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शून्य – 5

शून्य – 1, शून्य – 2 , शून्य – 3, शून्य – 4 से आगे …

शून्य के वर्तमान गोले के रूप में लिखे जाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई इसका ठीक ठीक पता नहीं पर ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर में अंकित शून्य ही प्रथम लिखित शून्य  के रूप में मान्य है वैसे शून्य के लिए ‘ख’ अक्षर का प्रयोग और ‘खगोल’ शब्द से पता चलता है कि यह परंपरा उतनी ही पुरानी रही होगी जितना ‘खगोल’ शब्द – ख-गोल अर्थात शून्य-गोल, हर बिंदु से आरंभ हर बिंदु पर अंत।

इसकी चर्चा की यात्रा आरम्भ हुई थी पाणिनि-पिंगल के युग से। उस युग से इस युग की लंबी यात्रा में शून्य के रूप का परिवर्तन देखना चाहें तो वो बहुत अधिक नहीं है। आज भी वही रूप है। समय के साथ शून्य की महत्ता बढ़ती गयी और उससे बने संसार का विस्तार होता गया। शून्य जो अमूर्त था उसे हम बेहतर तरीके से समझते गए। यह यात्रा शुद्ध गणित के हर उस यात्रा की तरह है जिसकी परिकल्पना करने वाले मनीषियों के मस्तिष्क में उसका कोई उपयोग नहीं होता। अमूर्त-दार्शनिक सिद्धांत अक्सर प्रकृति के नियमों का निरीक्षण कर बनाये जाते हैं और कई बार केवल विशुद्ध अंतःकरण से उपजी दार्शनिक परिकल्पना होते हैं जो कालांतर में जनजीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं। गणित का स्वरुप ही यही है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने ऐसे ही गणितीय सिद्धान्तों पर कहा:

How can it be that mathematics, being after all a product of human thought which is independent of experience, is so admirably appropriate to the objects of reality?

भास्कराचार्य के बाद शून्य का स्वरुप बहुत कम बदला। शून्य से विभाजन का अपरिभाषित होना ही शून्य से विभाजन की परिभाषा बन गयी। लिमिट अर्थात शून्य की जगह अति सूक्ष्म अंक के इस्तेमाल ने कलन और आधुनिक गणनाओं को संभव किया जिनके रूप आज भी वही हैं। शून्य के आधुनिक उपयोग में बाइनरी अंको की चर्चा करें तो वहां भी सैद्धान्तिक गणक की परिकल्पना के बहुत बाद कम्प्यूटर का जन्म हुआ। छंद शास्त्र के जनक पिंगल ने छंदों के लिए दो अंको का इस्तेमाल कर पहली बार उस पद्धति का उल्लेख किया था जिसे आज हम बाइनरी कहते हैं। बाइनरी यानी द्विआधारी अंक पद्धति- केवल शून्य और एक से बनी अंक पद्धति जिससे बना है आज का डिजिटल संसार जो शून्य के बिना असंभव है। हजारों साल पहले जिस तरह इसकी परिकल्पना कठिन थी उसी तरह आज शून्य के बिना संसार की कल्पना संभव नहीं।

यह शृंखला आरम्भ हुई थी भारतीय अंको और शून्य के अरब होते हुए पश्चिम जाने से। भारतीय अंक और शून्य यात्रियों और व्यापारियों के साथ पश्चिम ही नहीं चीन भी पहुंचे। अरबी में आज भी अंको को ‘रकम-अल-हिन्द’ कहते हैं। पर हमें यह भी नहीं पता होता कि संस्कृत का शून्य ही अरब के सिफर या जिफर हुआ जहाँ से आगे वो लैटिन जेफिरम होता हुआ आज का जीरो बना।

हम बगदाद के गणितज्ञ मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी के बारे में पढ़ते हैं जिसके अल-जबर से अलजेब्रा शब्द बना तथा जिसके नाम से ही आज का अल्गोरिथम शब्द बना। पर यह नहीं पढ़ते कि अल-ख़्वारिज़्मी की कई गणितीय और खगोलीय पुस्तकें सिंद-हिंद पर आधारित थी। सिंद-हिन्द और अल-अरकंद नामक पुस्तकें ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के थोड़े परिवर्तनों के साथ अनुवाद भर थी।

अल-ख़्वारिज़्मी ने भारतीय गणित पर ‘अल जमवाल तफ़रीक़ बि हिसाब अल-हिन्द’ (हिन्दू अंकों से गणना की किताब) नामक किताब भी लिखी थी। जिसका लैटिन में ‘लिबेर अल्गोरिज्मी डे न्यूमेरो इंडोरम’ (अल-ख़्वारिज़्मी की भारतीय अंकों पर पुस्तक) नाम से अनुवाद हुआ। अल-ख़्वारिज़्मी ने भारतीय अंक पद्धति का वर्णन करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा है कि नौ अंको के साथ शून्य के लिए छोटे से वृत्त के उपयोग से भारतीय किसी भी अंक को लिख देते हैं।

शून्यादि अंको के अलावा भी कई गणितीय सिद्धांत भारत से अरब पहुंचे। दूसरे अब्बासी खलीफा, अल-मंसूर (753-774 ई) के काल में सिंध से कई विद्वान बग़दाद गए थे। अल बरुनी ने इन विद्वानों के खगोलीय और गणितीय जानकारी के बारे में कई जगह लिखा है। इसी काल में ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के अनुवाद भी सिंधहिन्द और अल-अरकंद के रूप में हुए।  इब्न-अल-अदामी  ने भारतीय खगोलीय विद्या के आधार पर खगोलीय सारणी की एक पुस्तक लिखी जिसकी प्रस्तावना में उसने बग़दाद में एक ऐसे भारतीय से मिलने की बात लिखी जो अपने साथ ग्रहों के समीकरण लेकर आया था। जिसे ग्रह-नक्षत्रों की गति, सूर्य और चंद्र ग्रहणों की पूरी जानकारी थी। कई अरबी-फ़ारसी पुस्तकों में कनक नामक गणितज्ञ का उल्लेख आता है। जिसके बारे में यह मान्यता  है कि भारतीय गणितज्ञों और खगोलविदों का प्रभाव अरब संसार में कुछ इस तरह था कि गणक से बना कनक केवल एक व्यक्ति नहीं था। कनक शब्द भारतीय गणितज्ञों और खगोलविदों को संबोधित करने के लिए प्रयुक्त होने लगा था।

अंकों के यूरोप आगमन पर उन दिनों यूरोपीय संस्कृति के केंद्र फ्लोरेंस शहर राज्य ने इस्लामी प्रभाव को रोकने और रोमन अंको के इस्तेमाल को जारी रखने के लिए व्यापारियों द्वारा लाये गए  इन अंको पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। पर 1202 ई. में छपी पिसा के फिबोनाची की पुस्तक लिबेर अबाचि ने यूरोप को एक से नौ तक के अंक और ज़ेफिरम से परिचय कराया जिसके साथ भारतीय, हिन्दू, बौद्ध और जैन धार्मिक दर्शनों से बनी मनीषा की उपज भारतीय अंक और शून्य, जिनके एक छोर पर शून्य और दूसरे छोर पर अनंत थे, नए नामों के साथ पूरी दुनिया में विस्तार पा गये।

यह आश्चर्य भी है और बिडम्बना भी कि भारत में प्राथमिक से लेकर उच्चतर गणित तक की पुस्तकों में भारतीय गणितज्ञों का नाम नहीं आता। श्रीधर आचार्य का एक फुटनोट में उल्लेख के अलावा मैंने गणित की किसी भी शैक्षणिक पुस्तक में किसी भारतीय गणितज्ञ का नाम नहीं पढ़ा। पाइथागोरस प्रमेय को चीन में गौगु थ्योरम कहते हैं। संसार में पाइथागोरस थियोरम का पहला उल्लेख मिस्र में मिलता है।

सटीक गणितीय परिभाषा का पहला वर्णन बौधायन ने किया। और पहला गणितीय प्रमाण चीन में – लेकिन नाम पाइथागोरस का।  भारतीय मिथ के सामने बौने होते हुए भी मनोविज्ञान में हमें हर ग्रीक मिथ के नाम पर एक सिद्धांत मिलता है।

कई कारण है ऐसा होने के। गणित के अलावा भी कई क्षेत्रों में।

भारतीय ग्रंथों और सिद्धांतों के यथारूप अध्ययन और शोध बहुत कम किये गए। हम भारतीय सिद्धांत अक्सर पश्चिमी विद्वानों के अनुवाद से पढ़ते हैं। शून्य के यात्रा की तरह हम पहले ज़ीरो पढ़ते हैं फिर यह कि उसका अनुवाद शून्य होता है।  यह बिडम्बना है कि या तो कुछ लोग ग्रंथों में क़्वांटम फिजिक्स ढूंढने लग जाते हैं या ग्रंथों की बातें करने वालों को पुरातनपंथी और कट्टर कह कर नकार देते हैं। मेरे एक मित्र ने मैसूर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से कई भोजपत्रों और लकड़ी की पटरियों पर अंकित आलेखों की तस्वीरें भेजी थी। ऐसे कितने ही ग्रन्थ समय के साथ खो गए। कितने उपेक्षित पड़े रह गये।


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

शून्य – 3

शून्य – 1, शून्य – 2 से आगे …

‘शून्य’ की प्रथम स्पष्ट गणितीय परिभाषा ब्रह्मगुप्त (628 ई.) के ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त में मिलती है। यह वह युग था जब अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति वेदांग ज्योतिष से अलग गणित के रूप में लगभग स्वतंत्र पहचान बना चुके थे। आर्यभटीय ज्योतिष का पहला ग्रन्थ है जिसमें गणित के लिए एक स्वतंत्र अध्याय है। ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त गणित की एक कालजयी रचना है। इस पुस्तक में गणित के कई सिद्धांत हैं और इसके अरबी अनुवाद ने विश्व में गणित को एक नयी दिशा दी. उस युग की परंपरा के अनुसार गणित की पुस्तक होते हुए भी यह पूरी तरह काव्य रूप में थी। कुट्टकाध्यायः (बीजगणित) नामक अठारहवें अध्याय में शून्य से जुडी छः प्रक्रियाओं का उल्लेख है:

धनयोर्धनमृणमृणयोर्धनर्णयोरन्तरं समैक्यं खम्। ऋणमैक्यं च घनमृणधनशून्ययोः शून्ययोः शून्यम्॥
ऊनमधिकात्विशोध्यं धनं धनातृणमृणातधिकमूनात्। व्यस्तं तद्-अन्तरं स्यातृणं धनं धनमृणं भवति॥

शून्य-विहीनमृणमृणं धनं धनं भवति शून्यमाकाशम्। शोध्यं यदा धनमृणातृणं धनात्वा तदा क्षेप्यम्॥
ऋणमृणधनयोर्घातो  धनमृणयोर्धनवधो  धनं भवति। शून्यर्णयो: खधनयो: खशून्ययोर्वा वध: शून्यम्॥
धनभक्तं धनमृणहृतमृणं धनं भवति खम् खभक्तम् खम्। भक्तमृणेन धनमृणं धनेन हृतमृणमृणं भवति॥
खोद्धृतमृणं धनं वा तच्छेदम् खमृणधनविभक्तं वा। ऋणधनयोर्वर्ग: स्वम् खम् खस्य पदं कृतिर्यत् तत्॥

अर्थात समान धनात्मक और ऋणात्मक संख्याओं का योग शून्य होता है। (यहाँ खम्, शून्य और आकाश तीनों शब्दों का ब्रह्मगुप्त ने प्रयोग किया)। ऋणात्मक संख्या का शून्य से योग ऋणात्मक होता है।  शून्य और धनात्मक का योग धनात्मक होता है। दो शून्य का योग शून्य ही होता है। ऋणात्मक संख्या को शून्य से घटाया जाय तो वह धनात्मक हो जाती है और धनात्मक संख्या को शून्य से घटाने पर ऋणात्मक। यदि ऋणात्मक संख्या में से शून्य घटाया जाय तो वह ऋणात्मक ही रहती है। उसी प्रकार धनात्मक संख्या में से शून्य घटा देने से वह धनात्मक ही रहती है। शून्य में से शून्य घटा देने से शून्य ही बचता है। शून्य का धनात्मक संख्या, ऋणात्मक और शून्य सबसे गुणनफल शून्य ही होता है। शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य बचता है। किसी भी ऋणात्मक या धनात्मक संख्या को शून्य से भाग देने पर तच्छेद।

यहाँ शून्य को शून्य से भाग देने पर शून्य बचने और शून्य के विभाजन के तच्छेद होने की बात को छोड़कर आज भी शून्य वैसे का वैसा ही है। ब्रह्मगुप्त की परिभाषा आधुनिक गणितीय परिभाषा है। 0/0 की परिकल्पना तो ब्रह्मगुप्त ने की परन्तु उसकी सही व्याख्या उन्होंने नहीं की, उन्होंने इसे भी शून्य ही कहा। इसी तरह शून्य से विभाजन को उन्होंने तच्छेद नाम दिया पर इसकी प्रकृति के बारे में कुछ नहीं कहा, यह शून्य से विभाजित एक अपरिभाषित भिन्न ही रहा। इन सीमाओं से इस बात की महत्ता कम नहीं होती कि यह ऋणात्मक संख्याओं और शून्य का विश्व में पहला स्पष्ट गणितीय विश्लेषण है।

इस सिद्धांत की जड़ स्थानीय मान पद्धति, आर्यभट की अक्षरांक पद्धति और भास्कर प्रथम के आर्यभटीय की व्याख्या में वर्णित दाशमिक प्रणाली में मिलती है। आर्यभट ने शून्य का उल्लेख इस रूप में तो नहीं किया और न ही उन्होंने शून्य को परिभाषित किया परंतु उनके कार्यों में उन्हें शून्य के ज्ञान होने की झलक दिखती है। आर्यभट की अक्षरांक पद्धति में उनकी अद्भुत विलक्षणता दिखती है। आर्यभट की शैली और प्रतिभा की बात करने पर हम शून्य की बात से भटक जायेंगे।  गीतिकापाद के मात्र 13 श्लोकों में अपनी अद्वितीय शैली से आर्यभट ने इतना कुछ लिख दिया कि उस पर एक पुस्तक लिखी जा सकती है। आर्यभट ने अंकों के लिए ब्राह्मी अंकों का प्रयोग नहीं किया,  ना ही पद्य रूप में चली आ रही शब्द परंपरा का। उन्होंने अक्षरों में अंको को लिखने की स्वनिर्मित पद्धति अपनायी जो अद्भुत और अद्वितीय है। श्रुति की परंपरा से सोचें तो गणित को श्लोकों में लिखना और कम से कम श्लोकों में अधिक से अधिक ज्ञान लिख देना परंपरा थी। आर्यभट का कार्य लघुता और कूट भाषा का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। आर्यभट की अक्षरांक पद्धति व्यवहार की दृष्टि से अत्यंत कठिन प्रतीत होती है पर उसकी विलक्षणता अद्वितीय है। व्यवहार की दृष्टि से कठिन इसलिये क्योंकि उसे समझना सरल नहीं है। अक्षरों से बने अंकों का उच्चारण सरल नहीं, कूट भाषा है। अंक में एक मात्रा के हेर फेर से भी अंकों के मान में भारी परिवर्तन हो जाता है। उनकी पद्धति यह है:

वर्गाक्षराणि वर्गे अवर्गे अवर्गाक्षराणि कात्ङ्मौ य:। ख द्विनवके स्वरा: नव वर्गे अवर्गे नवान्त्य-वर्गे वा॥

स्वरों से इकाई, दहाई आदि स्थान का परिचायक (अ = 1, इ = 100, उ= 10,000, ऋ = 1,000,000 …. औ = 1016) और क से म तक व्यंजनों से क्रमशः 1 से 25 अर्थात क = 1, ख = 2, ग = 3…. म = 25. उसके आगे य = 30, र = 40, ल = 50, … ह = 100.

युग गणना में प्रसिद्ध आर्यभटीय अक्षरांक ख्युघृ का कूटानुवाद आज के अंकों में कुछ यूँ है:

ख्युघृ = 4,320,000

खु = 2×10000 = 20,000
यु = 30 x 10000 = 300,000
घृ = 4 x 1000000 = 4,000,000
योग = 4,320,000

एक दूसरी प्रसिद्द संख्या ङिशिबुणॢख्षृ = 1,58,22,37,500

ङि = 5×100 = 500
शि = 70×100 = 7,000
बु = 23×10000 = 2,30,000
णॢ = 15×108 = 1,50,00,00,000
ख्षृ= (2+80)x106 = 8,20,00,000
योग = 1,58,22,37,500

शून्य का स्पष्ट उल्लेख आर्यभट ने नहीं किया परन्तु उनके यहाँ अंको के स्थानीय मान और दस के घात के वर्णन कुछ यूँ है कि शून्य का वर्णन नहीं होते हुए भी वह पद्धति में अन्तर्निहित है। इसी पुस्तक के गणितपाद प्रकरण में आर्यभट संख्या स्थानों के वर्णन में ‘स्थानात् स्थानं दशगुणम् स्यात्’ लिखते हैं। दर्शन, व्याकरण, अक्षरांक पद्धति से लेकर ब्रह्मगुप्त की स्पष्ट गणितीय परिभाषा तक धीरे धीरे शून्य अपना रूप लेता गया – क्रमिक विकास। खाली स्थान लिखने की परंपरा से एक खाली अंक होता हुआ अन्ततः सभी अंको का स्थान निर्धारित करने वाला अंक – अंको का सिरमौर! शून्य का वर्तमान लिखित रूप कब आया वह भी महत्त्वपूर्ण है। शून्य के वर्तमान रूप ‘0’ के पहले लिखित सन्दर्भ ग्वालियर और अंकोरवाट में मिलते हैं। पर शून्य की परिकल्पना का विकास उससे अधिक मायने रखता है। लिखित रूप ‘0’ के पहले प्रमाण से बहुत पहले से शून्य था।

ब्रह्मगुप्त की शून्य से विभाजन की सीमाओं के साथ शून्य का यह रूप गणित में अगले 500 वर्षों तक चला। 830-850 ई. में महावीर ने ‘गणित सार संग्रह’ की रचना की जो कि ब्रह्मगुप्त के गणित का ही परिष्कृत रूप था। इसमें वह शून्य के बारे में लिखते हैं कि किसी भी संख्या को शून्य से गुणा करने पर वह शून्य हो जाती है, शून्य को जोड़ने, घटाने या उससे भाग देने पर संख्या अपरिवर्तित रहती है। गणित की इस प्रसिद्ध पुस्तक में भी शून्य से विभाजन को महावीर ने सही परिभाषित नहीं किया। ब्रह्मगुप्त के लगभग 500 वर्ष पश्चात भास्कर द्वितीय ने 1114 ई में शून्य से विभाजन की नये सिरे से व्याख्या की।

अगले अंको में : भास्कर के शून्य से विभाजन की परिभाषा। अनंत के सिद्धांत का प्रतिपादन।
लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
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गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
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