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शून्य – 3

शून्य – 1, शून्य – 2 से आगे …

‘शून्य’ की प्रथम स्पष्ट गणितीय परिभाषा ब्रह्मगुप्त (628 ई.) के ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में मिलती है। यह वह युग था जब अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति वेदांग ज्योतिष से अलग गणित के रूप में लगभग स्वतंत्र पहचान बना चुके थे। आर्यभटीय ज्योतिष का पहला ग्रन्थ है जिसमें गणित के लिए एक स्वतंत्र अध्याय है। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त गणित की एक कालजयी रचना है। इस पुस्तक में गणित के कई सिद्धांत हैं और इसके अरबी अनुवाद ने विश्व में गणित को एक नयी दिशा दी. उस युग की परंपरा के अनुसार गणित की पुस्तक होते हुए भी यह पूरी तरह काव्य रूप में थी। कुट्टकाध्यायः (बीजगणित) नामक अठारहवें अध्याय में शून्य से जुडी छः प्रक्रियाओं का उल्लेख है:

धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम्। ऋणमैक्यं च घनमृणधनशून्ययोः शून्ययोः शून्यम्॥
ऊनमधिकात्विशोध्यं धनं धनातृणमृणातधिकमूनात्। व्यस्तं तद्-अन्तरं स्यातृणं धनं धनमृणं भवति॥

शून्य-विहीनमृणमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम्। शोध्यं यदा धनमृणातृणं धनात्वा तदा क्षेप्यम्॥
ऋणमृणधनयोर्घातो  धनमृणयोर्धनवधो  धनं भवति। शून्यर्णयो: खधनयो: खशून्ययोर्वा वध: शून्यम्॥
धनभक्तं धनमृणहृतमृणं धनं भवति खम् खभक्तम् खम्। भक्तमृणेन धनमृणं धनेन हृतमृणमृणं भवति॥
खोद्धृतमृणं धनं वा तच्छेदम् खमृणधनविभक्तं वा। ऋणधनयोर्वर्ग: स्वम् खम् खस्य पदं कृतिर्यत् तत्॥

अर्थात समान धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं का योग शून्य होता है। (यहाँ खम्, शून्य और आकाश तीनों शब्दों का ब्रह्मगुप्त ने प्रयोग किया)। ऋणात्मक संख्या का शून्य से योग ऋणात्मक होता है।  शून्य और धनात्मक का योग धनात्मक होता है। दो शून्य का योग शून्य ही होता है। ऋणात्मक संख्या को शून्य से घटाया जाय तो वह धनात्मक हो जाती है और धनात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर ऋणात्मक। यदि ऋणात्मक संख्या में से शून्य घटाया जाय तो वह ऋणात्मक ही रहती है। उसी प्रकार धनात्मक संख्या में से शून्य घटा देने से वह धनात्मक ही रहती है। शून्य में से शून्य घटा देने से शून्य ही बचता है। शून्य का धनात्मक संख्या, ऋणात्मक और शून्य सबसे गुणनफल शून्य ही होता है। शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य बचता है। किसी भी ऋणात्मक या धनात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर तच्छेद।

यहाँ शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य बचने और शून्य के विभाजन के तच्छेद होने की बात को छोड़कर आज भी शून्य वैसे का वैसा ही है। ब्रह्मगुप्त की परिभाषा आधुनिक गणितीय परिभाषा है। 0/0 की परिकल्पना तो ब्रह्मगुप्त ने की परन्तु उसकी सही व्याख्या उन्होंने नहीं की, उन्होंने इसे भी शून्य ही कहा। इसी तरह शून्य से विभाजन को उन्होंने तच्छेद नाम दिया पर इसकी प्रकृति के बारे में कुछ नहीं कहा, यह शून्य से विभाजित एक अपरिभाषित भिन्न ही रहा। इन सीमाओं से इस बात की महत्ता कम नहीं होती कि यह ऋणात्मक संख्याओं और शून्य का विश्व में पहला स्पष्ट गणितीय विश्लेषण है।

इस सिद्धांत की जड़ स्थानीय मान पद्धति, आर्यभट की अक्षरांक पद्धति और भास्कर प्रथम के आर्यभटीय की व्याख्या में वर्णित दाशमिक प्रणाली में मिलती है। आर्यभट ने शून्य का उल्लेख इस रूप में तो नहीं किया और न ही उन्होंने शून्य को परिभाषित किया परंतु उनके कार्यों में उन्हें शून्य के ज्ञान होने की झलक दिखती है। आर्यभट की अक्षरांक पद्धति में उनकी अद्भुत विलक्षणता दिखती है। आर्यभट की शैली और प्रतिभा की बात करने पर हम शून्य की बात से भटक जायेंगे।  गीतिकापाद के मात्र 13 श्लोकों में अपनी अद्वितीय शैली से आर्यभट ने इतना कुछ लिख दिया कि उस पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। आर्यभट ने अंकों के लिए ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया,  ना ही पद्य रूप में चली आ रही शब्द परंपरा का। उन्होंने अक्षरों में अंको को लिखने की स्वनिर्मित पद्धति अपनायी जो अद्भुत और अद्वितीय है। श्रुति की परंपरा से सोचें तो गणित को श्लोकों में लिखना और कम से कम श्लोकों में अधिक से अधिक ज्ञान लिख देना परंपरा थी। आर्यभट का कार्य लघुता और कूट भाषा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। आर्यभट की अक्षरांक पद्धति व्यवहार की दृष्टि से अत्यंत कठिन प्रतीत होती है पर उसकी विलक्षणता अद्वितीय है। व्यवहार की दृष्टि से कठिन इसलिये क्योंकि उसे समझना सरल नहीं है। अक्षरों से बने अंकों का उच्चारण सरल नहीं, कूट भाषा है। अंक में एक मात्रा के हेर फेर से भी अंकों के मान में भारी परिवर्तन हो जाता है। उनकी पद्धति यह है:

वर्गाक्षराणि वर्गे अवर्गे अवर्गाक्षराणि कात्ङ्मौ य:। ख द्विनवके स्वरा: नव वर्गे अवर्गे नवान्त्य-वर्गे वा॥

स्वरों से इकाई, दहाई आदि स्थान का परिचायक (अ = 1, इ = 100, उ= 10,000, ऋ = 1,000,000 …. औ = 1016) और क से म तक व्यंजनों से क्रमशः 1 से 25 अर्थात क = 1, ख = 2, ग = 3…. म = 25. उसके आगे य = 30, र = 40, ल = 50, … ह = 100.

युग गणना में प्रसिद्ध आर्यभटीय अक्षरांक ख्युघृ का कूटानुवाद आज के अंकों में कुछ यूँ है:

ख्युघृ = 4,320,000

खु = 2×10000 = 20,000
यु = 30 x 10000 = 300,000
घृ = 4 x 1000000 = 4,000,000
योग = 4,320,000

एक दूसरी प्रसिद्द संख्या ङिशिबुणॢख्षृ = 1,58,22,37,500

ङि = 5×100 = 500
शि = 70×100 = 7,000
बु = 23×10000 = 2,30,000
णॢ = 15×108 = 1,50,00,00,000
ख्षृ= (2+80)x106 = 8,20,00,000
योग = 1,58,22,37,500

शून्य का स्पष्ट उल्लेख आर्यभट ने नहीं किया परन्तु उनके यहाँ अंको के स्थानीय मान और दस के घात के वर्णन कुछ यूँ है कि शून्य का वर्णन नहीं होते हुए भी वह पद्धति में अन्तर्निहित है। इसी पुस्तक के गणितपाद प्रकरण में आर्यभट संख्या स्थानों के वर्णन में ‘स्थानात् स्थानं दशगुणम् स्यात्’ लिखते हैं। दर्शन, व्याकरण, अक्षरांक पद्धति से लेकर ब्रह्मगुप्त की स्पष्ट गणितीय परिभाषा तक धीरे धीरे शून्य अपना रूप लेता गया – क्रमिक विकास। खाली स्थान लिखने की परंपरा से एक खाली अंक होता हुआ अन्ततः सभी अंको का स्थान निर्धारित करने वाला अंक – अंको का सिरमौर! शून्य का वर्तमान लिखित रूप कब आया वह भी महत्त्वपूर्ण है। शून्य के वर्तमान रूप ‘0’ के पहले लिखित सन्दर्भ ग्वालियर और अंकोरवाट में मिलते हैं। पर शून्य की परिकल्पना का विकास उससे अधिक मायने रखता है। लिखित रूप ‘0’ के पहले प्रमाण से बहुत पहले से शून्य था।

ब्रह्मगुप्त की शून्य से विभाजन की सीमाओं के साथ शून्य का यह रूप गणित में अगले 500 वर्षों तक चला। 830-850 ई. में महावीर ने ‘गणित सार संग्रह’ की रचना की जो कि ब्रह्मगुप्त के गणित का ही परिष्कृत रूप था। इसमें वह शून्य के बारे में लिखते हैं कि किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर वह शून्य हो जाती है, शून्य को जोड़ने, घटाने या उससे भाग देने पर संख्या अपरिवर्तित रहती है। गणित की इस प्रसिद्ध पुस्तक में भी शून्य से विभाजन को महावीर ने सही परिभाषित नहीं किया। ब्रह्मगुप्त के लगभग 500 वर्ष पश्चात भास्कर द्वितीय ने 1114 ई में शून्य से विभाजन की नये सिरे से व्याख्या की।

अगले अंको में : भास्कर के शून्य से विभाजन की परिभाषा। अनंत के सिद्धांत का प्रतिपादन।
लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

शून्य

शून्य वि। तुच्छम्। … शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके।
(अमरकोश)

‘शून्य’ [0] गणित में अब तक की सबसे सबसे बड़ी खोज है। उसके बिना दस आधार वाली भारतीय अंक पद्धति और अंको के स्थानिक मान की पद्धति संभव नहीं और उसके बिना आज के गणित और विज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। यह अंकों और गणनाओं का युग है। अंको के बिना जीवन सोच पाना असंभव है। अगर हम अपने आस पास देखें तो ऐसी कोई चीज नहीं जो अंकों के बिना संभव हो, कुछ भी नहीं! और अंकों को इतना उपयोगी बनाने में सबसे बड़ा योगदान शून्य का है।

भारतीय परंपरा के अतिरिक्त इतिहास में अंकों की कई पद्धतियाँ रही हैं, रोमन, ग्रीक, हिब्रू इत्यादि, परन्तु सभी पद्धतियों में अंकों के लिए वर्णमाला के अक्षर प्रयुक्त होते थे। शून्य, स्थानिक मान की पद्धति और दशमलव जैसे सिद्धांत किसी भी और पद्धति में नहीं थे। शून्य के बिना न तो अंकों का निरूपण आसानी से हो सकता है न गणितीय संक्रियायें जिसके कारण रोमन अंकों की पद्धति में बड़ी संख्याओं को लिखना बहुत कठिन होता है और जोड़ घटाव लगभग असंभव।

आप ने कभी किसी पुराने ब्रिटिश कालीन भवन पर रोमन में लिखे निर्माण सन् का मान पता करने का प्रयास किया है?

रोमन पद्धति में ऋणात्मक संख्यायें, भिन्न, द्विघाती समीकरण, दशमलव अंक सोच पाना भी संभव नहीं! हमारे लिये यह सोच पाना भी कठिन है कि बिना शून्य और दस अंकों की पद्धति के संसार चलता कैसे था! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज से एक हजार वर्ष पहले कई देशों के मँझे हुये गणितज्ञ जो गणनायें कर पाते थे, उनसे अधिक आज की पाँचवी कक्षा के छात्र कर लेते हैं। एक लंबे समय तक कई सारे आविष्कार इसलिये नहीं हो पाये कि संसार के बहुत बड़े भाग में अंकों का विकसित तरीका नहीं था।

पश्चिमी सभ्यता की बात करें तो पीजा (Pisa) के एक वाणिज्यदूत बोनाची के पुत्र लिओनार्दो पिसानो को अपने पिता के साथ अल्जीरिया जाने का अवसर मिला। वहाँ उसे एक अरबी व्यापारी ने भारतीय अंक पद्धति से परिचय कराया। फिबोनाची, जिसका शाब्दिक अर्थ हुआ बोनाची-पुत्र, के लिए यह अद्भुत था! फिबोनाची को नयी अंक पद्धति में असीमित संभावनायें दिखीं। जो गणनायें रोमन अंक पद्धति में असंभव थीं उन्हें भारतीय अंक पद्धति से बड़ी सरलता से किया जा सकता था। वह इतना प्रभावित हुआ कि अगले कई वर्षों तक भूमध्य सागर के तट पर स्थित देशों का भ्रमण कर व्यापारियों से गणित सीखता रहा।
१२०२ ई. में फिबोनाची ने ‘लिबेर अबाचि’’ अर्थात ‘गणना की पुस्तक’ की रचना की। यह भारतीय अंक पद्धति से यूरोप का पहला परिचय था। फिबोनाची ने इस पुस्तक में मोडस इंडोरम  यानि भारतीय पद्धति का उल्लेख किया। यह शून्य सहित एक से नौ तक अंको की परंपरा और स्थानीय मान की विधि से अंको को लिखने की पद्धति थी। इस पुस्तक में फिबोनाची ने अंको की नयी पद्धति के साथ साथ इसके प्रयोग के व्यावहारिक उदाहरण भी दिये जिनमें व्यापारियों से सीखे गये हिसाब रखने के तरीके विशेष थे। इसी पुस्तक में एक प्रश्न के हल के रूप में गणित के विख्यात ‘फिबोनाची क्रम’ का उल्लेख भी था। इस क्रम का वर्णन इससे पहले विरहाङ्क (६००-८०० ई.), गोपाल (११३५ ई. के पहले) तथा हेमचन्द्र (११५० ई. के पहले) ने भी किया था। फिबोनाची क्रम को गणितज्ञ गोपाल-हेमचन्द्र नम्बर्स के नाम से भी जानते हैं। जैन विद्वान और दार्शनिक हेमचन्द्र को कलिकाल सर्वज्ञ भी कहते हैं।  वैसे तो फिबोनाची के परिचय के बावजूद लगभग दो सौ वर्षों तक यूरोप में अंको की भारतीय पद्धति पूरी तरह प्रचलित नहीं हुई, पर विज्ञान में आविष्कारों की गति को इस परिचय से अधिक गति इतिहास के किसी परिचय ने नहीं दी। फिबोनाची को इस परिचय और अध्ययन के लिए मध्यकालीन यूरोप का सबसे प्रतिभासम्पन्न गणितज्ञ माना जाता है।

शून्य का प्रयोग भारत में सदियों पहले से था। कई सन्दर्भों को नकारने वाले लोग भी यह मानते हैं कि कम से कम ५०० ई. तक भारत में शून्य का प्रयोग होने लगा था। इनमें सबसे प्रमुख नाम आता है आर्यभट का, जिन्हें हम शून्य का आविष्कारक भी कहते हैं जो कि सच नहीं है। आर्यभट ने शून्य का लिखित वर्णन किया है। शून्य के लिए ‘ख’।

‘आर्यभटीय’ पर भास्कर की टीका से लिया गया अंश

परन्तु उससे पहले कई सन्दर्भों में शून्य का वर्णन आया है। ऋग्वेद में रथचक्र की धुरी के गोलाकार छिद्र और विवर के लिये ‘ख’ के प्रयोग कुछ विद्वानों ने इंगित किये हैं। खुले भूदृश्य में रात में गोलाकार दिखता आकाश भी बाद में ‘ख’ कहलाया। यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा मेंं दाशमिक प्रणाली के स्पष्ट वर्णन हैं जिनमें क्रमश: दस गुना करते हुये परार्द्ध 1012  जितनी संख्या तक की गणना बताई गई है:

कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय शाखा, 4.4.11

ऋग्वेद और अथर्ववेद के गणना और संख्या विषयक प्रयोग स्वतंत्र आलेख के योग्य हैं। ‘ख’ और शून्य के अन्य आर्यभटपूर्व प्रयोग हैं: पिंगल  के छंदशास्त्र में (लगभग ४०० ई पू, मान्यताओं के अनुसार पिंगल प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के भाई थे), बृहदारण्यक उपनिषद् में, शतपथ ब्राह्मण में और अमरकोश में – शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके।

शून्य की परिकल्पना सबसे पहले भारत में होने का बहुत बड़ा कारण है – गणित का अध्ययन वेदांग के रूप में होना। अंकों का आविष्कार वस्तुओं को गिनने के लिए हुआ। पर शून्य और उसकी परवर्ती ऋणात्मक संख्यायें गणित के पहले अमूर्त रूप हैं, पहली गणितीय काल्पनिकता – ‘शुद्ध गणित’। गणित में होने से पहले दार्शनिक दृष्टि से शून्य की चर्चा भारतीय ग्रंथों में कई बार आयी है। शून्यता अर्थात  बृहदारण्यक उपनिषद का ‘ॐ  खं ब्रह्म’। ख, शून्य, अम्बर, रिक्त, अभाव, तुच्छ, बिंदु इत्यादि शब्दों का प्रयोग शून्य के संकेत 0 के बहुत पहले से होता रहा। आर्यभट के बाद ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर ने शून्य को न केवल गणितीय रूप से परिभाषित किया बल्कि इससे जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिये, एक तरह से देखें तो भारतीय दर्शन के सिद्धान्तों को अङ्कों में लिख दिया!

भारतीय गणितीय परंपरा की एक कठिनता रही उसका संस्कृत श्लोकों के रूप में लिखा जाना। संभवतः श्रुति की परंपरा से गणितीय सिद्धांतों और सूत्रों की रचना कम शब्दों में और स्मृतिसुगम हो जाने वाले संस्कृत श्लोकों के रूप में की गयी, जिनका बाद में अर्थ निकालना कठिन होता गया।


अगले अङ्कों में:
शून्य का वेदांग दर्शन से गणितीय रूप में विकास, वेदांग और खगोलीय गणनाओं में बड़े अंको का प्रयोग,आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर की शून्य की परिभाषा. शून्य की परिभाषाओं पर भारतीय दर्शन के अभाव (कणाद), शून्यवाद (नागार्जुन), ख (उपनिषद्), शून्यता (बौद्ध महायान) के सिद्धांतों का प्रभाव. शून्य से विभाजन की समस्या और अनंत/लिमिट के सिद्धांत का प्रतिपादन.

लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha