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शून्य

शून्य वि। तुच्छम्। … शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके।
(अमरकोश)

‘शून्य’ [0] गणित में अब तक की सबसे सबसे बड़ी खोज है। उसके बिना दस आधार वाली भारतीय अंक पद्धति और अंको के स्थानिक मान की पद्धति संभव नहीं और उसके बिना आज के गणित और विज्ञान की कल्पना नहीं की जा सकती। यह अंकों और गणनाओं का युग है। अंको के बिना जीवन सोच पाना असंभव है। अगर हम अपने आस पास देखें तो ऐसी कोई चीज नहीं जो अंकों के बिना संभव हो, कुछ भी नहीं! और अंकों को इतना उपयोगी बनाने में सबसे बड़ा योगदान शून्य का है।

भारतीय परंपरा के अतिरिक्त इतिहास में अंकों की कई पद्धतियाँ रही हैं, रोमन, ग्रीक, हिब्रू इत्यादि, परन्तु सभी पद्धतियों में अंकों के लिए वर्णमाला के अक्षर प्रयुक्त होते थे। शून्य, स्थानिक मान की पद्धति और दशमलव जैसे सिद्धांत किसी भी और पद्धति में नहीं थे। शून्य के बिना न तो अंकों का निरूपण आसानी से हो सकता है न गणितीय संक्रियायें जिसके कारण रोमन अंकों की पद्धति में बड़ी संख्याओं को लिखना बहुत कठिन होता है और जोड़ घटाव लगभग असंभव।

आप ने कभी किसी पुराने ब्रिटिश कालीन भवन पर रोमन में लिखे निर्माण सन् का मान पता करने का प्रयास किया है?

रोमन पद्धति में ऋणात्मक संख्यायें, भिन्न, द्विघाती समीकरण, दशमलव अंक सोच पाना भी संभव नहीं! हमारे लिये यह सोच पाना भी कठिन है कि बिना शून्य और दस अंकों की पद्धति के संसार चलता कैसे था! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि आज से एक हजार वर्ष पहले कई देशों के मँझे हुये गणितज्ञ जो गणनायें कर पाते थे, उनसे अधिक आज की पाँचवी कक्षा के छात्र कर लेते हैं। एक लंबे समय तक कई सारे आविष्कार इसलिये नहीं हो पाये कि संसार के बहुत बड़े भाग में अंकों का विकसित तरीका नहीं था।

पश्चिमी सभ्यता की बात करें तो पीजा (Pisa) के एक वाणिज्यदूत बोनाची के पुत्र लिओनार्दो पिसानो को अपने पिता के साथ अल्जीरिया जाने का अवसर मिला। वहाँ उसे एक अरबी व्यापारी ने भारतीय अंक पद्धति से परिचय कराया। फिबोनाची, जिसका शाब्दिक अर्थ हुआ बोनाची-पुत्र, के लिए यह अद्भुत था! फिबोनाची को नयी अंक पद्धति में असीमित संभावनायें दिखीं। जो गणनायें रोमन अंक पद्धति में असंभव थीं उन्हें भारतीय अंक पद्धति से बड़ी सरलता से किया जा सकता था। वह इतना प्रभावित हुआ कि अगले कई वर्षों तक भूमध्य सागर के तट पर स्थित देशों का भ्रमण कर व्यापारियों से गणित सीखता रहा।
१२०२ ई. में फिबोनाची ने ‘लिबेर अबाचि’’ अर्थात ‘गणना की पुस्तक’ की रचना की। यह भारतीय अंक पद्धति से यूरोप का पहला परिचय था। फिबोनाची ने इस पुस्तक में मोडस इंडोरम  यानि भारतीय पद्धति का उल्लेख किया। यह शून्य सहित एक से नौ तक अंको की परंपरा और स्थानीय मान की विधि से अंको को लिखने की पद्धति थी। इस पुस्तक में फिबोनाची ने अंको की नयी पद्धति के साथ साथ इसके प्रयोग के व्यावहारिक उदाहरण भी दिये जिनमें व्यापारियों से सीखे गये हिसाब रखने के तरीके विशेष थे। इसी पुस्तक में एक प्रश्न के हल के रूप में गणित के विख्यात ‘फिबोनाची क्रम’ का उल्लेख भी था। इस क्रम का वर्णन इससे पहले विरहाङ्क (६००-८०० ई.), गोपाल (११३५ ई. के पहले) तथा हेमचन्द्र (११५० ई. के पहले) ने भी किया था। फिबोनाची क्रम को गणितज्ञ गोपाल-हेमचन्द्र नम्बर्स के नाम से भी जानते हैं। जैन विद्वान और दार्शनिक हेमचन्द्र को कलिकाल सर्वज्ञ भी कहते हैं।  वैसे तो फिबोनाची के परिचय के बावजूद लगभग दो सौ वर्षों तक यूरोप में अंको की भारतीय पद्धति पूरी तरह प्रचलित नहीं हुई, पर विज्ञान में आविष्कारों की गति को इस परिचय से अधिक गति इतिहास के किसी परिचय ने नहीं दी। फिबोनाची को इस परिचय और अध्ययन के लिए मध्यकालीन यूरोप का सबसे प्रतिभासम्पन्न गणितज्ञ माना जाता है।

शून्य का प्रयोग भारत में सदियों पहले से था। कई सन्दर्भों को नकारने वाले लोग भी यह मानते हैं कि कम से कम ५०० ई. तक भारत में शून्य का प्रयोग होने लगा था। इनमें सबसे प्रमुख नाम आता है आर्यभट का, जिन्हें हम शून्य का आविष्कारक भी कहते हैं जो कि सच नहीं है। आर्यभट ने शून्य का लिखित वर्णन किया है। शून्य के लिए ‘ख’।

‘आर्यभटीय’ पर भास्कर की टीका से लिया गया अंश

परन्तु उससे पहले कई सन्दर्भों में शून्य का वर्णन आया है। ऋग्वेद में रथचक्र की धुरी के गोलाकार छिद्र और विवर के लिये ‘ख’ के प्रयोग कुछ विद्वानों ने इंगित किये हैं। खुले भूदृश्य में रात में गोलाकार दिखता आकाश भी बाद में ‘ख’ कहलाया। यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा मेंं दाशमिक प्रणाली के स्पष्ट वर्णन हैं जिनमें क्रमश: दस गुना करते हुये परार्द्ध 1012  जितनी संख्या तक की गणना बताई गई है:

कृष्ण यजुर्वेद, तैत्तिरीय शाखा, 4.4.11

ऋग्वेद और अथर्ववेद के गणना और संख्या विषयक प्रयोग स्वतंत्र आलेख के योग्य हैं। ‘ख’ और शून्य के अन्य आर्यभटपूर्व प्रयोग हैं: पिंगल  के छंदशास्त्र में (लगभग ४०० ई पू, मान्यताओं के अनुसार पिंगल प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के भाई थे), बृहदारण्यक उपनिषद् में, शतपथ ब्राह्मण में और अमरकोश में – शून्यं तु वशिकं तुच्छरिक्तके।

शून्य की परिकल्पना सबसे पहले भारत में होने का बहुत बड़ा कारण है – गणित का अध्ययन वेदांग के रूप में होना। अंकों का आविष्कार वस्तुओं को गिनने के लिए हुआ। पर शून्य और उसकी परवर्ती ऋणात्मक संख्यायें गणित के पहले अमूर्त रूप हैं, पहली गणितीय काल्पनिकता – ‘शुद्ध गणित’। गणित में होने से पहले दार्शनिक दृष्टि से शून्य की चर्चा भारतीय ग्रंथों में कई बार आयी है। शून्यता अर्थात  बृहदारण्यक उपनिषद का ‘ॐ  खं ब्रह्म’। ख, शून्य, अम्बर, रिक्त, अभाव, तुच्छ, बिंदु इत्यादि शब्दों का प्रयोग शून्य के संकेत 0 के बहुत पहले से होता रहा। आर्यभट के बाद ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर ने शून्य को न केवल गणितीय रूप से परिभाषित किया बल्कि इससे जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिये, एक तरह से देखें तो भारतीय दर्शन के सिद्धान्तों को अङ्कों में लिख दिया!

भारतीय गणितीय परंपरा की एक कठिनता रही उसका संस्कृत श्लोकों के रूप में लिखा जाना। संभवतः श्रुति की परंपरा से गणितीय सिद्धांतों और सूत्रों की रचना कम शब्दों में और स्मृतिसुगम हो जाने वाले संस्कृत श्लोकों के रूप में की गयी, जिनका बाद में अर्थ निकालना कठिन होता गया।


अगले अङ्कों में:
शून्य का वेदांग दर्शन से गणितीय रूप में विकास, वेदांग और खगोलीय गणनाओं में बड़े अंको का प्रयोग,आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, महावीर और भास्कर की शून्य की परिभाषा. शून्य की परिभाषाओं पर भारतीय दर्शन के अभाव (कणाद), शून्यवाद (नागार्जुन), ख (उपनिषद्), शून्यता (बौद्ध महायान) के सिद्धांतों का प्रभाव. शून्य से विभाजन की समस्या और अनंत/लिमिट के सिद्धांत का प्रतिपादन.

लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

 

साफ-सफाई : सांस्कृतिक कर्तव्य और गुण

साफ-सफाई के बारे में एक उक्ति है:
यत्र शुचिता: च स्वच्छतां, तत्र तिष्ठष्यारोग्य वैभवञ्च सुखम्।

इसमें पवित्रता और शुचिता के लिए कहा गया है कि इनके होने पर आरोग्य, संपदा और सुख की सिद्धि होती है। सफाई का मर्म भी इसी भाव में निहित है। सदा रुग्णता, कृपणता, ऋणग्रस्तता, उद्यमहीनता, व्यसन आसक्ति जैसे मनोशारीरिक विकार वहीं पर होते हैं जहाँ पर शुचिता का निर्वाह नहीं किया जाता। स्मृतिकार अत्रि और दक्ष ने इस बुराई को एक प्रकार के सूतक के रूप में निर्दिष्ट किया है।

स्वच्छता या साफ-सफाई का कार्य अपने परिवेश के प्रति मानव के कर्तव्य के रूप में स्वीकारा गया है। यों तो प्राकृतिक व्यवस्था भी रही है कि अग्नि स्वत: चैतन्य होकर झाड़-झंखाड़ों को स्वाहा कर देती है; जल गंदगी व भराव को बहाकर ले जाता है; हवा भी कचरा उड़ाकर ले जाने का काम करती है और धूप तेज होकर कीचड़ को सुखा देती है। पशु तक एक दूसरे का खाकर प्राकृतिक परिवेश की सफाई और संतुलन बनाये रखते हैं किंतु यह अन्योन्याश्रित प्राकृतिक चक्र तब गड़बड़ा जाता है जब कृत्रिम तौर पर गंदगी की जाती है और उसके निस्तारण-निवारण का उपाय नहीं किया जाता। फलत: यह समस्या का कारण बना है। आज गंदगी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आई है और जैविक कचरा तो खास सिरदर्द हो गया है और उसका निस्तारण-शोधन एक बड़ी चुनौती के रूप में उभर रहा है। सब ओर शुचिता के लिए चेतावनियाँ दी जा रही है जबकि सफाई हमारी सामान्य आदत में हो तो इस प्रकार के निर्देशों की आवश्यकता ही नहीं पड़े।

हमारे यहाँ साफ-सफाई रखने और परिवेश-पर्यावरण को साफ-सुथरा बनाये रखने के मूल में जहाँ वर्णाधारित व्यवस्था रही, वहीं प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह कर्तव्य भी तय किया गया कि वह अपने परिवेश को स्वच्छ रखे। वैदिक सूक्तों से यह सिद्ध होता है कि श्रेष्ठ परिवेश ही उपासना के योग्य होता है। एक प्रोक्षण मंत्र है – महे रणाय चक्षसे (ऋ.10.9.1)। इसमें महे = महर् = सीमाक्षेत्र = वातावरण के लिए है। चक्षसे = देखभाल अथवा रक्षा या सुरक्षा के अर्थ में है। यह प्रोक्षण मंत्र पानी से धो-पोंछने के प्रसंग में आया है और इसमें वातावरण को साफकर रमणीय बनाने का निर्देश है। निश्चित ही वैदिक ऋषियों ने परिवेश की शुद्धता को जीवन के लिए आवश्यक माना था। इसमें घर से लेकर गोष्ठ (गायों के स्थान), गली-वीथिका और बस्ती तक को साफ-सुथरा रखने और सर्वथा यज्ञ-योग्य पवित्र स्थान बनाये रखने पर जोर है।

 बीकानेर के महाराजा रायसिंह कालीन विक्रम संवत् 1650 की प्रशस्ति में इस अर्थ में वंशवर्तियों के चरित्र को शुचिता पूर्ण बनाने का विचार दिया गया है। लक्ष्मी, गंगा, गिरिजा, सावित्री की तरह पौराणिक पात्रों के पवित्र जीवनादर्शों को धारण करने के लिये गंगातुल्य गुणों की अपेक्षा की गई है: गङ्गातुल्या गुर्णैगङ्गा। (जर्नल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, 1920, अंक 14, पृष्ठ 278)

आयुर्वेद भारत की दुनिया के मानव समुदाय को सबसे बड़ी देन है। आचार्य सुश्रुत ने टूटी-फूटी, बेकार वस्तुओं वाली अर्थात परित्यक्त जगहों पर निवास करने का निषेध किया है, इसका आशय है निवास स्थान साफ स्वच्छ हो (सुश्रुतसंहिता, चिकित्सा. 24, 91)।

सुश्रुत द्वारा बाल, कान, नाक, दाँत या शरीर के किसी भी विवर में अंगुली न करने का निर्देश (सुश्रुत संहिता, चिकित्सा, 24.95)

इस बात को महाभारत ने यूँ कहा है कि सब प्रकार की उपयोगी-अनुपयोगी वस्तुओं को उनके लिए निर्धारित स्थान पर ही रखकर कार्य का निस्तारण करना चाहिए। स्त्रियों से यह विशेष रूप से अपेक्षा की गई है कि वे सफाई के कार्य पर विशेष ध्यान दें। कचरा, बर्तन आदि के सुव्यवस्थित नहीं रहने पर वहां से सम्पदा चली जाती है (विशुद्धगृहभाण्डासु गोधान्याभिरतासु च आदि; महाभारत, अनुशासनपर्व,  11, 11-12)। महाभारतकार ने दाँत आदि की शारीरिक शुद्धि वस्त्र शुद्धि पर पूरा ध्यान देने का आग्रह किया है। गरुड़पुराण में कहा गया है कि अपवित्रता कई व्याधियों का कारण बनती है। शुद्धता से संपदा की बहुलता मिलती है। (गरुड़पुराण, आचार. 114, 35) ब्रह्मवैवर्तपुराण ने तो अपने हाथ के नाखूनों तक को दांतों से कुतरने का निषेध किया है क्योंकि प्रथमतया गंदगी वहीं पर शेष रहती है। स्वास्थ सुरक्षा के लिए ऐसे आचरण की मनाही है। (ब्रह्मवैवर्त. प्रकृतिखण्ड 38, 44)

गृह की शुद्धि विचार शुद्धि से भी अति आवश्यक बताई गई है। अशुद्धि होने पर न केवल विचार दूषित होते है बल्कि नकारात्मक ऊर्जा का पल्लवन होने लगता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में परिवेश का शोधन करने पर जोर है, इसके लिए अनेक प्रकार की धूपों का प्रयोग कर वातावरण को सुगंधित बनाए रखने का मंतव्य भी मिलता है। उपाय के रूप में गुग्गुल, चंदन, लोबान जैसी अनेकानेक धूपों का नाम भी दिया गया है। चरकसंहिताकार ने यात्रा में मंगल के लिए मांगलिक वस्तुओं को परिभाषित किया है और दूषित, गंदी वस्तुओं को सर्वथा छोड़कर आगे बढऩे का निर्देश किया है, यह साफ-सुथरे परिवेश का परिचायक है। (चरक. सूत्र. 8, 19) मनुस्मृति, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण, विष्णुधर्मोत्तर पुराण आदि में परिवेश की शुद्धता पर बराबर ध्यान रखने और साफ परिवेश में रहने और विचरण करने पर जोर दिया गया है। चलते हुए या खड़े-खड़े खाने पर गंदगी होती है, प्राय: हमारे यहां बैठकर शांतचित्त से ही भोजन करने का निर्देश है। अत: चलते हुए खाने का निषेध मिलता है:
न गच्छंस्तु पठेद्वापि। खादन्न गच्छेदध्वानम्। स्वापेऽध्वनि तथा भुंजन्स्वाध्यायं च विवर्जयेत्।
(पद्म. स्वर्ग. 55, 66; शुक्रनीति 3, 143; ब्रह्मपुराण 221, 70)

पुराणों और धर्मसूत्रों में नगर को शुद्ध रखकर उनके मार्गों में सुगंधित जल छिड़कने के संदर्भ मिलते हैं। बौधायन धर्मसूत्र में प्राचीन नगरों का जिक्र है और उनकी सीमा में किसी भी प्रकार के कूड़ा-कचरा नहीं रखे जाने का निर्देश किया गया है। उक्त धर्मसूत्र में किसी भी प्रकार की गंदगी करने पर प्रायश्चित करने और इसके लिए प्रार्थना पूर्वक स्नान करने का संदर्भ आया है। कहा गया है कि यदि मैंने कुछ दूषण किया हो और उससे जो पाप हुए हों तो उन पापों से इंद्र, वरुण, बृहस्पति और सविता मुझे दूर करें और पवित्रता प्रदान करने का अनुग्रह करें:
यन्मे मनसा वाचा कर्मणा वा दुष्कृतं कृतम्।
तन्म इंद्रो वरुणो बृहस्पतिस्सविता च पुनन्तु पुन: पुनरिति॥
(बौधायन. अध्याय 5, खंड 8, प्रश्न 2, श्लोक 3)

इसकी टीका में कहा गया है: यो वा मया पापकर्मभ्य: प्रतिग्रह: कृत:, यच्च मया मनोवाक्कायकर्मभि: दुष्कृतं तत्सर्वं जलाशयस्नानेन इन्द्रादय: पुनन्त्विति यन्मया पुन: पुन: प्रार्थयितुं शक्यते इत्येतदतो भवति। इसी ग्रंथ में कहीं चमड़े का टुकड़ा, बाल, नाखून, कीड़ा, चूहे की विष्ठा भोजनादि में गिरी वस्तु के दिखाई दे जाने पर जल से सफाई करने का संदर्भ भी मिलता है। (वही 7, 12, 2, 6)

फिर, जगह की साफ-सुथरी रखने और वहीं पर बैठने और अन्यान्य कार्य करने का निर्देश मिलता है। यह भी कहा गया है कि रथ, हाथी, घोड़ा आदि के चलने पर जो धूल उड़ती है, वह पवित्र बताई गई है क्योंकि वह पुन: जम जाती है। गाय के पैरों से उडऩे वाली धूल भी पवित्र बताई गई है किंतु झाडू लगाते समय उडऩे वाली धूल को अशुद्ध कहा गया है। बकरी, भारवाही गदहों के चलने से उड़कर कपड़ों पर लगने वाली धूल को दूषित व अशुद्ध कहा गया है। उसके शुद्धिकरण का निर्देश किया गया है। (उपर्युक्त 3, 6, 2, 35)

मनुस्मृति में सफाई पर पूरा ध्यान देते हुए पञ्चसूना को परिभाषित किया गया है। मानव को इन पाँच स्थानों को  नियमित रूप से साफ-स्वच्छ रखने का निर्देश किया है। गृहस्थी के लिए घर के उपयोगी पाँच स्थानों को पाप का स्थान कहा गया है:
पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्कर:।
कण्डनी चोदकुम्भ्श्च बध्यते यास्तु वाहयन्॥
(मनुस्मृति 3, 68)

इसमें पाँच स्थानों का वर्णन हैं और पाँचों को ही जीव हिंसा का स्थान कहा गया है। इनसे व्यहृत करता हुआ गृहस्थ पाप से बँधता है :

  1. चुल्हा (उद्वाहनी, चुल्ली),
  2. चक्की (पेषणी),
  3. झाडू (संमार्जन्यादि),
  4. ओखली-मुसल (कण्ठनी उलूखल मुसले) और
  5. जल का घट (उदकुम्भ)।

इन स्थानों पर होने वाले पापों की निवृत्ति के लिए महर्षियों ने पञ्च महायज्ञ का निर्देश किया है और इन क्रम में ब्रह्मïयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और नृयज्ञ करने को कहा गया है। इनमें वेद का अध्ययन व अध्यापन ब्रह्मयज्ञ, तर्पण करना पितृयज्ञ, हवन करना देवयज्ञ, बलिवैश्वदेव करना भूत यज्ञ व अतिथियों को भोजन आदि देकर सत्कार करवाना नृयज्ञ है।

मेगास्थिनीज के 300 ईसापूर्व के इण्डिका में आये विवरणों और तत्कालीन प्रमाणों में पाटलिपुत्र आदि नगरों को जो विवरण अंकित है, वह साफ-सुथरे परिवेश का बोधक है। बौद्ध ग्रन्थ मिलिन्द पञ्हो में शहर के निवेश से पूर्व ही सूत्रधार द्वारा वहाँ साफ-सफाई के उचित प्रबंधन का निर्देश मिलता है।

इसी प्रकार अर्थशास्त्र, कामंदकीय नीतिसार आदि में भी इस संबंध में जोर है। इसी प्रकार अन्य बौद्ध ग्रंथों में जिस प्रकार की नगरीय रचना के प्रमाण हैं, वे वहाँ के मुख्य मार्गों, मार्गों के किनारों पर दुकानों के नियमितीकरण, कूपों सहित उद्यानों और वाटिकाओं, झील-सरोवरों, कमल दीर्घिकाओं, वापियों के घिरे होने का संदर्भ देते हैं और वे साफ-सुथरे रखे जाते थे। उनके लिए परिचारकों की व्यवस्था थी और नागरिकों से उनके प्रति कर्तव्यों की अपेक्षा की जाती थी। ऐसे नगरों में नागरिकों के साथ ही उद्यमी-व्यापारी, दस्तकार भी होते किंतु वे स्वच्छता, पवित्रता पर पूरा ध्यान देते थे। (अर्ली इंडियन आर्किटेक्चर, सिटीज़ एवं गेट्स : आनंद केंतिश कुमार स्वामी, पृष्ठ 1)

सफाई सुरुचि की सूचक ही नहीं, सभ्यता की बोधक भी है। भारत यदि पवित्र और सनातन राष्ट्र है तो उसने भीतरी ही नहीं, बाहरी शुद्धि पर भी पूरा ध्यान दिया और और परिवेश की स्वच्छता पर भी ध्यान केंद्रित रखा है। योग में नियम के रूप में शौचाचार पर जोर दिया गया है। स्वच्छता यहां एक जीवंत तत्व के रूप में स्वीकारी गई है। सरस्वती-सिंधु कालीन नालियाँ शुद्धि के विचार को ही दर्शाती हैं। आहाड़ के चक्रकूप गंदे पानी के भर जाने पर दूसरा कूप खोदकर गंदे पानी को भूमि मेें उतारने का प्रयास था। बीकानेर क्षेत्र में भी ऐसी शुचिता की पुरानी परंपरा रही है। मिलिंद ने आश्चर्य किया था कि भारत में घरों के बाहर पानी से भरे घड़े क्यों रखे जाते थे। इन सब बातों में सफाई की परंपराओं के ध्येय छिपे हैं। यहाँ आत्मा का मैल हटाने का श्रेष्ठ उदाहरण है क्यों कि बारंबार घर बाहर में सफाई होती देख यह दृष्टांत हमारी सांस्कृतिक कहानियों का अंतर्निहित तत्व भी बनकर उभरा।

देवालयों और मंदिरों के मार्जन, प्रोक्षण आदि को पुराणों और धर्मशास्त्रों में विधि के रूप में लिखा गया है। गोमय से लिपाई को पवित्रता का प्रतीक बताया गया है। वहां साफ-सफाई और सफेदी को पुण्यार्जन के रूप में परिभाषित किया गया है। शिवधर्मपुराण में शिवायतन में सफाई करने का निर्देश है। इसका सीधा अर्थ है कि गंदगी कहीं पर भी न हो, जो व्यर्थ की वस्तु हो, उसको कृषि के लिए खाद के रूप में काम में लेने का निर्देश पराशर, काश्यपादि के कृषिशास्त्रों में मिलता है। यदि सफाई कार्य प्रभावित होता है तो गंदगी और प्रदूषण बढ़ता है और कुमति-बुरे विचार आते हैं: जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। यह ठीक ही कहा गया है कि भारत के प्राकृतिक परिवेश को भारत के सभ्यता बोध से अलग नहीं किया जा सकता। पश्चिमी देशों ने जहां इकोलॉजी के महत्व को अब समझा है, वहीं यह भारत के लिए हमेशा से यह संस्कृति का अविभाज्य अंग रहा है। यहां जल में मल, मूत्र, थूक, कुल्ला और कफ छोडऩे की मनाही रही है। याज्ञवल्क्य स्मृति, शाण्डिल्य स्मृति, महाभारत में इस आशय के वचन पर्याप्त महत्व लिए हैं : ष्ठीवनासृक् शकृन्मूत्ररेतातांस्यप्सु न निक्षिपेत्। (याज्ञवल्क्य. 1, 137)

कहना न होगा कि शुद्धता, शुचिता, पवित्रता आदि हमारे सांस्कृतिक गुण हैं और देह से लेकर गेह तक की सफाई पर जोर दिया गया है। पूर्वकाल में घर में बर्तनों को इधर-उधर बिखरे हुए देखने पर अशुभ माना जाता था। बैठने के आसन फटे होते तो विचारों में दरार होना स्वीकारा जाता था। महाभारत के रचनाकाल में इस प्रकार की स्थितियों को उचित नहीं माना जाता था। सफाई के लिए अकेले स्त्रियों को ही जिम्मेदार मानकर उन पर दोषारोपण नहीं किया जाता बल्कि इसे सामूहिक दायित्व समझा जाता था। ऐसे घर या स्थान को पाप के कारण दूषित माना जाता था और कहा गया है कि कि वहां से किसी भी प्रकार की पूजा देवता और पितरगण स्वीकार नहीं करते:
प्रकीर्णं भाजनं यत्र भिन्नभाण्डमथासनम्।
योषितश्चैव हन्यते कश्मलोपहते गृहे॥
देवता: पितरश्चैव उत्सवे पर्वणीषु वा।
निराशा: प्रतिगच्छन्ति कश्मलोपहतात् गृहात्॥
(अनुशासन. 127, 6-7)

ऐसे गंदगी वाले स्थानों में कलिकाल का निवास माना जाता था। प्राय: बर्तनों और खाट के टूटी हो जाने पर भी रखे रहने पर दोष स्वीकारा जाता था, तब ये ही बेकार वस्तुयें थीं। (उपर्युक्त 127, 16)

इस प्रकार भारतीय परंपरा में साफ-सफाई पर पर्याप्त महत्व दिया गया है। मानव के आचरण में स्वच्छता को एक आचरण की तरह स्वीकारा गया है। दीपोत्सव पर गंदगी के विधिवत निस्तारण की परंपरा के मूल में यही उद्देश्य रहा है कि परिवेश की शुद्धता ही संपदा, स्वास्थ और समृद्धि की कारक है। अत: हमें इस कर्तव्य के पुरजोर पालन को एक आवश्यकता और युगीन मूल्य के रूप में स्वीकारना चाहिये। आज प्रमुख आवश्यकता घर से लेकर गली-मोहल्ला, नगर और फिर राज्य से लेकर देश और देश से लेकर विदेश तक में सफाई के लिए संकल्पित होने की है।


Dr Shrikrishna Jugnu

लेखक: डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’,
फैलो इण्डोलॉजी
40, राजश्री कॉलोनी, विनायकनगर,
उदयपुर 313001 राजस्थान