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ऋतूनां कुसुमाकरः!

श्रीमद्भावद्गीतायां श्रीकृष्णस्य मुखारविन्देन निर्गता संदेशोस्ति ऋतूनां कुसुमाकरः, सः स्वयमेव कुसुमाकरः-वसन्तः-ऋतुराजश्च। भारतीय वाङ्ग्मये ऋतूनां वर्णने वसन्त ऋतोः वर्णनं महत्वप्रतिपादनन्च अपेक्षाकृतः अधिकः। वासंतिककालेस्मिन् सर्वत्र प्रकृतेः मनोहारि दर्शनं भवति मन प्रफुल्लित भवतीति। वने-उद्याने-फलारामे सर्वत्र मनोहारि विभिन्न वर्णानां सुन्दराणि पुष्पाणि-फलानि विकसन्ति, तेषां सौन्दर्येण नीरस जनानामपि चित्तं आह्लादयन्ति। क्वचित् पुष्पाणि तेषां सुगन्धेन क्वचित् तेषां मनोहारि स्वरुपेण आकर्षयन्ति जनानाम्। पुष्पैव वृक्षाणां लतानां वा पुनरोत्पदक बीजानां निर्माणं प्रसारपि कुर्वन्ति अतः वसन्तस्य एकः नामः कुसुमाकरः। न केवलं वृक्ष-लता-पुष्प-फल अपितु कोकिला, मयूराः तथा अन्यान्य खगाः कलरवं कुर्वन्ति आनन्देन कूजन्ति च एतस्मिन् काले।
प्रायः प्रत्येक संस्कृत ग्रन्थे ऋतुवर्णनं प्राप्यन्ते, वसन्तेस्मिन किमर्थं संस्कृत कवीनां वसन्तरसं न श्रवणीयम्:
वाल्मीकीये रामायणे किष्किन्धाकाण्डे रामलक्ष्मणौ ऋष्यमूक पर्वत मार्गे स्थित पम्पा सरोवरे वसन्त समये प्राप्तौ। वैदेही रावणेन अपहृता, तर्हि रामः शोकसन्तप्तः जातः। महर्षि वाल्मीकि, शोकातुररामस्य मुखारविन्देन वर्णनं करोति –
सुखानिलोऽयं सौमित्रे कालः प्रचुरमन्मथः।
गन्धवान्सुरभिर्मासो जातपुष्पफलद्रुमः॥ 4.1.10॥
-हे सौमित्र (लक्ष्मण)! अस्मिन् काले मन्मथः प्रचुरः अस्ति (तर्हि) सुखकर्त्री अनिलः वहति। अनिलः पुष्प-फल-वृक्षाणां सगन्धा जाता अस्मिन् सुरभिमासे (वसन्ते)।
पश्य रूपाणि सौमित्रे वनानां पुष्पशालिनाम्।
सृजतां पुष्पवर्षाणि तोयं तोयमुचामिव॥ 4.1.11॥
-हे सौमित्र ! पश्य पुष्पवान वृक्षाः पुष्पवर्षाम् कुर्वन्ति यथा (वर्षाकाले) जलपूर्ण मेघात् जलं वर्षति।
अमी पवनविक्षिप्ता विनदन्तीव पादपाः।
षट्पदैरनुकूजन्तो वनेषु मधुगन्धिषु॥ 4.1.18॥
-एताः वृक्षाः वात-विक्षेपेन गुञ्जन्ति, वने च भ्रमराः मधुगन्धिताः कूजन्ति।
अहा ! कवेः भावचित्रः वसन्तसौन्दर्य वर्णने अद्भुता जाता, परन्तु न केवलं सौन्दर्ये, वसन्त ऋतौ मानव मनोऽपि कामभावेन परिपूर्णः भवति। इयं चर्चायां यदि महाकवि कालिदासस्य चर्चा न भवति इत्यसंभवः। महाकवि अपि वसन्त वर्णने स्त्रीणां सज्जामनोदशाच वर्णयति:
कुसुम्भरागारुणितैर्दुकूलैर्नितम्बबिम्बानि विलासिनीनाम् ।
तन्वंशुकैः कुङ्कुमरागगौरैर्अलङ्क्रियन्ते स्तनमन्डलानि ॥
-कुसुम्भस्य रागेण रक्ता विलासिनीनां नितंबबिम्बानि विलासिनीनां वस्त्रैः कूलन्ति, रक्त्गौर कुङ्कुमकेसर रागेण (विलासनीनां) स्तन्मण्डलस्य अलङ्करणं क्रियन्ते।
स्तनेषु हाराः सितचन्दनार्द्राः भुजेषु सङ्गं वलयाङ्गदानि ।
प्रयान्त्यनङ्गातुरमानसानां नितम्बिनीनां जघनेषु काञ्च्यः॥
-(विलासनीनां) श्वेतचन्दनै आर्द्राः स्तनेषु मुक्ताहाराः, बाहुषु कटककेयूराणि सुशोभिताः। कामभावेन पीडितं तासां नितंबनीनां जङ्घा प्रदेशे काञ्च्यः सङ्गः प्राप्नुवन्ति।
उच्छ्वासयन्त्यः श्लथबन्धनानि गात्राणि कंदर्पसमाकुलानि ।
समीपवर्तिष्वधुना प्रियेषु समुत्सुका एव भवन्ति नार्यः॥
-वसन्तकाले निकतस्थेषु प्रियेषु उत्कण्ठायां, तेषां गात्राणि शिथिलबन्धना जाता, ते कामपीडिता श्वासोच्छ्वासं कुर्वन्ति।
कुन्दैःसविभ्रमवधूहसितावदातैः उद्योतितान्युपवनानि मनोहराणि ।
चित्तं मुनेरपि हरन्ति निवृत्तरागमं प्रागेव रागमलिनानि मनांसि यूनाम्॥
-विभ्रमसहितानि रमणीहास्यानि, मनोहारि उपवनानि, रागेण निवृत्ता जाता मुनेरपि चित्तं अपहरन्ति, तेषां मनान्सि रागेण मलिना भवन्ति।
शृङ्गारशतके भर्तृहरि अपि वदति वसन्तमहिमा-
पान्थस्त्रीविरहानलाहुति कथा मातन्वतीमञ्जरी, माकन्देषु पिकाङ्गनाभिरधुना सोत्कण्ठमालोक्यते।
अप्येते नवपाटलापरिमलप्राग्भारपाटच्चरा, वान्ति क्लान्तिवितानतानवकृताः श्रीखण्डशैलानिलाः॥
-अहो ! वसन्तकालेस्मिन् पथिकानां विरहिणां वियोगाग्निं प्रज्वलिता मञ्जरी, आम्रवृक्षेषु उत्कण्ठापूर्णा कोकिला अवलोक्यति। मलयाचल पवन नवीन पलाश पुष्पगन्ध सहिता मार्गश्श्रमः हरति।
वृहद्संस्कृतवाङ्ग्मये ऋतुराजवसन्तप्रयोगाः प्रचुराः, तेन पठने-पाठने कामोद्दीपनं जायते अतः सावधानतया सुस्थिर मनसा तेषु पठनीयम् 🙂 यद्यपि ‘श्रीर्हरति मुनेरपि मानसं वसन्तः’।
विकसितसहकारभारहारिपरिमलपुञ्जितगुञ्जित द्विरेफ:।
नवकिसलयचारुचामरश्रीर्हरति मुनेरपि मानसं वसन्तः॥



लेखक: अलंकार शर्मा

शिक्षा: गणित स्नातक, स्नातकोत्तर कंप्यूटर विज्ञान,
आचार्य – फलित ज्योतिष

संयोजन: पं. बैजनाथ शर्मा प्राच्य विद्या शोध संस्थान का कार्यभार
सम्पादक: प्राच्य मञ्जूषा

आया बसन्त, अब मत सो

आया बसन्त ,
जागो प्यारे! जाड़े का शैथिल्य छोड़ो। सुनो! पूर्णिमा नक्षत्र के बहाने कोई बसन्त की प्रस्तावना पढ़ रहा है!

छोड़ खिन्नता खिला शिरीष

हिमाद्रेः संभूता सुललित करैः पल्लवयुता
सुपुष्पामुक्ताभिः भ्रमरकलिता चालकभरैः
कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्ति सरसा
रुजां हन्त्री गंत्री विलसति चिदानन्द लतिका।
~आचार्य शङ्कर 

अभी नयनोन्मीलन नहीं हुआ है। मैं निद्रालस ही पड़ा हूँ। दिशायें तिमिरांक लीला हैं। चतुर्दिक विशद शान्ति वितान तना है। सहसा एक कङ्कण की झंकृति सुनता हूँ। उनींदे लोचन-पलक को रात्रि-सूक्त का छंद गुनगुनाते हुये कोई हथेली सहलाने लगती है:

निरुस्वसारमस्कृतोषसं देव्यायती। अपेदु हासते तमः।“
(यह चिच्छक्ति रूपा रात्रि देवी आकर अपनी बहिन ब्रह्मविद्यामयी उषा देवी को प्रकट कर देती हैं जिससे अविद्यामय अंधकार विनष्ट हो जाता है।)

देखता हूँ एक आकृति! सुन्दर! सुवृतारविन्दसुरभितायतशरीरा! अनबोले अधर जैसे कह रहे हों – ’जाग तुमको दूर जाना।’ उसकी मृणालदलमृदुला अङ्गुलि में एक मानचित्र झूल रहा है। सुधावर्षिणी वाणी के प्रबोधन से बलात् उठ बैठ जाता हूँ।  वह वत्सला प्रतिमूर्ति अपलक दृष्टि से निहार रही है! मैं स्वर सुनने लगता हूँ:

“देख! देख, इस मानचित्र को! भारत को पृथ्वी के इस मानचित्र पर ठीक से देख। यह ऐसा ही दीखता है जैसे हमारे शरीर में तीन लोकों का आभास। उसका स्थान वही है जो हमारे शरीर में हृदय का स्थापित स्थान, विष्णु का निवास स्थान बताया गया है। यह विशाल, विलक्षण भारत है। ज्ञान-विज्ञान से परिपूर्ण भारत है। अतुल्य निधि है यह तुम्हारी। अपने धन से धनवान बनो। कैसे सोने वाले बेसुध बटोही बने हो कि अपने लुट जाने का ज्ञान ही नहीं है! अपने पास रहना सीखो! तुम्हारा चिन्तन-मनन, सोच-विचार, ज्ञान, बुद्धि, विवेक-विचार, मनन का परिणाम तुम्हारे साथ लग जाता है। अपनी अद्भुत भारतीयता की वास्तविक निधि, धन सँजो लो। यह एक हल्की सी हिचकी भी लेती है तो कहीं डुबकी लग जाती है जहाँ कालहीन, दिशाहीन शान्ति का अखण्ड साम्राज्य है।“

मुझे प्रतीति हो रही है-भारतीयता अमृत मंत्र है। विषम स्थिति होने पर भी मर नहीं रहे हैं। मरने नहीं पायेंगे। किसी न किसी रीति से पार उतरेंगे। यह  न मेरे राष्ट्र के नायक समझ पायेंगे न स्यात मैं ही। मुझे जैसे इस दिव्य आकृति का संकल्प दिख रहा है यह, और शायद यह संकल्प ही हमारा प्रारब्ध है।  उसके लिए जीवन बनायें, उसकी सृष्टि समझें। उसका राष्ट्र समझें, उसका विश्व समझें। इस तरह हम अपना प्रकाश करें, साथ ही साथ हमारा आध्यात्मिक प्रकाश भी हो जायेगा।

मैं सुन रहा हूँ। उसकी पीयूषवर्षिणी गिरा की इतनी मार्मिक पीर कि सिहरन विदा होने का नाम ही नहीं लेती है। चिबुक पर गौर मृदुल हथेली रखे प्रबोधन की रस निर्झरिणी में डूबती-डुबाती वाणी संचरण कर रही है:

“मैं चिदानन्दमयी चिन्मय लतिका अपने विलास में ’जागते रहो-जागते रहो” की दुंदुभि बजा रही हूँ। इस मन से ऊपर उठकर अपने परमभाव परमात्मा की ओर चरणन्यास कब करोगे? देह ही माया है। इस द्वैताभास से परे ब्रह्माण्ड की यात्रा में तुम्हारी उंगली थामे पकड़ कर ले चलूँगी। मैं भारतीयता की पावसी बेला हूँ। तुम्हारी सुसुप्ति में इस स्वर्ण विहंगम के पंख नोचने वालों की विशाल वाहिनी तैयार है। जागो! ’परम प्रत्यक्ष’ तुमको भेंटने के लिए बाहें पसारे खड़ा है।“

“देखो, निर्भ्रान्त अवस्था से अध्यात्म प्रसाद-’आत्म-ज्योति’ मिलती है, जिसका नाम ’ऋतम्भरा प्रज्ञा’ है। इस प्रज्ञा की विशेषता उद्घाटित करते व्यास देव फूट पड़े हैं- अन्वर्थ सा, सत्यमेव विभर्ति तत्र विपर्यासगन्धोऽप्यस्तीति इससे ’विवेक ख्याति’ प्रकट होती है। थोड़ा और आगे ’स्थितप्रज्ञ’ अवस्था है। इसी अवस्था में भागवत प्रसाद रूप ’धर्म’ का साक्षात्कार होता है। यह परम वैराग्य की ’धर्म मेघ’ की स्थिति है। यही मघा है- “बरसै मघा झकोरि-झकोरि।“ इसी रिमझिम में भीगो। मघा की पूर्वा ’आश्लेषा’ की एक बाहु तथा परवर्ती ’पूर्वा फाल्गुनी’ की अपरा रसवन्ती विह्वल बाहु तुम्हें आलिंगनबद्ध करने को आतुर है। ’मघा’ यों ही मघा नहीं है। इसके रस में भींगो। ’मघा’ का विपरीत जो ’घाम’ है उसमें तपो। निहारो, निहारो। मेरा कहा अनसुना मत करो। मुझे मेरी आँख से देखो!“

“क्षपां क्षामीकृत्य प्रसभमपहृत्याम्बु सरितां
प्रताप्योर्वीं कृत्स्नां तरुगहनमुच्छोस्य सकलम्।
क्वसम्प्रत्युष्णांशुर्गत इति समालोकन परा-
स्तडिद्दीपालोका दिशि दिशि चरन्तीह जलदा:॥“

’मघा की छटा छायी हुई है। प्रत्येक दिशा में जलद घिर आये हैं। विद्युत भी इन मेघों में कौंध जाती है। ये परम उपकारी बादल, जो न्याय की जीती हुई मूर्ति हैं, विद्युत रूपी दीपक के प्रकाश में चारों ओर घूम रहे हैं। भला इनके घूमने का उचित कारण क्या हो सकता है? अरे, ये तीक्ष्ण किरण वाले अपराधी सूर्य की खोज में इधर-उधर घूम रहे हैं। उसने रातों को पतली बना डाला है, नदियों का नीर चुरा डाला है। समग्र विस्तीर्ण पृथ्वी को तपा डाला है, वृक्ष-समूह को तपा डाला है। इन अपराधों को करने के बाद न जाने किस दिशा मे वह अपराधी छिपा हुआ है! इसीलिए न्यायप्रिय ये बादल – ये ’मघा’ के मर्मस्पर्शी पयोधर उस तिग्मांशु की खोज में चारों ओर घूम रहे हैं। ’मघा’ के मेघ का मातृत्व उसे डुबा कर ही छोड़ेगा- ’मानहु मघा मेघ झरि लाई।“

 “एक बात और स्मरण रखो। ’मघा’ है वत्सला मतारी। ’मघा’ का मातृत्व फलित होता है शरद के शालि क्षेत्र में। ’मघा’ है मनोहर घाट’- “मज्जहिं जहाँ वर्ण चारिउ नर”, शरद-शिशिर का ’निर्मल नीर’ मघा की ही प्रदत्त जीवन-सम्पदा है। “संत हृदय जस निर्मल बारी”। मघा-सृजित मानस सर में शारदीय मरालिनी क्रीड़ा कल्लोल करती है। ’मघा’ के मेघ साद्रानन्द पयोद हैं”। चोट मत पहुँचाओ-यही उसका दुंदुभिनाद है। भगोड़े सूर्य को भी सुख देने की आनन्दिनी विधा इसी ने रच दी। रजनी रूपी प्रिया ने उसे गाढ़ालिंगन में लेकर सुला दिया। अतः वह दिनमणि लेटा हुआ है। तब भला हेमंत की रात बड़ी क्यों न हो!

“स्वपति पुनरुदेतुं सालसांगस्तु तस्मात्
किमु न भवतु दीर्घा हैमिनी यामनीयम्।

यह मघा का ही मार्द्रव है जो गुदगुदाता तो है पर घायल नहीं करता। ’मघा’ में ’घात’ नहीं है। वहाँ तो अद्भुत रस निष्पत्ति का रसायन है। भाव, विभाव, अनुभाव-ये हैं शरद, शिशिर, हेमंत, तब संचारी भाव का वसंत, फिर तो ऋतुपति रूपी रस निष्पत्ति। यह मघा का ही कमाल है-’भावानुभावसंचारीभावसंयोगात् रसनिष्पत्ति। निरंतर प्रवहमान रस की जन्मदात्री ’मघा’।“

“वसंत के मलय पवनान्दोलित जल में लीलारविन्द से क्रीड़ा करती वही चिदानन्द लतिका है ’मघा’ जिसके स्मरण रस में शंकराचार्य डूब गये:

“वसन्ते सानन्दे कुसमितलताभिः परिवृते
स्फुरन्नानापद्मे सरसि कलहंसालिसुभगे।
सखीभिः खेलन्तीं मलयपवनान्दोलित जले
स्मरेद्यस्त्वां तस्य ज्वरजनित पीड़ापसरति॥“

प्रफुल्ल प्रकृति की गोद है। लतायें पुष्पवती हैं। राशि-राशि विविधवर्णी सुमनों के परिमल की सुगंध से दिशायें महामोदमय हैं। कलहंस क्रीड़ा-कल्लोल निरत हैं। ऐसे प्रफुल्ल प्रांगण में मलयपवनान्दोलित सरोवर शोभायमान है। उसमें सखियों के साथ खेल रही है वह पराम्बा चिदानन्दलतिका। इस मधुमय विलासयुता का स्मरण करने वाला ज्वरजनित पीड़ा से मुक्त हो जाता है। और सबसे बड़ा ज्वर क्या है-’काम ज्वर, यौवन ज्वर’। इस लीला विलास की स्मृति से ही काम-ज्वर विनष्ट हो जाता है। मद मत्सर, मान, मोह का घालन करने वाली लीलालावण्य संयुक्ता शक्ति है ’मघा’। “

“एक बात और स्मरण करा दूँ। यह ’मघा’ वह प्रसवपीड़ा है जो फाल्गुन से पुत्रवती हुई है। वह ऐसी रंग-सर्जनी नहीं है जो फाग की नोंक-झोंक, धमा-चौकड़ी, चोट-चपेट, भंग-तरंग झेलती हुई मदालसा बनी हो। वह विरल अनुरागवती है। उदाहरण तो है ही:

“या अनुराग की फाग लखो जहाँ राजत राग किशोरी किशोरी
त्यों पद्माकर घालि घनी रहि तैसइ राखी अबोर की झोरी।
नेक न काहु छुई पिचकी कर काहु न केसर रंग में बोरी
गोरी के रंग में भींजि गे सावरो सावरे के रँग भींजिगी गोरी॥“

ऐसा ही महामोदमय अनुग्र-संपुटित जीवन पाथेय सम्हाले निकल चलो। किसी का मर्दन नहीं, किसी का घर्षण नहीं, किसी का अपनय नहीं। किसी को चोट नहीं पहुँचे, यही है ’मघा’ का मन। पावसी पीर और वासंती वैभव का युगपत समीकरण सिद्ध है यहाँ। गुणमयी चिन्मयी लतिका ’मघा’! बलिहारी है, बलिहारी है।“

… बीता पावस, बीता जाड़। आयी माघ पूनम, आया बसंत, द्वार पर।


लेखक: हिमांशु कुमारपाण्डेय
शिक्षक
ब्लॉग: http://blog.ramyantar.com/