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अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था: भाग – 1

अंतर्राष्ट्रीय राजनैतिक अर्थव्यवस्था पर विचार करने से पहले यह जानना होगा कि अर्थशास्त्र क्या है?
अर्थशास्त्र वह विधा है जो इसका अध्ययन करती है कि समाज अपने अल्प संसाधनों से मूल्यवान उत्पाद या सेवाओं का किस प्रकार निर्माण तथा जनमानस में वितरण करता है।

अरस्तू के अनुसार मानव स्वभावतः एक राजनैतिक पशु है क्योंकि वह एक सामाजिक प्राणी है जिसे अभिव्यक्ति और नैतिक रूप से तर्क करने की शक्ति प्राप्त है।

अरस्तू की 'एथिका निकोमेकिया' का अंश

अरस्तू की ‘एथिका निकोमेकिया’ का अंश

अर्थशास्त्र में प्रथम अमरीकी नोबेल पुरस्कार विजेता पॉल सैमुएल्सन ने अपनी पुस्तक में अर्थशास्त्र की परिभाषा बताई है। उनके अनुसार अर्थशास्त्र वह विधा है जो इसका अध्ययन करती है कि समाज अपने अल्प संसाधनों से मूल्यवान उत्पाद या सेवाओं का किस प्रकार निर्माण तथा जनमानस में वितरण करता है। इन दोनों विचारों को स्वीकार करते ही राजनीति और अर्थव्यवस्था के मध्य परस्पर निर्भरता स्पष्ट दिखाई देती है। वस्तुतः एडम स्मिथ से लेकर कार्ल मार्क्स और जॉन स्टुअर्ट मिल्स तक ने ‘राजनैतिक अर्थव्यवस्था’ की ही व्याख्या की थी। राजनैतिक अर्थशास्त्र एक विषय के रूप में राज-व्यवस्था एवं बाजार के मध्य अंतर्सम्बंध को प्रमाणित करने का कार्य करता है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके बाजार द्वारा संचालित होती है जहाँ आर्थिक गतिविधियों की उठा पटक के मापदण्ड क्रय-विक्रय के मूल्यों द्वारा निर्धारित होते हैं। इसमें नियामक की भूमिका उक्त देश की मौद्रिक नीति तथा कर की दरें निभाती हैं।

जब वस्तुयें अथवा सेवायें एक देश से दूसरे देश ले जाकर बेची जाती हैं तब अंतर्राष्ट्रीय बाजार खड़ा होता है। यह बाजार किसी देश के घरेलू बाजार से कई मायने में भिन्न होता है। यहाँ हर प्रकार का उत्पाद न बेचा जा सकता है न क्रय किया जा सकता है। राजनेताओं की व्यक्तिगत उत्कण्ठा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कुण्ठित हो जाती हैं। अनेक अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की सीमायें लाँघना कई उत्पादों के लिए इतना कठिन हो जाता है कि उनका उत्पादन ही बन्द  हो जाता है। आयात किये जाने वाले माल पर जो कर लगाया जाता है उसे प्रशुल्क ‘टैरिफ ड्यूटी, Tariff Duty’ कहा जाता है।  इसकी दरें बढ़ा कर कोई देश किसी विदेशी उत्पाद को अपने बाजार में आने से रोक सकता है। सन् 1930 के दशक में कुछ देश ‘पड़ोसी को भिखमंगा बना दो – beggar-thy-neighbour’ की नीति पर चलते थे जिसके अनुसार ऐसी आर्थिक नीतियाँ बनाई जाती थीं जिनसे स्वहित के लिये पड़ोसी देश को भिखारी बना दिया जाये। एक समय में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संधियाँ वणिकराष्ट्रवाद ‘mercantilism’ के यथार्थवादी सिद्धांत पर की जाती थीं जिसके अनुसार कोई देश किसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था के नियमों को न मानकर वही निर्णय लेता था जो उसके हित में हो। कुछ देश अपने प्रमुख उद्योगों को व्यापार की सन्धियों से दूर रखते थे तो कुछ आत्मनिर्भर अर्थतंत्र ‘अटार्की, autarky’ में विश्वास रखते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में न्यूनतम भागीदारी निभाते थे। उनका मानना था कि सब कुछ बनाने में वे स्वयं सक्षम हैं, उन्हें किसी दूसरे देश के सहयोग की आवश्यकता नहीं। हालांकि ऑटर्की का यह सिद्धांत अधिक लाभकारी सिद्ध नहीं हुआ और उन देशों को रोना पड़ा जो अतिशय स्वावलंबन में विश्वास रखते थे। नव-उदारवाद के साथ भूमण्डलीकरण की अवधारणा बली होती गयी परिणामस्वरूप आज सम्भवतः हर देश ने व्यापार के लिये अपने द्वार खोल दिये हैं।

यूरोप व अमरीका सदैव मुक्त व्यापार के पक्षधर रहे हैं। जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद का झण्डा बुलन्द था तब वे एशियाई देशों की सम्पदा पर अपना अधिकार मानते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ही ऐसा प्रतीत होने लगा था कि ब्रिटिश उपनिवेश अधिक दिनों तक पराधीन नहीं रहेंगे। तब वैश्विक राजनीति में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिए ब्रिटेन और अमरीका ने जुलाई सन् 1944 में न्यू हैम्पशायर के ब्रेटन वुड्स में 44 राष्ट्रों का एक सम्मेलन बुलाया। उसमें प्रसिद्ध ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स तथा अमरीका के वित्त मंत्रालय (Treasury Department) के हैरी वाइट ने जो प्रस्ताव रखे उनसे चार संस्थाओं का जन्म हुआ। युद्ध की समाप्ति के बाद यूरोप के पुनर्निर्माण हेतु जिस बैंक ‘International Bank for Reconstruction and Development’ का गठन किया गया उसे हम आज विश्व बैंक (World Bank) के नाम से जानते हैं। व्यापार में विनिमय दरों के निर्धारण के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) बनाया गया जिसने अमरीकी डॉलर को स्थाई रूप से शक्ति प्रदान करते हुए एक ऑउंस (28.35 ग्राम)  स्वर्ण बराबर 35 डॉलर की दर निर्धारित कर दी। इसका अर्थ यह था कि अमरीकी डॉलर के अतिरिक्त अन्य देशों की मुद्रायें परस्पर परिवर्तित नहीं हो सकती थीं वरन् उतने मूल्य के स्वर्ण से बदली जा सकती थीं जिसका मान अमरीकी डॉलर द्वारा निर्धारित होता था। इसे बद्ध विनिमय दर प्रणाली (Fixed Exchange Rate System) कहा गया। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में टैरिफ की दरों पर सन्धिवार्ता (negotiation) हेतु मंच प्रदान करने के उद्देश्य से गैट (जनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड ऐण्ड टैरिफ, General Agreement on Trade and Tariff) की स्थापना की गयी। यही संस्था 1995 में विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) बन गयी।

ब्रेटन वुड्स प्रणाली द्वारा निर्मित संस्थान सन् 1971 तक सही चले किंतु उसके पश्चात यह प्रणाली ध्वस्त हो गयी। सन् 1970 के दशक में अमरीका स्थिर-मुद्रास्फीति ‘stagflation’ के दौर से गुजर रहा था। स्थिर मुद्रास्फीति की दर और बेरोजगारी ने अमरीका की कमर तोड़ दी थी। सन् 1973 में ‘योम किपर, Yom Kippur‘ या रमज़ान युद्ध में इजराइल को समर्थन देने के विरोध में तेल बेचने वाले अरबी देशों ने अमरीका को तेल बेचने से मना कर दिया था। परिणामस्वरूप 1974 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली ध्वस्त हो गयी। इसका प्रभाव यह पड़ा कि डॉलर एक स्थिर विनिमय मुद्रा नहीं रह गयी बल्कि सभी देशों की मुद्रायें परस्पर विनिमय दर तय कर सकती थीं।

ब्रेटन वुड्स प्रणाली के अवसान के बाद सन् 1974 में नयी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order) का प्रस्ताव रखा गया।

(नयी व्यवस्था पर अगले अङ्क में)

 


लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

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जाली मुद्रा (FICN) का अर्थशास्त्र: तंत्र, संकट तथा सामाजिक प्रभाव

लेखक: श्री यशार्क पाण्डेय 
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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा हजार व पाँच सौ के नोटों के विमुद्रीकरण से सबसे तगड़ा प्रहार जाली मुद्रा तथा आतंक के व्यवसाय पर हुआ है। एक अनुमान के अनुसार बैंक तथा सुरक्षा एजेंसियाँ कुल जाली मुद्रा का केवल 30प्रतिशत ही पकड़ पाती हैं। पाकिस्तानी संस्था आईएसआई (Inter-Services Intelligence)  भारत में जाली मुद्रा भेज कर लगभग पाँच सौ करोड़ रुपये का वार्षिक लाभ अर्जित करती है।
 
भारतीय रिज़र्व बैंक और फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (FIU) के आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक जाली नोट हजार एवं पाँच सौ मूल्य के पाये जाते हैं। इनमें सबसे अधिक जाली नोट प्राइवेट बैंकों की शाखाओं में जमा किये और निकाले जाते हैं। अपवादों की सचाई कहीं अधिक भयानक है। ज़िला सिद्धार्थनगर उत्तरप्रदेश की डुमरियागंज की स्टेट बैंक शाखा में 29जुलाई से 1 दिसंबर 2008 तक चली जाँच में कुल चार करोड़ एक लाख सत्रह हजार दो सौ रूपये मूल्य के जाली नोट पकड़े गये थे। इस घटना का संज्ञान चौदहवीं लोक सभा में गठित वित्तीय मामलों की स्थाई समिति (2008-09) की 79वीं रिपोर्ट में भी लिया गया।
 
भारत विश्व की एकमात्र ऐसी अर्थव्यवस्था है जहाँ जाली मुद्रा का व्यवसाय राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती देता है जिसमें आर्थिक सुरक्षा अन्तर्निहित है। जी-7 देशों द्वारा 1989में गठित अंतर्शासकीय संगठन फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फ़ोर्स‘ (FATF) की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक मुद्राओं के कृत्रिमिकरण की सूची में भारतीय रुपया 9वें स्थान पर रहा।
 
जाली मुद्रा कई तरीके से भारतीय अर्थव्यवस्था को हानि पहुँचाती है। काला धन और जाली मुद्रा मौलिक स्वरूप में भिन्न होने पर भी प्रथम दृष्टया धवल नज़र आते हैं। यद्यपि जाली मुद्रा के अप्रसार तथा जनमानस में जागरूकता हेतु रिज़र्व बैंक ने पैसा बोलता हैनामक वेबसाइट बनाई है किंतु एक मज़दूर के हाथ में चार दिन की दिहाड़ी के रूप में आया एक हजार का नोट यह नहीं बोलता कि उसे कब कैसे और कहाँ काले से सफेद बनाया गया या वह पाकिस्तान की किस प्रिंटिंग प्रेस में छपा था।
 
सरकारी संस्था इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस‘ (IDSA) से प्रकाशित एक पुस्तक के अनुसार अरब से प्राप्त धन को काले से सफेद करने की तरक़ीब को मज़हबी जामा पहनाया जाता है। क़ुर’आन सूरा 9, अत-तौबा, आयत 60 में ज़कातका ज़िक्र आता है। इसकी आड़ लेकर अरब के शेख, जो तेल बेच कर सोने के कमोड पर बैठने की विलासिता में विश्वास करते हैं, विश्व भर में इस्लामी निर्धनों को पैसा पहुँचाते हैं। 
 
भारत में यह ज़कात का पैसा हवाला के ज़रिये आता है जिसका कोई लेखा जोखा नहीं होता। इसी पैसे से पाकिस्तान भी उच्च तकनीक वाली मशीनें आधिकारिक रूप से अपनी मुद्रा छापने के लिए खरीदता है। उन मशीनों में भारतीय नोट पाकिस्तानी रुपये से ज्यादा मात्रा में छापे जाते हैं जो कश्मीर के पत्थरबाजों से लेकर नेपाल और बांग्लादेश के रास्ते भारत के बैंकों में किसी भी अज्ञात व्यक्ति के नाम पर जमा करा दिये जाते हैं। कालांतर में उन जाली नोटों के मूल्य के बराबर धन किसी और स्थान से एटीएम मशीनों से निकाल लिया जाता है जो कि असली मुद्रा होती है। इस प्रकार चक्र पूरा होने के उपरांत इस धन का प्रयोग असलहों के अवैध व्यापार से लेकर प्रतिबंधित मादक पदार्थों की तस्करी के लिए किया जाता है।
 
नक्सलियों के गढ़ इसी तन्त्र के ज़रिये मज़बूत हुए हैं। बंगाल में मालदा का कालियाचक गाँव और नेपाल से सटे इलाकों में जाली मुद्रा कई बार बिकती है। हजार के नोट पहले सौ रुपये में फिर एक सौ पचास, दो सौ, पाँच सौ इस प्रकार एक ग्राहक से दूसरे तक बिकते हुए चलन में आ जाते हैं। जाली नोट के व्यवसाय और प्रसार के षड्यंत्र में सिमी, इंडियन मुजाहिदीन के गुर्गों के अलावा इनके झाँसे में आये स्थानीय लोग भी सम्मिलित होते हैं।
अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखा जाये तो किसी भी देश की वित्तीय प्रणाली स्थायित्व एवं विकास के लिए सरकार की राजस्व अर्जन की नीति, ऋण तथा व्यय पर निर्भर होती है। सरकार का बजट इन सारी चीज़ों को पारदर्शी तरह से दर्शाता है। बजट का उद्देश्य सरकार की नीतियों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक होता है अतः बजटीय नीति मुख्य रूप से तीन कारकों के प्रयोग से सरकार की नीतियों को कार्यान्वित करती है:  
(1) करों के प्रावधान से
(2) सार्वजनिक व्यय से
(3) सार्वजनिक देनदारियों के प्रबंधन से
 
जाली मुद्रा (Fake Indian Currency Notes, FICN) कई तरह से अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। जब बजट में कुल व्यय कुल आय से अधिक हो तब बजटीय घाटा होता है। इस घाटे के वित्त पोषण के लिए घाटे की वित्त व्यवस्था (Deficit Financing) अपनानी पड़ती है। इसमें सरकार को सार्वजनिक देनदारियों के प्रबंधन के लिए नए नोट छापने पड़ते हैं क्योंकि वैध मुद्रा जो बैंकिंग चैनल के माध्यम से सरकार के पास पहुँचती है उसकी मात्रा कई वजहों से कम हो जाती है (मुख्यतः मुद्रा के अवैध भण्डारण की वजह से, काला धन, कर अपवंचन इत्यादि वजहों से)। वैध मुद्रा की पूर्ती हेतु सरकार जो नए नोट छापती है, वे बाज़ार में मुद्रा की आपूर्ति को बढ़ा देते हैं जिसके परिणाम स्वरूप मुद्रास्फीति (Inflation) की दर बढ़ जाती है। जाली मुद्रा भी एक तरह से घाटे की वित्त व्यवस्था का छद्म, अवैध रूप है। उपभोक्ता व्यवहार (consumer behaviour) के कारण यह भी बाजार में पैठ बना के मुद्रा आपूर्ति को बढ़ा देती है जिसके कारण भी मुद्रास्फीति की दर बढ़ती है। जब कभी भी जाली नोट बैंक की तिजोरी में पकडे जाते है तो केंद्रीय बैंक को उन जाली नोटों के बदले फिर से अपने अकाउंट को पारदर्शी रखने के लिए नए नोट छापने पड़ जाते है क्योंकि सरकार अथवा बैंक जनता के प्रति अपनी देनदारियों से मुकर नहीं सकते। आम जनमानस में वैध मुद्रा के प्रति आस्था बनाये रखने के लिए नए नोटों से जाली नोटों को बदलना होता है जो कि पुन: घाटे की वित्त व्यवस्था से जुड़ती है, इस प्रकार यह दुष्चक्र चलता रहता है।
 
यदि कभी यह परिस्थिति उत्पन्न हो कि जाली नोटों की संख्या बैंक की तिजोरी में 50 % से ऊपर हो जाए तो फिर ग्रेशम का नियम मूर्त रूप ले लेगा जिसके अनुसार अवैध मुद्रा वैध मुद्रा को ‘बाहर’ कर देती है अर्थात खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देगी।
 
यहाँ यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि जाली नोटों का क्रय कम मूल्य पर ही सही परंतु असली मुद्रा से होता है और जाली नोटों के व्यवसायी इस विधि से अवैध किंतु असली मुद्रा अर्जित करते है। इस अवैध पैसे का उपयोग अनेक राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में किया जाता है जैसे कि हथियार, मादक पदार्थ, मानव तस्करी, सट्टेबाज़ी इत्यादि। इसके अलावा यह अवैध असली पैसा देश की उत्पादक गतिविधियों में कभी नहीं लगता उलटे विध्वंसकारी कार्यों में प्रयुक्त होता है और सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो शक्य या सम्भाव्य श्रम (Potential Labour) और मानव संसाधन के श्रम का नाश करता है।
 
अवैध रूप से कमाया धन अपना स्वयं का तंत्र विकसित करके देश के कई लोगों को विध्वंसकारी गतिविधियों में रोजगार के अवसर प्रदान करने में सक्षम हो जाता है फलस्वरूप सामाजिक-आर्थिक रूप से देश के श्रम संसाधन का नाश करता है और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का शनैः शनैः क्षरण कर देता है।
 
अवैध धन के द्वारा विकसित किया गया आर्थिक तंत्र धीरे धीरे कुछ और कारोबार विकसित करता है जिसमें काले धन का निवेश होता है। इस प्रकार यह तंत्र और व्यापक होता जाता है। इस समांतर तंत्र को बनाये रखने हेतु नैतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता पड़ती है जो तभी हो पाता है जब सरकारी तंत्र को निष्ठा से च्युत बेईमान बना दिया जाये। अर्थात यह समांतर तंत्र देश में अपने अस्तित्व के लिए सरकार और समाज में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।
 
आवश्यकतानुसार अवैध रूप से कमाए धन को सफ़ेद बनाया जाता है फिर उस सफ़ेद धन को समानांतर तंत्र के लिए आधारभूत संरचना खड़ा करने के लिए तैयार किया जाता है। चूँकि यह सफ़ेद धन बिना किसी उत्पादक गतिविधि में लगे बिना अर्थव्यवस्था में प्रयुक्त होता है इसलिये इससे समाज में धीरे धीरे असमानता की खाई चौड़ी हो जाती है और लोगो में असंतोष बढ़ने लगता है। लोगों का भरोसा राष्ट्र प्रायोजित उत्पादक गतिविधियों से उठने लग जाता है, उपभोक्तावादी संस्कृति हावी हो जाती है, अचल सम्पत्ति (Real Estate) के कारोबार में तेज़ी आ जाती है, सट्टा आधारित आर्थिक गतिविधियाँ (speculative economic activities) बढ़ जाती हैं, भूमि का उपयोग लाभकारी कार्यों में होने के बजाय शुद्ध उपभोग के लिए होने लगता है और किसान शीघ्र धन लाभ ले अपने वास्तविक काम काज से बेरोज़गार होने लगता है जिसका परिणाम दीर्घकालिक बेरोजगारी (chronic unemployment) के रूप में सामने आता है और खाद्य उत्पादन गिर जाता है। सरकार को अपनी जनसंख्या के आर्थिक प्रबंधन हेतु तदर्थ कामचलाऊ नीतियों का सहारा लेना पड़ता है। ब्याज दरों  में अनिश्चितता आ जाती है, दीर्घावधि नीतियां बुरी तरह से प्रभावित होती है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देशी अर्थव्यवस्था व्यापार हेतु प्रतिकूल दिखाई पड़ने लगती है।
अर्थशास्त्र में आचार्य कौटल्य ने जाली मुद्रा बनाने वाले के लिये 48 से 96पण के अर्थदण्ड का प्रावधान किया था।
 संभवतः उस युग में भी पड़ोसी राज्य मगध की अर्थव्यवस्था को हानि पहुँचाने हेतु ऐसे प्रयास करते रहे होंगे परंतु निश्चित ही परिस्थितियाँ आज के भारतवर्ष जैसी नहीं रही होंगी जो शताब्दियों से जिहादी आतंकवाद से लड़ने के लिए अभिशप्त है।
 ऐसे में अर्थक्षेत्र से जुड़े विमुद्रीकरण को व्यापक और समेकित परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिये।
फाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स (FATF) को 9 सितंबर 2001 के बाद आतंक के अर्थतन्त्र के खतरे का भान हुआ था और भारत इस संस्था का सदस्य 26 नवंबर 2008 के बाद बना। देखें तो Unlawful Activities (Prevention) Act में 2011 के संशोधन के बाद 9 नवंबर 2016की तिथि ऐतिहासिक है जब विमुद्रीकरण के साथ विशाल मात्रा में जाली नोट मूल्यविहीन तो हुये ही, भीतर और बाहर सक्रिय भारत विरोधी ध्वंसक शक्तियों को विनाशकारी चोट भी लगी जिसके सार्थक परिणाम आने वाले समय में अवश्य दिखेंगे।
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References: 
(1)  Indian Economy by Ramesh Singh
(2) Lifeblood of Terrorism Countering Terrorism Finance by Col Vivek Chadha 
     (Institute for Defence Studies & Analyses) 
(3) Annual report Reserve Bank of India, 2014-15
(4) Financial Action Task Force report on Money laundering and terrorist financing related to 
     counterfeiting of currency (2013)
(5) Financial intelligence unit report on FICN
(6) Standing committee on Finance report 79 (14th Lok Sabha) 2008-09.