कौटलीय अर्थशास्त्रे शब्दप्रयोगाः

मम लेखस्य विषयः कौटलीय अर्थशास्त्रे कतिपय राजपदानाम्, कर्तव्यानाम्, वस्तूनाम् चार्थे प्रयुक्ताः विभिन्नाः अप्रसिद्ध शब्दाः। वयं जानीमः शब्दार्थाः परिवर्तनशील सन्ति कालेन सह तेषां अर्थाः परिवर्तयन्ति (अर्थशास्त्रस्य कालखण्ड तृतीय-चतुर्थ शताब्दि ईसा पूर्वं मन्यन्ते) अतः शब्दानाम् अर्थे अधुनातः वैचित्र्यं लभ्यते। कतिचन् शब्दाः मम ध्यानाकर्षण अकुर्वन् अर्थशास्त्रे तेषां प्रयोगात् अधुना वयं अपरिचितः च अस्तु एषः लेखः। प्रथमे अधिकरणे आचार्यः…

नवसंवत्सरोऽयं

अद्य नवसंवत्सर पर्वः अस्ति। सामान्यतया अस्माकं भारत देशे कार्यालयेषु, वित्तकोषेशु, विद्यालयेषु सामान्यजनाः व्यवहारे ख्रीष्ट वर्षपदः उपयुज्यते।

ऋतूनां कुसुमाकरः!

वृहद्संस्कृतवाङ्ग्मये ऋतुराजवसन्तप्रयोगाः प्रचुराः, तेन पठने-पाठने कामोद्दीपनं जायते अतः सावधानतया सुस्थिर मनसा तेषु पठनीयम् 🙂 यद्यपि ‘श्रीर्हरति मुनेरपि मानसं वसन्तः’।
विकसितसहकारभारहारिपरिमलपुञ्जितगुञ्जित द्विरेफ:।
नवकिसलयचारुचामरश्रीर्हरति मुनेरपि मानसं वसन्तः॥

Holaka Krida(होलाका क्रीड़ा) : Annual Deva Yajna(देव यज्ञ) for Masses

ग्राफिक्स चित्र संदर्भ: http://newseastwest.com/wp-content/uploads/2017/01/lohri-celebrations.jpg http://img09.deviantart.net/183e/i/2010/087/3/8/holi_festival_2010_46_by_falln_stock.jpg  Holaka From the references of Sabara and Jaimini bhashya on Purvamimasa-sutra, it appears that the original word is होलाका. [1] होलाका is a festival of unmixed gaiety and frolics throughout India. Although, all parts of India don’t celebrate it same way, but one element is common across India i.e. element…

प्रीतिः मंजरीषु इव

वह आनंद-बोध ही क्या जिससे हम स्वयं भी रिक्त रहें तथा हमारा परिसर भी रिक्त रह जाये? जो गगन को आपूरित नहीं कर सकता वह गीत तथा जो मन को आपूरित नहीं कर सकता वह उत्सव व्यर्थ है! यह आपूरण विधि-निषेधों से परे है। यह न आदेश देने पर आता है, न रोकने पर रुक ही सकता है। यह तो जातीय-प्रवाह है! जिस “जाति” की शिराओं में गाढ़ा लाल रक्त प्रवाहमान रहे उस जाति के लिये आपूरण के क्षण आये बिना नहीं रह सकते। जिस जाति ने अनंगोत्सव तथा रंगोत्सव की कल्पना की, योजना बनायी, परम्परा चलायी, वह तपश्चर्या से, संयम से तथा चिंतन से सामाजिक मर्यादा का वास्तविक मूल्य भली-भाँति जानती थी; किन्तु वह लोक-धर्म भी पहचानती थी, इसीलिये वसंतोत्सव को उसने लोकोत्सव का रूप दिया।