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भारतीय कृषि, कोई है खेवनहार?

इस शताब्दी के तीसरे चौथे दशक में भारतीय कृषि के सामने विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या का पेट भरने की चुनौती होगी। चुनौती का अर्थ मात्रा और गुणवत्ता दोनों से है जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य से जुड़ते हैं। वास्तविकता यह है कि जितना ध्यान अन्य क्षेत्रों पर है उसका अल्पतम भी इस क्षेत्र पर नहीं है। कृषि और किसान दोनों चिंता और चिंतन के क्षेत्र से बाहर मेड़ पर बैठे बिलबिलाते नौटंकी देख रहे हैं, एक ऐसी नौटंकी जिसमें उनकी युवा संतति विदूषक की भूमिका भी नहीं रखती। वह एक तरह से दास है, नागर जन की बँधुवा।

कृषि की समस्या को दो बड़े बिन्दुओं में समेटा जा सकता है। वे हैं – जड़ता और उचित मूल्य। खेती के व्यापक परिदृश्य के लिये जड़ता से अधिक उपयुक्त शब्द नहीं है। जड़ से कटे और प्रचण्ड स्वार्थी अंग्रेजीदाँ नीति नियामक इसे inertia, status quo या ऐसे ही कुछ भारी भरकम आयातित शब्दों में अनुवाद कर समझते हैं। भारतीय कृषि की समस्या अनुवाद की समस्या है, उस अनुवाद की है जिसकी शब्दावली हवा हवाई, कहीं से बह कर चली आ रही है। वह वह पछुवा है जो सब कुछ सुखा देने में लगी है, कहीं और से कूड़ा ला कर सब कुछ आरोपित कर किसान को जड़ से उखाड़ने में लगी है। समय समय पर ऋण माफी जैसे टुकड़े फेंक वह जड़ता को बनाये रखती है क्यों कि वे टुकड़े भविष्य के बारे में उसकी अन्धता को क्षणिक उल्लास में आँखें मींच भुलाने में किसान की सहायता करते हैं। चिंता से मुक्त हो वह भी उन जैसा ही हो जाता है – कल किसने देखा?

किसान का अर्थ गाँव है। स्मार्ट सिटी हों या चौड़े द्रुतसह्य राजमार्ग, इनके पीछे जो आँधी लगी हुई है वह अपनी इस धारणा में ‘निर्विवाद’ है कि प्रगति तीव्र नगरीकरण से ही सम्भव है और नगरीकरण का अर्थ है, कृषि पर निर्भर जन की संख्या घटाना। उसके पास घटी हुई संख्या के लिये श्रमिक का काम है जो कि नाली साफ करने, कुत्ते घुमाने से ले कर चौकीदारी तक कुछ भी हो सकता है। इसके प्रवक्ता इसे रोजगार सृजन कहते अपनी बासमती प्लेट के बारे में निश्चिंत रहते हैं किंतु उनकी आगामी पीढ़ी के लिये ऐसा कतई जारी नहीं रहना।  आसन्न संकट सबके लिये हैं।

कृषि को ले कर जड़ता लोकतंत्र के हर स्तम्भ में है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की प्राथमिकता में ऊँचे स्थान पर कृषि तो है ही नहीं, चौथा स्तम्भ कही जाने वाली मीडिया तो पूरी तरह से नागर कचरे के प्रसंस्करण और पुनर्संस्करण में लगी हुयी है, कुछ कहना बेकार होगा। देखें तो किसी भी क्रांतिकारी और दूरगामी योजना की कुञ्जी कार्यपालिका के पास होती है। कार्यपालिका एजेण्डा तय करती है, प्राथमिकतायें सुनिश्चित करती है और तदनुसार विधायी प्राविधान के लिये आगे बढ़ गति देती है। संसाधनों को देखें तो न्यायपालिका भी बहुत कुछ कार्यपालिका पर ही निर्भर है। इन तीनों का कृषि पर रुख क्या है, निम्न प्रश्न स्पष्ट कर देंगे:

  • गाँवों में आधारभूत सुविधाओं जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और पेय जल आदि की क्या स्थिति है?
  • कृषि से जुड़े कुटीर उद्योगों की क्या स्थिति है?
  • दुग्ध उत्पादन और प्रसंस्करण की सुविधायें हैं या नहीं? यदि हैं तो पर्याप्त हैं कि नहीं?
  • विभिन्न योजनाओं में आते धन का समुचित और प्रभावी उपयोग कैसे हो रहा है?
  • ग्राम स्वराज के नाम पर जमीनी स्तर पर कितना काम हुआ? उसका लेखा जोखा?
  • गाँवों में ही रोजगार सृजन हेतु दीर्घजीवी और प्रभावी तंत्र है या नहीं?
  • न्यायालयों में लम्बित कुल मुकदमों का कितना प्रतिशत ग्रामीण है? उनकी औसत आयु क्या है? उनमें कितने मूल्यवान ‘मानव घण्टे’ बरबाद होते हैं? उनमें कितने धन का अपव्यय होता है? वह धन कहाँ जाता है?

ये प्रश्न शाखा दर शाखा निकलते जायेंगे और सभी के उत्तर में एक बात तलछट की तरह बैठ जायेगी – गाँव, कृषि और किसान प्राथमिकता में नहीं हैं। प्रभु वर्ग के लिये ये सभी घृणित और पिछड़े विषय हैं। तंत्र ऐसा है कि गाँव से निकले अधिकारी भी नगरीय चकाचौंध में दोनों हाथ, चौबीस घण्टे धनदोहन में व्यस्त हैं। ऐसे में ऋणमाफी की सकल ग्रामीण ऋण या स्वास्ध्य मद में सरकारी व्यय से तुलना सतही है क्योंकि तदर्थ व्यवस्था के तर्क वाग्जाल भर होते हैं। गाँव वाला समझ चुका है कि हजारो करोड़ उसके यहाँ कभी ‘निवेश’ नहीं किये जायेंगे तो हर पाँचेक बरस पर चुनावी चबेना खा लेने में हर्ज ही क्या है? कुछ तो मिल जाता है!

एक बड़ी संख्या ऐसे ‘किसानों’ की भी है जो भूमि के स्वामी तो हैं किंतु स्वयं खेती नहीं करते। यह तर्क दिया जाता है कि कृषि  द्वारा धनोत्पादन कम होने का एक बड़ा कारण यह भी है। यह तर्क परोक्ष रूप से उस ढंग का ही समर्थन करता है जो कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की पूर्ण उपेक्षा करता है – गाँव के हैं तो गाँव में रहिये, न अस्पताल होंगे, न विद्यालय और न पानी। जीवन गुजारिये जैसे हम चाहें, आप को बाहर आने का कोई अधिकार नहीं है! जो श्रमिक या जो उद्योगी टाउन और नगर में भाग कर बहुत कुछ कर पा रहा है, उसे गाँवों में अनुकूल वातावरण मिले तो नगर की ओर क्यों भागे? अपनी मिट्टी छोड़ना किसे अच्छा लगता है? वास्तविकता यह है कि यदि गाँवों में सुविधायें हो गईं तो नगर में जायेगा कौन? आधुनिक नगर किसके बल पर चलेंगे? झुग्गी झोपड़ी आधारित जो तंत्र विकसित हो पूरी गति से बिना सोचे समझे चलायमान है , उसके लिये ये प्रश्न बहुत असुविधाजनक ही नहीं, उसके पूरे औचित्य को ही ध्वस्त करने वाले हैं।

हमने सुविधाओं के द्वीप विकसित किये हैं और सड़ाँध मारते पानी में तैरते, नाव खेते, डूबते उतराते गँवई उनकी ओर भागे चले आ रहे हैं। काँच की भित्तियों से घिरे वायु शीतित कार्यालयों से उनकी ओर ताकना तक आँखें मैली कर देता है। कार्यालय, कार और घर तक की यात्रा ऐसी होती है जैसे कुकून घूम रहा हो और उसे बाहर आने में समस्या ही समस्या है। टाउन स्तर का बीडीओ तक जीप ले गाँव का दौरा नहीं करता। कार्यालय पर ही खानापूरी कर आँकड़े बढ़ा देता है कि इतने कृषक सत्र हुये, इतने लोग आये और इतना ज्ञान बँटा। धान पिसान की उसे भी नहीं पड़ी!

उन्नत बीज, तकनीकी आदि आदि आयोगों की पुस्तकों और रिपोर्टों तक सीमित हैं। सहज बुद्धि से अपने अनुभव के आधार पर दिन गिनते किसान तो फसल चक्र या रोटेशन तक नहीं अपना पा रहे, ‘रिस्क’ बहुत हैं और उबारने वाला कोई नहीं! एक सरल सा उदाहरण नीलगायों का है जिनके कारण जाने कितने हेक्टेयर भूमि पर दलहन तिलहन बोया ही नहीं जाता और यह ‘प्रगति’ पिछले बीस वर्षों की ही है, पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। किसी कृषि विकास अधिकारी (यदि ऐसा कुछ हो तो) से पूछ कर देखियेगा कि तंत्र इस समस्या के निवारण हेतु क्या कर रहा है? उत्तर खासा मनोरञ्जक होगा। पहली हरित क्रांति तो गेहूँ को उभार सफल कहलाई, आगे वाली को जाने कितनी फसलों को उभारना होगा। तंत्र तैयार है, सोच भी रहा है?

कृषि उपज का उचित मूल्य एक ऐसा मुद्दा है जो ढंग से उभर जाये तो समूचे ‘झुग्गियान अर्थतंत्र’ की चूलें हिला दे। गेहूँ और आटे के मूल्य के बीच का अंतर हो, खेत में सब्जी और मण्डी में उसकी दर का भेद हो या गन्ने और शक्कर के बीच का; बिचौलियों द्वारा उगाही पर स्थापित और फलती फूलती यह नयी ‘महाजनी व्यवस्था’ शोषण पर आधारित है।

 ऊपर जो चार स्तम्भ गिनाये गये हैं, उनकी गढ़न को यह मुद्दा दिखता भी है? दिखने की छोड़िये, लगता भी है। वेतन और व्यवसाय आधारित नागर जन के लिये तो ‘खरीद भाव’ ही महत्त्वपूर्ण हैं, वे तो बिचौलियों के ‘कट’ के बारे में सोचते तक नहीं! वे शोषण तंत्र के कवच हैं क्योंकि मूल्यों में वृद्धि को बिचौलिये नहीं, उपभोक्ता के रूप में वे सहते हैं। सब्जियों या जिंसों की महँगाई को ले वे सबसे अधिक रोते कलपते हैं। जीवन की गुणवत्ता तो केवल राशन की बचत से ही निर्धारित होती है न!

एक बहुत ही सोची समझी, प्रभावी और विनाशक दुरभिसन्धि कृषि उत्पादों के मूल्य को ले कर स्थापित है। उसे तोड़ने के समय समय पर नाटक भर किये जाते रहे हैं, गम्भीर कोई नहीं। गम्भीरता इसलिये नहीं है क्योंकि कोई तात्कालिक खतरा दिख नहीं रहा और ‘विकास’ कुलाँचे भर रहा है।

राजमार्ग बन जायेंगे, छोटे से छोटे नगर के भी अपने विमानपत्तन होंगे, स्मार्ट नगर होंगे, देश की अर्थव्यवस्था सेवाओं और औद्योगिक उत्पादनों पर आधारित होगी, हर नगर-महानगर के अपने घेट्टो, अपने ‘धारावी’ होंगे और एक दिन कभी यह फूलता गुब्बारा फूटा तो जो होंगे उनके हाथ हवा और मुँह में रक्त होगा।

हमें क्या? ‘चिरस्थायी, दीर्घकालिक और टिकाऊ’ शब्दों के खेल तो रोटी दे ही रहे हैं। किसानों का क्या? वे तो बस ऐसे ही रहे हैं और रहेंगे। परिकल्पना अच्छी है। ईश्वर किसानी को ऐसे ही बनाये रखे, पेट पुजाता रहेगा।