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जैव विविधता: अवधी चिरइयाँ

वैज्ञानिक नाम: Saxicoloides fulicata
स्थानीय नाम: भुजइन, कलचुरी, गँड़ुलर, फुदकी
अंग़्रेजी नाम: Indian Robin
चित्र स्थान और दिनाङ्क: अयोध्या (उत्तरप्रदेश), 06/01/2017, चित्र मादा चिड़िया का है।
छाया चित्रकार (Photographer): आजाद सिंह

लक्षण, चरित्र और स्वभाव: नर काले रंग का, पंख पर सफेद धब्बा और उठी हुई पूँछ, पूँछ की निचले छोर पर जंग जैसा ललछौंह रंग होता है। मादा बिना किसी श्वेत धब्बे के भूरे रंग की होती है। यह एक सक्रिय प्रमुदित चिड़िया (अवधी – चिरई) है।
घरों में सामान्यतया झोपड़ियों और बरामदों में कीड़ों को लेने के लिये आ जाती हैं। फूस की छतों और भूमि पर फुदक फुदक कर चलती हैं।

भौगोलिक वितरण‌: भारत, पाकिस्तान, बङ्गलादेश और श्री लङ्का के मैदानों में और पहाड़ियों पर माध्य समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊँचाई तक पायी जाती हैं।

घोंसला करने की क्रिया: अप्रैल से जून मास तक। पत्थर और चट्टानों के नीचे, घरों के खुले मोके, वृक्षों के लघु कोटरों में ये  तिनके, घास-फूस, पंख या बाल से घोंसला बनाती हैं।


लेखक: आजाद सिंह
शिक्षा: जंतुविज्ञान परास्नातक,
लखनऊ विश्वविद्यालय
व्यवसाय: औषधि विपणन

अभिरुचि: फोटोग्राफी

जोशुआ ‘परमेश्वर यादवों से प्रेम करता है’

विकीपीडिया पर ‘जोशुआ प्रोजेक्ट’

‘फ्रण्टियर वेंचर्स’ ईसाइयत के प्रसार का लक्ष्य ले कर चलने वाला एक अमेरिकी संगठन है। इसकी अनेक आनुषंगिक इकाइयाँ भी हैं। कार्यसिद्धि के लिये बनाये गये इसके विभिन्न विभाग ministry कहलाते हैं जिनकी कुल संख्या 12 है। इस संगठन की योजनायें बहुत ही महत्त्वाकांक्षी और बृहद हैं। यह संस्था पहले U.S. Center for World Mission के नाम से जानी जाती थी। इसके संस्थापक राल्फ और रॉबर्टा विण्टर दम्पति थे। मृत्यु से पहले डॉ. राल्फ डी. विण्टर को ‘टाइम’ पत्रिका ने ‘America’s 25 most influential evangelicals’ की सूची में स्थान दिया था।  वर्तमान में इसके कई पदाधिकारियों की सूची में जिन तीन महानिदेशकों के नाम सबसे ऊपर हैं वे ये हैं – ब्रूस ग्राहम, डेव डटेमा और चाङ्ग किम।

‘जोशुआ प्रोजेक्ट’ इसकी एक मिनिस्ट्री है जिसने ईसाइयत के प्रसार के लिये कथित ‘10/40 खिड़की’ पर स्वयं को केन्द्रित रखा है। भूगोल अक्षांश 10 अंश से ले कर 40 अंश तक (और उनसे लगे हुये) विराट भू भाग को यह नाम दिया गया है जिसमें विश्व की हिन्दू, बौद्ध और मुसलिम जनसंख्या का बहुसंख्य निवास करता है। इस क्षेत्र को यह संगठन ‘प्रतिरोध पट्टी Resistance Belt’ कहता है। इस पट्टी में रहने वाले जन को 8178 विशिष्ट समूहों में बाँट कर उनमें से 5579 को असाधित (unreached) श्रेणी में रखा गया है अर्थात लगभग 3 अरब जनसंख्या को ईसाई बनाने के लक्ष्य के साथ यह संगठन कार्यरत है। ईसाइयों के भी दो वर्ग ‘सामान्य ईसाई’ और ‘पंथपरिवर्तक ईसाई’ सृजित करने पर बल दिखता है।

भारत के परिप्रेक्ष्य में यह संगठन 2245 जनसमूहों की पहचान करता है जो कि पूरे का लगभग 28% है। इनमें से 2026 को यह असाधित श्रेणी में रखता है जो कि कुल असाधित का लगभग 36% है और उसके भीतर भारत की 95% जनसंख्या निहित है।

चित्र, वर्ग, देशीय संख्या, वैश्विक संख्या, मूल, प्राथमिक भाषा और प्राथमिक पंथ के आधार पर वर्गीकृत जनसमूहों के भीतर ईसाइयत के प्रसार को पाँच रंंगों के प्रगति स्केल पर कसा जाता है और तदनुसार समीक्षा और आगे की योजना पर कार्य किया जाता है। जातियों के भीतर भी उपजातियों के अनुसार वर्गीकरण किये गये हैं। उदाहरण के लिये ब्राह्मणों के 84, बनियों के 47 और राजपूतों के 106 आदि।

पूर्वी पञ्जाब के ‘क्रिश्चियन ब्राह्मण’ समूह का मामला रोचक है जिनके 1400 जन को जाति वही रखते हुये ईसाई मत का अनुयायी बताया गया है। कुछ प्रश्न उठते हैं। आखिर पंथपरिवर्तन निरोधक विधि के रहते हुये भी ये ऐसा कैसे कर पा रहे हैं और क्यों न तो पकड़ में आ रहे हैं और न ही कहीं से परिवाद के स्वर उठ रहे हैं? इनकी योजना दूरगामी है और लक्ष्य के प्रति समर्पण पूर्ण। धन की कमी तो है ही नहीं। धीरे धीरे दीमकों की तरह कार्य करने में इनका विश्वास है। पहले जाति अभिमान बनाये रखते हुये ‘व्यक्तिगत रूप’ में ईसाई बनाना है। धीरे धीरे ऐसे जन के समूह बनाने हैं। दबाव युक्त संख्या हो जाने पर उन समूहों के बीच से ही धर्मप्रचारक इवेंजलिस्ट निकल कर आयेंगे जो साधक, उत्प्रेरक और नियामक सभी कार्य करेंगे। ऐसी स्थिति में प्राइवेट रूप से गुपचुप ईसाई बन चुका व्यक्ति न तो अपनी पहचान बताता है और न ही उसके सुहृद परिवारियों को इसकी भनक ही लगती है। पकड़ में आने और परिवादों की स्थिति पहुँचने तक ‘पंथनिरपेक्ष’ देश में इनकी स्थिति सुदृढ़ हो चुकी होती है। ऐसा ये भारत के अन्य भागों में कर चुके हैं।

सामाजिक उन्नति की ओर अग्रसर, राजनैतिक रूप से संगठित, प्रभावी एवं दबंग जातियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पाकिस्तान के जाट मुस्लिम और भारत के यादवों का अलग से उल्लेख ध्यातव्य है। संगठन की रणनीति स्पष्ट है – उत्थान यात्रा करते जन के जातीय गौरव को यथावत रखते हुये उनकी मान्यताओं और रीतियों में पैठ बना कर उनका पंथपरिवर्तन सरल होगा। ठीक यही कार्य ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ आये मिशनरियों ने किया। अब बहुत ही वैज्ञानिक विधि से संसाधनों और सूचना क्रांति का उपयोग करते हुये कर रहे हैं।

‘परमेश्वर यादवों से प्रेम करता है’ का आमुख कथन लिये छ: करोड़ यादवों को टार्गेट करती आनुषंगिक वेब साइट ‘गॉड लव्स यादव डॉट ऑर्ग’ पर उपलब्ध सामग्री जोशुआ प्रोजेक्ट के उद्देश्य, कार्य के ढंग और लक्ष्य के प्रति सामरिक समर्पण को रेखांकित करती है। साथ ही यह भी स्पष्ट हो जाता है कि मिशनरियों के समाजोन्नति, शिक्षा और कल्याणकारी कार्यों के पीछे छिपा उद्देश्य पंथपरिवर्तन है।

स्क्रीनशॉट : http://godlovesyadav.org/yadav-prayer-profile/

धर्म संस्कृति की उदार रज्जु से जुड़े सनातनियों को खण्ड खण्ड बाँट कर इवेंजलिस्ट बनाने की राहें ऐसे कार्यों से ही बनायी जाती हैं।