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सम्वत्सर और पञ्चाङ्ग – 1

भारतीय सम्वत्सर और पञ्चाङ्ग के वर्तमान रूप सहस्राब्दियों से जागृत उन्नत सभ्यता और संस्कृति के प्रमाण हैं। उपलब्ध पुरातात्विक और साहित्यिक प्रमाणों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि अग्नि रूपी पुरोहित को आगे रखती कृषिकर्मी देव सभ्यता यहीं फली फूली जिसका नेतृत्त्व वर्षा के देवता इन्द्र करते थे। यहाँ ऋतु, उस पर आधारित कृषि और कृषि आधारित जीवन के बहुत ही समृद्ध और बहुरंगी रूप विन्यास मिलते हैं जिनका प्रस्तावक जन का वैविध्य है।

उस पुरातन समय में कृषि उत्पादकता, सफलता, नवोन्मेष और प्रसार के लिये अग्नि के आकाशीय रूप सूर्य की गति पर आधारित ऋतु चक्र का प्रेक्षण अनिवार्य  हुआ जिसके कारण क्रमश: ‘यज्ञ’ आधारित एक ऐसी व्यवस्था ने जन्म लिया जिसने सृष्टि के विराट ‘यजन्’ से स्व को जोड़ते और उसका अनुकरण करते स्वयं को चेतना और कर्म के अति उच्च स्तर तक पहुँचा दिया। विभिन्न याज्ञिक सत्रों के निर्वहन हेतु कालचक्र का सटीक विवेचन और मूर्तन अनिवार्य था। सम्वत्सर और पञ्चाङ्ग आदि उस आवश्यकता की पूर्ति करते थे। इस शृंखला में हम उस विकास यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे। आरम्भिक स्थिति में वैदिक संकेतों के आधार पर अनुमान रहेंगे जो धीरे धीरे ऋचाओं, मंत्रों और यजुष् के साथ ठोस होते जायेंगे।  

गिरिजेश राव

जब तक कृषि नहीं थी तब तक सूर्य गति और ऋतु चक्र के व्यवस्थित प्रेक्षण बहुत आवश्यक नहीं थे। एक बार कृषि की ओर उन्मुख होने के पश्चात क्रमश: आवश्यकता बढ़ती गयी। दूर नभ में दिन में चमकते तपते पिण्ड सूर्य की ऊष्मा ही जीवन थी, यह समझा जाने लगा, साथ ही यह भी कि उसकी झुकान और उठान के साथ ही अँजोर घटता बढ़ता तो देह भी कभी ठिठुरन तो कभी ताप का अनुभव करती। ताप बहुत बढ़ जाता तो शीतल करने को झझझम पानी बरसता और शस्य लहलहा उठती। हिरण्यरूप सूर्य बादलों के पीछे छिप अमृत बरसाता और हरीतिमा निखरती पसरती जाती। अति हो जाती तो उसकी ढलान पहले थोड़ी सिहरावन लाती और कुछ ही समय में दाँत कड़कड़ाने लगें ऐसा भी चारो ओर हो जाता और तब एक दिन अचानक दिखता कि कमेरे हाथ की ओर का झुकाव थिर हो गया है और सूर्य लौटने जैसे लगे हैं। उजाले का समय बढ़ने लगता और उनके कुछ ही उगने और डूबने के उपरांत समूची धरा जैसे निखर उठती। मुरझाये वन पर नवीनता अँखुवाने लगती और पुहुप खिल उठते। न अधिक शीत, न अधिक घाम, लगता जैसे सब नया नया हो गया है। भीतर मन में किलकारियों के साथ नाचने की उमंगें उठतीं और प्रिय के सान्निध्य की ऊष्मा खेतों में उच्छृंखल हो उठती। अब की बार जो अन्न घर आता उसकी बात ही और होती। सब होते होते जाने कब सूरज सिर पर पुतली चढ़ जाता और आग बरसने लगती तो पुन: तड़ित झमझम की पुकार और प्रतीक्षा होने लगती!

जो चतुर थे वे समझ गये कि किसी भी तरह की अति का शमन एक निश्चित समय में हो ही जाता है और ऐसा चलता रहता है। इस चमत्कार को नमस्कार करते हुये उन्हों ने कारक सूर्य को देवता घोषित कर दिया जो कि अंतरिक्ष में उसी ऊष्माधारी देवता अग्नि का ही रूप था जिसके कारण वन हटे और खेत बने, पेट भरने की चिंता कम हुई और देह की सुन्दरता पर ध्यान गया, ढकने और सजाने की आवश्यकता भी पड़ी। शीत की सी सी, घर में अन्न पहुँचने के आह्लादी गान का रे, रे और हर्षाती बरसाती ठुमक के त त ता ता थइया जाने कब मिल कर शरत हो गये। प्रतिदिन उगते और अस्त होते ‘सरति आकाशे’ सूर्य थे ही, उनकी आवृत्ति का समय हुआ शरद, आगे वर्षा से ‘वर्ष’ होने वाले कालखण्ड का पहला रूप।

सुख और उल्लास की अभिव्यक्ति के दो अक्षर मिल कर ‘ऋत’ हुये। एक बहुत ही आदरणीय भावना ने कहीं जन्म लिया। वह जो कभी नहीं चूकता, वह जो अतुल प्रकाश से चमकता है, वह जो सब कुछ देता है, वह जो वरने योग्य है, पूजने योग्य है, वह भी ऋत हुआ और उसकी व्यवस्था भी ऋत हुई। देह के अनुभव और वनस्पतियों एवं प्राणियों पर प्रभाव से जो तीन कालखण्ड पूर्णत: स्पष्ट थे, शीत, ग्रीष्म और वर्षा, वे बार बार आते, निश्चित समय रह कर लुप्त हो जाते ऋतु हो गये।

चतुर पहेरुओं ने जाना कि सूर्य जिस ओर उगते हैं, उस ओर भी एक ही स्थान पर स्थिर रह नहीं उगते। एक हाथ की ओर झुकते चले जाते और जब लगता कि अब गिरे कि तब तो थम कर पुन: लौटने लगते। दूसरे हाथ की ओर भी यही क्रिया दुहराते। लगता कि जैसे अदृश्य रज्जुओं से बँधे हों जो एक सीमा से नीचे गिरने नहीं देती! विराट दोलन।

इस गति के साथ ही वह दैनिक गति भी थी जिसके पालन में सूर्य प्रतिदिन आधा गोला पार कर उगने के विपरीत ओर अस्त हो जाते। स्पष्ट था कि गति चक्रीय भी थी। रज्जुओं और चक्रीय गति को समझने तक भौतिक रूप से अश्व पालतू बना कर रथों में जोते जा चुके थे। यह समझ उसी से आकार ली।

तब तक गिनती के साथ नृत्य की ताल और गति की मात्रायें भी निश्चित की जा चुकी थीं और गीत गाये जाने लगे थे। सीधे कहने के स्थान पर वक्रोक्ति, उपमा, रूपक, लक्षणा, व्यञ्जना आदि का प्रयोग चतुर जन करने लगे थे और उनसे संवादित देवता परोक्षप्रिय हो चले थे। कवियों ने पर्जन्य की भूमिका में घिरे मेघों की फुहारों और सूर्य रश्मियों से बने धनु देखे थे जिनमें सात वर्ण भी स्पष्ट थे।

दिन में तपता सूर्य होता और रात में जब वनस्पतियाँ और पादप सो जाते तो जैसे उन्हें सहलाने को सूर्य सम एक दूसरा रूप शीतल प्रकाश के साथ अंतरिक्ष में उभर आता और उसके साथ ही आ जाते अनेक चमकते टिमटिमाते जुगनू। इस सम को नाम मिला सोम। सोम अद्भुत था, वह कलायें दिखाता था। सूर्य की कलाकारी का परास तो बहुत बड़ा था जो सबके लिये उतना बोधगम्य भी नहीं था किंतु सोम की घटबढ़ कलायें तो स्पष्ट दिखती थीं। किसी दिन वह पूरा गोला दिखता और घटते घटते एक दिन लुप्त हो जाता। दुबारा बढ़ते हुते पुन: पूरा गोला हो जाता। यह चक्र चलता रहता। गिनती से पता चला कि लगभग तीस सूर्यास्तों में यह चक्र पूरा हो जाता। सोम के पूर्ण से पुन: पूर्ण होने के इस कालखण्ड को नाम मिला मास। लगभग 12 ऐसे मास होते तो सूर्य देवता अपना दोलन पूरा कर चुके होते। यह भी स्पष्ट हो गया कि तीन ऋतुओं वाले खण्ड चार चार मास की अवधि के थे।

और तब ऋत को जीवन में उतारने को उद्यत एक कवि की ऋचा ने विराट रूपक का आकार लिया जिसमें सात सवारियाँ थीं, सप्त नाम का अश्व जिसे खींचता, रथ ऐसा था कि उसमें बस एक चक्का था जब कि तीन धुरियाँ थीं। वह चक्का न ढीला पड़ता और न नष्ट होता जब कि रथ में विश्व भुवन स्थित थे!

सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा।
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वो भुवनाधि तस्थु:॥
(ऋग्वेद 1.164.2)

यह एक पहिये वाला रथ क्या था? सम्वसंति ऋतव: यस्मिन् अर्थात जिसमें ऋतुयें बसती थीं, समीकृरूपेण सरंति यस्मात् कालात्, अर्थात जिस कालखण्ड के पश्चात सबकुछ सम (संतुलन) से प्रारम्भ होता है, ‘स सम्वत्सर’।

उन्हों ने जाना कि सूर्य के आभासी दोलन में ऐसे संतुलन के दो बिन्दु होते हैं, जिनमें एक वसंत ऋतु में होता है। वसंत अर्थात जिसमें समूची सृष्टि नयेपन के उमंग और नवरस उद्योग में सहज स्वाभाविक रूप से ही होती है। इसी संतुलन बिन्दु को सामान्य जन ने नववर्ष का आरम्भ माना।

किंतु हमने तो जिन तीन ऋतुओं की बात की उनमें वसंत ऋतु तो है ही नहीं! विषुव और अयन क्या थे? सात सवारियाँ कौन थीं? अगले अङ्क में इन पर आगे बढेंगे और साथ ही इस पर भी कि सम्वत्सर अकेला क्यों नहीं है?   

ऋत, ऋतु और Ritual

ऋग्वेद 4.23.8-4.23.10
 
क्रिया धातु ‘ऋ’ से ऋत शब्द की उत्पत्ति है। ऋ का अर्थ है उदात्त अर्थात ऊर्ध्व गति। ‘त’ जुड़ने के साथ ही इसमें स्थैतिक भाव आ जाता है – सुसम्बद्ध क्रमिक गति। प्रकृति की चक्रीय गति ऐसी ही है और इसी के साथ जुड़ कर जीने में उत्थान है। इसी भाव के साथ वेदों में विराट प्राकृतिक योजना को ऋत कहा गया। क्रमिक होने के कारण वर्ष भर में होने वाले जलवायु परिवर्तन वर्ष दर वर्ष स्थैतिक हैं। प्रभाव में समान वर्ष के कालखंडों की सर्वनिष्ठ संज्ञा हुई ‘ऋतु’  । उनका कारक विष्णु अर्थात धरा को तीन पगों से मापने वाला वामन ‘ऋत का हिरण्यगर्भ’ हुआ और प्रजा का पालक पति प्रथम व्यंजन ‘क’ कहलाया।
 
आश्चर्य नहीं कि हर चन्द्र महीने रजस्वला होती स्त्री ‘ऋतुमती’ कहलायी जिसका सम्बन्ध सृजन की नियत व्यवस्था से होने के कारण यह अनुशासन दिया गया – ऋतुदान अर्थात गर्भधारण को तैयार स्त्री द्वारा संयोग की माँग का निरादर ‘अधर्म’ है। इसी से आगे बढ़ कर गृह्स्थों के लिये धर्म व्यवस्था बनी – केवल ऋतुस्नान के पश्चात संतानोत्पत्ति हेतु युगनद्ध होने वाले दम्पति ब्रह्मचारियों के तुल्य होते हैं।
 
आयुर्वेद का ऋतु अनुसार आहार विहार हो या ग्रामीण उक्तियाँ – चइते चना, बइसाखे बेल …, सबमें ऋत अनुकूलन द्वारा जीवन को सुखी और परिवेश को गतिशील बनाये रखने का भाव ही छिपा हुआ है।  ऋत को समान धर्मी अंग्रेजी शब्द Rhythm से समझा जा सकता है – लय। निश्चित योजना और क्रम की ध्वनि जो ग्राह्य भी हो, संगीत का सृजन करती है। लयबद्ध गायन विराट ऋत से अनुकूलन है। देवताओं के आच्छादन ‘छन्द’ की वार्णिक और मात्रिक सुव्यवस्था भी ऋतपथ है।

अंग्रेजी ritual भी इसी ऋत से आ रहा है। धार्मिक कर्मकांडों में भी एक सुनिश्चित क्रम और लय द्वारा इसी ऋत का अनुसरण किया जाता है। ‘रीति रिवाज’ यहीं से आते हैं। लैटिन ritus परम्परा से जुड़ता है। परम्परा है क्या – एक निश्चित विधि से बारम्बार किये काम की परिपाटी जो कि जनमानस में पैठ कर घर बना लेती है।
कभी सोचा कि ‘कर्मकांड’ में ‘कर्म’ शब्द क्यों है? कर्म जो करणीय है वह ऋत का अनुकरण है। कर्मकांडों के दौरान ऋत व्यवहार को act किया जाता है। Rit-ual और Act-ual का भेद तो समझ में आ गया कि नहीं?