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QSL पदार्थ की नई अवस्था: क्वॉन्टम स्पिन लिक्विड, मायोराना फर्मियॉन कण तथा क़्वॉण्टम कम्प्यूटर

हम पदार्थ की कितनी अवस्थायें जानते हैं? छोटी कक्षा में बताया जाता है कि पदार्थ की तीन मौलिक अवस्थायें हैं: ठोस, तरल और गैसीय, हाई स्कूल तक ‘प्लाज़्मा’ जो कि मूलतः आवेशित कणों से बना पदार्थ का वह स्वरूप है जिससे हमारे सूर्य के समान तारे निर्मित होते हैं।

इण्टरमीडियेट तक पदार्थ की एक नई अवस्था ‘बोस-आइंस्टीन कंडेन्सेट’ यानि BEC का पता चलता है। यह अवस्था तब उत्पन्न होती है जब लेज़र किरणों और तीव्र चुम्बकों की सहायता से परमाणुओं को बेहद कम तापमान पर ठण्डा कर दिया जाता है। इस तरह अब तक माध्यमिक शिक्षा तक के विद्यार्थी पदार्थ की कुल पाँच अवस्थायें जानते रहे हैं: ठोस, तरल, गैसीय, प्लाज़्मा और बोस-आइंस्टीन कंडेन्सेट।

हाल ही में अमेरिका की ओक रिज नेशनल लैब के वैज्ञानिकों ने प्रयोगों द्वारा पदार्थ की एक बिल्कुल ही नई अवस्था को वास्तविकता में देखने की पुष्टि की है जिसका नाम है Quantum Spin Liquid, ‘क़्वॉण्टम स्पिन लिक्विड’। प्रथम दृष्टया यह बड़ा विचित्र सा नाम प्रतीत होता है। पदार्थ की इस अवस्था के कई स्वरूप हैं अर्थात् कई मूलभूत कण कुछ विशेष तापमान वाली परिस्थितियों में क़्वॉण्टम स्पिन लिक्विड बना लेते हैं। इस अवस्था के अस्तित्व को सैद्धांतिक रूप से सबसे पहले फिलिप एंडरसन ने 1973 में प्रमाणित किया था। सुविधा के लिए आगे हम इसे QSL कहेंगे। एंडरसन के सिद्धांत के बाद 2003 और 2005 में भी QSL को प्रायोगिक रूप से देखा गया। प्रतिष्ठित पत्रिका ‘नेचर’ के अप्रैल 2016 अंक में प्रकाशित शोध पत्र के अनुसार भारतीय मूल के शोधकर्ता अर्नब बनर्जी के नेतृत्व में ओक रिज नेशनल लैब के शोधार्थियों ने QSL के ‘किटाएव मॉडल’ को प्रत्यक्ष देखा। यहाँ प्रत्यक्ष का अर्थ है कि उपकरणों की सहायता से QSL के अस्तित्व की पुष्टि की गयी। यह एक ऐसी क़्वॉण्टम अवस्था है जहाँ इलेक्ट्रॉन टूट जाते हैं और एक नया कण बन जाता है जिसे ‘मायोराना फर्मियॉन’ कहा जाता है। यह मायोराना फर्मियॉन कण कई मायनों में अनोखा है। इसका प्रयोग अति तीव्र गति से गणना करने वाली क़्वॉण्टम कम्प्यूटर तकनीक में हो सकता है। QSL क्या है? मायोराना फर्मियॉन कण का यह नाम क्यों पड़ा? और इनका उपयोग क़्वॉण्टम कम्प्यूटर में कैसे हो सकता है? आइये भौतिकी के सिद्धांतों से इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास करते हैं।

अब यह तो सबको पता है कि न्यूटन की यांत्रिकी के सिद्धांत परमाणु के अति सूक्ष्म आयामों पर प्रयुक्त नहीं होते। इसके लिए क़्वॉण्टम सम्बन्धित सिद्धांतों को समझना आवश्यक है।

एक परमाणु के अंदर थिरकते कणों के स्वभाव में वस्तुतः सब कुछ अनिश्चित होता है। पदार्थ के मौलिक कण ऐसी ही अनिश्चितता वाला एक व्यवहार प्रदर्शित करते हैं जिसे ‘स्पिन’ कहा जाता है।

आपने कभी नाचती हुई ‘बैलेरिना’ को देखा है? एक सुन्दर दुबली पतली लड़की बदन से चिपके हुए कपड़े पहने पैर के एक अंगूठे के बल पर लट्टू के समान घूमती है। इसी तरह पदार्थ के मौलिक कण भी प्रकृति के इस अद्भुत संगीत पर नाचते हैं, चाहे वे इलेक्ट्रॉन हों या परमाणु के नाभिक कण। कणों के इस नृत्य का पता तब चला जब 1922 में ओट्टो स्टर्न और वॉल्थर गरलाच ने चांदी के परमाणुओं को असमान चुम्बकीय क्षेत्र के बीच से जाने दिया। अपनी धुरी पर नाचने की कला में दक्ष इन कणों का व्यवहार ऐसा होता है कि कोई कण दक्षिणावर्त होकर नाचता है तो कोई वामावर्त। ऐसे में इलेक्ट्रॉन जैसे कणों की स्पिन -1/2 अथवा +1/2 होती है। इन्हें ‘UP’ और ‘DOWN’ स्पिन कहा जाता है किंतु वास्तव में इलेक्ट्रॉन अपनी धुरी पर नाचते हैं या नहीं, यह किसी को नहीं पता। इसका कारण यह है कि परमाणविक कणों को हम प्रत्यक्ष देख नहीं सकते। हम केवल किसी कण के होने की प्रायिकता ज्ञात कर सकते हैं और इसी गणितीय प्रायिकता के आधार पर सम्पूर्ण क़्वॉण्टम सिद्धांत खड़ा है।

By Thehintsch (Own work) [CC BY-SA 3.0 or GFDL], via Wikimedia Commons

भौतिकी में स्पिन का अर्थ है कोणीय संवेग। हम किसी बड़े द्रव्यमान वाली वस्तु जैसे कि अपनी धुरी पर घूर्णन करता लकड़ी का एक टुकड़ा या गेंद के कोणीय संवेग की गणना करते हैं। यह कोणीय संवेग हमें बताता है कि वह वस्तु अपने द्रव्यमान के हिसाब से कितनी तीव्र गति से घूर्णन कर सकती है परन्तु जब कोई वस्तु कई सारे कणों का एक निकाय न होकर स्वयं एक कण हो जिसकी गति की दिशायें सटीक ज्ञात करना असंभव हो तब वहाँ न्यूटन के नियम धराशायी हो जाते हैं और स्पिन की क़्वॉण्टम परिभाषा का सहारा लेना पड़ता है जिसके अनुसार किसी इलेक्ट्रॉन की स्पिन का अर्थ होता है दक्षिण अथवा वाम आवर्तन में स्पिन ‘UP’ और ‘DOWN’ होना। कोई बड़ी वस्तु किसी भी दिशा में घूर्णन कर सकती है किंतु परमाणविक कण कुछ निश्चित दिशाओं में ही स्पिन परिलक्षित करते हैं। सम्भवतः ऐसी ही विचित्र व्याख्या के चलते रिचर्ड फेयनमान ने कहा था कि “क़्वॉण्टम यांत्रिकी को कोई नहीं समझता।”

क़्वॉण्टम स्पिन लिक्विड जल की भाँति तरल भी नहीं होता। मौलिक भौतिकी के नियमों से हम जानते हैं कि जब कोई आवेशित कण गतिमान होता है तब उसमें चुम्बकीय गुण उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए किसी वस्तु में गतिमान इलेक्ट्रॉन उसमें फेरोमैग्नेटिस्म, डायमैग्नेटिस्म अथवा पैरामैग्नेटिस्म व्यवहार के लिए उत्तरदायी होते हैं। घरों में प्रयुक्त होने वाला सामान्य चुम्बक फेरोमैग्नेटिक होता है। जब किसी वस्तु को बेहद कम तापमान पर ठण्डा किया जाता है तब उसमें घूमते सभी इलेक्ट्रॉन एक दिशा की ओर घूर्णन करने लगते हैं। परन्तु QSL में ऐसा नहीं होता। शून्य केल्विन के समीप ठण्डा होने पर भी QSL के इलेक्ट्रॉन एक दिशा में व्यवस्थित नहीं होते अपितु एक ऐसी अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं जिसे ‘क़्वॉण्टम एनटैंगलमेंट’ कहा जाता है। वस्तुतः किसी भी परमाणविक कण की स्थिति व दिशा का सटीक मापन न हो पाने के कारण उसके व्यवहार की व्याख्या ‘क़्वॉण्टम अवस्थाओं’ से की जाती है। इसके लिए चार मूलभूत क़्वॉण्टम संख्याएं निर्धारित हैं जिनमें से एक स्पिन होती है। एनटैंगलमेंट का अर्थ है कि किसी कण की एकल क़्वॉण्टम अवस्था अन्य कणों से पृथक् कर के ज्ञात नहीं की जा सकती अतः QSL अवस्था में पदार्थ एक प्रकार से मिश्रित क़्वॉण्टम सूप की भाँति बन जाता है और ऐसी स्थिति में इलेक्ट्रॉन टूट कर एक नए कण का निर्माण करते हैं जिसे मायोरना फर्मियॉन कण कहा जाता है। फर्मियॉन कणों को उनका नाम एनरिको फर्मी से मिला और कुछ विशेष प्रकार के फर्मियॉन कण मायोरना फर्मियॉन कहलाते हैं जिनकी सैद्धांतिक अवधारणा सबसे पहले ईटोर मायोरना ने प्रस्तुत की थी।

फर्मियॉन कण वे होते हैं जिनकी स्पिन अर्द्ध पूर्णांक होती है; यथा इलेक्ट्रॉन की स्पिन 1/2 है। प्रोटॉन तथा न्यूट्रॉन भी फर्मियॉन कणों में आते हैं। फर्मियॉन कणों के व्यवहार के नियम फर्मी-डिरैक क़्वॉण्टम सांख्यिकी द्वारा निर्धारित होते हैं। क़्वॉण्टम भौतिकी के अनुसार प्रत्येक कण के एक ‘प्रति-कण’ (anti particle) का अस्तित्व होता है। यह प्रतिकण ही उस ‘प्रति-पदार्थ’ (anti matter) के निर्माण के लिए उत्तरदायी है जिससे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के वे हिस्से निर्मित हुए हैं जिन्हें हम देख नहीं सकते। मायोरना फर्मियॉन कणों की विशिष्टता यह है कि वे स्वयं अपने ही प्रतिकण होते हैं क्योंकि इन पर कोई आवेश नहीं होता। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जब भी कोई मायोरना फर्मियॉन अपनी क़्वॉण्टम अवस्था में परिवर्तन करता है तो इसकी सूचना पीछे छोड़ जाता है। ऐसा इलेक्ट्रॉनों के साथ नहीं होता जिनकी ‘on/off’ अवस्थाओं पर आज की कम्प्यूटर तकनीक कार्य करती है।

आज जिस संगणन की तकनीक का हम उपयोग करते हैं वह 0 और 1 के आधार पर ‘बाइनरी डिजिट’ के रूप में प्रयुक्त होती है। परन्तु क़्वॉण्टम कम्प्यूटिंग में हम क्यूबिट का प्रयोग करते हैं। यहाँ क्यूबिट की व्याख्या कणों की क़्वॉण्टम अवस्था को आधार बना कर की जाती है। जहाँ बाइनरी अवस्था में एक समय में 0 अथवा 1 में से एक ही स्थिति सम्भव है वहाँ क्यूबिट में एक साथ 0 और 1 दोनों हो सकते हैं। इसे क़्वॉण्टम अवस्थाओं का ‘सुपरपोसिशन’ कहा जाता है अर्थात् एक समय में ही एक क़्वॉण्टम अवस्था के ऊपर दूसरी तीसरी, अनगिनत अवस्थाएं होना। जब समस्त क़्वॉण्टम अवस्थाएं एनटैंगल हो जाती हैं तो एक विचित्र सी घटना होती है। एक अवस्था में परिवर्तन करने से उससे जुड़े अन्य कणों की अवस्थाएं भी परिवर्तित हो जाती हैं भले ही वे कण सहस्रों किलोमीटर दूर हों। क़्वॉण्टम एनटैंगलमेंट को पारलौकिक क्षमताओं से जोड़ कर भी देखा जाता है किंतु क़्वॉण्टम कम्प्यूटर के क्षेत्र में देखा जाये तो किसी एक क़्वॉण्टम सर्वर पर सूचना में किये गए परिवर्तन से लाखों किलोमीटर दूर स्थित सर्वर पर भी सूचनायें स्वतः परिवर्तित हो जाएँगी। यही नहीं चूंकि मायोरना फर्मियॉन कण अपने पीछे परिवर्तन का इतिहास छोड़ जाते हैं अतः हम पुनः क़्वॉण्टम अवस्थाओं में परिवर्तन कर पुरानी सूचना प्राप्त कर सकते हैं। यह सब कुछ प्रकाश के वेग से सम्भव है। क़्वॉण्टम स्पिन लिक्विड में इलेक्ट्रॉनों के टूटने से उत्पन्न हुए मायोरना फर्मियॉन कण ‘एनटैंगल’ सूप की अवस्था में एक साथ कई क़्वॉण्टम अवस्थाएं परिलक्षित करते हैं अतएव ये कण भविष्य के क़्वॉण्टम कम्प्यूटर बनाने में प्रयुक्त हो सकते हैं जो आज के डिजिटल कम्प्यूटरों की तुलना में कहीं ज्यादा तीव्र गति से अरबों खरबों सूचनाओं की गणना कर सकेंगे।


लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

ब्लॉग: https://sciencediplomat.wordpress.com

Reference reading:
1. Quantum by Manjit Kumar
2. Computing with Quantum Cats by John Gribbin
3. Nature journal link http://www.nature.com/nmat/journal/vaop/ncurrent/full/nmat4604.html


Image credit:
Patterns formed by bombarding materials in a quantum spin liquid state with neutrons / Genevieve Martin, Oak Ridge National Laboratory

ब्रह्माण्ड से महाकैलास तक की अनन्त यात्रा

कैलास दो बताये गये हैं- भूकैलास तथा महाकैलास। प्रचलित धारणा के विपरीत कुछ विद्वानों का यह मानना है कि भगवान् शिव का निवास परमधाम कैलास चीन में स्थित पर्वत नहीं है। पुराणों के अध्येता चीन स्थित पर्वत को वास्तविक भू-कैलास भी नहीं मानते। काशी के केदारखण्ड में भगवान् गौरीकेदारेश्वर का मन्दिर है। इस मन्दिर में खिचड़ी से निर्मित शिवलिंग के प्रादुर्भाव का उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। भगवान् गौरी केदारेश्वर की महिमा ‘काशी केदार माहात्म्यम्’ नामक ग्रन्थ में वर्णित है। इस ग्रन्थ के चतुर्थ अध्याय में महाकैलास का वर्णन है:

अनेककोटिब्रह्माण्डाधारभूतमहोदके।
लक्षयोजनविस्तारा स्वर्णभूरिति शुश्रुम॥28॥
उन्नतं परमेशस्य स्थानं तल्लक्षयोजनम्।

महाकैलास इति च स्थानं वेदविदो विदुः॥29॥

चित्र आभार: काशी केदार माहात्म्यम्, श्री काशीकेदारखण्ड आध्यात्मिक संस्था

अर्थात्, अनेक कोटि ब्रह्माण्ड के आधारभूत महोदक में हम लोगों ने सुना है कि लाख योजन विस्तीर्ण स्वर्ण भूमि है। वहीं परमेश्वर का स्थान लाख योजन ऊँचा है, उसी को वेद के ज्ञाता महाकैलास कहते हैं।

यहाँ ‘आधारभूत महोदक’ पर विचार करना आवश्यक है। ग्रन्थ के अनुवादक ने इस जलरूपी महोदक को ‘परफेक्ट फ्लुइड’1 कहा है। फ्लुइड (fluid) अर्थात् वह जो बहे जैसे कि जल अथवा वायु। भौतिक विज्ञान में परफेक्ट फ्लुइड वह तरल होता है जिसमें चिपचिपापन अथवा श्यानता (viscosity) का अभाव हो तथा उसमें ऊष्मा प्रवाहित न हो सके। यह परफेक्ट फ्लुइड धरती के वातावरण में भी हो सकता है और तारों के अन्तःकरण में भी। उन्नीसवीं शताब्दी में जब माईकेल्सन और मोर्ले प्रकाश की गति ज्ञात करने में जुटे थे तब यह माना जाता था कि समूचे अंतरिक्ष की संरचना ईथर नामक अदृश्य द्रव से निर्मित है जिससे होकर गुजरते पृथ्वी आदि ग्रह घर्षण उत्पन्न करते हैं। आइंस्टीन ने गुरुत्वाकर्षण बल को सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत से समझाया और अपने इस सिद्धांत से ब्रह्माण्ड के दिक् काल संरचना की व्याख्या की। इस व्याख्या के लिए ब्रह्माण्ड में व्याप्त एक ऐसे द्रव की आवश्यकता थी जिसका व्यवहार परफेक्ट फ्लुइड जैसा हो। आज ‘टेन्सर एनालिसिस’ तथा ‘डिफरेंशियल ज्यामिति’ के समीकरणों में परफेक्ट फ्लुइड को रखना अनिवार्य तत्व है जिसकी सहायता से आधुनिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान (कॉस्मोलॉजी) ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विस्तार का अध्ययन करता है।

शास्त्रों में यह परफेक्ट फ्लुइड कई रूपों में वर्णित है। शिवपुराण रुद्रसंहिता (प्रथम खण्ड) की कथा के अनुसार जब शिव ने अपने वाम अंग के दसवें अंश पर अमृत मला तो उससे श्रीविष्णु ने जन्म लिया। श्रीविष्णु ने सहस्रों वर्षों तक तप किया तो उनके अंगों से ‘नार’ रूपी दिव्य जल निकला और पूरे आकाश (अंतरिक्ष) में व्याप्त हो गया। श्रीविष्णु ने स्वयं इस जल में स्नान किया तत्पश्चात वे ‘नारायण’ कहलाए। उस समय उन परम पुरुष नारायण के सिवा कोई अन्य प्राकृत वस्तु नहीं थी। नारायण से ही यथासमय सभी तत्व प्रकट हुए। प्रकृति से महत्तत्व प्रकट हुआ तथा महत्तत्व से तीनों गुण। इन गुणों के भेद से ही त्रिविध अहंकार की उत्पत्ति हुई। अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ हुईं और उन तन्मात्राओं से पाँच भूत प्रकट हुए।

यह वर्णन आधुनिक कणभौतिकी-ब्रह्माण्ड विज्ञान के सिद्धांत से मेल खाता प्रतीत होता है जिनमें कहा गया है कि ब्रह्माण्ड में सबसे पहले ‘बेरयॉन’ और क्वार्क जैसे कण उत्पन्न हुए जिनसे प्रोटॉन न्यूट्रॉन आदि की उत्पत्ति हुई। त्रिगुण को प्रकृति के तीन मूलभूत आकर्षण का स्वरूप माना जा सकता है जिनके द्वारा पदार्थ के कण एक दूसरे से बंधे होते हैं यथा- गुरुत्वाकर्षण, न्यूक्लिअर आकर्षण तथा विद्युतचुम्बकीय आकर्षण। ब्रह्माण्ड के आदिकाल में एक प्रकार का माइक्रोवेव रेडिएशन भी व्याप्त था जिसके छिटपुट लक्षण आज भी उन्नत उपकरणों द्वारा संसूचित किये जाते हैं।

ऋग्वेद के दसवें मण्डल के 129वें सूक्त के 1 से 7 तक के मन्त्र नासदीय सूक्त कहलाते हैं। नासदीय सूक्त का तीसरा मन्त्र देखें:

तम आसीत् तमसा गूळहमग्रेsप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम्
तुछ्येनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसस्तन्महिनाजायतैकम्॥

अर्थात्, सृष्टि से पूर्व प्रलयकाल में अंधकार व्याप्त था, सब कुछ अंधकार से आच्छादित था। अज्ञातावस्था में यह सब जल ही जल था और जो था वह चारों ओर होने वाले सत् असत् भाव से आच्छादित था। सब अविद्या से आच्छादित तम से एकाकार था और वह एक ब्रह्म तप के प्रभाव से हुआ। इस प्रकार वेद भी नार रूपी जल परफेक्ट फ्लुइड की व्याख्या करते हैं।

शिवपुराण और लिंगपुराण में कई जगह कहा गया है कि भगवान् शिव अनेक ब्रह्माण्डों की रचना एवं संहार करते हैं। महाकैलास के महोदक में स्थित होने की पुष्टि शिव अथर्वशीर्ष भी करता है। छठा मन्त्र देखें:

अक्षरात् संजायते कालः, कालाद् व्यापक उच्यते। व्यापको हि भगवान् रुद्रो भोगायमानो यदा शेते रुद्रस्तदा संहार्यते प्रजाः। उच्छ्वसिते तमो भवति तमस आपोsप्स्वङ्गुल्या मथिते मथितं शिशिरे शिशिरं मथ्यमानं फेनं भवति फेनादंडं भवत्यंडाद् ब्रह्मा भवति ब्रह्मणो वायुः वायोरोंकार ॐकारात् सावित्री सावित्र्या गायत्री गायत्र्या लोका भवन्ति॥

अर्थात्, अक्षर से काल उत्पन्न होता है। कालरूप होने से उसको व्यापक कहते हैं। व्यापक तथा भोगायमान रुद्र जब शयन करता है तब प्रजा का संहार होता है। जब वह श्वाससहित होता है तब तम होता है। तम से जल (आपः) होता है। जल में अपनी ऊँगली से मन्थन करने से वह जल शिशिर ऋतु के द्रव (ओस) जैसा हो जाता है। उसका मन्थन करने से फेन होता है। फेन से अंडा होता है। अंडे से ब्रह्मा होता है। ब्रह्मा से वायु, वायु से ॐकार होता है। ॐकार से सावित्री, सावित्री से गायत्री और गायत्री से सब लोक होते हैं।

यहाँ अंडे का अभिप्राय ब्रह्माण्ड समझा जा सकता है। फेन का मन्थन वह कालखण्ड हो सकता है जब बेरयॉन आदि कणों और पदार्थ की उत्पत्ति हुई। भगवान् शिव को काल (समय) का नियन्ता माना गया है। काल अर्थात् सृष्टि का प्रारंभ। शुक्ल यजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी में आया है: नमः पूर्वजाय चापरजाय। अर्थात् समय से पूर्व और पश्चात विद्यमान रहने वाले रुद्र को नमस्कार है। सम्भवतः इसीलिए गन्धर्वराज पुष्पदंत ने भी शिवमहिम्नस्तोत्र के दूसरे श्लोक में ही कह दिया कि हे भगवान् आपकी महिमा का बखान तो वेद (श्रुति) भी नेति-नेति (नहीं नहीं) कहते हुए करते हैं अर्थात् डरते हुए करते हैं। महाकैलास द्वारा ही एक से अनेक ब्रह्माण्डों की रचना की जाती है इसमें कोई संशय नहीं। शिव अथर्वशीर्ष के पाँचवें मन्त्र में आया है:

एषो ह देवः प्रदिशो नु सर्वाः पूर्वो ह जातः स उ गर्भे अंतः। स एव जातः स जनिष्यमाणः सर्वतो मुखः। एको रुद्रो न द्वितीयाय तस्मै य ईमाँल्लोकानीशत ईशनिभिः। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोचान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोप्ता।

अर्थात्, यही देव सब दिशाओं में रहता है। प्रथम जन्म उसी का है, मध्य में तथा अंत में वही विद्यमान है। वही उत्पन्न होता है और होगा। प्रत्येक व्यक्तिभाव में वही व्याप्त हो रहा है। एक रुद्र ही किसी अन्य की अपेक्षा न करते हुए अपनी महाशक्तियों से इस लोक में नियम रखता है। सब उसमें रहते हैं और अंत में सबका संकोच उसी में होता है।

यह विवरण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सिद्धांत बिग बैंग के ठीक उलट ‘बिग क्रंच’ कहे जाने वाले प्रतिपादन की ओर संकेत करता है। पॉल स्टाइनहार्ट और नील टुरोक के सिद्धांत के अनुसार तरंगों के रूप में कई ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं और जब भी एक ब्रह्माण्ड की परत दूसरे से स्पर्श होती है तब वहाँ कृष्ण विवर (ब्लैक होल) बन जाता है और यह दूसरे ब्रह्माण्ड तक जाने का मार्ग होता है। यह तभी सम्भव है जब पदार्थ पूर्ण रूप से ऊर्जा में परिवर्तित हो सूक्ष्म क्वॉन्टम अवस्था में गमन करे। इस अवस्था में स्थूल शरीर नहीं केवल ऊर्जा रूपी प्राण होता है।

पुष्पदंत ने शिव को कण रूपी व्यष्टि और ब्रह्माण्ड रूपी समष्टि दोनों प्रकार से प्रणाम किया है: नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः। वेद पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों में क्लिष्ट गणितीय समीकरण भले न हों किंतु वह दर्शन अवश्य है जिससे परमार्थ विज्ञान तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त हो। ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने की यात्रा महाकैलास धाम तक पहुँचने के प्रयास से कम नहीं। ॐ नमः शिवाय।


लेखक: यशार्क पाण्डेय
वाराणसी

ब्लॉग: https://sciencediplomat.wordpress.com

 


1 Perfect fluid अर्थात पूर्ण द्रव – Perfect लैटिन के per और facere से मिला कर बना है जिसका अर्थ होता है पूर्ण करना। perfectus का अर्थ ही completed होता है। Per की पूर्ण से समानता द्रष्टव्य है। द्रव की संगति द्रु से है – द्रु गतौ-भावे अप् जिसका अर्थ प्रवाह और (अश्व की तरह) गति से है। यहाँ dra मूल और draw शब्द को देखने से न्यून प्रतिरोध वाले श्यानहीन गति स्पष्ट होती है। विमानन विद्या में भी आगे बढ़ने के लिये draw शब्द का प्रयोग होता है जब कि ऊपर उठने के लिये lift का।
सम्पादकीय टिप्पणी


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