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जनसंख्या वृद्धि और चतुर ताँत या अभिज्ञ तंतु

जनसंख्या वृद्धि की दर को थामना ही होगा।

हमार कहनाम

यो यज्ञो विष्वतस्तन्तुभिस्तत एकशतं देवकर्मेभिरायतः।
इमे वयन्ति पितरो य आययुः प्र वयाप वयेत्यासते तते॥
पुमाँ एनं तनुत उत् कृणत्ति पुमान् वि तत्ने अधि नाके अस्मिन्।
इमे मयूखा उप सेदुरू सदः सामानि चक्रुः तसराण्योतवे॥
(ऋग्वेद, 10.130.1-2)

पितर बुनकर हुये हैं, सूत विस्तार के साथ यज्ञ रूपी वस्त्र बुना जा रहा है, साममंत्रों का ताना बाना है। ‘लम्बा बुनो, चौड़ा बुनो’ की ध्वनि है। देवता उपस्थित हैं, बुनाई दिव्य लोकों तक है।


वस्त्र और बुनाई से सम्बन्धित इतने शब्द हमारी इस सबसे प्राचीन धरोहर में मिलते हैं कि पुरखों की तकनीकी प्रवीणता स्पष्ट हो उठती है। वैदिक ‘वासस्’ आज भी ‘बसन’ रूप में देसभाषाओं में प्रयुक्त है, वस्त्र तो है ही। ‘वय’ से बुनना है तो तंतु (तद्भव ताँत) से ताना, ‘ताना बाना’। ऋग्वैदिक बुनकर वासोवाय कहलाता है और पूषन् देवता स्वयं बुनकर हैं। तंतुओं और रश्मियों से समन्वित सूर्य किरणों के लिये चित्ररश्मि समान उद्भावना सुन्दर कविता को जन्म देती है। स्वर्ण (हिरण्य) तंतुओं के साथ बुने और कढ़ाई (पेशस्) किये वस्त्रों का कहना ही क्या!

वस्त्रों ने सभ्यता के साथ बहुत लम्बी यात्रा की है और आज फैशन डिजाइनिंग वस्त्राभरणों पर ही केन्द्रित है। सामग्री, विन्यास, तकनीकी आदि विविधताओं ने इसे समृद्ध तो किया ही है, बहुत ही परिष्कृत और जटिल भी बनाया है। परिकल्पना की दृष्टि से देखें तो ‘Hunger Games, हंगर गेम्स’ शृंखला फिल्मों (2012 से 2015 ई. तक) में नायिका केटनिस द्वारा मंचीय प्रस्तुति के समय पहना गया वह वस्त्र उल्लेखनीय है जो कोयला खदानों और उनमें लगने वाली आग को जीवंत दर्शाता है।

जाने कितने नवोन्मेषों के साथ आगे बढ़ते हुये आज मानव ‘चतुर तंतु या ताँत’ (smart textile) के स्तर पर पहुँच चुका है। ‘स्मार्ट’ के लिये और उपयुक्त संस्कृत शब्द ‘अभिज्ञ’ होगा। तंतु जब ओढ़ने पहनने योग्य बुन दिये जाते हैं तो परिधान बनते हैं। चतुर परिधान वे जो धारक की आवश्यकता अनुरूप परिवर्तन में सक्षम हों ताकि उसे सुविधा हो। हम ऐसे वस्त्रों के बारे में सोच सकते हैं जो ताप अनुकूलित हों, एक ही वस्त्र किसी भी ऋतु में धारण किया जा सकता क्योंकि वह ताप और आर्द्रता का समायोजन मानव देह की आवश्यकता अनुसार करने में सक्षम है। ऐसे वस्त्र भी अभिज्ञ श्रेणी में आयेंगे जो वातावरण से ऊर्जा का दोहन कर सकें या हमारे स्वास्थ्य से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण इङ्गित समझ कर समय रहते चेतावनी दे सकें और साथ ही आपात स्थिति में जीवनरक्षा भी कर सकें।

‘Live Science, लाइव साइंस’ पत्रिका में छपे एक आलेख के अनुसार अब अभिज्ञ तंतुओं से ऐसी कृत्रिम मांसपेशियों का ताना बाना रचा जा सकता है जिन्हें वस्त्रों के नीचे पहन कर विकलांग और चलने में अक्षम जन चल सकें। लिंकोपिंग विश्वविद्यालय, स्वीडेन के शोधकर्ताओं ने सेलुलोज तंतुओं पर एक विशेष विद्युतवाही बहुलक की परत चढ़ा कर एक ऐसी गतियुक्ति (Actuator, ऐक्चुएटर) बनाई है जो ऊर्जा को गति में परिवर्तित कर देती है। Textile से बने होने के कारण उन्हों ने इसे टेक्स्टुएटर, Textuator नाम दिया है। क्या हम इसके लिये हिन्दी में ऐसा ही कोई संश्लिष्ट नाम दे सकते हैं? सोचिये तो?? जब यह युक्ति प्रयोग के लिये सर्वसाधारण को उपलब्ध होगी तो इसकी सहायता से भारोत्तोलक अधिक भार उठा सकेंगे। वृद्धावस्था में निर्बलता या रोग के कारण बैठ गये लोग चल सकेंगे, अनेक सम्भावनायें हैं। यह तकनीक बाल अवस्था में ही है और मनुष्य मांसपेशियों के तुल्य क्रिया प्रतिक्रिया कर पाने में सक्षम बनाने के लिये अभी इसमें बहुत सुधार करने होंगे किंतु उसमें अधिक समय नहीं लगना। चीन के चोंगक़िंग विश्वविद्यालय में भी ‘चतुर ताँत’ पर स्वतंत्र रूप से काम चल रहा है।

एक ओर नवोन्मेष और तकनीकी द्वारा मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता सुधारने के लिये ऐसे प्रयास चल रहे हैं तो दूसरी ओर मानव की जनसंख्या वृद्धि भी अपनी गति से चल रही है। वस्त्र के साथ ही दो और मूलभूत आवश्यकताओं भोजन और आवास पर दबाव स्पष्ट हैं। पूँजी का केन्द्रीकरण और अनुत्पादक निवेश स्थिति को और जटिल बनाते जा रहे हैं। भारत को देखें तो सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन की जनसंख्या से यहाँ केवल 11 करोड़ कम लोग ही रहते हैं जब कि, तिब्बत के लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर को छोड़ कर, उसका क्षेत्रफल लगभग 71 लाख वर्ग किलोमीटर है जो कि भारत के दुगुने से भी अधिक है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमानों के अनुसार 2022 तक भारत विश्व की सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश होगा।

एक ऐसे देश में जहाँ नवोन्मेष के नाम पर शून्य हो, भ्रष्टाचार का चहुँओर साम्राज्य हो और नीतियाँ दूरगामी सोच और कार्यान्वयन नहीं रख पा रही हों, आने वाले दिन बहुत कठिन हो सकते हैं। जनसंख्या वृद्धि की दर को थामना ही होगा। साम्यवादी अधिनायकतंत्र के स्थान पर यहाँ लोकतंत्र होने से सरकारें कई कड़े उपाय नहीं कर पा रहीं। वोट की राजनीति ने क्लिष्टतायें बढ़ाई ही हैं। आधारभूत संरचनाओं पर भार बढ़ता ही जा रहा है और इस क्षेत्र में जो भी विकास हो रहा है उस पर ग्रहण लगा हुआ है।

आज माघ पूर्णिमा है, चन्द्र और सूर्य आमने सामने होंगे। पुण्य स्नान के साथ ही इस प्रश्न का सामना भी करना होगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कतिपय विशेष दबाव समूहों का ध्यान रखते हुये देश को एक बहुत भारी समस्या की ओर जाने दिया जा रहा है? लोकतंत्र लोक से है। लोक आगामी समस्याओं की अनदेखी करेगा तो तंत्र रोगग्रस्त होगा और पितरों और देवताओं का ताना बाना टूट जायेगा। आँखें खोलिये, जनसंख्या समस्या को सबसे पहले, विमर्श के केन्द्र में लाइये।


आपन बाति: सोच, सङ्कट और उद्योग

136 वर्ष से कुछ अधिक दिन पहले क्रमश: दो और चार जनवरी को ‘महरट्ट’ और ‘केसरी’ नामधारी दो पत्र लोकमान्य बालगङ्गाधर टिळ्क (तिलक) ने प्रकाशित करने प्रारम्भ किये। इन पत्रों के माध्यम से जो सार्थक परिवर्तन घटित हुये वे अब इतिहास का अङ्ग हैं। भारत को सांस्कृतिक और राजनैतिक रूप से जागृत करने के उद्योग हेतु टिळक और स्वामी विवेकानन्द में आपसी सहमति थी। दोनों ‘संकट’ को ले ‘सोच’ में थे और जो कर सकते थे, कर गये।

कहीं पढ़ा था – सोच सङ्कट है। जाने लिखने वाले ने किस मन:स्थिति में किस उद्देश्य और अर्थ में लिखा था किंतु कुछ बातें बहुआयामी हो इङ्गित की सीमाओं को तोड़ती हैं, यह अंश भी वैसा ही है। ‘संकट के कारण सोच में पड़ा हुआ है’ या ‘सोच के कारण संकट में है’, देखें तो विशाल हिन्दी भू भाग ऐसी स्थिति में ही है। नये भारत के कोष की कुञ्जी इस क्षेत्र में कहीं खोई हुयी है। आवश्यकता सोच और संकट से आगे बढ़ उद्योग की है। संसार के सबसे बड़े भाषिक समूहों में से एक इस अद्भुत उर्वर क्षेत्र की विराट संभावनायें तो अभी पत्र के स्तर तक भी नहीं आई हैं। करने को बहुत कुछ है।

‘मघा’ के ‘औपचारिक पत्र’ का यह पहला शून्याङ्क है। शून्याङ्क, वह भी पहला? क्या दूसरे तीसरे भी आयेंगे? इन प्रश्नों के उत्तर हेतु मध्यकालीन उड़िया क्षेत्र में प्रचलित ‘वर्ष अङ्क’ पद्धति को देखना रोचक होगा। पद्धति कुछ भी हो, यदि व्यवस्थित तंत्र के साथ है तो उद्देश्य पूरे करती है। पितरों से सीधे संवादित होने वाले नक्षत्र की नामधारी इस पत्रिका की परास में अनुछुई या उपेक्षित आधुनिक चिंतायें और विषय होंगे। विज्ञान, कृषि, उद्योग, अर्थ, तकनीकी, पर्यावरण, भारतविद्या, भारतवर्ष इत्यादि से जुड़े आलेख होंगे। ‘मघा’ के लिये हिन्दी एक विराट भू भाग का प्रतिनिधित्त्व तो करती ही है, चलती फिरती वह बानी भी है जो समस्त भारतवर्ष को जोड़ती है। हिन्दी क्षेत्र, हिन्दी जन, हिन्दी बानी के विकसित हुये बिना भारत विकसित नहीं हो सकता।

‘विकास’ शब्द के आते ही सामान्यतया अट्टालिकायें, राजमार्ग, चमकते मॉल और वैसी जाने कितनी संरचनाओं की चौंध लगने लगती है। क्या वास्तव में ‘बिकसवा’ केवल यही सब है? या ये सब उसके द्योतक हार्डवेयर भर हैं? ऐसी संरचनाओं के मूर्तिमान होने से पहले सॉफ्टवेयर आवश्यक होता है। वह सॉफ्टवेयर जन जन के स्तर पर विकसित होता है। उसके लिये चेतना के स्तर पर सामूहिक प्रयास, उद्योग आदि करने होते हैं। चाल, चलन, चरित्र और सोच बदलनी पड़ती है। यह कोई राजनैतिक नारा भर नहीं, सचाई है। सोच के संकट से छुटकारा नहीं!  ‘हम क्या कर सकते हैं?’, पढ़ते हुये यही प्रश्न उठता है न? उर्वर, समतल, नदी सिञ्चित भूमि के वासी ऐसे प्रश्न पूछें तो ठीक नहीं।

चित्र आभार: ‘स्पाइस जेट’ की यात्रा-पत्रिका

पानी की समस्या से जूझते शीत शुष्क मरुस्थल कहे जाने वाले लद्दाख के सोनम वांगचुक के सामने भी यही प्रश्न था। वह आगे बढ़े। बर्फ के ऊँचे टीले बना कर जलदोहन का नव्य सफल प्रयोग कर डाले। उनके बनाये ‘हिमस्तूपों’ और नलिकाओं की साधारण सी संरचना में गुरुत्व बल के चतुर उपयोग से जल ‘उत्पादित’ होता है जिसका प्रयोग सिंचाई के लिये किया जाता है। उस जल की ड्रिप सिंचाई से शस्य लहलहा रही है।  आगे उनकी योजना 30 मीटर ऊँचे बीसों स्तूपों के निर्माण की है। इस नवोन्मेष के लिये उन्हें गत नवम्बर Rolex Award for Enterprise मिला जिसके लिये 144 देशों से 2322 प्रविष्टियाँ आई थीं। उनकी आयु पचास वर्ष है।

उनका राजनैतिक मत क्या है? कौन सी विचारधारा के हैं… आदि आदि पर मीमांसा छोड़ यह सोचने की आवश्यकता है कि ऐसा क्या है उनमें जो छटपटाहट छोड़ कुछ कर गये? अन्यों से क्यों नहीं होता? ‘आस पास ही’ कुछ तो है जहाँ दोषदर्शन और दोषारोपण तज ‘करने’ की आवश्यकता है।

‘केसरी’ के मुखपृष्ठ श्लोक पर ध्यान देना रोचक होगा कि कुछ बातें सीमाओं को तोड़ती नये अर्थ उद्घाटित करती हैं: 

स्थितिं नो रे दध्याः क्षणमपि मदान्धेक्षण सखे, गज श्रेणीनाथ त्वमिह जटिलायां वनभुवि।
असौ कुम्भिभ्रान्त्या खरनखरविद्रावितमहा, गुरुग्रावग्रामः स्वपिति गिरिगर्भे हरिपतिः॥
‘भामिनीविलास’ , पण्डित जगन्नाथ
सोता हुआ सिंह कब जगेगा? ड्रैगन की फुफकार तो पूरे संसार में पसर गयी है!