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शून्य – 4

शून्य – 1, शून्य – 2 , शून्य – 3 से आगे …

भास्कराचार्य (भास्कर द्वितीय) ने बीजगणितम् और लीलावती में शून्य को नए सिरे से परिभाषित किया। शून्य से भाग देने पर शून्य ही बचता है को संशोधित कर उन्होंने कहा कि किसी भी अंक को शून्य से भाग देने पर खहर (शून्य हर वाली संख्या या शून्य हर वाला भिन्न) बचता है – खहरो भवेत् खेन भक्तश्च राशिः। शून्य को पूरी तरह एक अंक के रूप में मान्यता भास्कराचार्य के द्वारा ही मिली। अंक प्रणाली में उन्होंने पहली बार शून्य के साथ साथ अनंत को भी सम्मिलित किया। दर्शन में वर्णित होने पर भी गणित में इससे पहले अनन्त की परिकल्पना नहीं मिलती। शून्य की यात्रा में हमने देखा कि कैसे भारतीय दर्शन से होता हुआ शून्य गणित में अवतरित हुआ।  उसी तरह खहर के लिए भास्कराचार्य लिखते हैं: 

अस्मिन् विकारः खहरे न राशावपि प्रविष्टेष्वपि निःसृतेषु।
बहुष्वपि स्याल्लयसृष्टिकालेऽनन्तेऽच्युते भूतगणेषु यद्वत्॥

अर्थात जिस प्रकार अनन्त अच्युत ब्रह्म में सृष्टि और प्रलय के समय बहुत से जीवों का प्रवेश होने या निकल जाने से उस ब्रह्म में कोई परिवर्तन (विकार) नहीं होता उसी प्रकार खहर  में कोई भी संख्या जोड़ी या घटाई जाय उसमें परिवर्तन नहीं होता। 

यदि आपने संस्कृत के श्लोक और सुभाषित पढ़े हैं तो यह श्लोक आपको अलग अलग रूपों में कई बार दिखा होगा। भास्कराचार्य ने बीजगणित की रचना लगभग 1150 ई. में की पर इस श्लोक की जड़ें ईशोपनिषद्  के ‘ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥’ से आती है। यह उस प्राचीन दर्शन का ही गणितीय रूप है। वही श्लोक, वही रहस्य, सन्दर्भ – गणित। अपने पूर्ववर्ती गणितज्ञों की ही भांति भास्कराचार्य के गणित में धर्म, ज्योतिष, खगोल और दर्शन अंतर्मिश्रित हैं। बीजगणितं का पहला श्लोक किसी ग्रन्थ का मंगलाचरण ही तो है! 

शून्य और उससे विभाजन को लीलावती में परिभाषित करते हुए भास्कराचार्य ने लिखा कि अगर किसी अंक को शून्य से गुणा किया जाय तो वो शून्य हो जाता है पर… अगर इसके अलावा आगे और गणितीय प्रक्रिया करनी हो तो उस शेष प्रक्रिया पूरी करने के पहले इसे शून्य नहीं करना चाहिये। 

योगे खं क्षेपसमं वर्गादौ खं खभाजितो राशिः। खहरः स्यात् खगुणः खं खगुणश्चिन्त्यश्च शेषविधौ।
शून्ये गुणके जाते खं हारश्चेत् पुनस्तदा राशिः। अविकृत एव ज्ञेयस्तथैव खेनोनितश्च युतः।

यहाँ वह लिखते हैं कि जैसे किसी संख्या को यदि शून्य से गुणा भी किया जाय और विभाजित भी तो वह संख्या अपरिवर्तित रहती है, आधुनिक गणित से यह त्रुटिपूर्ण और अपरिभाषित लगती है पर सूक्ष्म तरीके से देखें तो भास्कराचार्य यहाँ शून्य से विभाजन की प्रक्रिया से जुड़ी एक बीजगणितीय संरचना को परिभाषित करते दिखते हैं। यहाँ वह अत्यंत सूक्ष्म (इनफाइनाइटेसिमल) का ज्ञान देते हैं मानो वह आधुनिक गणित के ‘लिमिट’ को परिभाषित करते करते रह जाते हैं। शून्य से गुणा और भाग के स्थान पर यदि शून्य के समीपवर्ती अत्यंत सूक्ष्म संख्या से गुणा और भाग कह दें तो यही प्रक्रिया और सिद्धांत आगे चल कर ‘लिमिट’ बना अर्थात आगे और गणितीय प्रक्रिया करनी हो तो उसे शेष विधि के पहले शून्य नहीं करना चाहिये। 

लीलावती, बीजगणित और अनंत की चर्चा करने पर हम शून्य से भटक जायेंगे पर शून्य और अनंत को अंक प्रणाली में सम्मिलित करने और बीजगणितीय संरचनाओं के अतिरिक्त  भी भास्कराचार्य का सिद्धांत-शिरोमणि (लीलावती, बीजगणित, गोलाध्याय और ग्रहगणित) गणित का अद्भुत ग्रंथ है, आज भी। संभवतः उनकी गणितीय रचना  से अधिक टीकायें और अनुवाद गणित के किसी पुस्तक की नहीं हुईं। यह रचना भारतीय शिक्षा पद्धति में किस तरह बसी होगी इसका अनुमान मैं इस बात से लगाता हूँ कि भास्कराचार्य के लगभग ८५० वर्ष पश्चात मुझे किसी ने गणित सिखाते हुए कहा था कि ‘मैं जो सिखाऊंगा वह चक्रवाल गणित है। इससे कोई सवाल बन जायेगा लेकिन परीक्षा में ऐसे मत लिखना।’ उस घटना के वर्षों पश्चात पता चला कि चकवाली विधि सच में एक गणितीय विधि है जिसके प्रणेता भास्कराचार्य थे। 

भारतीय गणित की यह विलक्षण परंपरा ख़त्म नहीं हुई है। पिछली सदी के महानतम और रहस्यमय गणितज्ञ रामानुजन भी इसी ब्रह्म दर्शन वाली विलक्षण परंपरा के वाहक थे। कैसे अद्वैत, निर्गुण ब्रह्म और शून्य की कल्पना ‘द मैन हु न्यू इनफिनिटी ‘ ने की वह याद करते हुए प्रसिद्ध सांख्यिकीविद प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस ने लिखा: 

He was eager to work out a theory of reality which would be based on the fundamental concepts of zero, infinity and the set of finite numbers. I used to follow in a general way but I never clearly understood what he had in mind. He sometimes spoke of zero as the symbol of the absolute (Nirguna-Brahmam) of the extreme monistic school of Hindu philosophy, that is, the reality to which no qualities can be attributed, which cannot be defined or described by words, and which is completely beyond the reach of the human mind.

According to Ramanujan, the appropriate symbol was the number zero, which is the absolute negation of all attributes. He looked on the number infinity as the totality of all possibilities, which was capable of becoming manifest in reality and which was inexhaustible. According to Ramanujan, the product of infinity and zero would supply the whole set of finite numbers. Each act of creation, as far as I could understand, could be symbolized as a particular product of infinity and zero, and from each such product would emerge a particular individual of which the appropriate symbol was a particular finite number. I have put down what I remember of his views. I do not know the exact implication. He seemed to have been perhaps emotionally more interested in his philosophical ideas than in his mathematical work. He spoke with such enthusiasm about the philosophical questions that sometimes I felt he would have been better pleased to have succeeded in establishing his philosophical theories than in supplying rigorous proofs of his mathematical conjectures.


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

शून्य – 3

शून्य – 1, शून्य – 2 से आगे …

‘शून्य’ की प्रथम स्पष्ट गणितीय परिभाषा ब्रह्मगुप्त (628 ई.) के ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में मिलती है। यह वह युग था जब अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति वेदांग ज्योतिष से अलग गणित के रूप में लगभग स्वतंत्र पहचान बना चुके थे। आर्यभटीय ज्योतिष का पहला ग्रन्थ है जिसमें गणित के लिए एक स्वतंत्र अध्याय है। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त गणित की एक कालजयी रचना है। इस पुस्तक में गणित के कई सिद्धांत हैं और इसके अरबी अनुवाद ने विश्व में गणित को एक नयी दिशा दी. उस युग की परंपरा के अनुसार गणित की पुस्तक होते हुए भी यह पूरी तरह काव्य रूप में थी। कुट्टकाध्यायः (बीजगणित) नामक अठारहवें अध्याय में शून्य से जुडी छः प्रक्रियाओं का उल्लेख है:

धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम्। ऋणमैक्यं च घनमृणधनशून्ययोः शून्ययोः शून्यम्॥
ऊनमधिकात्विशोध्यं धनं धनातृणमृणातधिकमूनात्। व्यस्तं तद्-अन्तरं स्यातृणं धनं धनमृणं भवति॥

शून्य-विहीनमृणमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम्। शोध्यं यदा धनमृणातृणं धनात्वा तदा क्षेप्यम्॥
ऋणमृणधनयोर्घातो  धनमृणयोर्धनवधो  धनं भवति। शून्यर्णयो: खधनयो: खशून्ययोर्वा वध: शून्यम्॥
धनभक्तं धनमृणहृतमृणं धनं भवति खम् खभक्तम् खम्। भक्तमृणेन धनमृणं धनेन हृतमृणमृणं भवति॥
खोद्धृतमृणं धनं वा तच्छेदम् खमृणधनविभक्तं वा। ऋणधनयोर्वर्ग: स्वम् खम् खस्य पदं कृतिर्यत् तत्॥

अर्थात समान धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं का योग शून्य होता है। (यहाँ खम्, शून्य और आकाश तीनों शब्दों का ब्रह्मगुप्त ने प्रयोग किया)। ऋणात्मक संख्या का शून्य से योग ऋणात्मक होता है।  शून्य और धनात्मक का योग धनात्मक होता है। दो शून्य का योग शून्य ही होता है। ऋणात्मक संख्या को शून्य से घटाया जाय तो वह धनात्मक हो जाती है और धनात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर ऋणात्मक। यदि ऋणात्मक संख्या में से शून्य घटाया जाय तो वह ऋणात्मक ही रहती है। उसी प्रकार धनात्मक संख्या में से शून्य घटा देने से वह धनात्मक ही रहती है। शून्य में से शून्य घटा देने से शून्य ही बचता है। शून्य का धनात्मक संख्या, ऋणात्मक और शून्य सबसे गुणनफल शून्य ही होता है। शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य बचता है। किसी भी ऋणात्मक या धनात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर तच्छेद।

यहाँ शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य बचने और शून्य के विभाजन के तच्छेद होने की बात को छोड़कर आज भी शून्य वैसे का वैसा ही है। ब्रह्मगुप्त की परिभाषा आधुनिक गणितीय परिभाषा है। 0/0 की परिकल्पना तो ब्रह्मगुप्त ने की परन्तु उसकी सही व्याख्या उन्होंने नहीं की, उन्होंने इसे भी शून्य ही कहा। इसी तरह शून्य से विभाजन को उन्होंने तच्छेद नाम दिया पर इसकी प्रकृति के बारे में कुछ नहीं कहा, यह शून्य से विभाजित एक अपरिभाषित भिन्न ही रहा। इन सीमाओं से इस बात की महत्ता कम नहीं होती कि यह ऋणात्मक संख्याओं और शून्य का विश्व में पहला स्पष्ट गणितीय विश्लेषण है।

इस सिद्धांत की जड़ स्थानीय मान पद्धति, आर्यभट की अक्षरांक पद्धति और भास्कर प्रथम के आर्यभटीय की व्याख्या में वर्णित दाशमिक प्रणाली में मिलती है। आर्यभट ने शून्य का उल्लेख इस रूप में तो नहीं किया और न ही उन्होंने शून्य को परिभाषित किया परंतु उनके कार्यों में उन्हें शून्य के ज्ञान होने की झलक दिखती है। आर्यभट की अक्षरांक पद्धति में उनकी अद्भुत विलक्षणता दिखती है। आर्यभट की शैली और प्रतिभा की बात करने पर हम शून्य की बात से भटक जायेंगे।  गीतिकापाद के मात्र 13 श्लोकों में अपनी अद्वितीय शैली से आर्यभट ने इतना कुछ लिख दिया कि उस पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। आर्यभट ने अंकों के लिए ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया,  ना ही पद्य रूप में चली आ रही शब्द परंपरा का। उन्होंने अक्षरों में अंको को लिखने की स्वनिर्मित पद्धति अपनायी जो अद्भुत और अद्वितीय है। श्रुति की परंपरा से सोचें तो गणित को श्लोकों में लिखना और कम से कम श्लोकों में अधिक से अधिक ज्ञान लिख देना परंपरा थी। आर्यभट का कार्य लघुता और कूट भाषा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। आर्यभट की अक्षरांक पद्धति व्यवहार की दृष्टि से अत्यंत कठिन प्रतीत होती है पर उसकी विलक्षणता अद्वितीय है। व्यवहार की दृष्टि से कठिन इसलिये क्योंकि उसे समझना सरल नहीं है। अक्षरों से बने अंकों का उच्चारण सरल नहीं, कूट भाषा है। अंक में एक मात्रा के हेर फेर से भी अंकों के मान में भारी परिवर्तन हो जाता है। उनकी पद्धति यह है:

वर्गाक्षराणि वर्गे अवर्गे अवर्गाक्षराणि कात्ङ्मौ य:। ख द्विनवके स्वरा: नव वर्गे अवर्गे नवान्त्य-वर्गे वा॥

स्वरों से इकाई, दहाई आदि स्थान का परिचायक (अ = 1, इ = 100, उ= 10,000, ऋ = 1,000,000 …. औ = 1016) और क से म तक व्यंजनों से क्रमशः 1 से 25 अर्थात क = 1, ख = 2, ग = 3…. म = 25. उसके आगे य = 30, र = 40, ल = 50, … ह = 100.

युग गणना में प्रसिद्ध आर्यभटीय अक्षरांक ख्युघृ का कूटानुवाद आज के अंकों में कुछ यूँ है:

ख्युघृ = 4,320,000

खु = 2×10000 = 20,000
यु = 30 x 10000 = 300,000
घृ = 4 x 1000000 = 4,000,000
योग = 4,320,000

एक दूसरी प्रसिद्द संख्या ङिशिबुणॢख्षृ = 1,58,22,37,500

ङि = 5×100 = 500
शि = 70×100 = 7,000
बु = 23×10000 = 2,30,000
णॢ = 15×108 = 1,50,00,00,000
ख्षृ= (2+80)x106 = 8,20,00,000
योग = 1,58,22,37,500

शून्य का स्पष्ट उल्लेख आर्यभट ने नहीं किया परन्तु उनके यहाँ अंको के स्थानीय मान और दस के घात के वर्णन कुछ यूँ है कि शून्य का वर्णन नहीं होते हुए भी वह पद्धति में अन्तर्निहित है। इसी पुस्तक के गणितपाद प्रकरण में आर्यभट संख्या स्थानों के वर्णन में ‘स्थानात् स्थानं दशगुणम् स्यात्’ लिखते हैं। दर्शन, व्याकरण, अक्षरांक पद्धति से लेकर ब्रह्मगुप्त की स्पष्ट गणितीय परिभाषा तक धीरे धीरे शून्य अपना रूप लेता गया – क्रमिक विकास। खाली स्थान लिखने की परंपरा से एक खाली अंक होता हुआ अन्ततः सभी अंको का स्थान निर्धारित करने वाला अंक – अंको का सिरमौर! शून्य का वर्तमान लिखित रूप कब आया वह भी महत्त्वपूर्ण है। शून्य के वर्तमान रूप ‘0’ के पहले लिखित सन्दर्भ ग्वालियर और अंकोरवाट में मिलते हैं। पर शून्य की परिकल्पना का विकास उससे अधिक मायने रखता है। लिखित रूप ‘0’ के पहले प्रमाण से बहुत पहले से शून्य था।

ब्रह्मगुप्त की शून्य से विभाजन की सीमाओं के साथ शून्य का यह रूप गणित में अगले 500 वर्षों तक चला। 830-850 ई. में महावीर ने ‘गणित सार संग्रह’ की रचना की जो कि ब्रह्मगुप्त के गणित का ही परिष्कृत रूप था। इसमें वह शून्य के बारे में लिखते हैं कि किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर वह शून्य हो जाती है, शून्य को जोड़ने, घटाने या उससे भाग देने पर संख्या अपरिवर्तित रहती है। गणित की इस प्रसिद्ध पुस्तक में भी शून्य से विभाजन को महावीर ने सही परिभाषित नहीं किया। ब्रह्मगुप्त के लगभग 500 वर्ष पश्चात भास्कर द्वितीय ने 1114 ई में शून्य से विभाजन की नये सिरे से व्याख्या की।

अगले अंको में : भास्कर के शून्य से विभाजन की परिभाषा। अनंत के सिद्धांत का प्रतिपादन।
लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
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