक्शन को और ज्यादा सुरक्षित करना बैंक की जिम्मेदारी है। इस निर्देश में भारतीय रिजर्व बैंक ने साफ-साफ लिखा है कि अगर कोई भी अनाधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग ट्रांजैक्शन होता है, तो उसके लिए Bank जिम्मेदार होगा।

तो आइए हम इसका मतलब समझते हैं।


तत्काल प्रतिक्रिया

मान लीजिए आपको अपने मोबाइल पर बैंक का एक मैसेज मिला कि ₹25000 आपके अकाऊँट से निकल गए हैं, जबकि वह ट्रांजैक्शन आपने किया ही नहीं है, आप तत्काल क्या करेंगे? बैंक को फोन करेंगे, ईमेल भेजेंगे या फिर शायद पास की ब्रांच में जाकर शिकायत दर्ज करवा देंगे।

भारतीय रिजर्व बैंक के निर्देशों के अनुसार अब बैंकों को फ्रॉड ट्रांजैक्शन की शिकायत करने के लिए और भी तरीके उपलब्ध करवाने होंगे। जिससे कि फ्रॉड ट्रांजैक्शन की ग्राहक जल्दी से जल्दी शिकायत कर सकें। जैसे कि आजकल ट्रांजैक्शन के बाद आपको एकदम से SMS आ जाता है, तो भारतीय रिजर्व बैंक चाहता है कि उसी SMS को ग्राहक रिप्लाई कर सके। तो आप जल्दी ही SMS या ईमेल अलर्ट जो बैंक द्वारा जारी किए जाते हैं और अगर वह ट्रांजैक्शन फ्रॉड है, तो वह आप जल्दी ही उसका रिप्लाई कर पायेंगे। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को यह भी कहा है कि एक सीधा लिंक भी उपलब्ध करवाया जाए, जिससे कि किसी भी ग्राहक को अगर शिकायत करनी हो, तो वह सीधे उस लिंक पर जाकर शिकायत कर दे और यह लिंक सीधे बैंक की वेबसाइट के होम पेज पर अलग से देखना चाहिये। अभी यह सुविधा किसी भी बैंक की वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं है।

अगर आपको किसी भी प्रकार की शिकायत दर्ज करवाना होती है तो आपको वेबसाइट पर जाकर बहुत ढ़ँढना पड़ता है। रिजर्व बैंक ने अपने निर्देशों में कहा है कि ग्राहक को इस तरह की असुविधा का सामना ना हो, इसलिए यह कदम उठाना जरूरी है। भारतीय रिजर्व बैंक चाहता है कि सभी बैंक अपनी कोर बैंकिंग टीम के साथ बैठकर कुछ इस तरह का सॉफ्टवेयर डेवेलप करें जिससे अगर ग्राहक कोई भी शिकायत दर्ज करवाता है, तो उसके खाते में यह दर्ज हो जाये। बैंकों ने भारतीय रिजर्व बैंक को कहा है कि सॉफ्टवेयर के बदलाव के लिए उन्हें थोड़ा समय चाहिये।

समय से शिकायत करें

फ्रॉड होने की दशा में सबसे पहला कदम शिकायत करना होता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने समय से शिकायत संबंधित भी निर्देश दिये हैं, बैंकों ने कहा है कि अभी भी शिकायत करने के तरीके मौजूद हैं। लेकिन किसी भी शिकायत के निवारण की समय सीमा उपलब्ध नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने निर्देश दिया है कि शिकायत के निवारण के लिये एक समय सीमा होनी चाहिये। साथ ही बैंक को ग्राहक की और अपनी दोनों की जिम्मेदारी भी साफ तौर पर दिखानी चाहिये।

अगर कोई अनाधिकृत ऑनलाईन इलेक्ट्रॉनिक ट्रांजैक्शन जो कि आपने नहीं किया है, वह आपके खाते में हो जाता है, तो उसके लिए सीधे बैंक ही जिम्मेदार है। यहाँ तक कि अगर ग्राहक इस फ्रॉड की शिकायत बैंक को नहीं भी करता है। इस दशा में ग्राहक की जिम्मेदारी उस अनाधिकृत फ्रॉड ट्रांजेक्शन के लिये बिल्कुल भी नहीं होगी। इसका मतलब यह है कि बैंक को फ्रॉड की गई रकम की भरपाई अपनी जेब से करनी होगी। अधिकतर बैंकें फ्रॉड अटैक के लिए बीमा लेती हैं जैसे की स्किमिंग (skimming) इत्यादि जिससे ग्राहक की लायबिलिटी बहुत कम हो जाती है, अगर वह समय पर शिकायत कर देता है।

अगर थर्ड पार्टी के कारण कहीं सुरक्षा में चूक होती है जहाँ पर ना तो बैंक जिम्मेदार है और ना ही ग्राहक। लेकिन अगर ग्राहक तीन कार्यकारी दिनों में बैंक को शिकायत कर देता है, तो ग्राहक की उस फ्रॉड ट्रांजैक्शन के प्रति जिम्मेदारी बिल्कुल नहीं होगी। लेकिन अगर ग्राहक तीन कार्यकारी दिनों के बाद 4 से 7 कार्यकारी दिनों में शिकायत दर्ज करता है जो कि बैंक द्वारा सूचित करने के बाद होता है, तो ग्राहक की जिम्मेदारी (Liability) बहुत ही कम होती है। लिमिटेड लायबिलिटी मतलब की जो फ्रॉड हुआ है उससे आपको कुछ वित्तीय नुकसान हो सकता है। पर अगर 7 दिन के बाद शिकायत दर्ज करवाई तब क्या होगा? इस तरीके की शिकायतों में बैंक निर्णय लेगा कि क्या करना है। लेकिन यह नियम अलग-अलग बैंकों के अलग-अलग होंगे।

भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को निर्देश दिया है कि इस तरीके के सारी जानकारी पब्लिक डोमेन में दी जाए और विज्ञापन करके भी बताई जाये। साथ ही हर एक खाताधारक को व्यक्तिगत रुप से इस बात की जानकारी दी जाये। यह समय सीमा उसी दिन से शुरू हो जायेगी, जिस दिन शिकायत दर्ज करवाई गई है और कामकाजी दिनों को जिस शाखा में आपका खाता है, उसके कामकाजी दिनों के हिसाब से गिना जायेगा। भारतीय रिजर्व बैंक ने यह भी निर्देश दिए हैं कि एक बार शिकायत दर्ज हो जाने के बाद 90 दिनों के भीतर उस शिकायत का निवारण होना ही चाहिए।

दायित्व

फ्रॉड ट्रांजेक्शनों की शिकायत में जहाँ आप बैंक के साथ वित्तीय घाटा उठाते हैं, मतलब कि यहाँ आपकी लिमिटेड लायबिलिटी होती है, क्योंकि आपने शिकायत देरी से दर्ज करवाई है। लेकिन ध्यान रखें अगर गलती ग्राहक के कारण हुई है, तो जो भी वित्तीय नुकसान हुआ है और जिसकी शिकायत बैंकों की गई है, उसका पूरा नुकसान ग्राहक को ही उठाना होगा। जैसे कि अगर आपने अपना पिन या पासवर्ड किसी और के साथ शेयर कर लिया और पैसा चोरी हो गया तो इस केस में पूरे वित्तीय नुकसान आपको ही उठाना होगा। लेकिन एक बार अगर ग्राहक ने इस प्रकार की शिकायत कर दी और उसके बाद फिर से कोई फ्रॉड ट्रांजैक्शन हुआ तो उस ट्रांजेक्शन की जिम्मेदारी बैंक की होगी।

लिमिटेड लायबिलिटी का मतलब है ₹5000 से ₹25000 तक की वित्तीय हानि। तो रकम निर्भर करती है कि आप किस प्रकार का खाता उपयोग कर रहे हैं, जैसे की अगर आपका बचत खाता है तो लाइबिलिटी ₹5000 तक की रखी गई है और अन्य प्रकार के बचत खातों में या फिर प्रीपेड उत्पाद, गिफ्ट कार्ड, क्रेडिट कार्ड जिनकी लिमिट 5 लाख रूपये तक है तो उनके लाइबिलिटी ₹10,000 तक रखी गई है। लेकिन अगर आपके क्रेडिट कार्ड की लिमिट 5 लाख रूपये से ज्यादा है, तो लाइबिलिटी ₹25000 तक वहन करना होगी।

लेकिन उस रकम का क्या होगा जिस का नुकसान फ्रॉड ट्रांजैक्शन के कारण हुआ है? एक बार अगर आपने बैंक को शिकायत कर दी तो बैंक को उतनी रकम आपके खाते में 10 कार्यकारी दिनों के अंदर जमा करनी होगी। यह 10 कार्यकारी दिन उसी दिन से शुरू हो जायेंगे जिस दिन आपने बैंक को शिकायत दर्ज करवाई है। अगर फ्रॉड डेबिट कार्ड या बैंक अकाउंट से हुआ है तो यह भी निर्देश दिए गये हैं कि ग्राहक को इतने दिनों का ब्याज का नुकसान नहीं होना चाहिए और अगर क्रेडिट कार्ड में फ्रॉड हुआ है तो ग्राहक को किसी भी तरह के अतिरिक्त ब्याज को नहीं भरना होगा।

आपको क्या करना चाहिये

अगर हमारे जीवन में कुछ नया करने पर हम असफल होते हैं तो इसका मतलब यह नहीं होता कि हम नये कार्य करना छोड़ देते हैं, बल्कि अपने असफल कार्यों से सीखकर नये कार्य में सावधानी और अतिरिक्त सुरक्षा बरतते हैं और कुछ नियम भी बनाते हैं, जिससे असफल होने के परिस्थिति का सामना न करना पड़े। उसी प्रकार से अपने आप को ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के फ्रॉड से बचने के लिए हमें अतिरिक्त सुरक्षा रखनी होगी।

आप यह कैसे करेंगे? अगर आप ऑनलाइन ट्रांजैक्शन या कार्ड को स्वाइप कर रहे हैं तो आपको SMS और ईमेल अलर्ट के लिए पंजीकृत करना चाहिये, यह सबसे सरल तरीका है। अगर आपके खाते में कोई भी ट्रांजैक्शन होता है तो उसकी जानकारी तत्काल ही SMS या ईमेल अलर्ट से आपको मिल जाती है और आप तत्काल ही अपने बैंक को शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।

जब आप बैंक को शिकायत दर्ज करवाते हैं बैंक समय और दिनाँक जिसे की टाइमस्टांप कहा जाता है, वह भी दर्ज करती हैं। जो कि आपकी लाइबिलिटी कितनी होगी, बाद में यह निर्णय लेने के लिए काम आती है। तो आपका दायित्व है कि आप की तरफ से शिकायत करने में देरी ना हो। जब भी आपके मोबाइल पर SMS आये तो तत्काल उसको देख लें, कि कहीं बैंक से तो कोई SMS नहीं है। आप किसी भी SMS को नजरअंदाज न करें, इसके लिये आपको भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।


सन्दर्भ:

Customer Protection – Limiting Liability of Customers in Unauthorised Electronic Banking Transactions

https://www.rbi.org.in/scripts/NotificationUser.aspx?Id=11040

https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/notification/PDFs/NOTI15D620D2C4D2CA4A33AABC928CA6204B19.PDF

सांख्य दर्शन : सनातन बोध: प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 7

सांख्य विस्तृत है, इस लेखांश की सीमा से परे। यहाँ हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सांख्य की सरल बातों की चर्चा करेंगे।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2, 3, 4 , 5 और 6से आगे  …

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन की छः प्रमुख शाखाओं में से एक है। सांख्य का दर्शन की शाखाओं में सर्वोच्च स्थान है। कपिल मुनि ने सांख्य की स्थापना की। भगवान ने भगवद्गीता में कहा है कि ‘सिद्धानां कपिलो मुनिः’। गीता, महाभारत, उपनिषद् जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में सांख्य का वर्णन मिलता है।
‘गीता रहस्य’ में बाल गंगाधर तिलक सांख्य पर लिखते हैं:

शांतिपर्व में भीष्म ने कहा है कि सांख्यों ने सृष्टि-रचना के बारे में एक बार जो ज्ञान प्रचलित कर दिया है वही पुराण, इतिहास, अर्थशास्त्रों आदि में पाया जाता है। यही क्यों, यहाँ तक कहा गया है कि ‘ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किञ्चित सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन’ अर्थात इस जगत का सब ज्ञान सांख्यों से ही प्राप्त हुआ है । यदि इस बात पर ध्यान दिया जाय कि वर्तमान समय में पश्चिमी ग्रन्‍थकार उत्‍क्रांति-वाद (evolution theory) का उपयोग सब जगह कैसे किया करते हैं, तो यह बात आश्चर्यजनक नहीं मालूम होगी कि इस देश के निवासियों ने भी उत्क्रांति-वाद की बराबरी के सांख्यशास्त्र का सर्वत्र कुछ अंश में स्वीकार किया है। गुरुत्वाकर्षण, सृष्टि-रचना उत्क्रांतितत्त्व या ब्रह्मात्मैक्य के समान उदात्त विचार सैकड़ों बरसों में ही किसी महात्मा के ध्यान में आया करते हैं।

सांख्य एक विस्तृत दर्शन है  -गूढ़, अनेकांत, व्यापक – जितना पढ़ा जाय उतनी परतें खुलती हैं। पर कितना भी पढ़ा जाय जिसे अंततः अनुभव से ही जाना जा सकता है। ग्रंथो में काव्य और सूत्रात्मक ढंग से कही जाने के कारण इनका अर्थ समझना भी सरल नहीं है। सांख्य के विज्ञलोकप्रिय होने का एक कारण वही लगता है जो आधुनिक काल में विकासवादी जीवविज्ञान और मनोविज्ञान के लोकप्रिय होने का – संसार में दिखने वाली विषमता का सुगम विश्लेषण। हम इस विश्लेषण के केवल एक अंश का सरल अध्ययन करेंगे। सांख्यवादियों ने संसार में जो कुछ भी है उसका कारण प्रकृतियों के अनुपात और तालमेल को माना। ब्रह्माण्ड को एक विकासात्मक प्रक्रिया का परिणाम माना गया है अर्थात सृष्टि अनेक अवस्थाओं (phases) के बाद वर्तमान स्वरूप को प्राप्त हुई है। और निरंतर परिवर्तनशील है। भौतिक सृष्टि त्रिगुणात्मक प्रकृति का परिणाम है।

सांख्य दर्शन के अनुसार सृष्टि ‘प्रकृति-पुरुष’ मूलक है जिनमें से प्रकृति गुणमयी है – सत्व, रज और तम। ये तीन गुण प्रकृति में पाये जाते हैं। यही तीनों गुण मनुष्य में भी हैं। सांख्य सिद्धांत पढ़ते हुये यहाँ एक भ्रम की स्थिति बनती है क्योंकि सांख्य के तत्वों का अर्थ हम उनके भौतिक रूप से समझने लगते हैं परंतु सांख्य के तत्वों का अर्थ शाब्दिक नहीं होकर विस्तृत है। गीता के अठारहवें अध्याय में अलग अलग श्लोकों में त्याग, ज्ञान, कर्ता, बुद्धि, धृति, सुख सबके त्रिगुणी होने का वर्णन है – सात्विक, राजसी और तामसी।

अव्यक्त से महत् , महत् से अहंकार की उत्पत्ति पढ़ते हुए ये प्रतीत होता है कि सांख्य दर्शन के अनुसार मानवीय मस्तिष्क भी भौतिक विकास का परिणाम है। शान्तिपर्व के याज्ञवल्क्यगीता में याज्ञवल्क्य कहते हैं:

अव्यक्ताच्च महानात्मा समुत्पद्यति पार्तिव ।
प्रथमं सर्गमित्येतदाहुः प्राधानिकं बुधाः ॥

महतश्चाप्यहङ्कार उत्पद्यति नराधिप ।
द्वितीयं सर्गमित्याहुरेतद्बुद्ध्यात्मकं स्मृतम् ॥

अहङ्काराच्च सम्भूतं मनो भूतगुणात्मकम् ।
तृतीयः सर्ग इत्येष आहङ्कारिक उच्यते ॥

महाभारत के शान्ति पर्व में सांख्य का सुन्दर वर्णन मिलता है। व्यास-शुकदेव, मनु-बृहस्पति और वसिष्ठ-जनक वार्तालाप में इन्द्रियों, मन अहंकार और बुद्धि के बारे में बहुत रोचक बातें हैं। व्यास शुकदेव (२४७:१-१६) को समझाते हुए कहते हैं कि इन्द्रियाँ विषयों से जुडी होती हैं और मन इन्द्रियों से। और इस पूरी यंत्रावली का सञ्चालन बुद्धि करती है। इन्द्रियों से जुड़ा होने के कारण मन अस्थिर होता है। मन से जो सूचना प्राप्त होती है, बुद्धि उसके आधार पर निर्णय लेती है। साथ ही सांख्य के तीन गुणों के अनुपात के अनुसार बुद्धि की अवस्था भी परिवर्तित होती रहती है – सात्विक से तामसी के स्तर पर। इस बुद्धि के द्वारा मनुष्य की अंतर्जगत पहचानने की बात शांति पर्व में कही गयी है।
मनु बृहस्पति से कहते हैं कि मनुष्‍यों द्वारा हिमालय पर्वत का दूसरा पार्श्‍व तथा चन्‍द्रमा का पृष्‍ठ भाग देखा हुआ नहीं है तो भी इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनके पार्श्‍व और पृष्‍ठ भाग का अस्तित्‍व ही नहीं है। (२०३।६) यह वार्तालाप पढ़ते हुए कई संज्ञानात्मक पक्षपात सांख्य के मनोविज्ञानिक विश्लेषण की विशेषावस्था लगते हैं। संज्ञानात्मक पक्षपातों के सारे सिद्धांत इस कथन की तरह ही हैं। यह कथन आधुनिक व्यावहारिक मनोविज्ञान के हर पुस्तक की भूमिका है!

संख्या के तत्व शाब्दिक अर्थों से परे  सृष्टि के पुरुष-प्रकृति की बात करते हैं।  हाल के दिनों में चर्चित हुआ शोध विचार Is universe  conscious ?, सांख्य के इस सिद्धान्त का ही पुनर्विचार लगता है। सांख्य सिद्धांतों के मनोवैज्ञानिक अर्थ के आधार पर मानव मस्तिष्क का प्रतिरूप बनाने का प्रयास करें तो कुछ इस तरह होगा:

  • सांख्य की प्रकृति-पुरुष  की अवधारणा से मानवीय व्यवहार की चर्चा।
  • प्रकृति अचेतन (जड़) है और पुरुष (यानि जीवात्मा) चेतन।
  • मानसिक प्रकृति का तीन अवस्थाओं – सत्व, रज और तम में विभाजन। सत्व – शुद्ध, रज – ऊर्जा, तम – आलस्य व जड़ता। मानव के स्तर पर प्रकृति के इन तीन गुणों से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है। सत्व का अधिक होना सकारात्मक, रज का  क्षणिक सुख, तम का अधिक होना आलस्य और निराशावादी। विभिन्न देश काल में अलग अलग अनुपात में सभी के अंदर इन तीनों का सम्मिश्रण होता है। सत्व की वृद्धि का अर्थ – सकारात्मक के साथ साथ आध्यात्मिक उन्नति।
    इनके अतिरिक्त अभौतिक अंश जिसे पुरुष कहते हैं – चैतन्य।

इस दृष्टि से संज्ञान (cognition) का प्रतिरूप कुछ ऐसा हुआ – मनुष्य में बाहरी संसार को देखने के लिए इन्द्रियाँ हैं। बुद्धि का काम है इन्द्रियों और मन के साथ निर्णय लेना और प्रतिक्रिया देना। बुद्धि प्रकृति के तीन गुणों के अनुपात से प्रभावित होती है। प्रमापीय प्रतिरूप (modular) की तरह मस्तिष्क का प्रतिरूप हुआ मन, बुद्धि और अहंकार का समिश्रण निचले स्तर पर इन्द्रियाँ और ऊपरी स्तर पर पुरुष।
प्रकृति के त्रिगुण का अनुपात स्मृति से भी परिवर्तनशील है। (पूर्वजन्म की परिकल्पना स्मृति के प्रभाव-कार्य-कारण का विस्तार प्रतीत होती है)। इन्द्रियों को बहिर्जगत से सुचना मिलती है। मन उसे स्वयं (अहम) से जोड़कर मूल्यांकन करता है जिसके उपरांत बुद्धि उस मूल्याङ्कन के अनुरूप निर्णय लेती है। जड़ प्रकृति की बुद्धि पुरुष के संपर्क में आने पर चेतन होती है पर बहुधा पुरुष के होते हुए भी उसके बिना ही क्रियाशील रहती है और इस तरह हम संसार को अनुभव करते हैं और प्रतिक्रियायें भी देते हैं।
बुद्धि के निष्कर्ष, अन्तर्ज्ञान (intuition) और सहज ज्ञान (instinct) पूर्व अनुभवों और कर्मों पर भी आधारित होते हैं और वर्तमान के कर्म भविष्य की प्रकृति को प्रभावित करते हैं। प्रकृति पुरुष से नितांत भिन्न होकर काम नहीं करती बल्कि पुरुष के होते हुए भी उससे अनजान रहकर कार्य करती है। यह मानसिक प्रतिरूप निरंतर परिवर्तन रहता है। पूर्वाग्रह, भ्रम, आशंकायें सर्वदा उपस्थित रहती हैं क्योंकि प्रकृति पुरुष (चैतन्य) से अनजान रहती है।

योगसूत्र में पांच क्लेशों की बात की गयी है – अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। अविद्या अर्थात पुरुष से अनभिज्ञता।  अविद्या से जन्मी असमर्थता। आभासी और वास्तविकता में अंतर समझने की असमर्थता। नित्य और अनित्य में अंतर समझने की असमर्थता और अपनी योग्यता का भ्रम – ये संज्ञानात्मक पक्षपातों की विश्व में कहीं भी पहली चर्चा है। इसके समाधान के लिए अष्टांग योग की बात ग्रन्थ में की गयी है पर केवल इन क्लेशों और सांख्य से बने मानसिक प्रतिरूप से आधुनिक व्यावहारिक मनोविज्ञान का बोध मिल जाता है। व्यक्तित्व के इस प्रकार के विस्तृत वर्णन से पता चलता है कि पश्चिमी मनोविज्ञान में किये गए अध्ययन जैसे विशेषावस्था मात्र हैं।

सांख्य से बने इस प्रतिरूप की चर्चा डेनियल काहनेमैन के सिद्धांत से करते हैं। मस्तिष्क के सोचने की प्रक्रिया को वह दो भागों में विभाजित करते हैं जिन्हें वह प्रणाली १ और प्रणाली २ का नाम देते हैं। प्रणाली १ अर्थात सहज ज्ञान (intuitively) बिना प्रयास, बिना सोचे तुरंत प्रतिक्रिया देने वाला। इसमें मस्तिष्क क्षणिक निर्णय लेता है, बिना सोचे, अनुभव और अंतर्ज्ञान से, जैसे गाडी चलाते समय स्वतः रोक लेना।
दूसरा – गंभीर और तर्कसंगत। लाभ-हानि का विवेचन करने वाला,  सोच विचार कर, समय लगा कर, समस्या का हल ढूंढना, किसी समस्या का विस्तृत विश्लेषण करना।

प्रणाली १ बहुधा सही नहीं होती पर प्रणाली २ के लिए श्रम की आवश्यकता होती है जो मस्तिष्क करना नहीं चाहता। प्रणाली २ के लिए ऊर्जा चाहिये, एकाग्रता चाहिये पर हमें सरलता से सोचने के लिये बनाया गया है। स्वभाव से हम आलसी होते हैं। प्रोफ़ेसर काहनेमैन कहते हैं “Laziness is built deep into our nature।” तो हम दैनिक कामों के लिए कभी भी प्रणाली २ का प्रयोग नहीं करते। साथ ही हम एक समय पर प्राय: एक ही प्रणाली का प्रयोग करते हैं जैसे हमें चलते चलते कोई जोड़ने घटाने को कहे तो हम रुक जाते हैं या जब हम बहुत ध्यान लगाकर कुछ करते हैं तो खाना तक भूल जाते हैं। जब हम थके होते हैं तो हमारा आत्म नियंत्रण दुर्बल हो जाता है – Intelligence is not only the ability to reason, it is also the ability to find relevant material in the memory and deploy attention when needed.

हमारा मस्तिष्क श्रम नहीं करना चाहता और वैसा नहीं कर हम प्राय: अपने निर्णयों और प्रतिक्रियाओं में ग़लतियाँ करते हैं। डेनियल काहनेमैन की प्रणाली १ सांख्य के मन और अहंकार प्रतीत होते हैं एवं प्रणाली २ बुद्धि और चित्त!   दोनों से परे पुरुष। दोनों में अद्भुत समानता है।

(क्रमशः)


अगले अंकों में संख्या के संज्ञान प्रतिरूप की आगे चर्चा और नीति तथा अन्य ग्रंथो में आधुनिक व्यावहारिक मनोविज्ञान के बोध की चर्चा।