Category Archives: सम्पादकीय

अपनी बात : चुनाव सुधार

चुनाव सुधार नहीं हुये तो स्थिति वही रहनी है जो पिछले 65 वर्षों से जारी है।

565 रजवाड़ों और ब्रिटिश शासित क्षेत्रों के विलय के साथ वर्तमान भारत संघ बना। संयुक्त राष्ट्रसंघ के अनुमान के अनुसार भारत की जनसंख्या 134 करोड़ होने वाली है जिसकी मध्यमान आयु लगभग 27 वर्ष है। यह युवा देश पिछले 65 वर्षों में 16 आम चुनाव करा कर अपने लिये सरकारें गठित कर चुका है। इनमें से किसी भी चुनाव में औसत मतदान मतदाताओं की दो तिहाई संख्या का स्पर्श नहीं कर पाया। सोलहवीं लोकसभा के लिये हुये चुनावों में मतदान प्रतिशत 66.4 रहा जो कि अब तक का अधिकतम है और दो तिहाई से 0.27% कम। अब तक हुये सभी चुनावों का औसत 60 प्रतिशत से कम ही बैठता है अर्थात एक तिहाई से भी अधिक मतदाता मतदान नहीं करते हैं। संख्या और अनुपात से सम्बन्धित एक अन्य तथ्य यह भी है कि दो तिहाई बहुमत पूर्ण बहुमत कहलाता है जब कि आधे से अधिक वाला साधारण बहुमत।

संविधान सभा में जब सभी वयस्कों को शिक्षा, योग्यता आदि से निरपेक्ष मताधिकार देने पर आपत्तियाँ उठी थीं तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें काटते हुये गँवई जनता की सहज समझ पर विश्वास जताया था कि वह झूठे और अव्यावहारिक लुभावने वादों से झाँसे में नहीं आयेगी। आज लगता है कि वह विश्वास आदर्श अभिव्यक्ति भर था जो यथार्थ का अनुमान करने में चूक गया।

नहीं लगता कि पिछले सत्तर वर्षों से हम स्वयं को धोखा देते आ रहे हैं जिसका लाभ एक ऐसा लचीला धनाढ्य भ्रष्ट वर्ग उठाता आया जिसे सामूहिक रूप से नवसामंत वर्ग कहा जा सकता है? पाँच वर्षों में ही इनमें से अधिकांश अकूत सम्पदा के स्वामी बन जाते हैं। इन्हें नये ‘लचीले रजवाड़ों’ की संज्ञा दी जा सकती है या नहीं?

आर्थिक कदाचार के साथ ही मजहब के आधार पर संगठित समूहों का तुष्टिकरण भारतीय लोकतंत्र की एक विशेषता रहा है। बीस करोड़ की जनसंख्या के साथ उत्तरोत्तर वृद्धि दर बढ़ाता हुआ दूसरे स्थान पर जमा समूह यहाँ ‘अल्पसंख्यक’ कहलाता है, जाति आधारित गिरोहबन्दी तो अपने स्थान पर है ही!

इन सभी दोषों की परिणति एक ही होती रही है – चुन कर आने वाले प्रतिनिधि जनता के वास्तविक प्रतिनिधि नहीं होते। यदि वर्तमान लोकसभा को देखें तो विजयी प्रत्याशियों द्वारा प्राप्त मतों का औसत लगभग 31% ही रहा। घूम फिर कर बात तिहाई पर पहुँच जाती है। ऐसे तंत्र में जहाँ सभी वयस्कों को मताधिकार दिया गया हो, परिणाम संख्या बल पर निर्भर करते हैं। जो भी स्वार्थी समूह या ऐसे कुछेक संगठित समूहों का वर्ग एक दो के अनुपात को साधने में सफल होगा, वही निर्णायक होगा। चूँकि मतदान न करने वालों में उस वर्ग का प्रतिशत बहुत अधिक है जो कि शिक्षित है और कार्य व्यापार में नेतृत्त्व प्रदान करता है, इसलिये चुने गये प्रतिनिधियों की ‘गुणवत्ता’ निम्न कोटि की होनी ही है। मात्र सहज समझ रखने वाला वर्ग तो बहुत सरलता से झाँसे में आ जाता है। चुने गये प्रतिनिधियों की निम्न कोटि की गुणवत्ता उनके द्वारा किये गये कार्यों में भी परिलक्षित होती है जिसके दो परिणाम होते हैं। पहला यह कि ‘नेतृत्त्व वर्ग’ और उदासीन होता चला जाता है एवं अपने लिये वे सभी उपाय करने लगता है जिनसे तंत्र पर निर्भरता कम हो। उत्तरदायित्त्व से बचने के सारे मार्ग उसके अपने होते चले जाते हैं और तंत्र और पतित होता चला जाता है। दूसरा परिणाम यह होता है कि इन सबके कारण जनसामान्य की आस्था टूटती जाती है और आवश्यक गुणवत्ता एवं दूरदर्शिता की कमी उसे क्षुद्र, भंगुर और तदर्थ लुभावने लाभों की ओर खींचती है जिसका शोषण राजनैतिक शक्ति सम्पन्न वर्ग करता है। तंत्र की विफलता या आंशिक और अप्रभावी कुशलता पतन का बचा खुचा पूरा कर देती है।  यह दुष्चक्र चलता रहा है और इसी कारण सारी सम्भावनाओं और शक्यता के होते हुये भी हम प्रगति और जीवन की गुणवत्ता के कई मानकों में बहुत पीछे बने हुये हैं।

एक समस्या उपलब्ध प्रावधानों और नियमों का अनुपालन नहीं करना भी है। ऐसे मतदाता जो प्रवासी हैं या किसी कारण से मतदान के दिन अपने क्षेत्र तक नहीं पहुँच सकते, उनके लिये ‘पोस्टल बैलट’ की व्यवस्था रही है। आज के समय में जब कि श्रमिक से लेकर सेवा और व्यापार में लगे जन पूरे भारत में बिखरे हुये हैं, इस प्रावधान के अनुसार व्यवस्था करने के प्रति घनघोर उपेक्षा आश्चर्यजनक है।

समाधान क्या है? उसी पुराने ढर्रे पर चलते हुये क्रांतिकारी परिवर्तन की आशा दुराशा ही होगी। वृहद चुनाव सुधार आवश्यक हैं जिनमें प्रत्याशियों की पात्रता के मानकों में परिवर्तन, संख्या नियंत्रण, चुनाव व्यय की पद्धति में आमूल चूल परिवर्तन, शिक्षा-संस्कार, चुने जाने के पश्चात प्रतिनिधि के क्रिया कलापों का लेखा परीक्षण, जन अभियोग, निरस्तीकरण इत्यादि कई सम्मिलित हैं किंतु इन सबसे पहले शत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के लिये क्रांतिकारी परिवर्तन करने होंगे। जिस तरह साक्षरता गणना में एक निश्चित प्रतिशत के पश्चात शत प्रतिशत मान लिया जाता है वैसे ही चुनावों में भी होना चाहिये। 90 या उससे अधिक प्रतिशत तक मतदान लक्ष्य हो जिसके लिये एक के स्थान पर दो दिन दिये जा सकते हैं। जनता को मतदान के ‘अधिकार और कर्तव्य’ दोनों को समझा कर प्रेरित भी करना होगा। आयकर दाताओं सहित समाज के सम्पूर्ण ‘नेतृत्त्व वर्ग’ के लिये शत प्रतिशत मतदान अनिवार्य बनाना होगा क्योंकि वे सक्षम हैं और करने के लिये उन्हें केवल काहिली छोड़नी होगी।

मतदान केन्द्र के अतिरिक्त चुनी गई बैंक शाखाओं, डाकघर, सैन्य क्षेत्र, विश्वविद्यालय, जिलाधिकारी कार्यालय इत्यादि विशेष रूप से सुरक्षित स्थानों पर भी जैव पहचान की क्षमता वाले डिजिटल कार्डों के प्रयोग द्वारा मतदान कराया जाना चाहिये। इस सम्बन्ध में पहले से ही उपलब्ध ‘आधार कार्ड’ के विकल्प पर भी विचार किया जा सकता है।

जहाँ चाह, वहाँ राह। इस क्षेत्र में नवोन्मेष की अपार सम्भावनायें हैं। पहल होनी चाहिये। यदि इच्छाशक्ति हो तो आगामी 2019 के चुनाव नयी व्यवस्था के साथ करवाये जा सकते हैं।


जनसंख्या वृद्धि और चतुर ताँत या अभिज्ञ तंतु

जनसंख्या वृद्धि की दर को थामना ही होगा।

हमार कहनाम

यो यज्ञो विष्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः।
इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते॥
पुमाँ एनं तनुत उत् कृणत्ति पुमान् वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्।
इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुः तसराण्योतवे॥
(ऋग्वेद, 10.130.1-2)

पितर बुनकर हुये हैं, सूत विस्तार के साथ यज्ञ रूपी वस्त्र बुना जा रहा है, साममंत्रों का ताना बाना है। ‘लम्बा बुनो, चौड़ा बुनो’ की ध्वनि है। देवता उपस्थित हैं, बुनाई दिव्य लोकों तक है।


वस्त्र और बुनाई से सम्बन्धित इतने शब्द हमारी इस सबसे प्राचीन धरोहर में मिलते हैं कि पुरखों की तकनीकी प्रवीणता स्पष्ट हो उठती है। वैदिक ‘वासस्’ आज भी ‘बसन’ रूप में देसभाषाओं में प्रयुक्त है, वस्त्र तो है ही। ‘वय’ से बुनना है तो तंतु (तद्भव ताँत) से ताना, ‘ताना बाना’। ऋग्वैदिक बुनकर वासोवाय कहलाता है और पूषन् देवता स्वयं बुनकर हैं। तंतुओं और रश्मियों से समन्वित सूर्य किरणों के लिये चित्ररश्मि समान उद्भावना सुन्दर कविता को जन्म देती है। स्वर्ण (हिरण्य) तंतुओं के साथ बुने और कढ़ाई (पेशस्) किये वस्त्रों का कहना ही क्या!

वस्त्रों ने सभ्यता के साथ बहुत लम्बी यात्रा की है और आज फैशन डिजाइनिंग वस्त्राभरणों पर ही केन्द्रित है। सामग्री, विन्यास, तकनीकी आदि विविधताओं ने इसे समृद्ध तो किया ही है, बहुत ही परिष्कृत और जटिल भी बनाया है। परिकल्पना की दृष्टि से देखें तो ‘Hunger Games, हंगर गेम्स’ शृंखला फिल्मों (2012 से 2015 ई. तक) में नायिका केटनिस द्वारा मंचीय प्रस्तुति के समय पहना गया वह वस्त्र उल्लेखनीय है जो कोयला खदानों और उनमें लगने वाली आग को जीवंत दर्शाता है।

जाने कितने नवोन्मेषों के साथ आगे बढ़ते हुये आज मानव ‘चतुर तंतु या ताँत’ (smart textile) के स्तर पर पहुँच चुका है। ‘स्मार्ट’ के लिये और उपयुक्त संस्कृत शब्द ‘अभिज्ञ’ होगा। तंतु जब ओढ़ने पहनने योग्य बुन दिये जाते हैं तो परिधान बनते हैं। चतुर परिधान वे जो धारक की आवश्यकता अनुरूप परिवर्तन में सक्षम हों ताकि उसे सुविधा हो। हम ऐसे वस्त्रों के बारे में सोच सकते हैं जो ताप अनुकूलित हों, एक ही वस्त्र किसी भी ऋतु में धारण किया जा सकता क्योंकि वह ताप और आर्द्रता का समायोजन मानव देह की आवश्यकता अनुसार करने में सक्षम है। ऐसे वस्त्र भी अभिज्ञ श्रेणी में आयेंगे जो वातावरण से ऊर्जा का दोहन कर सकें या हमारे स्वास्थ्य से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण इङ्गित समझ कर समय रहते चेतावनी दे सकें और साथ ही आपात स्थिति में जीवनरक्षा भी कर सकें।

‘Live Science, लाइव साइंस’ पत्रिका में छपे एक आलेख के अनुसार अब अभिज्ञ तंतुओं से ऐसी कृत्रिम मांसपेशियों का ताना बाना रचा जा सकता है जिन्हें वस्त्रों के नीचे पहन कर विकलांग और चलने में अक्षम जन चल सकें। लिंकोपिंग विश्वविद्यालय, स्वीडेन के शोधकर्ताओं ने सेलुलोज तंतुओं पर एक विशेष विद्युतवाही बहुलक की परत चढ़ा कर एक ऐसी गतियुक्ति (Actuator, ऐक्चुएटर) बनाई है जो ऊर्जा को गति में परिवर्तित कर देती है। Textile से बने होने के कारण उन्हों ने इसे टेक्स्टुएटर, Textuator नाम दिया है। क्या हम इसके लिये हिन्दी में ऐसा ही कोई संश्लिष्ट नाम दे सकते हैं? सोचिये तो?? जब यह युक्ति प्रयोग के लिये सर्वसाधारण को उपलब्ध होगी तो इसकी सहायता से भारोत्तोलक अधिक भार उठा सकेंगे। वृद्धावस्था में निर्बलता या रोग के कारण बैठ गये लोग चल सकेंगे, अनेक सम्भावनायें हैं। यह तकनीक बाल अवस्था में ही है और मनुष्य मांसपेशियों के तुल्य क्रिया प्रतिक्रिया कर पाने में सक्षम बनाने के लिये अभी इसमें बहुत सुधार करने होंगे किंतु उसमें अधिक समय नहीं लगना। चीन के चोंगक़िंग विश्वविद्यालय में भी ‘चतुर ताँत’ पर स्वतंत्र रूप से काम चल रहा है।

एक ओर नवोन्मेष और तकनीकी द्वारा मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिये ऐसे प्रयास चल रहे हैं तो दूसरी ओर मानव की जनसंख्या वृद्धि भी अपनी गति से चल रही है। वस्त्र के साथ ही दो और मूलभूत आवश्यकताओं भोजन और आवास पर दबाव स्पष्ट हैं। पूँजी का केन्द्रीकरण और अनुत्पादक निवेश स्थिति को और जटिल बनाते जा रहे हैं। भारत को देखें तो सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन की जनसंख्या से यहाँ केवल 11 करोड़ कम लोग ही रहते हैं जब कि, तिब्बत के लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर को छोड़ कर, उसका क्षेत्रफल लगभग 71 लाख वर्ग किलोमीटर है जो कि भारत के दुगुने से भी अधिक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमानों के अनुसार 2022 तक भारत विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश होगा।

एक ऐसे देश में जहाँ नवोन्मेष के नाम पर शून्य हो, भ्रष्टाचार का चहुँओर साम्राज्य हो और नीतियाँ दूरगामी सोच और कार्यान्वयन नहीं रख पा रही हों, आने वाले दिन बहुत कठिन हो सकते हैं। जनसंख्या वृद्धि की दर को थामना ही होगा। साम्यवादी अधिनायकतंत्र के स्थान पर यहाँ लोकतंत्र होने से सरकारें कई कड़े उपाय नहीं कर पा रहीं। वोट की राजनीति ने क्लिष्टतायें बढ़ाई ही हैं। आधारभूत संरचनाओं पर भार बढ़ता ही जा रहा है और इस क्षेत्र में जो भी विकास हो रहा है उस पर ग्रहण लगा हुआ है।

आज माघ पूर्णिमा है, चन्द्र और सूर्य आमने सामने होंगे। पुण्य स्नान के साथ ही इस प्रश्न का सामना भी करना होगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय विशेष दबाव समूहों का ध्यान रखते हुये देश को एक बहुत भारी समस्या की ओर जाने दिया जा रहा है? लोकतंत्र लोक से है। लोक आगामी समस्याओं की अनदेखी करेगा तो तंत्र रोगग्रस्त होगा और पितरों और देवताओं का ताना बाना टूट जायेगा। आँखें खोलिये, जनसंख्या समस्या को सबसे पहले, विमर्श के केन्द्र में लाइये।