पातञ्जल योगसूत्र (Pātañjal Yoga Sūtra)

अनुराग शर्मा

11 दिसंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रत्येक वर्ष 21 जून को विश्व योग दिवस के रूप में मान्यता दी। भारतीय संस्कृति द्वारा मानवता को प्रदत्त अनेक उपहारों की तरह योग ने भी आज विश्वव्यापी पहचान बनाई है। संसार का शायद ही कोई क्षेत्र, भाषा या लिपि इससे अनजान रहा हो। योग आजकल फ़ैशन में है। अमेरिका में ठीक-ठाक आकार का शायद ही कोई नगर हो जहाँ आम-जन की पहुँच में दो-चार योग-केंद्र न हों। पश्चिम में योग प्रशस्त जीवनशैली के साधन के रूप में प्रयुक्त हो रहा है। योग की उपस्थिति घर से व्यायामशाला तक, और आध्यात्मिक केंद्र से अस्पताल तक है। यथार्थ में योग का विस्तार, अच्छे स्वास्थ्य से बहुत आगे तक है।

जीवन का अर्थ और उद्देश्य मानव-मन के मूलभूत प्रश्नों में से है। दर्शनशास्त्र इन मूलभूत प्रश्नों का उत्तर देने को प्रयासरत है। भारतीय दर्शन को छ: अंगों के आधार पर षड्दर्शन भी कहा जाता है। षड्दर्शन के छः दर्शन न्याय, वैशेषिक, साङ्ख्य, योग, पूर्व मीमांसा तथा उत्तर मीमांसा (वेदांत) हैं।

योग दर्शन षड्दर्शन में से एक है। योग दर्शन ईश्वर, आत्मा तथा पुनर्जन्म में विश्वास रखने वाला दर्शन है। पतञ्जलि कृत योगसूत्र योग दर्शन का एक प्रमुख ग्रंथ है। योगसूत्र में योग की परिभाषा एवं आवश्यक विवरण 195 संक्षिप्त सूत्रों में प्रस्तुत किये गये हैं। योगसूत्र चार भागों में विभाजित है जिन्हें क्रमशः समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद तथा कैवल्यपाद कहा गया है। समाधि पाद  में 51 सूत्र हैं। साधन पाद तथा विभूति पाद में 55-55 सूत्र हैं, तथा कैवल्यपाद में 34 सूत्र।

योगसूत्र में वर्णित अष्टांग योग से इतर, भक्तियोग, क्रियायोग, हठयोग, राजयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, आदि जैसे शब्द भी सुनने में आते हैं जोकि सामान्यतः योग के उद्देश्य की प्राप्ति के लिये अनुकूल या वैकल्पिक साधन सरीखे लगते हैं। पिछले दिनों मैंने विहंगम योग, मंत्रयोग, लययोग जैसे नाम भी सुने। भारत से बाहर, बिक्रम योगा, पॉवर योगा आदि जैसे शब्द-युग्म भी प्रचलन में हैं। इनमें से अधिकांश का क्षेत्र शरीर सौष्ठव, आसन-प्राणायाम से लेकर ऐरोबिक व्यायाम तक सीमित है। योगसूत्र में योग की व्याख्या निम्न है:

योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।
पतञ्जलि के अनुसार एक वाक्य में योग का अर्थ ‘चित्त की वृत्तियों पर अनुशासन’  ही है।

‘सांख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता:। (गीता)

‘एकं साख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति। (गीता)

चित्त की वृत्तियों को अनुशासित करते हुये, क्लेशों को हटाकर मोक्ष की प्राप्ति के उद्देश्य से रचे गये योगसूत्र की शिक्षायें हमारे सामान्य जीवन के हर स्तर पर लाभकारी हैं। जहाँ फ़लसफ़ा, अध्यात्म या दर्शन को सामान्यतः ‘गूँगे के गुड़’ जैसा माना और बताया जाता है, योगसूत्र बहुत कुछ साङ्ख्य (एम्पिरिकल/न्यूमेरिकल) है। न केवल साधन, वृत्तियाँ, क्लेश, आदि संख्यात्मक रूप से निश्चित किये गये हैं बल्कि योग के अंग, सिद्धियाँ आदि का विश्लेषण भी आधुनिक साङ्ख्य विधियों द्वारा मापन तथा पुनरुत्पादन योग्य समझाया गया है। ‘उबले गेहूँ को अंकुरित करके खाने से खाँसी में आराम होगा’ जैसी गोलमोल बात योगसूत्र में नहीं दिखती। क्या करने से क्या होगा, क्या नहीं होगा, नहीं होता तो क्या कारण और उसका क्या उपाय होगा, कितने प्रकार की सिद्धियाँ हैं, और उनकी प्राप्ति का सिद्ध प्रमाण क्या है, आदि जैसे वर्णन आपको यह सामर्थ्य देते हैं कि आप योग के मार्ग पर चलते हुए पुनरावलोकन, और परीक्षण करके अब तक तय किये हुए और आगे बचे हुये मार्ग को स्पष्ट देख सकते हैं। 

पतञ्जलि के योगसूत्र में वर्णित योग के आठ अंग हैं, इसलिये इसे अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग के आठ अंग हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान तथा समाधि। स्पष्ट है कि योग का क्षेत्र आसन या प्राणायाम तक सीमित नहीं है। यम तथा नियम पाँच-पाँच हैं। आठ अंग वाले योग दर्शन के पहले अंग यम का पहला यम अहिंसा है। अहिंसा को मैं आठ-तल्ला भवन के पहले तल की पहली सीढ़ी मानता हूँ। सामान्यजन में अहिंसा के बारे में बहुत से भ्रम हैं, जिन पर किसी अन्य आलेख में विस्तार से चर्चा करेंगे, अभी के लिये हमें केवल इतना ही ध्यान में रखना है कि अहिंसा भारतीय संस्कृति के उन मूलभूत तत्वों में से एक है जो हमें सभी अभारतीय संस्कृतियों, पंथों, और समुदायों से अलग धरातल पर खड़ा करते हैं। अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द में यह भारतीय संस्कृति का पैराडाइम शिफ़्ट है।

  • यम :- पाँच – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह
  • नियम :- पाँच – शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्राणिधान
  • आसन :- अनेक – शारीरिक अनुशासन
  • प्राणायाम :- श्वास लय द्वारा प्राण का अनुकूलन
  • प्रत्याहार :- इन्द्रियों का अनुशासन
  • धारणा :- विचार, परिकल्पना, एकाग्रचित्त होना – ध्यान के लिये आवश्यक
  • ध्यान :- धारणा से आगे एकरूपता का प्रयास – समाधि के लिये आवश्यक
  • समाधि :- दो प्रकार – असम्प्रज्ञात, सम्प्रज्ञात – ध्यान से आगे, मोक्ष की ओर स्वत्व से योग

योगा-जॉगिंग, या योगा-साइक्लिंग जैसी आधुनिक गतिविधियों के विपरीत आसन योगी को चलाने का नहीं, बल्कि ध्यान या समाधि के लिये स्थैर्य देने का साधन है। आप ऐरोबिक्स या भारोत्तोलन अवश्य कीजिये, परंतु उन्हें योगासन नहीं कहा जा सकता। सूर्य नमस्कार एक बहुत अच्छा व्यायाम है, लेकिन वह भी योगासन नहीं है। आसनों की संख्या असीमित है। सर्वांगासन, शीर्षासन, चक्रासन, शवासन, मयूरासन, धनुरासन आदि कुछ सामान्य आसन हैं। ध्यान के लिये सुखासन, पद्मासन, गोरक्षासन, वज्रासन आदि अच्छे हैं।

प्राणायाम तीन प्रकारों के विभिन्न संयोगों के साथ किये जाते हैं: पूरक (श्वास लेना), कुम्भक (श्वास रोकना), रेचक (श्वास निकालना)। सामान्यतः पूरक तेज़ी से और रेचक धीमे से किया जाता है। परम्परा में सूर्य नाड़ी व चंद्र नाड़ी को भी महत्व दिया जाता है। युद्ध आदि आक्रामक परिस्थितियों के अतिरिक्त सर्वकाल में चंद्रना‌ड़ी (नाक के वामछिद्र से श्वसन, विशेषकर रेचक) का प्रयोग श्रेयस्कर समझा जाता है।     

रामायण में हनुमान जी द्वारा सूक्ष्मरूप धरने और अंगद द्वारा अपना पाँव स्थावर कर लेने के जो वर्णन मिलते हैं, वे योगसूत्र में वर्णित लघिमा और गरिमा सिद्धियों के उदाहरण हैं। सिद्धियों का सांसारिक उपयोग सम्भव है, उन्हें पार करके योगी भी बना जा सकता है।

योगसूत्र के प्रथम खण्ड समाधिपाद में योग की परिभाषा, उद्देश्य, लक्षण, और साधनों का वर्णन है। साधनपाद में क्लेश, कर्मविपाक और कर्मफल आदि का विवेचन है। विभूतिपाद में योग के अंग तथा सिद्धियों का वर्णन है। कैवल्यपाद में कैवल्य या मोक्ष का विवेचन किया गया है। पतंजलि के अनुसार,  अष्टांगयोग के अभ्यास से मनुष्य सिद्ध हो जाता है और अंत में मोक्ष प्राप्त कर लेता है।     

पातञ्जल योगसूत्र के कुछ चुने हुये सूत्र और उनके अर्थ: समाधिपाद

प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि (1-7)
प्रमाण के प्रकार: प्रत्यक्ष, अनुमान (लॉजिकल कनक्लूज़न, तार्किक, गणितीय निष्कर्ष आदि) तथा आगम (सर्टिफाइड, वेदमंत्र, प्रामाणिक, सिद्ध, मानक)   

विपर्ययो मिथ्याज्ञानम् अतद्रूपप्रतिष्ठम् (1-8) 
विपर्यय मिथ्याज्ञान है, जैसा न हो वैसा समझना।

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः (1-12)
अभ्यास और वैराग्य से वृत्तियों को रोका जाता है।

स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः (1-14)
दीर्घकाल तक सातत्य और श्रद्धा से भूमि दृढ़ होती है। (और यह बात योग ही नहीं, किसी भी कार्य के लिये सत्य है।)

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः (1-24)
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञ्त्वबीजम् (1-25)
स पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् (1-26)
तस्य वाचकः प्रणवः (1-27)
ईश्वर निर्लिप्त है, वह क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष व अभिनिवेश), कर्म  (सञ्चित, प्रारब्ध, आगामि), फल, तथा आशय से रहित है। सब कुछ उसी से फलीभूत है। पूर्वजों का भी गुरु वही है। ॐ उसका प्रतीक है।

पातञ्जल योगसूत्र के कुछ चुने हुये सूत्र और उनके अर्थ: साधनपाद

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः (2-1)
तप, स्वाध्याय, व ईश्वर-प्राणिधान क्रियायोग है।

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः (2-3)
अविद्या क्षेत्रम् उत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम् (2-4)
अविद्या, अस्मिता (अहं), राग, द्वेष, अभिनिवेश (जीवन से मोह), ये पाँच क्लेश हैं। बाद के चार क्लेशों का स्रोत/क्षेत्र अविद्या है।

स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः । (2-9)
जीवन की नैसर्गिक इच्छा, अभिनिवेश विद्वानों को भी जकड़ती है। 

हेयं दुःखम् अनागतम् (2-16) 
आगत दुःख से बचा जा सकता है।

कृतार्थं प्रति नष्टमपि अनष्टं, तदन्य – साधाारणत्वात्। (2-22)
जो मुक्त हो गया है, उसके लिये यह जगत नष्ट हो जाता है, परन्तु जगत तो रहता ही है। 

पातञ्जल योगसूत्र के कुछ चुने हुये सूत्र और उनके अर्थ: कैवल्यपाद

ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः (4-30)
(धर्ममेघ समाधि की अवस्था में) क्लेशकर्म निवृत्त हो जाते हैं। 

तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम् (4-31)
आवरण हटने से निर्मल हुए चित्त के ज्ञानयोग्य अल्प ही बचता है। 

ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम् 4-32)
कृतकार्य होने से कर्म-परिणाम का चक्र समाप्त हो जाता है। 

पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति (4-34)
पुरुषार्थशून्य होकर गुणों का अपने कारण में विलीन हो जाना कैवल्य है। चितिशक्ति का अपने वास्तविक रूप में प्रतिष्ठित होना कैवल्य है।                                                                                                         

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