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मनु स्मृति में यात्रा – 4 (वृषली फेन और नि:श्वास)

भाग 1, 2 और 3 से आगे: 
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निवेदन है कि इस लेखमाला को पहले भाग से क्रमानुसार ही पढ़ा जाय। 
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मनु स्त्री के लिये गुरु के आश्रम में रह कर शिक्षा प्राप्त करने की कोई व्यवस्था नहीं सुझाते हैं। शिक्षा समाप्ति के पश्चात समावर्तन (घर वापसी), भार्या चयन और तत्पश्चात दारकर्म (विवाह उपरांत मैथुनी गृहस्थ जीवन) की व्यवस्थायें उपलब्ध मनु स्मृति (उ.म.स.) के तीसरे अध्याय में वर्णित हैं जो स्पष्टत: पुरुष केन्द्रित हैं।
दारा (पत्नी) के चयन में सामाजिकता, निषेध, धर्म शासन और सामुद्रिक शास्त्र (देह लक्षण निषेधादि) के अनुशासन वर्णित हैं।
बारहवाँ श्लोक द्विजातियों (उपनयन संस्कार वाले) की पहली पत्नी के लिये सवर्ण अर्थात ब्राह्मण-ब्राह्मण, क्षत्रिय-क्षत्रिय, वैश्य-वैश्य युग्म की व्यवस्था देता है। तेरहवें श्लोक में दूसरी के लिये सवर्ण सम्बन्ध से छूट दी गयी है। कर्तव्य, दायित्त्व निर्वाह और अधिकार की श्रेष्ठता को देखते हुये अनुलोम विवाह की व्यवस्था इस प्रकार है:
शूद्र पुरुष – शूद्र स्त्री
वैश्य पुरुष – वैश्य या शूद्र स्त्री
क्षत्रिय पुरुष – क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र स्त्री
ब्राह्मण पुरुष – ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र स्त्री
टीकाकार कुल्लूक लिखते हैं:
इसके पश्चात श्लोक 14 से सातत्य टूटता है और 19 वें श्लोक तक स्वर उत्तरोत्तर प्रतिक्रियात्मक, उद्दण्ड और द्वेषी होता गया है। उ. म. स. का यह भाग स्पष्टत: क्षेपक है जो कि मनु की अनुलोम विवाह स्थापना की उद्धत काट है। इसके पहले के लेख में हम लोगों ने जुगुप्सा शब्द पर चर्चा की थी। 19 वाँ श्लोक वास्तव में वह उपजाता है जो कि जुगुप्सा का आधुनिक अर्थ है – घृणा। बीसवें श्लोक से व्यवस्था विवाह प्रकार पर केन्द्रित होती है और पुन: सातत्य दिखने लगता है।
स्पष्टत: यह भाग शूद्र-स्त्री द्वेषी रचयिताओं द्वारा घुसेड़ दिया गया है। चौदहवें श्लोक में तेरहवें की काट में यह कहा गया है कि वृतांतों तक में आपद्धर्म की स्थिति में भी ब्राह्मण या क्षत्रिय द्वारा शूद्रा भार्या के चयन का उपदेश नहीं मिलता। 15 वें श्लोक में लिखा गया है कि मोह ग्रस्त हो कर जो द्विज हीनजाति की स्त्रियों से विवाह करते हैं वे शीघ्र ही कुल और संतान दोनों को शूद्र की स्थिति में पहुँचा देते हैं। 16वें श्लोक में अत्रि, औतथ्य गोतम, भृगु और शौनक ऋषियों को उल्लिखित करते हुये यह बताया गया है कि शूद्रा से विवाह और संतान उत्पन्न करने पर द्विज पतित हो जाता है। 17वें श्लोक के अनुसार शूद्रा के साथ सोने से ब्राह्मण अधोगति को प्राप्त होता है और उससे पुत्र उत्पन्न करने से वह ब्राह्मण ही नहीं रह जाता है।
मनु के उद्धत विरोध में आगे बढ़ते हुये 18वाँ श्लोक यहाँ तक लिख देता है कि शूद्रा पत्नी के साथ पितरों और अतिथियों को अर्पित किये भाग को देवता और पितर ग्रहण नहीं करते हैं और ऐसा गृही स्वर्ग नहीं जाता। इससे भी मन नहीं भरा तो उन्नीसवें श्लोक में एकदम निकृष्ट स्तर पर उतरते हुये क्षेपककार लिखता है कि (सम्भोग के समय) वृषली का (चुम्बन लेते हुये उसके अधरों से) फेन पीने वाले, उसके नि:श्वासों से उपहत होने वाले और उससे उत्पन्न संतान के लिये तो कोई प्रायश्चित्त ही नहीं, कोई विधान ही नहीं! टीकाकार मेधातिथि भाष्य करते हैं – निष्कृति:शुद्धिर्नास्ति, निन्दातिशयो!! एक और टीकाकार ‘आत्मा वै जायते पुत्र:’ लिख मुहर जड़ देते हैं।
मेधातिथि, कुल्लूक आदि टीकाकार वृषली का अर्थ शूद्रा किये हैं। अगले अंक में हम देखेंगे कि गोपन सम्बन्धित जुगुप्सा की तरह ही वृषल शब्द ने भी ऋग्वेद से होते हुये मुद्राराक्षस तक कितनी लम्बी यात्रा की है और उसके अर्थ क्या क्या हो सकते हैं?

(क्रमश: )      

                                                                                                                          एवं स जाग्रत् स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं चराचरम्।
सं (स) जीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्यय:॥
                                                                                                                                                                  (मनु, १।५७) 

मनु स्मृति में यात्रा – 3 (शूद्र जुगुप्सित)

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शूद्रों के प्रति पहला कथित निन्दनीय भाव मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के 31 वें श्लोक में मिलता है। प्रकरण विभिन्न वर्ण-जातकों के नामकरण से सम्बन्धित है। सातत्य और नैरंतर्य पर विचार के लिये क्र. 30 से 33 तक के श्लोक यहाँ दर्शाये गये हैं। पहले ऋग्वेद की एक ऋचा है जिसका महत्त्व आगे समझ में आयेगा। 
 
श्लोक 31 और 32 शब्द संयोजन में समान हैं और प्रतीत होता है कि किसी एक के आधार पर दूसरे को रचा गया है। विभिन्न वर्णों के नाम जिन लक्षण गुणों वाले होने बताये गये हैं, उनके युग्म इन दो श्लोकों के आधार पर निम्नवत हैं:
ब्राह्मण – मंगल और शर्म
क्षत्रिय – बल और रक्षा
वैश्य – धन और पुष्टि
शूद्र – जुगुप्सित और प्रेष्य
हिन्दी में संस्कृत स्रोत का शब्द जुगुप्सा प्रचलित है जिसका अर्थ निन्दनीय, घृणित आदि से जुड़ता है। अज्ञेय के साहित्य में यह शब्द इसी भाव में सटीक प्रयुक्त हुआ है और मनुस्मृति के भाष्यकारों में अधिकांश ने भी यही अर्थ लिया है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में मनुस्मृति के रचयिता शूद्रों के लिये घृणित और निन्दनीय नाम चाहते थे?
विष्णु और कुछ अन्य पुराण श्लोकों के आधार पर (शर्मा, वर्मा, गुप्त और दास) इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है जो कि गाड़ी को बैल के आगे रखने जैसी ही है। मनुस्मृति के आधार पर पुराणों में लिखा गया है न कि उसके उलट। ध्यान दें तो पुनरुक्ति जैसी बात ही दिखती है और 31 वाँ श्लोक संकीर्ण क्षेपककारों द्वारा डाला गया लगता है। विद्वानों ने इसके ऊपर क्षेपक आक्षेप का निराकरण यह बता कर करने का प्रयास भी किया है कि पहला श्लोक नाम से सम्बन्धित है और दूसरा उपनाम और पदवी आदि से। यह एक आधुनिक प्रयास ही है जो कि ठीक नहीं लगता।
आगे बढ़ने से पहले ‘गुप्’ धातु पर विचार करना आवश्यक है। हिन्दी के ‘गोपनीय’ शब्द का उत्स इस संस्कृत धातु में है जिसका सम्बन्ध संरक्षण से है। गोपनीय वह होता है जिसकी रक्षा करनी होती है, छिपाना पड़े तो भी। ऋत् और धर्म आधारित समूची वर्णव्यवस्था समाज संरक्षण भाव के मूल से विकसित हुई है। ऋषियों के लिये धर्मगोप्ता, ऋतगोप्ता आदि विशेषण नाम इसे स्पष्ट करते हैं।
ब्राह्मण का शर्मन् प्रसन्नता और समृद्धि का अर्थ लिये है जिसका कारक ‘शर्मण्य’ है, अर्थ आश्रय देने वाला, रक्षा करने वाला। सुशर्मा या सुशर्मन् नामधारी ऐसा व्यक्ति है जो कि सुरक्षित शरण और स्थान देने वाला हो। धर्मशर्मन् वह है जो धर्म को शरण देता हो। रक्षा भाव ब्राह्मण है।
क्षत्रिय का वर्मन् वर्म अर्थात कवच से बना है। कवच कोमल अंगों की सुरक्षा के लिये पहना जाता है। मर्मस्थलों की सुरक्षा क्षत्रिय का धर्म है, वह समाज का कवच है। रक्षा भाव क्षत्रिय भी है।
वैश्य का गुप्त धन धान्य का गोप्ता भाव लिये हुये है। व्यापार हो, मूल्यवान वस्तुयें हों, खेत हो, शस्य हो, पशु सम्पदा हो इन सबकी रक्षा के लिये गोपनीयता परम आवश्यक है और समाज की उदर पूर्ति करने वाला वैश्य इसे निबाहता है। रक्षा भाव वैश्य भी है।
शूद्र का दास सेवा संरक्षण भाव है। वह प्रेष्य है। प्रेष्य में भी रक्षा भाव है। प्रेष्य वह है जिसे निर्देश आदेश दे काम कराया जाता है। वह विश्वसनीय होता है क्यों कि उद्देश्य की सुरक्षा करते हुये निबाहता है। जब आप पत्र भेजते हैं तो क्या लिखते हैं? प्रेषक – फला फला। आप ने पत्र का दायित्त्व प्रेष्य को दिया जिसने उसे सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचा दिया। बेटी बहनों के यहाँ भार ले कर कहाँर पहले जाते थे न, वे भी प्रेष्य थे और आप प्रेषक। डोली में दुल्हन को ले कर जाने वाले भी भरोसे वाले प्रेष्य ही होते थे। वह भरोसे वाला है इसलिये रक्षणीय है। रक्षा भाव शूद्र भी है।
यह टुकड़ा टुकड़ा दिखती सुरक्षा उस ’समाज पुरुष’ की समग्र सुरक्षा है जिसकी कल्पना ऋषियों ने की। जी, पुरुष सूक्त ‘व्यकल्पयन्’ ही कहता है। ऋषि का मस्तिष्क गर्भ है जिसमें समूचे ब्रह्माण्ड को अपने में समेटते हुये मनु संतति का रूप विकसित होता है। उस विराट पुरुष संकल्पना की ऐसी तैसी भाष्यकारों और आज कल के धुरन्धरों ने खूब की, किये जा रहे हैं।     
वर्ण व्यवस्था के मानक अर्थ पर 32 वाँ श्लोक खरा उतरता है क्यों कि वह उस विराटता से जुड़ता है न कि 31 वें की तरह बस मंगल, बल, धन और जुगुप्सा तक सीमित होता है। 31 वाँ श्लोक क्षेपक हो सकता है।
जुगुप्सा शब्द गुप् धातु में इच्छा के अर्थ वाले सन् प्रत्यय के जुड़ने से बना है। सन् प्रत्यय में द्वित्व का विधान है इसलिए एक और गु जुड़ता है। गु+गुप्+सन् के योग में सूत्र प्रयोग के कारण पहला ग ‘ज’ हो जाता है और बनता है जुगुप्सा। ऐसा एक अन्य उदाहरण है पा+सन् = पिपासा जो कि प्यास के लिये प्रयुक्त होता है।
ऋग्वेद (7.103.9) में वसिष्ठ ऋषि मेढकों के माध्यम से 12 महीनों के संवत्सर चक्र की सुरक्षा के लिये जुगुपु: शब्द का प्रयोग करते हैं। पूरे ऋग्वेद में यह एकल प्रयोग है। इसी संरक्षण अर्थ में मनुस्मृति में इसका प्रयोग हो, सम्भावना कम ही लगती है।
अब प्रश्न यह कि ‘जुगुप्सा’ शब्द का अर्थ संकीर्ण हो निन्दित या घृणित कैसे हो गया? हजार वर्षों के उत्थान पतन में शब्द घिसते हैं, कभी छिछले तो कभी गहन अर्थ ले लेते हैं और कभी कभी मूल से इतर उलट भी। समाज भी उठता है, गर्त में जाता है, पुन: पुन: दुहराता है।   
घृणित या निन्दनीय अर्थ परवर्ती है जो स्पष्टत: गुप्तांगों के ढकने से उपजा है। सुरक्षित और गोपनीय रखने वाले ढेर सारे अवयवों में गुप्तांग भी होते हैं जिनका प्रदर्शन घृणित और निन्दनीय होता है। सामाजिक विकृति ने सेवा और भृत्य कर्म करने वालों के लिये ऐसा सोचा ठीक गुप्तांग आधारित गालियों की तरह ही जो कि बहुत बाद में विकसित हुईं। गुप्तांग आधारित गालियाँ संस्कृत में नहीं हैं।
जुगुप्सित शब्द का भाष्यकार कुल्लुक जहाँ स्पष्टत: निन्दावाचक अर्थ करते हैं, वहीं मेधातिथि और नन्दन क्रमश: कृपणकोदीन शबरक और पैलवक जैसे उदाहरण नाम सुझाते हैं।
भाष्यकारों ने एकदम से संरक्षण वाला भाव भुला दिया हो, ऐसा भी नहीं है। राघवानन्द जुगुप्सित लिखते हुये जब द्विजदास और द्विजगुप्त नाम सुझाते हैं तो अनायास ही वैदिक संरक्षण भाव वाले अर्थ से जुड़ जाते हैं, द्विज के संरक्षण में रहने वाला। सेवक की सुरक्षा स्वामी का कर्तव्य तो आज भी है, तब धर्म कहलाता था।
रामचन्द्र वह भाष्यकार हैं जो जुगुप्सित शब्द का प्रयोग ही नहीं करते। वह ‘प्रेष्यसंयुक्तंकुर्यात्’ लिखते हुये  स्पष्टत: संरक्षण योग्य नाम यथा कृष्णदास सुझाते हैं।

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि शक संवत 1807 में जब इस ‘मानव धर्म शास्त्र’ का संचयन कर छापने के लिये देश भर से पाण्डुलिपियाँ जुटाई गयीं तो तीन भिन्न भिन्न स्थानों से प्राप्त प्रतियों में ‘जुगुप्सित’ प्रयोग था ही नहीं! उसके स्थान पर प्रेष्य पाठ ही दुहरा दिया गया था।
 
सोचना आप को है कि बिना गहराई में उतरे समूची सनातन परम्परा को क्षेपकों के आधार पर कलंकित करने वालों के निहितार्थ क्या हैं? और आप स्वयं भी उनके जाल में फँसते क्यों जा रहे हैं? 
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आभार:

श्री दत्ता राज (वैदिकी), 

सुश्री संगीता शर्मा (शब्द, धातु उत्पत्ति)