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शून्य – 2

शून्य – 1 से आगे …

अंक हर सभ्यता में किसी न किसी रूप में रहे हैं। अंको की कल्पना एकैक फलन के रूप में वस्तुओं की गणना के लिये हुई, जो सम्भवतः पशुओं की गणना रही होगी। जितने पशु उतने कंकड़ रख लेने की परंपरा से शुरुआत हुई होगी। परन्तु शून्य और अनंत इस फलन और परंपरा के परे की कल्पना हैं। आज हमें सम्भवतः शून्य और अनंत सामान्य सिद्धांत लगें पर सोचिये कि किसी ने सबसे पहले कैसे शून्यता की, गणनीय से परे अंको की, अनंत की कल्पना की होगी।  (पूर्णमदः पूर्णमिदं से लेकर कैंटर तक, – अनंत एक स्वतंत्र शृंखला के योग्य है)। प्रकृति के नियमों का अवलोकन कर और कई बार विशुद्ध अंतःकरण से उपजे अमूर्त सिद्धांतो में शून्य और अनंत अग्रणी हैं।

भारत के अलावा किसी भी प्राचीन सभ्यता में गणनीय अंको की सीमा से परे जाकर विशाल अंकों की परिकल्पना देखने को नहीं मिलती, चाहे ब्रह्माण्ड की विशालता का अनुमान हो, काल गणना हो, या सृष्टि में जीवों का अनुमान।

यजुर्वेद में एक से आरम्भ कर अंकों को क्रमशः दस गुना करते हुये एक, दस, शत, सहस्र, आयुत, नियुत, प्रयुत, अर्बुद, नियर्बुद, समुद्र, मध्य, अंत, परार्ध (1012) अंकों का उल्लेख है। ये अंक आज के हिसाब से भी विशाल अंक हैं। यही विधि महायान बौद्ध सम्प्रदाय के ग्रन्थ ललितविस्तर (100 ई.पू.) में भी मिलती है जहाँ दस के स्थान पर सौ गुणा से बढ़ते हुये अंको का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में एक प्रसंग है जिसमें गोपा (यशोधरा) के स्वयंवर में सिद्धार्थ जब लेखन, मल्लविद्या, तैराकी जैसी कई प्रतियोगितायें जीत लेते हैं, तब गणितज्ञ अर्जुन युवा बुद्ध से प्रश्न करते हैं,“क्या तुम्हें कोटि से बड़ी सौ के गुणन वाली संख्याओं के बारे में पता है?” उत्तर में सिद्धार्थ बताते हैं,”सौ कोटियों से एक अयुत बनता है। सौ अयुत से एक नियुत।“ ऐसे अंको को सौ गुना करते हुये सिद्धार्थ ने तल्लक्षण 1053 (1 के आगे 53 शून्य) का उल्लेख किया। इसके बाद एक दूसरा क्रम शुरू कर असंख्येय (10420) का भी उल्लेख किया। जैन संहिताओं में भी ऐसे ही विशाल अंको का उल्लेख है। जैन ग्रन्थ अनुयोग द्वार सूत्र में दस और सौ की तरह दो के अपवर्त्य में संख्याओं का वर्णन करते हुये 296 का उल्लेख है।

हजारों साल पहले ‘जब कुछ नहीं हो, तब क्या हो’ की कल्पना किसी ने कैसे की होगी? इसकी मूलभूत अवधारणा में भारतीय मनीषियों की विलक्षणता है। शून्य की परिकल्पना की सर्वप्रथम झलक मिलती है – पाणिनि के ‘लोप’, न्याय तथा वैशेषिक दर्शनों के ‘अभाव’ और नागार्जुन की ‘शून्यता’ में। पाणिनि के 500 ई.पू. में किये गये अनुच्चारण की कल्पना ‘लोप’ से – अदर्शनं लोप:! (पाणिनि की अष्टाध्यायी को गणित की पुस्तक नहीं कहा जा सकता, न ही इन बातों को शून्य का गणितीय रूप;  परन्तु वैसी तार्किक संरचना और सूत्रों में पूरी संस्कृत भाषा को लिख देना – संसार में ऐसा विलक्षण कोई उदाहरण नहीं)। शून्य की दार्शनिकता के बीज औपनिषदिक महावाक्यों के ‘नेति नेति’ में हैं। जिसकी परिणति सदियों से चले आ रहे दार्शनिक सिद्धांत जैसे अभाव, खालीपन, माया, लीला, शून्यता आदि हैं।

वैशेषिक दर्शन में  संसार भाव और अभाव में विभाजित है। अभाव अर्थात – न होना। प्राग् अभाव – कुछ होने के पहले उसके न होने की अवस्था। जो था उसके नाश हो जाने के बाद की अवस्था – प्रध्वंस अभाव। जो कभी था ही नहीं उसकी अवस्था – अत्यंत अभाव और अन्योन्याभाव अर्थात एक में होने से उसका दूसरे में अभाव। अभाव को परिभाषित करते हुये महर्षि कणाद (उलूक) लिखते हैं:
यत्किंचिन्न कदाचित भवति। किंचिच्च  कदाचिद्भवदपि केनचिद्रूपेण कुत्रचिद्भवति , न सर्वदा, न रूपांतरेण न खल्वपि सर्वत्र।
यह गणितीय परिभाषा नहीं है। परन्तु भाव-अभाव और शून्यता जैसी अमूर्त अवधारणायें हजारों वर्षों से भारतीय सोच का हिस्सा रही हैं, जो पश्चिमी सोच के लिये किसी और ग्रह की बात लगती है।

शून्यता नागार्जुन का आधारभूत सिद्धांत है – संसार में एकमात्र मूल तत्व शून्य है और बाकी सब पदार्थ सत्ताहीन। शून्यता से परे भी मूलमध्यमककारिका में नागार्जुन की विलक्षण द्वंद्वात्मक दार्शनिकता दिखती है। द्वंद्वात्मक दार्शनिकता और विरोधाभास (कंट्राडिक्शन) का गणित में बहुत महत्त्व है। साथ ही ऐसा लगता है कि जेन दार्शनिकता भी नागार्जुन के दर्शन का ही एक रूप है।

न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम्। चतुष्कोटिर्विनिर्मुक्त तेत्वं माध्यमिका विदु:॥

अस्ति (है), नास्ति (नहीं है), तदुभयम् (हो भी सकता है नहीं भी), नोभयम् (तदुभयं का उल्टा)के परे, इन चार संभव संभावनाओं के परे, रिक्त समुच्चय को नागार्जुन शून्यता कहते हैं। नागार्जुन ने विरोधाभास से  शून्यता और निर्वाण को परिभाषित किया। नागार्जुन की शून्यता और श्रुति परम्परा के  नेति-नेति और माया एक ही नहीं लगते हैं?

नागार्जुन शून्य को ज्ञान या चेतना भी नहीं कहते क्योंकि ऐसा करने से शून्य में गुण आ जायेगा। उनका शून्य हर गुण से परे है। यह उस दार्शनिक प्रश्न की तरह है कि नेत्रहीन को क्या दीखता है? अगर हम कहें काला या अँधेरा तो अर्थ हुआ कि नेत्रहीन को ‘कुछ’ दिखता है!  नेत्रहीन को काला नहीं दीखता, कुछ नहीं दीखता। शून्य दीखता है। हमारे लिये सोच पाना कठिन है क्योंकि हमें सब कुछ दीखता है -अँधेरा भी। नागार्जुन ने बार बार कहा है कि शून्य न अच्छा है न बुरा, न सत्य न असत्य, न धनात्मक न ऋणात्मक;  माध्यमिक मार्ग। इसका अर्थ यह नहीं कि वह शून्य को महत्त्वहीन मानते हैं। शून्य में इस तरह परिभाषित कर वह उसमें अनन्त संभावनायें देखते हैं – सृष्टि, निर्वाण।  उनकी बात ऐसे लिख देने पर सहज हो जाती है:
… -4, -3, -2, -1, 0, 1, 2, 3, 4…

शून्य,  अंकों को अनन्त चक्र में डालता हुआ, उन्हीं नौ अंकों को आपस में फेंटते हुये अलग अलग रूप देता हुआ। स्वयं न धनात्मक, न ऋणात्मक पर सबका केंद्र। शून्य कुछ नहीं पर उसके बिना कोई अंक संभव नहीं। वह अंक भी नहीं जिनमें शून्य नहीं। 516 को 516 की तरह नहीं लिखा जाना अर्थहीन होगा अगर ५१० परिभाषित नहीं हो! अर्थात नागार्जुन अपनी शून्यता को सृष्टि में वैसे ही घुमाते हैं जैसे अंकों में स्थानीय मान बनाता शून्य। नागार्जुन कहते हैं कि शून्यता के बिना कुछ भी संभव नहीं -ठीक वैसे ही जैसे शून्य के बिना अंक संभव नहीं। सृष्टि – शून्य से प्रकट उसी में विलीन।

अगले अंको में शून्य के गणितीय रूप विकास। आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर की शून्य की परिभाषा शून्य से विभाजन की समस्या और अनंत के सिद्धांत का प्रतिपादन।


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

 

शून्य

शून्य वि। तुच्छम्। … शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके।
(अमरकोश)

‘शून्य’ [0] गणित में अब तक की सबसे सबसे बड़ी खोज है। उसके बिना दस आधार वाली भारतीय अंक पद्धति और अंको के स्थानिक मान की पद्धति संभव नहीं और उसके बिना आज के गणित और विज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। यह अंकों और गणनाओं का युग है। अंको के बिना जीवन सोच पाना असंभव है। अगर हम अपने आस पास देखें तो ऐसी कोई चीज नहीं जो अंकों के बिना संभव हो, कुछ भी नहीं! और अंकों को इतना उपयोगी बनाने में सबसे बड़ा योगदान शून्य का है।

भारतीय परंपरा के अतिरिक्त इतिहास में अंकों की कई पद्धतियाँ रही हैं, रोमन, ग्रीक, हिब्रू इत्यादि, परन्तु सभी पद्धतियों में अंकों के लिए वर्णमाला के अक्षर प्रयुक्त होते थे। शून्य, स्थानिक मान की पद्धति और दशमलव जैसे सिद्धांत किसी भी और पद्धति में नहीं थे। शून्य के बिना न तो अंकों का निरूपण आसानी से हो सकता है न गणितीय संक्रियायें जिसके कारण रोमन अंकों की पद्धति में बड़ी संख्याओं को लिखना बहुत कठिन होता है और जोड़ घटाव लगभग असंभव।

आप ने कभी किसी पुराने ब्रिटिश कालीन भवन पर रोमन में लिखे निर्माण सन् का मान पता करने का प्रयास किया है?

रोमन पद्धति में ऋणात्मक संख्यायें, भिन्न, द्विघाती समीकरण, दशमलव अंक सोच पाना भी संभव नहीं! हमारे लिये यह सोच पाना भी कठिन है कि बिना शून्य और दस अंकों की पद्धति के संसार चलता कैसे था! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज से एक हजार वर्ष पहले कई देशों के मँझे हुये गणितज्ञ जो गणनायें कर पाते थे, उनसे अधिक आज की पाँचवी कक्षा के छात्र कर लेते हैं। एक लंबे समय तक कई सारे आविष्कार इसलिये नहीं हो पाये कि संसार के बहुत बड़े भाग में अंकों का विकसित तरीका नहीं था।

पश्चिमी सभ्यता की बात करें तो पीजा (Pisa) के एक वाणिज्यदूत बोनाची के पुत्र लिओनार्दो पिसानो को अपने पिता के साथ अल्जीरिया जाने का अवसर मिला। वहाँ उसे एक अरबी व्यापारी ने भारतीय अंक पद्धति से परिचय कराया। फिबोनाची, जिसका शाब्दिक अर्थ हुआ बोनाची-पुत्र, के लिए यह अद्भुत था! फिबोनाची को नयी अंक पद्धति में असीमित संभावनायें दिखीं। जो गणनायें रोमन अंक पद्धति में असंभव थीं उन्हें भारतीय अंक पद्धति से बड़ी सरलता से किया जा सकता था। वह इतना प्रभावित हुआ कि अगले कई वर्षों तक भूमध्य सागर के तट पर स्थित देशों का भ्रमण कर व्यापारियों से गणित सीखता रहा।
१२०२ ई. में फिबोनाची ने ‘लिबेर अबाचि’’ अर्थात ‘गणना की पुस्तक’ की रचना की। यह भारतीय अंक पद्धति से यूरोप का पहला परिचय था। फिबोनाची ने इस पुस्तक में मोडस इंडोरम  यानि भारतीय पद्धति का उल्लेख किया। यह शून्य सहित एक से नौ तक अंको की परंपरा और स्थानीय मान की विधि से अंको को लिखने की पद्धति थी। इस पुस्तक में फिबोनाची ने अंको की नयी पद्धति के साथ साथ इसके प्रयोग के व्यावहारिक उदाहरण भी दिये जिनमें व्यापारियों से सीखे गये हिसाब रखने के तरीके विशेष थे। इसी पुस्तक में एक प्रश्न के हल के रूप में गणित के विख्यात ‘फिबोनाची क्रम’ का उल्लेख भी था। इस क्रम का वर्णन इससे पहले विरहाङ्क (६००-८०० ई.), गोपाल (११३५ ई. के पहले) तथा हेमचन्द्र (११५० ई. के पहले) ने भी किया था। फिबोनाची क्रम को गणितज्ञ गोपाल-हेमचन्द्र नम्बर्स के नाम से भी जानते हैं। जैन विद्वान और दार्शनिक हेमचन्द्र को कलिकाल सर्वज्ञ भी कहते हैं।  वैसे तो फिबोनाची के परिचय के बावजूद लगभग दो सौ वर्षों तक यूरोप में अंको की भारतीय पद्धति पूरी तरह प्रचलित नहीं हुई, पर विज्ञान में आविष्कारों की गति को इस परिचय से अधिक गति इतिहास के किसी परिचय ने नहीं दी। फिबोनाची को इस परिचय और अध्ययन के लिए मध्यकालीन यूरोप का सबसे प्रतिभासम्पन्न गणितज्ञ माना जाता है।

शून्य का प्रयोग भारत में सदियों पहले से था। कई सन्दर्भों को नकारने वाले लोग भी यह मानते हैं कि कम से कम ५०० ई. तक भारत में शून्य का प्रयोग होने लगा था। इनमें सबसे प्रमुख नाम आता है आर्यभट का, जिन्हें हम शून्य का आविष्कारक भी कहते हैं जो कि सच नहीं है। आर्यभट ने शून्य का लिखित वर्णन किया है। शून्य के लिए ‘ख’।

‘आर्यभटीय’ पर भास्कर की टीका से लिया गया अंश

परन्तु उससे पहले कई सन्दर्भों में शून्य का वर्णन आया है। ऋग्वेद में रथचक्र की धुरी के गोलाकार छिद्र और विवर के लिये ‘ख’ के प्रयोग कुछ विद्वानों ने इंगित किये हैं। खुले भूदृश्य में रात में गोलाकार दिखता आकाश भी बाद में ‘ख’ कहलाया। यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा मेंं दाशमिक प्रणाली के स्पष्ट वर्णन हैं जिनमें क्रमश: दस गुना करते हुये परार्द्ध 1012  जितनी संख्या तक की गणना बताई गई है:

कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय शाखा, 4.4.11

ऋग्वेद और अथर्ववेद के गणना और संख्या विषयक प्रयोग स्वतंत्र आलेख के योग्य हैं। ‘ख’ और शून्य के अन्य आर्यभटपूर्व प्रयोग हैं: पिंगल  के छंदशास्त्र में (लगभग ४०० ई पू, मान्यताओं के अनुसार पिंगल प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के भाई थे), बृहदारण्यक उपनिषद् में, शतपथ ब्राह्मण में और अमरकोश में – शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके।

शून्य की परिकल्पना सबसे पहले भारत में होने का बहुत बड़ा कारण है – गणित का अध्ययन वेदांग के रूप में होना। अंकों का आविष्कार वस्तुओं को गिनने के लिए हुआ। पर शून्य और उसकी परवर्ती ऋणात्मक संख्यायें गणित के पहले अमूर्त रूप हैं, पहली गणितीय काल्पनिकता – ‘शुद्ध गणित’। गणित में होने से पहले दार्शनिक दृष्टि से शून्य की चर्चा भारतीय ग्रंथों में कई बार आयी है। शून्यता अर्थात  बृहदारण्यक उपनिषद का ‘ॐ  खं ब्रह्म’। ख, शून्य, अम्बर, रिक्त, अभाव, तुच्छ, बिंदु इत्यादि शब्दों का प्रयोग शून्य के संकेत 0 के बहुत पहले से होता रहा। आर्यभट के बाद ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर ने शून्य को न केवल गणितीय रूप से परिभाषित किया बल्कि इससे जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिये, एक तरह से देखें तो भारतीय दर्शन के सिद्धान्तों को अङ्कों में लिख दिया!

भारतीय गणितीय परंपरा की एक कठिनता रही उसका संस्कृत श्लोकों के रूप में लिखा जाना। संभवतः श्रुति की परंपरा से गणितीय सिद्धांतों और सूत्रों की रचना कम शब्दों में और स्मृतिसुगम हो जाने वाले संस्कृत श्लोकों के रूप में की गयी, जिनका बाद में अर्थ निकालना कठिन होता गया।


अगले अङ्कों में:
शून्य का वेदांग दर्शन से गणितीय रूप में विकास, वेदांग और खगोलीय गणनाओं में बड़े अंको का प्रयोग,आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर की शून्य की परिभाषा. शून्य की परिभाषाओं पर भारतीय दर्शन के अभाव (कणाद), शून्यवाद (नागार्जुन), ख (उपनिषद्), शून्यता (बौद्ध महायान) के सिद्धांतों का प्रभाव. शून्य से विभाजन की समस्या और अनंत/लिमिट के सिद्धांत का प्रतिपादन.

लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha