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यज़िदी : एक करुण पुकार

सुभाष काक

DFID - UK Department for International Development (picture: Rachel Unkovic/International Rescue Committee)

चित्र आभार: UK Department for International Development (DFID), Rachel Unkovic/International Rescue Committee, under Open Government license

सम्भवत: किसी और नृवंश ने यज़िदी लोगों जैसा संत्रास नहीं झेला है। ईराक़ में अल-क़ायदा ने उन्हें काफिर घोषित कर उनके सम्पूर्ण नरसंहार की अनुमति दी। 2007 में सुनियोजित कार बमों की शृंखला ने उनमें से लगभग 800 की हत्या कर दी।  

इस्लामिक स्टेट ने 2014 में यज़िदी नगरों और गाँवों के विनाश का एक अभियान आरम्भ किया, और इसने उनमें से लगभग 3000 की हत्या कर दी है, 6500 का अपहरण किया है और 4500 यज़िदी महिलाओं और लड़कियों को यौनदासत्त्व हेतु बेंच दिया है। बहुत सी अपहृत लडकियों ने आत्महत्या कर ली है। इन वर्षों में आक्रमण के भय से यज़िदियों के धार्मिक नेता बाबा शय्ख ने लालिश स्थित मुख्य मन्दिर में होने वाले आधिकारिक वार्षिक समारोह निरस्त कर दिये। 

लालिश का विहंगम दृश्य By Ger Al Hamud Ser bahger (From Iraq) [GFDL or CC-BY-SA-3.0], via Wikimedia Commons

 यज़िदी (या येज़िदी) मुख्यत: उत्तरी इराक़ में रहने वाले कुर्दिश भाषी लोग हैं। सदियों से अपने मुस्लिम और ईसाई पड़ोसियों द्वारा ‘शैतान पूजक’ के रूप में घृणित इन लोगों ने 70 से अधिक नरसंहारों का सामना किया जिनमें 2 करोड़ से ऊपर यज़िदियों की मृत्यु का अनुमान है, और उनमें से अधिकांश अपनी संस्कृति का त्याग करने के लिये बाध्य कर दिये गये हैं।

यूरोप में शरण लिये हुये 150,000 को मिला कर यज़िदियों की संख्या लगभग 800,000 है। वे स्वयं को एक सच्चे ईश्वर में आस्था रखने वाले बताते हैं, और वे मयूर देवदूत ‘ताउस मेलेक’ की आराधना करते हैं जो अनंत ईश्वर का रूप (अवतार) है। छ: दूसरे देवदूत तौस मेलेक के सहयोगी हैं और वे सृष्टि के सात दिनों से सम्बद्ध हैं जिनमें से रविवार ताउस मेलेक का दिन है। यज़िदियों के मन्दिरों और पूजागृहों तथा दूसरे स्थानों की सज्जा मोर के चित्राङ्कन से की जाती है। उन पर हो रहे आक्रमण ईसाइयों और मुसलमानों के इस विश्वास का परिणाम हैं कि मयूरदूत इब्लिस या शैतान है।       

यज़िदी पंथ एक रहस्यवादी, वाचिक परम्परा है जिसके प्रार्थना गीत (क़व्ल qawls) क़व्वालों द्वारा गाये जाते हैं। परम्परा के कुछ अंश अब दो पवित्र पुस्तकों में संग्रहीत किये गये हैं जिन्हें ‘किताब अल-जिल्वा’ (Revelation उद्घाटन की पुस्तक) और मिशेफ़ रेश (काली पुस्तक Mishefa Reş) कहा जाता है।

यज़िदी अपनी उत्पत्ति भारत में होने का दावा करते हैं, और मोर के प्रति उनका श्रद्धाभाव इस मूल की स्मृति हो सकता है। भारत में मोर शिवपुत्र मुरुगन (स्कन्द और कार्तिकेय) देव का वाहन है। कृष्ण भी अपने केशों या मुकुट में मोरपङ्ख पहनते हैं। आदिम इन्द्रधनुष से उपजे सात रंगों में से नीला रंग तौस मेलेक से सम्बन्धित है जो कि कृष्ण का भी रंग है। 

यज़िदी सूर्योन्मुख हो प्रार्थना करते हैं परंतु दोपहर की प्रार्थना वे लालिश (कुर्दिस्तान) की दिशा में करते हैं। भारतीय परम्परा जैसे ही वे पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं और उनकी मान्यता यह है कि ताऊस मेलेक के अतिरिक्त अन्य सभी देवदूत धरती पर संतों और पवित्रात्माओं के रूप में अवतरित होते हैं। हिंदुओं की तरह ही वे पुनर्जन्म के लिये वस्त्र बदलने के रूपक का प्रयोग करते हैं। 

दूसरी भारोपीय संस्कृतियों की तरह यज़िदी समुदाय तीन वर्गों में विभाजित है: शेख (पुजारी), पीर (वयोवृद्ध) और मुरीद (जन-सामान्य) और वे विवाह सम्बन्ध अपने समूह में भी करते हैं। यज़िदियों में पंथ-परिवर्तन का विधान नहीं है। शेख समुदाय फक़ीर, क़व्वाल तथा कोचक समूहों में बँटा हुआ है। वंश आधारित प्रशासनिक प्रमुख ‘मीर’ या राजकुमार होता है जब कि ‘बाबा शेख’ धार्मिक पदक्रम के प्रमुख होते हैं।

यज़िदी अपने आप को दासेनी (बहुवचन: दावासेन) कहते हैं जो देवयस्नि (संस्कृत, देवयाज्ञि) देवपूजक से उद्भूत है। इसकी पूरी सम्भावना है कि यज़िदी शब्द संस्कृत के यजाता से व्युत्पन्न है, जो कि प्राचीन पारसी (और कश्मीरी) में यज़ाता कहलाता है। प्राचीन पारसी में देव को दॆवा (daeva) कहते हैं।

प्राचीन भारत, ईरान और पश्चिम एशिया में वेदपूजकों को  देवयाज्ञि या देवयस्नी कहा जाता था जिसके समानार्थी सनातन या वैदिक धर्म हैं। पारसी अपने पंथ को माज़्दायास्ना (संस्कृत: मेधा-यज्ञ) या अहुर माज़्दा (संस्कृत: असुर मेधा, मेधा के देव) का पंथ कहते हैं। ज़रथुष्ट्र ने अपने पंथ को देवपंथ या देवयास्ना के प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया।

भारत से देवयास्ना के प्रसार की सबसे प्रबल सम्भावना हड़प्पा संस्कृति के क्षय के पश्चात लगभग 1900 ई.पू. की बनती है जिसके शीघ्र पश्चात वैदिक देवता मेसोपोटामिया और सीरिया में वर्णित होने प्रारम्भ होते हैं। ज़रथुष्ट्र बैक्ट्रिया से अफगानिस्तान के समीप उत्तर-पूर्व ईरान क्षेत्र में आये और उनके नये पंथ ने पश्चिम के निवासी देवपूजक समुदायों को भारत स्थित समुदायों से विखंडित कर दिया। यज़िदियों का 4000 वर्ष पूर्व भारत से लौटने का इससे मेल खाता है।  

प्रसंगवश, यह रोचक है कि अरस्तू का विश्वास था कि यहूदियों की मूलभूमि भी भारत है। इसके अतिरिक्त स्वयं को एकेश्वरवादी (अल-मुवह्हिदून) कहने वाला अरबभाषी ड्रूज़ समुदाय भी पुनर्जन्म में विश्वास रखता है और उनके पवित्र धर्मग्रन्थों में रसाइल-अल-हिंद  (भारतीय पत्रावली) भी सम्मिलित है।  

पारसी पंथ के उदय के पश्चात पश्चिमी एशिया में देवयास्ना पंथ पर्याप्त लम्बे समय तक बना रहा। उनके बने रहने का प्रमाण ईरानी सम्राट ज़ैरज़ैस (Xerxes, 486-465 ईसापूर्व) के देव- या दैव-अभिलेख में मिलता है जिसमें देवयास्नी विद्रोह का सीधा उल्लेख है। ज़ैरज़ैस घोषणा करता है: “और इन क्षेत्रों में एक स्थान ऐसा था जहाँ पहले दैव पूजे जाते थे। तदोपरांत, अहुरमज़्द की कृपा से, मैंने दैव स्थान को नष्ट कर दिया, और मैंने घोषणा की: दैव नहीं पूजे जायेंगे!” यह, लगभग 2500 वर्ष पहले का, यज़िदियों के देवयास्नि पूर्वजों द्वारा झेले गये दमन का एक पुराना लिखित प्रमाण है। 

यज़िदी पंचाङ्ग 4750 ईसापूर्व तक जाता है जोकि यवन (ग्रीक) इतिहासकार एरियन (Arrian) द्वारा सिकन्दर अभियान के वर्णन में उल्लिखित, भारत के 6676 ईसापूर्व में उदित हुए पुराने सप्तर्षि पंचांग से सम्बंधित प्रतीत होता है। (सप्तर्षि पञ्चाङ्ग के बारे में अधिक सामग्री मेरी पुस्तक The Astronomical Code of the gveda में उपलब्ध है।)

यज़िदियों की आध्यात्मिक परम्परा समृद्ध है और उनकी वर्तमान संस्कृति परम्परा बारहवीं शताब्दी के शेख आदि (देहांत 1162 ई.) से प्रारम्भ होती है जो चौथे उमय्यद खलीफ़ा मर्वान प्रथम के वंशज थे। शेख आदि का मकबरा उत्तरी ईराक़ के लालिश में है जो अब प्रमुख यज़िदी तीर्थयात्रा का केन्द्रबिन्दु है।

1919 ई. में छपी इस पुस्तक में यज़िदियों के प्रति ईसाई घृणा स्पष्ट है। उनकी आराधना पद्धति को Devil Worship और मयूर दीप स्तम्भ को Symbol of Devil बताया गया है।

नववर्ष उत्सव में [भारतीय, अनुवादक स्पष्टीकरण] काँस्य मयूर आरती-दीपों जैसे ही मयूर गढ़े हुए काँस्य-दीप ‘संजक’ एक शोभायात्रा में क़व्वालों द्वारा मीर के आवास से ले कर यज़िदी गाँवों में घुमाये जाते हैं। मान्यता है कि संजक भारत से आये थे और सात पवित्र देवदूतों के प्रतीक के रूप में मूलत: उनकी संख्या सात थी जिनमें से पाँच तुर्कों द्वारा छीन लिये गये, अब मात्र दो ही बचे हैं।      

यज़िदी लोग मानवता की अदम्य संकल्पशक्ति के एक प्रतीक हैं। संसार के सर्वाधिक दमित और प्रताड़ित जन में से एक यज़िदी समुदाय चरम विपरीत परिस्थितियों में भी अपने साहस और वीरता के लिये प्रशंसा, सहयोग और समर्थन का पात्र है।

(मूल अंग्रेजी आलेख से अनुवाद: अनुराग शर्मा और गिरिजेश राव)


सन्दर्भ :
Acikyildiz, The Yezidis. I.B. Tauris, 2010.

Kak, On Aristotle’s Claim that the Jews Originated in India.
https://www.linkedin.com/pulse/aristotles-claim-jews-originated-india-subhash-kak?trk=mp-reader-card

The Achaemenid Royal Daiva Inscription of Xerxes:
http://www.livius.org/aa-ac/achaemenians/XPh.html


श्री सुभाष काक भारत विद्या के जाने माने विद्वान हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नई दिल्ली से विद्युत अभियांत्रिकी में पी.एच.डी. श्री काक वर्तमान में ओकलाहामा राज्य विश्वविद्यालय के विद्युत और संगणक अभियांत्रिकी संस्थान में रिजेण्ट आचार्य हैं। 

सम्वत्सर और पञ्चाङ्ग – 1

भारतीय सम्वत्सर और पञ्चाङ्ग के वर्तमान रूप सहस्राब्दियों से जागृत उन्नत सभ्यता और संस्कृति के प्रमाण हैं। उपलब्ध पुरातात्विक और साहित्यिक प्रमाणों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि अग्नि रूपी पुरोहित को आगे रखती कृषिकर्मी देव सभ्यता यहीं फली फूली जिसका नेतृत्त्व वर्षा के देवता इन्द्र करते थे। यहाँ ऋतु, उस पर आधारित कृषि और कृषि आधारित जीवन के बहुत ही समृद्ध और बहुरंगी रूप विन्यास मिलते हैं जिनका प्रस्तावक जन का वैविध्य है।

उस पुरातन समय में कृषि उत्पादकता, सफलता, नवोन्मेष और प्रसार के लिये अग्नि के आकाशीय रूप सूर्य की गति पर आधारित ऋतु चक्र का प्रेक्षण अनिवार्य  हुआ जिसके कारण क्रमश: ‘यज्ञ’ आधारित एक ऐसी व्यवस्था ने जन्म लिया जिसने सृष्टि के विराट ‘यजन्’ से स्व को जोड़ते और उसका अनुकरण करते स्वयं को चेतना और कर्म के अति उच्च स्तर तक पहुँचा दिया। विभिन्न याज्ञिक सत्रों के निर्वहन हेतु कालचक्र का सटीक विवेचन और मूर्तन अनिवार्य था। सम्वत्सर और पञ्चाङ्ग आदि उस आवश्यकता की पूर्ति करते थे। इस शृंखला में हम उस विकास यात्रा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करेंगे। आरम्भिक स्थिति में वैदिक संकेतों के आधार पर अनुमान रहेंगे जो धीरे धीरे ऋचाओं, मंत्रों और यजुष् के साथ ठोस होते जायेंगे।  

गिरिजेश राव

जब तक कृषि नहीं थी तब तक सूर्य गति और ऋतु चक्र के व्यवस्थित प्रेक्षण बहुत आवश्यक नहीं थे। एक बार कृषि की ओर उन्मुख होने के पश्चात क्रमश: आवश्यकता बढ़ती गयी। दूर नभ में दिन में चमकते तपते पिण्ड सूर्य की ऊष्मा ही जीवन थी, यह समझा जाने लगा, साथ ही यह भी कि उसकी झुकान और उठान के साथ ही अँजोर घटता बढ़ता तो देह भी कभी ठिठुरन तो कभी ताप का अनुभव करती। ताप बहुत बढ़ जाता तो शीतल करने को झझझम पानी बरसता और शस्य लहलहा उठती। हिरण्यरूप सूर्य बादलों के पीछे छिप अमृत बरसाता और हरीतिमा निखरती पसरती जाती। अति हो जाती तो उसकी ढलान पहले थोड़ी सिहरावन लाती और कुछ ही समय में दाँत कड़कड़ाने लगें ऐसा भी चारो ओर हो जाता और तब एक दिन अचानक दिखता कि कमेरे हाथ की ओर का झुकाव थिर हो गया है और सूर्य लौटने जैसे लगे हैं। उजाले का समय बढ़ने लगता और उनके कुछ ही उगने और डूबने के उपरांत समूची धरा जैसे निखर उठती। मुरझाये वन पर नवीनता अँखुवाने लगती और पुहुप खिल उठते। न अधिक शीत, न अधिक घाम, लगता जैसे सब नया नया हो गया है। भीतर मन में किलकारियों के साथ नाचने की उमंगें उठतीं और प्रिय के सान्निध्य की ऊष्मा खेतों में उच्छृंखल हो उठती। अब की बार जो अन्न घर आता उसकी बात ही और होती। सब होते होते जाने कब सूरज सिर पर पुतली चढ़ जाता और आग बरसने लगती तो पुन: तड़ित झमझम की पुकार और प्रतीक्षा होने लगती!

जो चतुर थे वे समझ गये कि किसी भी तरह की अति का शमन एक निश्चित समय में हो ही जाता है और ऐसा चलता रहता है। इस चमत्कार को नमस्कार करते हुये उन्हों ने कारक सूर्य को देवता घोषित कर दिया जो कि अंतरिक्ष में उसी ऊष्माधारी देवता अग्नि का ही रूप था जिसके कारण वन हटे और खेत बने, पेट भरने की चिंता कम हुई और देह की सुन्दरता पर ध्यान गया, ढकने और सजाने की आवश्यकता भी पड़ी। शीत की सी सी, घर में अन्न पहुँचने के आह्लादी गान का रे, रे और हर्षाती बरसाती ठुमक के त त ता ता थइया जाने कब मिल कर शरत हो गये। प्रतिदिन उगते और अस्त होते ‘सरति आकाशे’ सूर्य थे ही, उनकी आवृत्ति का समय हुआ शरद, आगे वर्षा से ‘वर्ष’ होने वाले कालखण्ड का पहला रूप।

सुख और उल्लास की अभिव्यक्ति के दो अक्षर मिल कर ‘ऋत’ हुये। एक बहुत ही आदरणीय भावना ने कहीं जन्म लिया। वह जो कभी नहीं चूकता, वह जो अतुल प्रकाश से चमकता है, वह जो सब कुछ देता है, वह जो वरने योग्य है, पूजने योग्य है, वह भी ऋत हुआ और उसकी व्यवस्था भी ऋत हुई। देह के अनुभव और वनस्पतियों एवं प्राणियों पर प्रभाव से जो तीन कालखण्ड पूर्णत: स्पष्ट थे, शीत, ग्रीष्म और वर्षा, वे बार बार आते, निश्चित समय रह कर लुप्त हो जाते ऋतु हो गये।

चतुर पहेरुओं ने जाना कि सूर्य जिस ओर उगते हैं, उस ओर भी एक ही स्थान पर स्थिर रह नहीं उगते। एक हाथ की ओर झुकते चले जाते और जब लगता कि अब गिरे कि तब तो थम कर पुन: लौटने लगते। दूसरे हाथ की ओर भी यही क्रिया दुहराते। लगता कि जैसे अदृश्य रज्जुओं से बँधे हों जो एक सीमा से नीचे गिरने नहीं देती! विराट दोलन।

इस गति के साथ ही वह दैनिक गति भी थी जिसके पालन में सूर्य प्रतिदिन आधा गोला पार कर उगने के विपरीत ओर अस्त हो जाते। स्पष्ट था कि गति चक्रीय भी थी। रज्जुओं और चक्रीय गति को समझने तक भौतिक रूप से अश्व पालतू बना कर रथों में जोते जा चुके थे। यह समझ उसी से आकार ली।

तब तक गिनती के साथ नृत्य की ताल और गति की मात्रायें भी निश्चित की जा चुकी थीं और गीत गाये जाने लगे थे। सीधे कहने के स्थान पर वक्रोक्ति, उपमा, रूपक, लक्षणा, व्यञ्जना आदि का प्रयोग चतुर जन करने लगे थे और उनसे संवादित देवता परोक्षप्रिय हो चले थे। कवियों ने पर्जन्य की भूमिका में घिरे मेघों की फुहारों और सूर्य रश्मियों से बने धनु देखे थे जिनमें सात वर्ण भी स्पष्ट थे।

दिन में तपता सूर्य होता और रात में जब वनस्पतियाँ और पादप सो जाते तो जैसे उन्हें सहलाने को सूर्य सम एक दूसरा रूप शीतल प्रकाश के साथ अंतरिक्ष में उभर आता और उसके साथ ही आ जाते अनेक चमकते टिमटिमाते जुगनू। इस सम को नाम मिला सोम। सोम अद्भुत था, वह कलायें दिखाता था। सूर्य की कलाकारी का परास तो बहुत बड़ा था जो सबके लिये उतना बोधगम्य भी नहीं था किंतु सोम की घटबढ़ कलायें तो स्पष्ट दिखती थीं। किसी दिन वह पूरा गोला दिखता और घटते घटते एक दिन लुप्त हो जाता। दुबारा बढ़ते हुते पुन: पूरा गोला हो जाता। यह चक्र चलता रहता। गिनती से पता चला कि लगभग तीस सूर्यास्तों में यह चक्र पूरा हो जाता। सोम के पूर्ण से पुन: पूर्ण होने के इस कालखण्ड को नाम मिला मास। लगभग 12 ऐसे मास होते तो सूर्य देवता अपना दोलन पूरा कर चुके होते। यह भी स्पष्ट हो गया कि तीन ऋतुओं वाले खण्ड चार चार मास की अवधि के थे।

और तब ऋत को जीवन में उतारने को उद्यत एक कवि की ऋचा ने विराट रूपक का आकार लिया जिसमें सात सवारियाँ थीं, सप्त नाम का अश्व जिसे खींचता, रथ ऐसा था कि उसमें बस एक चक्का था जब कि तीन धुरियाँ थीं। वह चक्का न ढीला पड़ता और न नष्ट होता जब कि रथ में विश्व भुवन स्थित थे!

सप्त युञ्जन्ति रथमेकचक्रमेको अश्वो वहति सप्तनामा।
त्रिनाभि चक्रमजरमनर्वं यत्रेमा विश्वो भुवनाधि तस्थु:॥
(ऋग्वेद 1.164.2)

यह एक पहिये वाला रथ क्या था? सम्वसंति ऋतव: यस्मिन् अर्थात जिसमें ऋतुयें बसती थीं, समीकृरूपेण सरंति यस्मात् कालात्, अर्थात जिस कालखण्ड के पश्चात सबकुछ सम (संतुलन) से प्रारम्भ होता है, ‘स सम्वत्सर’।

उन्हों ने जाना कि सूर्य के आभासी दोलन में ऐसे संतुलन के दो बिन्दु होते हैं, जिनमें एक वसंत ऋतु में होता है। वसंत अर्थात जिसमें समूची सृष्टि नयेपन के उमंग और नवरस उद्योग में सहज स्वाभाविक रूप से ही होती है। इसी संतुलन बिन्दु को सामान्य जन ने नववर्ष का आरम्भ माना।

किंतु हमने तो जिन तीन ऋतुओं की बात की उनमें वसंत ऋतु तो है ही नहीं! विषुव और अयन क्या थे? सात सवारियाँ कौन थीं? अगले अङ्क में इन पर आगे बढेंगे और साथ ही इस पर भी कि सम्वत्सर अकेला क्यों नहीं है?