सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 4

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि ब्रह्माण्ड में सब कुछ केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान है।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2 और  3 से आगे  …

विकासवादी मनोविज्ञान की ही तरह आधुनिक जीव विज्ञान की व्याख्या सनातन सिद्धांतों से कुछ पश्चिमी विद्वानों ने की है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि हिन्दू धर्म की बात हो या बौद्ध – इन धर्मों में धर्म से अधिक दर्शन की बातें हैं, अन्वेषण की बातें हैं। दर्शन और विज्ञान जब मिलते हैं तो उनके मिलन में कभी विरोधाभास नहीं होता। वे एक दूसरे के पूरक होते हैं। नये उद्घाटित सत्य ज्ञात सत्य को परिष्कृत करते हैं। चेतना से उपजे सत्य को प्रयोग से पूर्णता मिलती है।

जैसे विकासवादी मनोविज्ञान और बुद्ध के दर्शन एक दूसरे के पूरक लगते हैं, दोनों से एक ही निष्कर्ष निकलता है, वैसे ही ऐसे कई प्रश्न जिनके उत्तर अभी मानवता के पास नहीं है उनके संभावित उत्तर भी सनातन दर्शनों से जुड़े दिखते हैं। जब हम प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से मन और इंद्रियाँ इत्यादि का जन्म पढ़ते हैं या बुद्ध के अनुशय को संसार का मूल तो यह समझ में नहीं आता कि मनोवृत्तियों से किसी चीज या जीव की उत्पत्ति कैसे हो सकती है पर चेतना से जुड़े हाल के शोध को देखें तो इस सोच के तार उस सनातन सोच से जुड़े दिखते हैं, जैसे एक ही चीज पर दूसरी दिशा से प्रकाश डाला जा रहा हो।

‘मैं’ को नकारते हुए बुद्ध ‘अनात्मा’ की बात करते हैं और आधुनिक विज्ञान की एक परंपरा भी वही कहती हुई दिखती है। जीव वैज्ञानिक डेविड बाराश अपनी पुस्तक ‘बुद्धिस्ट बायलोजी’ में इसी बात का वर्णन इस प्रकार करते हैं कि मानव एक जीवविज्ञानी प्रक्रिया के परिणाम मात्र हैं और कुछ नहीं। जीव विज्ञान के अनुसार मनुष्य ऐतिहासिक और परिवर्तनशील संरचनाओं (संस्कारों) का संकलन भर है। बुद्ध के ‘अनात्मा, अनित्यता और सह-अस्तित्व’ को जीव विज्ञान के संदर्भ से देखते हुए वह दोनों सिद्धांतों में एकरूपता दिखाते हैं।  आधुनिक जी

व विज्ञान के सिद्धांतों को वह एक एक करके बुद्ध के दर्शन से जोड़ते हैं – दर्शन और विज्ञान में यहाँ कोई विरोधाभास नहीं. दोनों एक दूसरे में अन्तर्निहित।

बुद्ध के ‘अनात्मा’ को वह जीवविज्ञान की दृष्टि से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि किसी भी जीव की संसार से अलग अपनी कोई सत्ता नहीं है। जीवविज्ञान और पारिस्थितिकी दोनों के गणित से हर जीव दूसरे जीवों पर निर्भर और उनसे परस्पर जुड़ा हुआ है,  एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं। सह-अस्तित्व यदि जीव विज्ञान का निष्कर्ष है तो इससे सनातन ग्रन्थ भी भरे पड़े हैं अर्थात जीवों का परस्पर संबंध जीव विज्ञान के अनुकूलन का भी निष्कर्ष है और सनातन दर्शन का मूल भी। जीव विज्ञान के अनुसार जीवों का अस्तित्व सदियों के अनुकूलन से और एक दूसरे के साथ चिरकालिक अन्योन्याश्रित सम्बन्ध से बना रहा। पारिस्थितिकी (इकोलॉजी, ecology) का मूल भी यही है कि सृष्टि में कोई भी जीव स्वतंत्र रूप से नहीं रह सकता। पर्यावरण का अध्ययन करने वालों को जीवविज्ञान से अधिक लाभ बुद्ध के करुणा और सनातन सह-अस्तित्व को पढ़ने से होगा। पारिस्थितिकी और सनातन बोध में यहाँ अद्भुत रुप से समानता है।

‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ का सिद्धांत कहता है कि ब्रह्माण्ड में सब कुछ  केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान है –  कॉज एंड इफ़ेक्ट (Cause and effect)। सब कुछ सब कुछ पर निर्भर। कर्म और संस्कार – अनंत चक्र; कारण-कार्य की शृंखला – पीढ़ी दर

पीढ़ी; एक को चुनने के बाद दूसरे को चुनने का अधिकार नहीं रहना – दूसरे का होना अनिवार्य परिणति होती है।

बुद्ध की अनित्यता का आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से विश्लेषण यह भी है कि वस्तुयें निरंतर परिवर्तनशील हैं।  यहाँ तक कि गुणसूत्रों में भी रूपांतरण  और उत्परिवर्तन (mutation, म्यूटेशन) होता है।  संसार के हर सजीव, निर्जीव पदार्थ में एक जैसे ही अणु हैं जो एक दूसरे के रूप में परिवर्तित होते रहते हैं, निरंतर परिवर्तनशील – अनित्य और परस्पर सम्बद्ध। हर जीव को अंततः निर्जीव संसार में चले जाना है। वही अणु-परमाणु जो आज हमारे भाग हैं कल कुछ और होंगे। कल जो पौधे, पत्थर और तारे थे वे आज हम है। जिसे अंततः पुनः पुनर्चक्रण हो कुछ और हो जाना है। हम पदार्थ और ऊर्जा के मिश्रण मात्र हैं जिन्हें पुनः उसी में मिल जाना है। यह बात कोई पारिस्थितिकी विज्ञानी (ecologist, इकोलॉजिस्ट) कहे, भौतिक विज्ञानी कहे तो भला इसमें क्या नया है?

विकासवाद और कर्म चक्र को डेविड बराश एक ही सिद्धांत के दो पहलू मानते हैं, कारण-परिणाम का नियम। कर्म चक्र को वह जीवविज्ञान की दृष्टि से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जो किया और हम जो कर रहे हैं सबका परिणाम आने वाली पीढ़ियाँ होंगीं। हर जीव अस्थायी है पर समय के साथ हर जीव के रूप का क्षय और परिवर्तन होता रहता है।

पिछले पचास साथ वर्षों में लोकप्रिय हुए एक विषय व्यवहारिक अर्थशास्त्र (behavioural economics, बिहेवियरल इकोनॉमिक्स) यानी अचेतन व्यवहार (irrational behavious, इर्रेशनल बिहेवियर) और पक्षपातों (cognitive bias, कॉग्निटिव बायस) का अध्ययन भी विकासवादी दृष्टिकोण और सनातन दृष्टिकोण में समानता की ही तरह ही है। इस नए विषय के तार यूँ तो विकासवाद से भी जुड़े हुये हैं पर ऐसे अध्ययनों का विस्तृत परिचय हजारों साल पुराने ग्रंथों में मिलता है, न केवल भारतीय बल्कि पश्चिमी दार्शनिक परम्पराओं में भी।

(इस विषय की चर्चा अगली कड़ी में)


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

 

 

 

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