संज्ञानात्मक पक्षपात inattentional blindness (सनातन बोध: प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 6)

संज्ञानात्मक पक्षपात inattentional blindness का अध्ययन चेतना की दृष्टिहीनता को बताता है। सभी सनातन ग्रंथों में चैतन्य को सर्वश्रेष्ठ विज्ञान कहा गया है। सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2, 3, 4 और  5 से आगे  … संज्ञानात्मक पक्षपात संज्ञानात्मक पक्षपातों का अध्ययन इस बात का अध्ययन है कि हम किसी बात…

सनातन बोध: प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 5

दुःख-सुख का उल्टा नहीं। उपलब्ध विकल्पों में हम उनको चुनते हैं जिसमें लाभ भले कम हो पर हानि होने के आसार ना हो। हम लाभ से ज्यादा हानि के प्रति सचेत होते हैं। (decision making economics behavioural science) सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2, 3 और  4 से आगे  … व्यावहारिक…

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 4

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि ब्रह्माण्ड में सब कुछ केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान है। सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2 और  3 से आगे  … विकासवादी मनोविज्ञान की ही तरह आधुनिक जीव विज्ञान की व्याख्या सनातन सिद्धांतों से कुछ…

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 3

आधुनिक विकासवादी मनोविज्ञान मानव की वर्तमान अवस्था को जिन पूर्वाग्रहों और असंतोष से पीड़ित बताती है उनका कोई सटीक हल नहीं बताती। यदि हम विश्व के दर्शनों में इसका हल ढूँढना चाहें तो आत्मनियंत्रण और प्राचीन भारत के ऊपर वर्णित सिद्धांतों से उत्तम हल कहीं नहीं मिलता और आधुनिक विज्ञान इसका समर्थन करता है।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 2

बुद्ध द्वारा प्रस्तावित निवारण की विधियाँ मस्तिष्क की इस क्रमिक विकास से हुई परिणति से विपरीत उसे उलटी गति में ले जाकर सत्य का आभास कराती हैं। विकासवादी मनोविज्ञान और इस सनातन दर्शन में क्या एक ही बात नहीं है?

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1

वित्तीय गणित का सबसे प्रसिद्ध सूत्र ब्लैक शॉल्स और मेर्टन भौतिकी का ऊष्मा समीकरण भर है। इस वित्तीय समीकरण का भौतिकी में होना केवल संयोग नहीं है। एक जैसी प्रक्रिया का एक ही हल होने से इसे मौलिक आविष्कार तो नहीं कहा जा सकता? ठीक इसी तरह व्यावहारिक अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान को पढ़ते हुए कई सिद्धांत जाने पहचाने लगते हैं।

शून्य – 5

शून्य – 1, शून्य – 2 , शून्य – 3, शून्य – 4 से आगे … शून्य के वर्तमान गोले के रूप में लिखे जाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई इसका ठीक ठीक पता नहीं पर ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर में अंकित शून्य ही प्रथम लिखित शून्य  के रूप में मान्य है वैसे शून्य…