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आपणी बात : रक्षा, संरक्षण और सुरक्षा

रक्षा, संरक्षण और सुरक्षा जीवधारियों के मूल स्वभाव हैं। देखें तो आहार, वस्त्र और आवास की मौलिक आवश्यकताओं के मूल में जीवन रक्षा का ही भाव है।

अथर्वण पैप्पलाद संहिता 1.10

प्रागैतिहासिक काल से ही मनुष्य भौतिक उपादानों को अपने अनुकूल बना कर रक्षा के उपाय करता रहा है। देवी देवताओं से प्रार्थना के साथ उन्हें शस्त्रास्त्रों से मण्डित करना हो या उनके लघु धातु रूपों को समूह चिह्न, अलंकरण एवं ताबीज के रूप में पहनना रहा हो, रक्षा भाव सर्वोपरि है। अथर्वण संहिता में शत्रु के विरुद्ध सीसे का वेधक के रूप में प्रयोग एक ऐसा ही उदाहरण है जिसमें तीन देवताओं वरुण, अग्नि और इन्द्र के अनुकूलन द्वारा शक्ति संधान का प्रार्थनामय आह्वान है। इन्द्र को नवोन्मेष, अग्नि को ऊष्मा ऊर्जा और वरुण को द्रव दबाव से सम्बन्धित मानने पर अर्थ स्पष्ट हो जाते हैं कि सम्भव है इसके लिये सीसे की गोलियों का प्रयोग यंत्र युक्ति के साथ किया जाता रहा हो।

संरक्षण विधायी उपायों से रक्षणीय को बचाने में निहित है तो सुरक्षा निरंतर जारी ऐसी व्यवस्था से सम्बन्धित है जो रक्षा सुनिश्चित करती है। जीवन के लिये हानिकर भयोत्पादक तत्त्वों से बचाव के भाव जहाँ एक ओर मानव जैसे उन्नत प्राणी को नवोन्मेष की ओर प्रेरित करते हैं तो दूसरी ओर अवांछित या शक्तिसम्पन्न व्यक्तियों और संस्थाओं को भयदोहन द्वारा लाभ अर्जित करने की ओर। भौतिक उन्नति के साथ उपजी जटिलताओं ने वर्तमान सभ्यता के लिये कई ऐसी समस्यायें पैदा कर दी हैं जिनसे निपटने को मनुष्य की नवोन्मेषी प्रवृत्ति उद्योग करती रहती है। तकनीकी विकास ऐसी चुनौतियों के कारण ही परवान चढ़ता है। ‘करने से होता है’ नवोन्मेष का मूल मंत्र है जिसके पहले अद्भुत कल्पनाशक्ति को सक्रिय होना पड़ता है।

सुविधामय जीवन के लिये सुरक्षित परिवेश आवश्यक है। सभ्य संसार में ऐसे परिवेश की सुनिश्चितता ने प्रयोगधर्मियों को विविध और समृद्ध सम्भावनाओं वाले आयाम दिये हैं जिनमें बहुत कुछ नया किया जा सकता है। सुख, सुविधा और सुरक्षा के समन्वय को लेकर चलने वाला एक ऐसा ही प्रकल्प है – चालकविहीन वाहन। स्वचालित यानों की बातें पुराने ग्रंथों में मिलती हैं किंतु अमेरिकी तकनीकी कम्पनी गुगल ने उन्हें यथार्थ रूप दे दिया है। वैसे तो एकाधिक कम्पनियाँ स्वतंत्र विकास में लगी हैं पर गुगल की चालकविहीन कार सीमित वास्तविक प्रयोग में लायी जाने लगी है अर्थात वीथियों में सवारियों को लेकर चलने लगी है। उनकी यह परियोजना 2009 में प्रारम्भ हुई और कुल दस लाख मील से भी अधिक चलने वाले परीक्षणों के पश्चात 2015 में पहली बार ‘सांता क्लारा घाटी दृष्टिबाधित केन्द्र’ के भूतपूर्व प्रमुख स्टीव मेहन (Steve Mahan) ने इससे वास्तविक यात्रा का आनन्द उठाया। वे स्वयं भी दृष्टि बाधित हैं। विकलांगों के लिये यह तकनीकी भविष्य में वरदान के समान होगी।

वीडियो चित्र: स्टीव मेहन और साथी, WAYMO प्रकल्प, गुगल

इसमें प्रयुक्त उत्कृष्ट उच्च तकनीकी अतिसुग्राही सेंसर, त्रिविमीय चित्रण, जी पी एस, यातायात के अद्यतन एवं तात्कालिक आँकड़ों और संगणन का समन्वित प्रयोग करती है। वे दिन दूर नहीं जब चिप धारण कर बैठी हुई सवारी बिना किसी भटकन या त्रुटि के नगर सीमाओं से बाहर की यात्रायें भी कर सकेगी। राजमार्गों के अनुकूलन एवं यातायात के नियमों, मानकों और प्रवर्तन की सम्मिलित व्यवस्था द्वारा यह सम्भव हो पायेगा।

इस परियोजना में  300 वर्ष जितने समय के बराबर अनुभव अर्जित करने के पश्चात अब आगे बढ़ते हुये गुगल ने इस प्रकल्प को Way और Mobility, Movement एवं Moments शब्दों के प्रारम्भिक दो वर्ण Mo लेकर WAYMO नाम दिया है। पहले दो शब्द तो सीधे ही समझे जा सकते हैं, Moments शब्द से सुख के क्षण रेखांकित होते हैं।

बीते पखवाड़े संरक्षण और सुरक्षा से सम्बन्धित दो महत्त्वपूर्ण घटनायें हुईं – तमिळनाडु के वार्षिक पोंगल पर्व में साँड़ों से सम्बन्धित वार्षिक ‘जल्लिकट्टु’ प्रतियोगिता आयोजन पर ‘पशु अत्याचार निरोध’ के तहत जारी प्रतिबन्ध के विरोध में उमड़ा स्वत:स्फूर्त जनसमूह और संयुक्त राज्य अमेरिका में नये रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा कार्यभार सँभाला जाना।

चेन्नई में के एक घर के गेट पर जल्लिकट्टु के समर्थन में लगा चित्र

जल्लिकट्टु देसी गोवंश के जातीय संरक्षण से जुड़ा पर्व है। वर्ष भर शुद्ध गोवंश के उन्नत साँड़ों को ग्रामीण तैयार करते हैं और पर्व के समय प्रतियोगिता में साँड़ और तपे तपाये युवा आमने सामने होते हैं। एक निश्चित समय तक साँड़ के कुकुद को पकड़ कर रख पाने वाला युवा विजयी होता है या उसे ऐसा न करने देने वाला प्रचण्ड साँड़। विजयी साँड़ का उपयोग गर्भाधान द्वारा स्वस्थ और बली गौ संतति उत्पन्न करने के लिये किया जाता है। इस प्रतियोगिता में ऐसी कोई हिंसा नहीं होती जिसमें पशु की जान पर संकट आये। पशु अधिकार के नाम पर इस पर प्रतिबन्ध से सदियों से जारी एक बहुत ही प्रभावी और पारम्परिक तंत्र का नाश हो जाता। ध्यान देने योग्य है कि प्रतिबन्ध के समर्थक सुरक्षा और पशु अधिकार की बातें करते हैं जिनके कार्यान्वयन का ऐसा मार्ग धीमा और समूल विनाश ही है।

From this day forward, it’s going to be only America first, America first… Protection will lead to great prosperity and strength… We will bring back our borders… it is the right of all nations to put their own interests first… We will reinforce old alliances and form new ones and reform the world against radical Islamic terrorism, which we will eradicate from the face of the Earth.

ऊपर अमेरिका के नवनिर्वाचित रिपब्लिकन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के प्रथम उद्बोधन से लिये गये अंश हैं। वैश्विक स्तर पर संकटपूर्ण हो चुके इस्लामी आतंकवाद और रेडिकल वाम के वर्षों से जारी विनाशकारी अभियानों की छाया में संरक्षण से जुड़े इस स्वर पर आश्चर्य नहीं होना चाहिये। वैश्विकता की आड़ में राष्ट्रीय हितों और मूल्यों पर प्रहार एवं भयदोहन का आश्रय ले अवैध गतिविधियों में प्रवृत्ति रेडिकल वाम की पहचान हैं। इस्लामी आतंकवाद की उनके साथ सहजीविता है। अमेरिका जैसा देश भी घुसपैठ और अवैध मादक द्रव्य के तस्करों से संकट का अनुभव करने लगा है।

अमेरिका की मेक्सिको सीमा से कहीं बहुत अधिक जटिल और संकटपूर्ण स्थिति भारत की बँगलादेश सीमा पर है जहाँ वर्षों से जारी तस्करी और अवैध इस्लामी घुसपैठ ने विकराल रूप ले लिया है। आशा है कि भारत में और वैश्विक स्तर पर भी उभरे रक्षा, सुरक्षा और संरक्षण के स्वर आने वाले वर्षों में इस संकट के उन्मूलन में सफल होंगे और मानव की स्वयं को समृद्ध और सुखी बनाने वाली नवोन्मेषी यात्रा ऐसे ही नये लक्ष्य अर्जित करती रहेगी।

आप के लिये मौनी अमावस्या का पर्व मनन और सृजन हेतु प्रेरक हो।


 

अवधी चिरइयाँ : कोटुर (Psilopogon zeylanicus)

आजाद सिंह

वैज्ञानिक नाम: Megalaima zeylanicus or Psilopogon zeylanicus
स्थानीय नाम: कोटुर, बड़ा बसंता (हिन्दी)
अंग़्रेजी नाम: Brown-headed Barbet
चित्र स्थान और दिनाङ्क: नवाबगञ्ज, लखनऊ (उत्तरप्रदेश), 04/01/2017
छाया चित्रकार (Photographer): आजाद सिंह

लक्षण, चरित्र और स्वभाव:
कोटुर भारी चोंच वाले घास के रंग के वृक्षीय पक्षी हैं जिनका आकार लगभग 27 सेंटीमीटर होता है। नर और मादा एक ही जैसे होते हैं।

इनके सिर, गर्दन, ऊपरी पीठ और सीने पर गहरे भूरे रंग के श्वेत धारी वाले पर होते हैं जब कि निचला सीना और पेट हरे रंग के होते हैं। इनकी पूँछ का निचला भाग हल्का नीला होता है और आँखें नारंगी रंग के वलय से घिरी होती हैं जो कि चोंच के मूल का स्पर्श करता है।

फल जैसे आम, पके कटहल, पपीता, केला आदि का आहार करते हैं। कभी कभी कीड़े मकोड़े भी खाते हैं।

ये प्राय: अकेले ही पाये जाते हैं किंतु फल उद्यानों में 20 की संख्या तक के झुण्ड में भी देखे गये हैं। ये शीत ऋतु में लगभग चुप रहते हैं किंतु ग्रीष्म ऋतु में लगातार कुटरू कुटरू की ध्वनि निकालते रहते हैं।

भौगोलिक वितरण‌: इनकी 3 जातियाँ समस्त भारत, बँगलादेश और श्री लंका के नाम और सूखे पर्णपाती वनों और उनके साथ के आवासीय क्षेत्रों में पायी जाती हैं।

प्रजनन: ये भूमि से 2 से 15 मीटर की ऊँचाई तक वृक्ष कोटरों में अण्डे देते हैं जिनकी संख्या प्राय: तीन होती है, यदा कदा दो से चार अण्डे भी देखे गये हैं। ये फ़रवरी से जून तक यह क्रिया सम्पन्न करते हैं। नर तथा मादा दोनों मिलकर अण्डे सेते हैं।

सम्पादकीय नोट:
अवध से बहुत दूर पश्चिमी घाट (अगस्त्यार मलाइ शृंखला) में गाने वाली दो नई प्रजाति की चिड़ियों का पता चला है। सुषमा रेड्डी, वी वी रॉबिन, सी के विष्णुदास, पूजा गुप्ता, उमा रामकृष्णन आदि की टीम ने Sholicola ashambuensis, albiventris और Montecincla meriodionalis की पहचान की। इससे सम्बन्धित आलेख BMC Evolutionary Biology के वर्तमान अङ्क में छपा है।

लेखक: आजाद सिंह
शिक्षा: जंतुविज्ञान परास्नातक,
लखनऊ विश्वविद्यालय
व्यवसाय: औषधि विपणन

अभिरुचि: फोटोग्राफी