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मनु स्मृति में यात्रा – 3 (शूद्र जुगुप्सित)

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शूद्रों के प्रति पहला कथित निन्दनीय भाव मनुस्मृति के दूसरे अध्याय के 31 वें श्लोक में मिलता है। प्रकरण विभिन्न वर्ण-जातकों के नामकरण से सम्बन्धित है। सातत्य और नैरंतर्य पर विचार के लिये क्र. 30 से 33 तक के श्लोक यहाँ दर्शाये गये हैं। पहले ऋग्वेद की एक ऋचा है जिसका महत्त्व आगे समझ में आयेगा। 
 
श्लोक 31 और 32 शब्द संयोजन में समान हैं और प्रतीत होता है कि किसी एक के आधार पर दूसरे को रचा गया है। विभिन्न वर्णों के नाम जिन लक्षण गुणों वाले होने बताये गये हैं, उनके युग्म इन दो श्लोकों के आधार पर निम्नवत हैं:
ब्राह्मण – मंगल और शर्म
क्षत्रिय – बल और रक्षा
वैश्य – धन और पुष्टि
शूद्र – जुगुप्सित और प्रेष्य
हिन्दी में संस्कृत स्रोत का शब्द जुगुप्सा प्रचलित है जिसका अर्थ निन्दनीय, घृणित आदि से जुड़ता है। अज्ञेय के साहित्य में यह शब्द इसी भाव में सटीक प्रयुक्त हुआ है और मनुस्मृति के भाष्यकारों में अधिकांश ने भी यही अर्थ लिया है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में मनुस्मृति के रचयिता शूद्रों के लिये घृणित और निन्दनीय नाम चाहते थे?
विष्णु और कुछ अन्य पुराण श्लोकों के आधार पर (शर्मा, वर्मा, गुप्त और दास) इनकी व्याख्या करने की परम्परा रही है जो कि गाड़ी को बैल के आगे रखने जैसी ही है। मनुस्मृति के आधार पर पुराणों में लिखा गया है न कि उसके उलट। ध्यान दें तो पुनरुक्ति जैसी बात ही दिखती है और 31 वाँ श्लोक संकीर्ण क्षेपककारों द्वारा डाला गया लगता है। विद्वानों ने इसके ऊपर क्षेपक आक्षेप का निराकरण यह बता कर करने का प्रयास भी किया है कि पहला श्लोक नाम से सम्बन्धित है और दूसरा उपनाम और पदवी आदि से। यह एक आधुनिक प्रयास ही है जो कि ठीक नहीं लगता।
आगे बढ़ने से पहले ‘गुप्’ धातु पर विचार करना आवश्यक है। हिन्दी के ‘गोपनीय’ शब्द का उत्स इस संस्कृत धातु में है जिसका सम्बन्ध संरक्षण से है। गोपनीय वह होता है जिसकी रक्षा करनी होती है, छिपाना पड़े तो भी। ऋत् और धर्म आधारित समूची वर्णव्यवस्था समाज संरक्षण भाव के मूल से विकसित हुई है। ऋषियों के लिये धर्मगोप्ता, ऋतगोप्ता आदि विशेषण नाम इसे स्पष्ट करते हैं।
ब्राह्मण का शर्मन् प्रसन्नता और समृद्धि का अर्थ लिये है जिसका कारक ‘शर्मण्य’ है, अर्थ आश्रय देने वाला, रक्षा करने वाला। सुशर्मा या सुशर्मन् नामधारी ऐसा व्यक्ति है जो कि सुरक्षित शरण और स्थान देने वाला हो। धर्मशर्मन् वह है जो धर्म को शरण देता हो। रक्षा भाव ब्राह्मण है।
क्षत्रिय का वर्मन् वर्म अर्थात कवच से बना है। कवच कोमल अंगों की सुरक्षा के लिये पहना जाता है। मर्मस्थलों की सुरक्षा क्षत्रिय का धर्म है, वह समाज का कवच है। रक्षा भाव क्षत्रिय भी है।
वैश्य का गुप्त धन धान्य का गोप्ता भाव लिये हुये है। व्यापार हो, मूल्यवान वस्तुयें हों, खेत हो, शस्य हो, पशु सम्पदा हो इन सबकी रक्षा के लिये गोपनीयता परम आवश्यक है और समाज की उदर पूर्ति करने वाला वैश्य इसे निबाहता है। रक्षा भाव वैश्य भी है।
शूद्र का दास सेवा संरक्षण भाव है। वह प्रेष्य है। प्रेष्य में भी रक्षा भाव है। प्रेष्य वह है जिसे निर्देश आदेश दे काम कराया जाता है। वह विश्वसनीय होता है क्यों कि उद्देश्य की सुरक्षा करते हुये निबाहता है। जब आप पत्र भेजते हैं तो क्या लिखते हैं? प्रेषक – फला फला। आप ने पत्र का दायित्त्व प्रेष्य को दिया जिसने उसे सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचा दिया। बेटी बहनों के यहाँ भार ले कर कहाँर पहले जाते थे न, वे भी प्रेष्य थे और आप प्रेषक। डोली में दुल्हन को ले कर जाने वाले भी भरोसे वाले प्रेष्य ही होते थे। वह भरोसे वाला है इसलिये रक्षणीय है। रक्षा भाव शूद्र भी है।
यह टुकड़ा टुकड़ा दिखती सुरक्षा उस ’समाज पुरुष’ की समग्र सुरक्षा है जिसकी कल्पना ऋषियों ने की। जी, पुरुष सूक्त ‘व्यकल्पयन्’ ही कहता है। ऋषि का मस्तिष्क गर्भ है जिसमें समूचे ब्रह्माण्ड को अपने में समेटते हुये मनु संतति का रूप विकसित होता है। उस विराट पुरुष संकल्पना की ऐसी तैसी भाष्यकारों और आज कल के धुरन्धरों ने खूब की, किये जा रहे हैं।     
वर्ण व्यवस्था के मानक अर्थ पर 32 वाँ श्लोक खरा उतरता है क्यों कि वह उस विराटता से जुड़ता है न कि 31 वें की तरह बस मंगल, बल, धन और जुगुप्सा तक सीमित होता है। 31 वाँ श्लोक क्षेपक हो सकता है।
जुगुप्सा शब्द गुप् धातु में इच्छा के अर्थ वाले सन् प्रत्यय के जुड़ने से बना है। सन् प्रत्यय में द्वित्व का विधान है इसलिए एक और गु जुड़ता है। गु+गुप्+सन् के योग में सूत्र प्रयोग के कारण पहला ग ‘ज’ हो जाता है और बनता है जुगुप्सा। ऐसा एक अन्य उदाहरण है पा+सन् = पिपासा जो कि प्यास के लिये प्रयुक्त होता है।
ऋग्वेद (7.103.9) में वसिष्ठ ऋषि मेढकों के माध्यम से 12 महीनों के संवत्सर चक्र की सुरक्षा के लिये जुगुपु: शब्द का प्रयोग करते हैं। पूरे ऋग्वेद में यह एकल प्रयोग है। इसी संरक्षण अर्थ में मनुस्मृति में इसका प्रयोग हो, सम्भावना कम ही लगती है।
अब प्रश्न यह कि ‘जुगुप्सा’ शब्द का अर्थ संकीर्ण हो निन्दित या घृणित कैसे हो गया? हजार वर्षों के उत्थान पतन में शब्द घिसते हैं, कभी छिछले तो कभी गहन अर्थ ले लेते हैं और कभी कभी मूल से इतर उलट भी। समाज भी उठता है, गर्त में जाता है, पुन: पुन: दुहराता है।   
घृणित या निन्दनीय अर्थ परवर्ती है जो स्पष्टत: गुप्तांगों के ढकने से उपजा है। सुरक्षित और गोपनीय रखने वाले ढेर सारे अवयवों में गुप्तांग भी होते हैं जिनका प्रदर्शन घृणित और निन्दनीय होता है। सामाजिक विकृति ने सेवा और भृत्य कर्म करने वालों के लिये ऐसा सोचा ठीक गुप्तांग आधारित गालियों की तरह ही जो कि बहुत बाद में विकसित हुईं। गुप्तांग आधारित गालियाँ संस्कृत में नहीं हैं।
जुगुप्सित शब्द का भाष्यकार कुल्लुक जहाँ स्पष्टत: निन्दावाचक अर्थ करते हैं, वहीं मेधातिथि और नन्दन क्रमश: कृपणकोदीन शबरक और पैलवक जैसे उदाहरण नाम सुझाते हैं।
भाष्यकारों ने एकदम से संरक्षण वाला भाव भुला दिया हो, ऐसा भी नहीं है। राघवानन्द जुगुप्सित लिखते हुये जब द्विजदास और द्विजगुप्त नाम सुझाते हैं तो अनायास ही वैदिक संरक्षण भाव वाले अर्थ से जुड़ जाते हैं, द्विज के संरक्षण में रहने वाला। सेवक की सुरक्षा स्वामी का कर्तव्य तो आज भी है, तब धर्म कहलाता था।
रामचन्द्र वह भाष्यकार हैं जो जुगुप्सित शब्द का प्रयोग ही नहीं करते। वह ‘प्रेष्यसंयुक्तंकुर्यात्’ लिखते हुये  स्पष्टत: संरक्षण योग्य नाम यथा कृष्णदास सुझाते हैं।

महत्त्वपूर्ण यह भी है कि शक संवत 1807 में जब इस ‘मानव धर्म शास्त्र’ का संचयन कर छापने के लिये देश भर से पाण्डुलिपियाँ जुटाई गयीं तो तीन भिन्न भिन्न स्थानों से प्राप्त प्रतियों में ‘जुगुप्सित’ प्रयोग था ही नहीं! उसके स्थान पर प्रेष्य पाठ ही दुहरा दिया गया था।
 
सोचना आप को है कि बिना गहराई में उतरे समूची सनातन परम्परा को क्षेपकों के आधार पर कलंकित करने वालों के निहितार्थ क्या हैं? और आप स्वयं भी उनके जाल में फँसते क्यों जा रहे हैं? 
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आभार:

श्री दत्ता राज (वैदिकी), 

सुश्री संगीता शर्मा (शब्द, धातु उत्पत्ति) 

मनु संहिता (मनु स्मृति) में यात्रा – 1

प्लासी में इसाई मलेच्छों की विजय से २५० वर्षों पश्चात हुये पामुलपर्ति वेंकट नरसिम्हराव। पी वी और पृथ्वीराज चौहान के बीच ८०० वर्ष का अंतर था। राय पिथोरा से लगभग ५२५ वर्ष पहले हर्षवर्द्धन हुये। उनसे तीन सौ वर्ष पहले चन्द्रगुप्त और चन्द्र से पौने चार सौ वर्ष पहले विक्रमादित्य। विक्रमादित्य से लगभग दो सौ वर्ष पहले हुये अशोक जिनका चक्र आज ऋषभपुत्र भरत के नाम से जाने जाने वाले भारत संघ के ध्वज पर अंकित लहरा रहा है जिसकी कल्पना न तो अशोक ने की होगी और न भरत ने!  
 
…. हम काल को रेखीय और बड़े ही भौंड़े सामान्यीकरण में समेट चिपेट समझने के अभ्यस्त हैं। ऊपर जो मैंने कालखंड बताया है वह मात्र २२०० वर्षों का है लेकिन आँखें मूँद कर ‘देखिये’ तो दूरी और अंतराल के नर्तन आकार लेने लगते हैं। समस्या यह है कि हम यह काम करते ही नहीं!
 
समूचा प्रागैतिहास (इस शब्द के प्रयोग पर मुझे स्वयं आपत्ति है, तो भी) मनु का एक काल स्तर प्रकल्पित कर उस पर प्रक्षेपित कर दिया जाता है, प्राचीन इतिहास हर्ष वाले स्तर पर, मध्यकालीन इतिहास राय पिथोरा और इस्लामी मलेच्छों के बीच तो आधुनिक २००० विक्रमी पर। प्राक्, प्राचीन, मध्य और आधुनिक वर्गीकरण वह भयानक सरलीकृत खाँचा है जिसके भीतर मनुस्मृति को जलाये जाने के औचित्य, तर्क और प्रभाव स्थापित किये जाते हैं। काल को नितांत रैखिक या द्विविमीय X-Y आयाम में समेट कर राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के अभिचार करना और उनमें उलझाना बहुत आसान और सफलता का आभास देता उपाय तो है ही।
रथ के पहिये की परिधि पर कोई बिन्दु हो और रथ सीधी रेखा में चल रहा हो तो उसका बिन्दुपथ cycloid (चक्रज) होता है, एक रेखा के ऊपर उठान, चरम और पुन: पतन, पुन: पुन: आवृत्ति जब कि धुरी सरल रेखा में ही चलती रहती है। 
कल्पना कीजिये कि क्या होगा जब रथ स्वयं किसी बड़ी परास के चक्रज पर चल रहा हो। और आगे सोचिये क्या हो यदि वह पथ किसी भँवर वर्तुल जैसा हो, कोई एक परिधि पर बैठा हो, कोई रथ पर और कोई धुरी पर? कालबोध इस दृष्टि की माँग करता है।
 
मनु के विश्लेषण से पहले मन्वन्तर को जानना आवश्यक है। मात्र २२०० वर्षों की तुलना में उस समय की सोचिये जिसका मान इस तरह बताया गया: ३६० गुणा [(८५२०००+५१४२) वर्ष+ ८ माह+ १७ दिन+ ८ दण्ड+ ३४ पल), विशालता और सूक्ष्मता दोनों ध्यान देने योग्य हैं। मनु में यही विशालता और सूक्ष्मता है। वे कहते हैं – कुरुते परमेष्ठी पुन: पुन:। यह जो पुन: पुन: है न, वह वर्तुल चार आयामों की बात है जिसमें क्रम है, सातत्य है और अनुशासनहीन प्रक्षेपण नहीं है।
 
मनुस्मृति या किसी भी प्राचीन कृति का उपलब्ध पाठ इन्हीं ‘गणितीय’ प्रतीत होती कसौटियों पर कसा जाना चाहिये। वेदों को छोड़ दें तो कोई भी प्रक्षिप्त प्रकरणों या क्षेपकों से अछूती नहीं। जिसकी जितनी प्रतिष्ठा उसमें उतनी ही मिलावट! कारण कई हो सकते हैं – वर्तमान संविधान के संशोधनों को ही देख लीजिये। मिलावट कई प्रकार की हो सकती है – मूल की प्रतिष्ठा वृद्धि हेतु, स्वयं को या स्वयं के आचार, मत, गुरु आदि को प्रतिष्ठित करने हेतु, किसी और स्वार्थ साधन हेतु, विकृत कर वैकल्पिक मार्ग की श्रेष्ठता सिद्ध करने हेतु और समाज के किसी वर्ग के उत्पीड़न और नियंत्रण हेतु। मनुस्मृति को मलेच्छों ने विकृत नहीं किया, उसके पहेरुओं और अध्येताओं के ही कुछ वर्गों ने किया। 
    
मनुस्मृति में मिलावट इन सब उद्देश्यों से की गयी जिन्हें सावधान पाठ से जाना समझा जा सकता है। सतत बिन्दुपथ से अचानक छिटकन और पुन: उसी पथ का अनुकरण, उस पर कोई और वक्र आरोपण, रेखा की बनावट में सहसा परिवर्तन आदि के ढेर सारे प्रारूप मनुस्मृति के उपलब्ध पाठ में मिलते हैं।
 
 चूँकि यह स्मृति है इसलिये इसमें इनकी पहचान तुलनात्मक रूप से आसान है क्यों कि सातत्य विधि विधानों का अनिवार्य अंग है। ऐसा नहीं कि क्षेपक पहले नहीं पहचाने गये। कम से कम सात सौ वर्ष पहले हुये टीकाकार कुल्लूक 170 के आसपास श्लोकों को क्षेपक पहचान कर बाहर कर देते हैं। आधुनिक समय अधिक समर्थ है क्यों कि उसका विधि विधान पृथक है और क्षेपक गढ़ने के कारण समाप्त हैं। इस काल में अधिक वस्तुनिष्ठ हो जाँच पड़ताल की जा सकती है।
एवं स जाग्रत् स्वप्नाभ्यामिदं सर्वं चराचरम्।
                                                सं (स) जीवयति चाजस्रं प्रमापयति चाव्यय:॥
                                                                                                                               (मनु, १।५७) 

यह अध्ययन यात्रा किसी विशेषज्ञ की नहीं, एक अन्वेषी की होगी। भूत की कड़ियों को वर्तमान चटकाता है और बहुधा कई को निकाल कर उसका यथार्थ भी जान लेता है।