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सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 2

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1 से आगे

विकासवादी मनोविज्ञान, जीवविज्ञान से प्रभावित एक सैद्धांतिक विषय है जो मनोविज्ञान और मानव स्वभाव की व्याख्या विकासवाद के परिपेक्ष्य में करता है। जिस तरह जीव विज्ञान में विकासवाद से जीवों के वर्तमान स्वरूप के क्रमिक विकास का अध्ययन और व्याख्या की जाती है, उसी तरह विकासवादी मनोविज्ञान में मानव व्यवहार की व्याख्या मस्तिष्क के क्रमिक विकास से की जाती है। जैसे जीवों के अंग पीढ़ी दर पीढ़ी वातावरण के अनुकूल होते गये, प्रकृति के चयन का सिद्धांत – योग्यतम की उत्तरजीविता से जीवों के अंगों में रूपांतरण आता गया। लाखों जीवों में से कई अनुकूल नहीं होने के कारण विलुप्त हो गये और उन्हीं में से एक बन्दर होता हुआ मनुष्य हुआ। विकासवादी मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि उसी क्रम में शरीर की ही तरह मस्तिष्क का भी अनुकूलन हुआ। उन बातों के लिए जो उत्तरजीविता और मानव प्रजाति के बने रहने के लिए जरूरी थे, मस्तिष्क उनके अनुकूल होता गया। जो बातें इसके लिए लाभकारी नहीं थीं वे मस्तिष्क से विलुप्त होती गयीं।

इन सिद्धांतों से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि संसार ऐसा क्यों है? हम किसी वस्तु को सुन्दर क्यों पाते हैं? हमें कुछ विशेष लोग अच्छे क्यों लगते हैं? हमें क्रोध क्यों आता है? हम किन बातों के पीछे पागल होते हैं? क्रोध, घृणा, प्रेम, आतंक, मित्रता, परिवार, शत्रुता, गर्व, सफलता, देश प्रेम की भावना जैसे अनगिनत गुण-दोष हमारे भीतर क्यों होते हैं? ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर विकासवादी मनोविज्ञान में इस परिप्रेक्ष्य से सोचे जाने के प्रयास किये जाते हैं कि कि अंतत: इससे मानव जाति को क्या लाभ होता होगा। तब जब मानव शिकारी और संग्रहकर्ता का जीवन जीते और छोटे समूहों में रहते थे। अपने समूह की उत्तरजीविता और सफल प्रजनन (survival and reproduction) के लिए क्या महत्त्वपूर्ण था। ऐसी हर महत्त्वपूर्ण बात उत्तरोत्तर मस्तिष्क में स्थायी होती गयी और स्वार्थी गुणसूत्र उसे अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित करते गए। जिन बातों से ऐसे लाभ नहीं थे वे मानव मस्तिष्क से मिटती गईं। जैसे जिनसे भयभीत होने या क्रोध आने से हमारे जीवित रहने की सम्भावना बढ़ी वे बातें मानव मस्तिष्क में समाहित हो गयीं, जैसे सामाजिक प्रतिष्ठा । ऐसी कई चीजें मानव जीवन का लक्ष्य बनती गयीं। प्रकृति ने सुख प्राप्ति को तो प्रोत्साहित किया पर सुख की अनुभूति को क्षणिक बनाया क्योंकि एक बार सुख प्राप्त हो जाने पर यदि मनुष्य रुक जाए तो प्रकृति के लक्ष्य में बाधा हो जायेगी। प्रकृति ने सुख प्राप्ति को मानव व्यवहार तो बनाया परंतु उससे प्राप्त होने वाली अनुभूति को अनित्य बनाया ! एक बार प्राप्त हो जाने पर और की इच्छा। इस सिद्धांत के हिसाब से मस्तिष्क के लिए चयन की शर्ते थीं, उत्तरजीविता और प्रजनन। सिद्धांत का निष्कर्ष – हमारे व्यवहार और सामाजिकता का कारण है हमारे पूर्वजों का शिकारी-संग्रहकर्ता और समूह में रहने वाला होना। जीने और कुटुंब बढाने के लिए जिस युग में जो महत्त्वपूर्ण और आवश्यक था वही मानवीय स्वभाव बन गया। क्रोध, प्रेम, घृणा, धैर्य, ईर्ष्या, करुणा… इत्यादि का मानव मस्तिष्क परिवेश के अनुसार चयन करता गया। मस्तिष्क के अनुकूलन का अर्थ हुआ ‘स्वार्थी जीन’ को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना।  

विकासवादी मनोविज्ञान के सिद्धांतों से एक निष्कर्ष निकलता है  – प्रकृति ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक भ्रम बनाया, सुख की मरीचिका। मानव मस्तिष्क इस तरह बनता गया कि उसे वो चीजें अच्छी लगने लगीं जिनसे प्रकृति के लक्ष्य (उत्तरजीविता और प्रजनन, Survival and Reproduction) को बढ़ावा मिले। विकासवाद और बौद्ध दर्शन पर अध्ययन करने वाले प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रो. रॉबर्ट राइट इस निष्कर्ष पर कहते हैं कि प्रकृति का इससे कोई प्रयोजन नहीं था कि हम संसार को स्पष्ट देख सकें या हम सत्य को जान सकें। प्रकृति ने मस्तिष्क में एक मरीचिका बनाई। मानवों के उत्तम जीन को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रकृति के लक्ष्य प्राप्ति के लिए मानव मस्तिष्क को सत्य दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। प्रकृति ने मानव मस्तिष्क को इस तरह विकसित किया जिससे उसे ये मरीचिका स्थायी लगे, मनुष्य उसके पीछे भागे, उसे प्राप्त करना चाहे। इस मरीचिका का एक ही लक्ष्य है – मानव को प्रोत्साहित करना। ये आगे चलकर ‘पुरस्कार आधारित तंत्र, Reward based System’ बन गया- मस्तिष्क को एक संतुष्टि का आभास। परन्तु एक बार लक्ष्य प्राप्ति हो जाए और मनुष्य रुक न जाए इसके लिए प्रकृति ने मानव मस्तिष्क को असंतुष्ट बनाया जिससे अनंत इच्छा का जन्म हुआ। सुख के पीछे लगे रहो ताकि प्रकृति का लक्ष्य पूरा होता रहे और हर सुख, मोद अनित्य, क्षणिक।

इस सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने कई परीक्षण भी किये। बंदरों पर प्रयोग हुये जिनमें बंदरों को काम करने पर दिए गए पारितोषिक से मिलने वाले सुख को उनके मस्तिष्क में होने वाले ‘डोपामिन‘ के स्तर में परिवर्तन से नापा गया। इस अध्ययन से इस सिद्धांत की पुष्टि हुई। मनोविज्ञान में इसे ‘हेडोनिक ट्रेडमिल’ भी कहते हैं। हेडोनिक अर्थात सुख विषयक और ट्रेडमिल अर्थात प्रयत्न करते रहना और वहीं का वहीं रह जाना। जीवन में आये अति सुख और दुःख के दिनों के कुछ दिन बाद पुनः सुख के उसी स्तर पर आ जाना। इसे आगे बढ़ाते हुए कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी दिखाया की सुख का स्तर अनुवांशिक होता है।

यह हुआ आधुनिक सिद्धांत – स्वार्थी जीन का दृष्टिकोण।

By Michel wal (Own work) [GFDL or CC BY-SA 3.0], via Wikimedia Commons

यदि हम सदियों पहले जाकर बुद्ध के दर्शन को देखें, संक्षेप में ही नहीं गहराई में उतर कर तो उनकी कही बातों से यही निष्कर्ष मिलता है। चार आर्य सत्य और विकासवादी मनोविज्ञान के इस निष्कर्ष में कितना अंतर है? बुद्ध ने डोपामिन के स्तर की जाँच नहीं की, पर उन्होंने दुःख, दुःख के कारण और इच्छा पर आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व ठीक यही बात कही, स्पष्ट शब्दों में कही। इसके आगे यह भी कहा कि हम साधना से मस्तिष्क को सत्य दिखा सकते हैं – क्रमिक विकास से परे का सच !
ज्ञानी को नीर-क्षीर विवेकी परमहंस कहने की परम्परा कितनी पुरानी है? माया से परे सत्य देखने की बात? क्रमिक विकास की अनवरत असंतुष्टि से परे  – जब मिलिहैं संतोष धन। कितने सुभाषितों में आपने कामना की आग में घी डालने वाला होने की बात पढ़ी है? नेति -नेति। न्याय दर्शन का रस्सी को देख साँप का भ्रम होने का उदाहरण क्या है? बुद्ध कहते हैं कि जीव अनवरत इच्छा (तृष्णा) से ग्रसित है। इच्छा की पूर्ति अस्थायी है। जब हम रोग, वियोग, मृत्यु जैसी बातों से प्रभावित नहीं तब भी हम असंतुष्ट और अपूर्ण रहते हैं – संसार में दुःख है। बुद्ध द्वारा प्रस्तावित निवारण की विधियाँ मस्तिष्क की इस क्रमिक विकास से हुई परिणति से विपरीत उसे उलटी गति में ले जाकर सत्य का आभास कराती हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान और इस सनातन दर्शन में क्या एक ही बात नहीं है? ‘हेडोनिक ट्रेडमिल’ का सिद्धांत पढ़ते हुए आप उसमें कितना नया पाते हैं? ‘जार्गन’ अगल होने के अतिरिक्त!


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

आनन्द, स्त्री आ गई, अब सद्धर्म केवल 500 वर्ष ही रह पायेगा!

चूळ्वग्ग

चूळ्वग्ग

एक बार भगवान बुद्ध शाक्यों के बीच कपिलवस्तु के निग्रोध विहार में बैठे थे। उनके पास महापजापति गोतमी आईं और सम्मानपूर्वक दूरी रखते हुये हुये उन्हों ने बुद्ध के सामने प्रस्ताव रखा – भंते! अच्छा हो कि मातृशक्ति स्त्रियाँ (मातुगामो) भी गृहत्याग कर प्रवज्या ले आप के बताये धम्म और विनय के मार्ग पर चलें।

 बुद्ध ने उत्तर दिया – गोतमी! स्त्रियों की गृहत्याग कर प्रवज्या ले धम्म और विनय के मार्ग में रुचि से सावधान! 
 गोतमी ने तीन बार अनुरोध किया और तीनों बार ऐसा कहते हुये बुद्ध ने इनकार कर दिया। यह जान कर कि बुद्ध स्त्रियों को धम्म के मार्ग पर प्रवेश नहीं देना चाहते, दुःखी गोतमी ने आँसू भरा मुख लिये सिसकते हुये उनकी प्रदक्षिणा की और चली गईं।
 कुछ दिन कपिलवस्तु में ठहरने के पश्चात घूमते हुये बुद्ध वैशाली पहुँचे। वहाँ वे महावन कूटागारशाला में ठहरे। तब गोतमी अपने केश कटा, काषाय वस्त्र धारण कर कई अन्य शाक्य स्त्रियों के साथ वहाँ पहुँचीं। पादाति आने के कारण उनके पाँव सूज गये थे। वे धूल भरी देह लिये दुःखी भाव से सिसकते हुये बाहर द्वार पार खड़ी थीं।
आर्य आनन्द ने उन्हें इस अवस्था में देख पूछा – गोतमी! आप यहाँ दु:ख से भरी रोती हुई क्यों खड़ी हैं? 
चित्राभार: https://what-buddha-said.net/library/DPPN/maha/mahapajapati_gotami.htm
गोतमी ने उत्तर दिया कि भगवान स्त्रियों को गृहत्याग कर प्रवज्या ले धम्म विनय के मार्ग पर आने की अनुमति नहीं दे रहे, इसलिये।
 
आनन्द ने कहा – आप कुछ क्षण यहाँ ठहरिये, मैं भगवान से इस बारे में पूछ आऊँ।
आनन्द बुद्ध के सामने जा खड़े हुये। सारी बात बताई और उन स्त्रियों का हाल सुनाते हुये गोतमी सहित सभी स्त्रियों की धम्म विनय मार्ग पर आने की इच्छा बताई। बुद्ध ने उन्हें भी वही उत्तर दिया। आनन्द ने भी तीन बार पूछा और तीनों बार बुद्ध ने वही उत्तर देते हुये अपना निषेध बनाये रखा।
 
आनन्द ने सोचा कि कोई और युक्ति लगाऊँ और उन्हों ने प्रश्न किया – भगवन्! क्या गृहत्याग कर प्रवज्या ले धम्म और विनय के मार्ग पर चलते हुये स्त्रियाँ सोतापत्तिफल (जीवन प्रवाह?), सकदागामिफल (पुनर्जन्म?) और अनागामिफल (मुक्ति, निर्वाण, आवागमन से मुक्ति?) पाने में समर्थ हैं?
 
बुद्ध ने उत्तर दिया – हाँ आनन्द! स्त्रियाँ ऐसा करते हुये इन फलों की प्राप्ति में समर्थ हैं।
 
आनन्द ने कहा – भगवन्! यदि स्त्रियाँ समर्थ हैं और आप की मौसी महापजापति गोतमी निवेदन ले चल कर आई हैं; जिन्हों ने आप पर बहुत उपकार किये, जो आप की मौसी हैं, आप की माता के असमय ही देहावसान हो जाने पर जिन्हों ने अपना दूध पिला कर आप को पाला पोसा; तो अच्छा हो कि मातृशक्ति स्त्रियाँ (मातुगामो) भी गृहत्याग कर प्रवज्या ले आप के बताये धम्म और विनय के मार्ग पर चलें।
 
बुद्ध ने उत्तर दिया – आनन्द! यदि महापजापति गोतमी आठ गुरुधर्मों (अट्ठगरुधम्मा, आठ महत्त्वपूर्ण नियमों) को स्वीकार करती हैं तो उन्हें उपसम्पदा प्राप्त होगी अर्थात वे दीक्षित होंगी:
 
(1) भले कोई भिक्षुणी शताब्दी भर से विनय के मार्ग पर हो, उसे भिक्षु को आदर देना होगा, उसके आने पर अपना आसन छोड़ खड़ी हो दोनों हाथ जोड़ कर अभिवादन करना होगा, चाहे वह भिक्षु उसी दिन ही क्यों न दीक्षित हुआ हो। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा,  पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(2) भिक्षुणी वर्षाकाल (चातुर्मास) भिक्षुरहित आवास में नहीं बितायेगी। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(3) प्रत्येक अर्द्धमास भिक्षुणी को भिक्षुसंघ से उपासना और उपदेश (उपोसथ, ओवादूपसङ्कमन) के दो अनुशासन पूछने होंगे। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(4) वर्षाकाल बीत जाने पर भिक्षुणी को दोनों (द्वे धम्मा) के सामने ये प्रस्तुत करने होंगे – क्या देखा, क्या सुना और क्या शङ्का की ( दिट्ठेन वा, सुतेन वा, परिसङ्काय वा)। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(5) इन महत्त्वपूर्ण नियमों का उल्लंघन होने पर भिक्षुणी को दोनों संघों के सामने आधे महीने तक अनुशासन हेतु प्रस्तुत होना होगा। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(6) दो वर्षों तक छ: धर्मों के अनुशासन में (प्रशिक्षु की तरह)   रहने के पश्चात भिक्षुणी दोनों संघों से दीक्षा हेतु अनुमति माँगेगी। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(7) भिक्षुणी किसी भिक्षु के लिये तिरस्कार या अपशब्द का प्रयोग कदापि नहीं करेगी। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
(8) आज से भिक्षुणी द्वारा भिक्षु को चेतावनी देने की मनाही है लेकिन भिक्षुओं द्वारा भिक्षुणी को चेतावनी देने की मनाही नहीं है। भिक्षुणी को आजीवन इस अनुशासन को महत्त्व देना होगा, मान देना होगा, पूजना होगा और पालन करना होगा।
 
हे आनन्द! यदि महापजापति गोतमी इन आठ महत्त्वपूर्ण नियमों को स्वीकार करती हैं तो उन्हें गृहत्याग कर प्रवज्या ले धम्म और विनय के मार्ग पर आने की अनुमति है।
 
तब आनन्द ने गोतमी के पास जा कर सब कुछ यथावत कह सुनाया। गोतमी ने उत्तर दिया – हे आर्य आनन्द! जैसे कोमल आयु में ही आभूषण में अभिरुचि रखने वाले युवा स्त्री या पुरुष सिर को धो उस पर कमलपुष्पमाल, मल्लिकामाल और लतामाल धारण करते हैं वैसे ही मैं आजीवन पालन करने हेतु इन आठ महत्त्वपूर्ण नियमों को स्वीकार करती हूँ।
 
आनन्द ने भगवान के पास जा कर यह वृतांत कह सुनाया कि आठो गरुधम्म महापजापति गोतमी ने स्वीकार कर लिये।
चित्राभार: https://what-buddha-said.net/library/DPPN/maha/mahapajapati_gotami.htm
बुद्ध ने (स्वीकार करते हुये) यह कहा:
 
“हे आनन्द! यदि मातुगण स्त्रियों ने गृहत्याग कर प्रवज्या अपना तथागत के बताये धम्म और विनय का मार्ग अङ्गीकार न किया होता तो ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचरियं) चिरजीवी होता, सद्धर्म एक हजार वर्ष तक बना रहता। किंतु हे आनन्द! चूँकि स्त्रियाँ इस मार्ग पर आ गयी हैं इसलिये ब्रह्मचर्य चिरजीवी नहीं होगा और सद्धर्म केवल पाँच सौ वर्षों तक चलेगा।“
 
“हे आनन्द! जैसे वे घर सरलता से बर्तन चोरों और डाकुओं के शिकार हो जाते हैं जिनमें स्त्रियाँ कई हों और पुरुष कम, वैसे ही जिस धम्म और विनय में स्त्रियाँ गृहत्याग कर प्रवज्या ले प्रविष्ट हो जाती हैं वहाँ ब्रह्मचर्य अधिक दिन नहीं बना रहता।“
 
“हे आनन्द! जैसे सेतट्टिका रोग द्वारा धान से भरे पुरे खेत पर आक्रमण से शस्य अधिक दिन नहीं ठहर पाती,  वैसे ही जिस धम्म और विनय में स्त्रियाँ गृहत्याग कर प्रवज्या ले प्रविष्ट हो जाती हैं वहाँ ब्रह्मचर्य अधिक दिन नहीं बना रहता।“
 
“हे आनन्द! जैसे मञ्जिट्ठिका रोग द्वारा ईंख से भरे पुरे खेत पर आक्रमण से शस्य अधिक दिन नहीं ठहर पाती,  वैसे ही जिस धम्म और विनय में स्त्रियाँ गृहत्याग कर प्रवज्या ले प्रविष्ट हो जाती हैं वहाँ ब्रह्मचर्य अधिक दिन नहीं बना रहता।“
 
 “आनन्द! जैसे दूरदर्शी पुरुष तड़ाग से जल के निकास को रोकने के लिये उसके चारो ओर बन्धा बाँध देता है वैसे ही मैंने भिक्षुणियों के लिये ये आठ महत्त्वपूर्ण नियम बनाये हैं जिनका उल्लंघन उन्हें आजीवन नहीं करना है।“
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(विनय पिटक, चूळ्वग्ग, 10 से)
… स्पष्ट है कि बुद्ध स्त्रियों का संघ और धम्म में प्रवेश चाहते ही नहीं थे। आनन्द द्वारा अनुरोध और धाता माँ के अटल आग्रह के कारण उन्हों ने अनुमति दी। दी भी तो भिक्षुणियों के लिये अलग से आठ नियम बनाये जिनका उन्हें कठोरता पूर्वक पालन करना था। भिक्षुओं को अति उच्च स्थान देने के साथ ही उन नियमों के पालन करने पर भी दो वर्ष तक भिक्षुणी को निगरानी में रखने के पश्चात ही औपचारिक दीक्षा मिलनी थी!
 
इतना होने पर भी वे आश्वस्त नहीं थे और विभिन्न उपमाओं द्वारा भविष्यवाणी कर गये कि स्त्रियों के प्रवेश के कारण सद्धर्म की आयु आधी रह जायेगी और वह केवल पाँच सौ वर्ष ही प्रभावी रह पायेगा।
शास्ता की भविष्यवाणी के अनुसार ही चतुर्थ बौद्ध संगीति (ईसा से लगभग एक सदी पहले से ले कर एक सदी पश्चात तक का समय) तक आते आते सद्धर्म ने कई शाखाओं में विभक्त हो अपना प्रभाव खो दिया, बौद्ध विहार और संघ भ्रष्टाचरण और विलासिता के केन्द्र बन गये।