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विमुद्रीकरण (Demonetisation) – अंतिम भाग

पहले भाग से आगे … 

अभिषेक ओझा


विमुद्रीकरण:

भ्रष्टाचार, काला धन और जाली नोट को ख़त्म करने के लक्ष्य को लेकर भारत सरकार ने गत आठ नवम्बर की अर्द्धरात्रि से ५०० और १००० के नोटों की वैधानिकता समाप्त कर दी। सबसे पहली बात यह कि यह नवीकरण (करेंसी स्वैप)  है, यानि कि पुराने नोट ख़त्म नहीं कर दिये गये  उनकी जगह नये नोट निकाले गये।

यदि तुरंत प्रभाव से नये नोट अर्थव्यवस्था में पहुँच गये होते तो नये नोटों के सुरक्षा मानकों, छापने में लगे खर्च और कितनी मुद्रा काले धन के रूप में पकड़ी गयी; इनके अतिरिक्त आर्थिक विश्लेषण के लिये कुछ अधिक नहीं बचता। यदि कोई समस्या है तो वह है क्रियान्वयन की – संचालन में हो रही देर और उससे होने वाले समस्यायें।  
 इस स्तर का आर्थिक निर्णय और साहसी प्रयोग इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। अर्थशास्त्र की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण घटना है जिसका विस्तृत अध्ययन किया जाना चाहिये पर जब तक आंकड़े नहीं आ जाते विश्लेषण के नाम पर हम जो भी हम पढ़ रहे हैं वह मान्यता भर है जो कि अधिकतर पक्षपातपूर्ण है, पूर्वाग्रह से ग्रसित किंतु कोई ऐसा लेख पढ़ने को नहीं मिला जिसमें इस कदम के उद्देश्यको सराहा न गया हो। जिस युग में हम जी रहे हैं उसके हिसाब से ऐसा होना भी चमत्कार ही है!
राजनीतिक मतभेद होना स्वाभाविक है,  मानवीय प्रकृति है,  होना ही चाहिये परंतु एक् सीमा होनी चाहिये और वह सीमा है देशहित। जब किसी को अपनी विरोधी राजनीतिक विचारधारा से देश के लिये कुछ अच्छा देख दुःख होने लगे और कुछ बुरा होते देख प्रसन्नता तो उसे केवल राजनीतिक मतभेद नहीं कह सकते।
संसार की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित होने पर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में कई विरोधाभासी बातें हैं।  भूमिगत या समानांतर अर्थव्यवस्था की समस्या, काला धन, भ्रष्टाचार, कर चोरी, आतंक, जाली मुद्रा, अवैध गतिविधियाँ एक अलग ही स्तर पर हैं। इतनी बड़ी किसी अन्य अर्थव्यवस्था में ऐसे हालात नहीं हैं। अधिकतर अनुमानों के अनुसार यहाँ भूमिगत अर्थव्यवस्था सकल घरेलु उत्पाद  का २०-२५% है! केवल १% लोग टैक्स भरते हैं।  वैसे इन अविश्वसनीय  से लगने वाले आँकड़ों को छोड़ भी दें तो हम सबने कितने व्यवसायियों को टैक्स भरते देखा है? किसी सी.ए. के पास चले जाइये वह टैक्स चोरी के तरीके बताना अपने पेशे का धर्म समझता है। यहाँ आर्थिक विकास की दर और कर में वृद्धि की दर समानुपाती नहीं है।  अर्थशास्त्र की दृष्टि से देखें तो करों की चोरी न सिर्फ चोरी है बल्कि एक् तरह से ‘निष्ठा और शुचिता पर दण्ड’ भी है,  निष्ठावान होने का जुर्माना। जो आर्थिक उत्पादन में अधिक सहयोग करते हैं, प्राय: ‘केवल’ उन्हें ही कर भी देना पड़ता है। एक् अर्थव्यवस्था के लिये इससे बुरा और क्या हो सकता है! पकड़े जाने की न तो कोई सम्भावना, न ही डर – इसे मोरल हैजर्डकहते हैं, व्यवस्था द्वारा कपटी और चोर बने रहने को प्रेरित करना। विगत दो दशकों में जैसे जैसे आर्थिक विकास होता गया भूमिगत अर्थव्यवस्था और घोटाले बढ़ते गये। आर्थिक विकास के साथ साथ अगर देश की मूलभूत संस्थाओं में सुधार नहीं हुआ तो उस विकास से पूरे देश को कैसे लाभ पहुँच सकता है? एक बार मैंने किसी से कहा था,”भारतीय अर्थव्यवस्था के आँकड़ों को मत देखो वरना तुम्हें अर्थशास्त्र से अधिक भगवान पर भरोसा होने लगेगा कि इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था चल कैसे रही है !”  
अब बात करते हैं विमुद्रीकरण की आलोचनाओं, तुरंत दिखने वाले प्रभाव और दूरगामी प्रभावों की:  
मौद्रिक झटका (मोनेटरी शॉक): 
सबसे बड़ा तर्क दिया जा रहा है कि यह एक् मोनेटरी शॉक है।  मुद्रा आपूर्ति एक् झटके में ८५% कम हो गयी, जिससे आर्थिक संकुचन होगा। जनता के पास मुद्रा की कमी से आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होगी, खासकर अनौपचारिक (इनफॉर्मल) अर्थव्यवस्था में – परिवहन, छोटे कारोबारी, किसान, मजदुर। लोग खर्च कम करेंगे, आमद कम होगी, व्यापार प्रभावित होंगे आदि, क्रय शक्ति कम होगी, महँगाई कम होगी और इन सबसे आर्थिक विकास कम होगा – अर्थव्यवस्था के यांत्रिकी का उल्टा क्रम।
यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि  मुद्रा ८५% से कम नहीं हुई है – करेंसी स्वैप हुई है – बदली जा रही है और अल्पकाल के लिये बृहत मुद्रा (ब्रॉड मनी) की परिभाषा के हिसाब से नकदी (कैश) से जमा (डिपॉजिट) के रूप में मुद्रा का रूप परिवर्तित हुआ है। अर्थव्यवस्था संकुचित हुई है तो मात्र उस परिमाण से जो मुद्रा कभी जमा ही नहीं हो पायेगी अर्थात वह काला धन जो मुख्य धारा में पुनः वापस नहीं आ रहा। ऐसी मुद्रा वैसे ही अचल होती है।
आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होंगी पर तभी तक जब तक नोटों की समस्या ख़त्म नहीं हो जाती और यह  समस्या खासकर उन क्षेत्रों में सीमित है जहाँ नकदी के बिना काम नहीं चलता और वैकल्पिक व्यवस्था संभव नहीं।  इसे जिस तरह से बढ़ा चढ़ा कर मंदी तक से जोड़ दिया जा रहा है वह अतिशयोक्ति है।
आर्थिक गतिविधियों और उत्पादन पर वास्तविक प्रभाव कितना होगा वह केवल समय ही बता सकता है। अभी जो भी आँकड़े हम देख रहे हैं वे केवल अनुमान हैं और लगभग हर ऐसे अनुमान राजनीतिक पूर्वाग्रह से प्रेरित हैं। पर इससे एक बात तो पता चलती है कि इस निर्णय के विरुद्ध इस एक तर्क के अलावा कोई बड़ा तर्क अर्थशास्त्रियों के पास नहीं है। फिलहाल विशेषज्ञों के आलेख से बेहतर आप अपने आस पास प्रभावित हो रही गतिविधियों को देखकर अनुमान लगा सकते हैं।
एक् और प्रभाव जिसकी उपेक्षा की जा रही है, वह है बचत में वृद्धि जो लंबी अवधि में आर्थिक विकास में सहायक सिद्ध होगी। जो भी धन मुद्रा के रूप में संचित रहता था वह अब मुख्यधारा में आयेगा। वित्तीय समावेश बढ़ेगा। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और छोटे कारोबारी बैकों का उपयोग अधिक करेंगे।  इस झटके से लोगों को बैंक में रुपया रखने को प्रोत्साहन मिलेगा। साथ में जो रुपया ऐसे ही पड़ा रहता था उस पर लोगों को ब्याज मिलेगा और वह मुद्रा बैंक से होती हुई अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनेगी। बैंको में जमा धन बढ़ने से लघु अवधि में ब्याज दरों में कमी आ सकती है। काले धन में कमी आने से पारदर्शिता बढ़ेगी। व्यवसाय सक्षम होंगे। नये व्यवसाय करने में आसानी होगी और प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही सरकारी आमदनी में वृद्धि होगी। 
द्रवता (लिक्विडिटी) और मंदी: 
मुद्रा के कम होने से खरीद-बिक्री भी प्रभावित होगी। खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ काले धन का इस्तेमाल सबसे अधिक होता है। इनमें सबसे पहले ध्यान में आता है – भूमि-भवन जैसी अचल संपत्तियों वाला क्षेत्र – (रियल इस्टेट)। अनुमान है कि यह क्षेत्र मध्यम से लंबी अवधि के लिये प्रभावित हो सकता है। निकट भविष्य में मुद्रा की कमी और मध्यम से लंबे समय तक काले धन में आयी कमी से अचल संपत्ति की माँग और बिक्री में कमी आयेगी। कुछ समय के लिये काले धन से होने वाली खरीद बिक्री तो पूरी तरह ही थम जानी है। फिर आपूर्ति माँग से ज्यादा होगी, इन्वेंटरी बढ़ेगी और दबाव से कीमतें उचित मूल्य (फेयर वैल्यू)  की ओर आयेंगी पर इसे मंदी कहना उचित नहीं होगा।
बढ़ी हुआ कृत्रिम मूल्य यदि माँग-आपूर्ति के अनुसार उचित मूल्य पर आये तो उसे ‘मंदी’ नहीं कह सकते। पर यदि अचल संपत्ति की कीमतें गिरती हैं तो इससे बाजार में संशोधन होगा (मार्किट करेक्शन)। भारत और अन्य पारदर्शी अर्थव्यवस्थाओं की अचल संपत्ति बाजार में सबसे बड़ा अंतर काले धन से आता है। पारदर्शी अर्थव्यवस्था में जहाँ घरों की कीमतें आपूर्ति, मांग और उपयोगिता के हिसाब से शेयर बाजार की तरह ऊपर नीचे होती हैं, वहीं भारत में काले धन के चलते माँग में स्यात ही कभी कमी आ पाती है। अंतरराष्ट्रीय मंदी के समय भी भारत में कीमतें कम नहीं हुई, इस पर आगे चर्चा करेंगे।
बाजार पारदर्शी और कीमतें उचित मूल्य पर आने के दूरगामी प्रभाव होंगे। एक बार कीमतें स्थिर होंगी तो उचित कीमतों पर निवेश में बढ़त होगी। जरूरतमंद अधिक संपत्ति खरीद पायेंगे। साथ ही इस कदम से बैंको की द्रवता बढ़ेगी। ज्यादा लोग बैंकिंग से जुड़ेंगे। बैंकों के पास ऋण देने को अधिक रुपये होंगे तो नये व्यवसायों को लाभ होगा। ज्यादा पारदर्शिता आने से अचल संपत्ति,  शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के कृत्रिम बुलबुले समाप्त होंगे।
क्रियान्वयन:
विमुद्रीकरण में अगर कुछ वास्तविक समस्यायें हैं तो वे हैं इसके क्रियान्वयन में लोगों को हो रही परेशानी, अव्यवस्था, लंबी कतारें, ए टी एम को नये नोटों के लिये ठीक करने की आवश्यकता, दो हजार के नोट होने से लेन देन में दिक्कत, निरंतर बदलते नियम। ऐसे में प्रबंधन और क्रियान्वयन पर प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं। पर साथ ही इतने बड़े परिवर्तन के बाद समस्या होना भी स्वाभाविक ही है। खासकर ऐसे फैसले का क्रियान्वयन जो इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ जिससे सीख ली गयी होती। किंतु जिस देश में नमक कम होने की अफवाह से अफरा तफरी मच जाती हो वहाँ इस तरह के अप्रत्याशित कदम के बाद जिस तरह सहयोग और शांति से सब कुछ हुआ वह अपने आप में अतुलनीय है।
 लोगों को हो रही समस्याओं के बीच सहयोग की अद्भुत कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। आलोचक एक् साथ इतनी विरोधाभासी बातें कह रहे हैं जैसे –  इस योजना को इतना गुप्त क्यों रखा गया? साथ ही यह प्रश्न कि कुछ लोगों को इस कदम की जानकारी तो नहीं थी? और यह भी कि एक् सुनियोजित तरीके से धीरे धीरे पुराने नोट ख़त्म किये जाने चाहिये थे। इन तर्कों में आपस में ही इतना विरोधाभास है कि किसी पक्ष में कुछ तर्क देने की आवश्यकता नहीं। अगर सुनियोजित तरीके से, पहले से घोषणा कर इस योजना को लागू किया जाता तो फिर उससे कौन सा लक्ष्य हासिल होता? क्या गुप्त रखना इस योजना के सफल होने के लिये जरूरी नहीं था?  अगर इस फैसले के क्रियान्वयन का यह सही समय नहीं था तो सही समय कब होता? आर्थिक गतिविधियाँ कब नहीं रुक जातीं? अभी रबी की बुवाई का समय था तो कल क्या कुछ और नहीं होता?
पीछे मुड़कर अगर हम जन धन योजना, खातों में अनुदान (सब्सिडी) का आना और फिर काले धन को घोषित करने को दी गयी समय सीमा इत्यादि सरकारी कदमों को देखें तो इसे एक् सुनियोजित क्रियान्वयन ही कहेंगे। इतने बड़े फैसले के बाद अगर कुछ भी परेशानी नहीं होती तो वह चमत्कार होता।
 निरंतर बदलते नियम कहीं न कहीं  इंगित करते हैं कि हो रही हर परेशानी को पहले से देख पाना संभव नहीं था। क्रियान्वयन की घोर आलोचना के बीच कहीं भी यह पढ़ने को नहीं मिला कि इसे और बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता था? विशेषज्ञ सिर्फ आलोचना करने की जगह अगर इस पर बात करते तो संभवतः क्रियान्वयन बेहतर होता। लोगों को परेशानी हुई और होगी इससे कोई इनकार नहीं कर सकता पर फिर क्या ऐसे फैसले लिये ही नहीं जाने चाहिये? लोगों को विश्वास है कि लघु अवधि में हो रही तकलीफ दीर्घकालीन बेहतरी के लिये है नहीं तो इतनी आसानी से इतना बड़ा फैसला सफलतापूर्वक लागू नहीं हुआ होता।
काला धन:
मुझे नहीं लगता इस बात से कोई भी असहमत है कि विमुद्रीकरण के फैसले से काला धन, भ्रष्टाचार, जाली मुद्रा, आतंक और नक्सलवाद जैसी समस्याओं पर एकाएक रोक लगी – पॉवर ऑफ। पूरी दुनिया इस बात पर एकमत है कि वित्तीय आपूर्ति के स्रोतों पर आक्रमण आतंकी गतिविधियों पर रोक लगाने का सबसे प्रभावी तरीका है। बाकी सारे उपाय रक्षात्मक और पैबंद की तरह हैं। ५०० यूरो के नोट को बिन लादेन ऐसे ही नहीं कहा जाने लगा था! समस्या यह है कि आगे फिर से ये पुनर्जीवित न हों इसके लिये क्या उपाय किये जायेंगे वह सबसे महत्त्वपूर्ण है। लघु अवधि में विमुद्रीकरण से अगर कोई सबसे बड़ा फायदा हुआ है तो निर्विवाद इन क्षेत्रों में ही हुआ है।
कई लोगों ने तर्क दिया कि काला धन दरअसल एक जगह नहीं रहता। काले और सफ़ेद धन में कोई स्पष्ट विभाजन रेखा नहीं है। काला धन जब लेन देन में इस्तेमाल होता है तो उस पर भी सेवा कर लगता है और ऐसे धन से भी अर्थव्यवस्था चलती है। साथ ही मंदी के समय भी ये मुद्रा आर्थिक गतिविधियों को चलाती रहती है। मैं समझ सकता हूँ कि ऐसे तर्क देने वाले लोग हैं – अर्थशास्त्री भी।
पहले तो यह कहना वैसे ही है जैसे यह कहना कि कैंसर होना बहुत अच्छी बात है क्योंकि कैंसर रोगियों के लिये अस्पतालों में मुफ्त की पार्किंग होती है। या ये कि विकलांग हो जाना ही अच्छा है, आरक्षण मिलेगा और ट्रेन के किराये में छूट!
एक तर्क है कि मंदी में भी भारतीय बैंक नहीं डूबे और विकास दर भी प्रभावित नहीं हुई क्योंकि समानांतर अर्थव्यवस्था चलती रही। उदाहरण के लिये मान लेते हैं कि अगर एक घर की कीमत १०० है और कोई ३० काले धन में भुगतान करता है और बाकी ७० पर सरकार को कर देकर बैंक से कर्ज लेता है। इससे कीमतें बढ़ती जाती हैं। मांग में कमी नहीं आती। और बैंक जो १०० की संपत्ति के लिये सिर्फ ७० ही लोन देते हैं उनके लिये कीमतें कम होना कोई परेशानी नहीं क्योंकि १०० की जगह वैसे ही उन्हें ७० बताया गया है। पारदर्शी अर्थव्यवस्था में पहले कीमतें कम होती हैं फिर हालात और बिगड़े तो पहले लोग, फिर बैंक एक के बाद एक डिफॉल्ट होते है। नैतिकता छोड़ भी दें तो सुनने में सही लगने वाला काला धन एक के बाद एक आर्थिक नुकसानों के सिलसिले के बाद एक आभासी सच बनाता है। मुझे कैंसर होने के बाद होने वाले साइड इफ़ेक्ट को फायदे के रूप में देखने से बेहतर उदाहरण नहीं सूझ रहा।
जो काला धन संचय करके रखते थे उनपर तो निर्विवाद सहमति है। पर बात उस तर्क की जिसमें कहा जा रहा है कि काला धन भी आर्थिक लेन देन का हिस्सा होता है और बहुत कम लोग ही मुद्रा के रूप में धन संचय करते हैं। जो चलायमान काला धन था उसके लिये क्या यह समझना इतना कठिन है कि उस मुद्रा के एक जगह ना रहने पर भी यानि अगर वह सात नवम्बर को उस इंसान के पास नहीं थी और नौ को भी नहीं रहती। पर किसी न किसी के पास तो वह आठ को थी? क्या वह वहीं ख़त्म नहीं हुई? तो ऐसा कैसे संभव है की चलायमान काले धन का कुछ नहीं हुआ? आठ नवम्बर के पहले चलन में जितनी मुद्रा ५००/१००० के नोटों के रूप में थी उनमें से जो मुद्रा वापस बैंकों में नहीं आ पायेगी उससे पता चलेगा कितना धन काले धन के रूप में ख़त्म हुआ।
हवाला, फेक करेंसी, टैक्स चोरी ख़त्म नहीं हो गयी। पर एक् पूर्ण विराम लगा। आर्थिक शब्दों में कहें तो ये गतिविधियाँ अब पहले से अधिक खर्चीली हो गयीं। इसमें दो राय नहीं कि लोग नये तरीके निकालेंगे। पर इन्हें करना जितना सरल हो गया था, वह नहीं रहा। विमुद्रीकरण काले धन और ऐसी गतिविधियों पर कर की तरह है। और मोरल हैज़र्डकी जो बात हमने की थी उसके इतर बेईमानी की जगह ईमानदारी को प्रेरित करने वाला कदम है।
मुद्राहीन/वित्तीय समावेश (कैशलेस/फिनांसियल इनक्लूजन):  
पिछले भाग में कैशलेस समाज की बात हुई थी। इस कदम का लक्ष्य कैशलेस को बढ़ावा देना रहा हो या नहीं, पर कहीं न कहीं इस कदम से बैंकिंग के साथ साथ डिजिटल भुगतान को अप्रत्याशित बढ़ावा मिलने वाला है, काले धन और बड़े कारोबारियों की बात छोड़ दें तब भी।
मेरा स्वयं का अनुभव है जब पिछले साल पूर्वी उत्तर प्रदेश में कार्ड ही नहीं चेक से भी वितरक ने टू व्हीलर देने से मना कर दिया था। मेरे लिये यह झटका था कि इतने नोट लेकर कौन चलता है! पर ऐसा होता है जो कि गलत है। बैंक एक ऐसी सुविधा है जिसके बस इस्तेमाल की आदत पड़नी है। पहले खाते नहीं थे। अब खाते हैं तो आदत नहीं। विमुद्रीकरण लोगों को बैंक तक खींच कर ले जाने वाला कदम है। गृहिणियाँ जो रुपया छिपा कर रखती थीं उनको अगर उसी पैसे के लिये ब्याज मिले तो वह क्यों नहीं बैंक में रखेंगी? आनन फानन में ही सही इसके दूरगामी फायदे होंगे – कई नये व्यवसाय जन्म लेने वाले हैं।
अमेरिका में टोल भुगतान के लिये एक् ईज़ी पास होता है,  पेन ड्राइव से थोड़ा सा बड़ा जिसे बस गाड़ी के भीतर रखना होता है। न टोल नाके पर रुकने की जरुरत, न छुट्टे की और न ही यह देखने की कि कितना टोल देना है।  जो एक बार इस्तेमाल कर ले वह दुबारा कभी सिक्कों और नोट का इस्तेमाल नहीं करना चाहेगा। बैंकिंग और मुद्राहीन सुविधायें ऐसी ही है। एक् बार बस लोग इस्तेमाल करने लगे फिर उन्हें दुबारा धक्का देने की जरूरत ही नहीं। इस्तेमाल करना आसान है। अगर नहीं हैं तो आसान बनाने वाले लोग हैं – ओला, उबेर, पेटीम, ई-कॉमर्स। इन क्षेत्रों में नयी कंपनियाँ बढ़ती ही जानी हैं और फिर जैसे जैसे डिजिटल मुद्रा बढ़ेगी व्यवस्था अपने आप पारदर्शी होती जायेगी।
कर और आँकड़े
विमुद्रीकरण के बाद जो आँकड़े जमा हो रहे हैं, वे नीतियाँ बनाने में बहुत ही उपयोगी होंगे। आयकर विभाग के पास स्वच्छ आँकड़े होंगे जिनसे कर देने वाले, न देने वाले, आय से अधिक संपत्ति इत्यादि की जानकारी जुटाना आसान होगा। संभवतः इससे पहले कभी पहचान के साथ इतना वित्तीय बड़ा आंकड़ा भारत सरकार के पास नहीं आया होगा। (वैसे इसके दुरुपयोग की भी सम्भावना है। भारत में आँकड़ों की गोपनीयता के कौन से कानून हैं मुझे इसकी जानकारी नहीं।) इन आँकड़ों से बहुत कुछ समझने और पता लगाने में मदद मिलेगी। साथ ही हर लेन देन के लिये पहचान की जरूरत आगे भी की जानी चाहिये। वह अपने आप में एक बहुत बड़ा सुधार है।
जुगाड़
ज्यादातर विशेषज्ञ विमुद्रीकरण को अंतरराष्ट्रीय आर्थिक नियमों और प्रक्रिया की दृष्टि से देख रहे हैं लेकिन भारतीय परिवेश में कई चीजें अलग नियमों से चलती हैं और इसके कई दूरगामी परिणाम होने जा रहे हैं। सारे परिणाम तो समय के साथ ही पता चलेंगे। स्टीवन लेविट की पुस्तक फ्रीकोनॉमिक्स के उदाहरणों की तरह किसी और लक्ष्य से शुरू की गयी योजना के किसी और क्षेत्र में परिणाम दिखेंगे। डिजिटल मुद्रा और वित्तीय समावेश जैसे असर वह हैं जो हम अभी ही अनुमान लगा ले रहे हैं। हम केवल आर्थिक संकुचन की बात कर पा रहे हैं पर कोई इस बात की चर्चा नहीं कर रहा कि कितने ही मजदूर और घरेलू काम करने वाले नौकर इत्यादि को दो-ढाई लाख रुपये विनिमय करने को मिले। मजदूर जिन्हें दिन भर की मजदूरी के लिये २५० रुपये मिलते हैं, उन्हें काम छोड़कर ए टी एम में लगने के ५०० रुपये मिलने लगे! कहीं न कहीं इससे आर्थिक गतिविधि को नुकसान हुआ है तो साथ में एक समानांतर मुद्रा प्रवाह की प्रक्रिया भी चल रही है। इसका एक छोटा असर मिल्टन फ्राइडमैन के हेलीकाप्टर मनी की तरह भी होगा!  मुझे पता है विशेषज्ञ इसे तुरत नगण्य प्रक्रिया कह अस्वीकार कर देंगे। पर कहने का अर्थ यह है कि ऐसी कई प्रक्रियायें चल रही हैं जिन्हें हम जुगाड़ कहते हैं। अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो जितने काम सरल और सस्ते होंगे संतुलन उनकी तरफ अपने आप बढ़ता जायेगा।
संस्कृति/सोच
आर्थिक दृष्टि से सोचें तो हमारे जीवनकाल में ऐसे दुर्लभ प्रयोग का होना अपने आप में बहुत महत्त्वपूर्ण है जिससे पता चला कि मुद्रा की कीमत सिर्फ सरकार पर भरोसा है। भरोसे के बिना मुद्रा सिर्फ एक कागज़ का टुकड़ा है और कुछ नहीं। इस मुद्दे पर बहुत कुछ लिखा गया है पर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि ऐसा फैसला लेने की हिम्मत किसी एक व्यक्ति में होगी। लोग चौतरफा आलोचना कर रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं। अगर राजनीतिक पूर्वाग्रह निकाल दें तो सवाल उठाना गलत नहीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पर्ल हार्बर हमले के बाद जब अमेरिकी संसद ने युद्ध का प्रस्ताव पारित किया तो उसके खिलाफ भी एक मत पड़ा था। लोकतंत्र में वह होना बहुत जरूरी है। इससे इस फैसले की अहमियत कम नहीं होती।
 इस एक् फैसले से जनमानस के सोच और व्यवहार में जो परिवर्तन आयेगा उसका सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है। बैंकिंग, डिजिटल और भुगतान के अन्य तरीकों के अलावा मानसिकता में आने वाला बदलाव जिसके नापने का कोई तरीका नहीं। आर्थिक फायदों से कहीं ज्यादा इस एक फैसले ने हर नियम कानून के अपवाद होते हैं वाली सोच के साथ-साथ देश, कानून और नेतृत्व की छवि में परिवर्तन किया है। हर व्यक्ति के अंदर ये सोच कि कानून के दायरे में रहना चाहिये, कुछ करने से पहले क्या नियम है वह जान लेना चाहिये, जमाखोरों में घबराहट, ईमानदारों में आत्मविश्वास –  एक झटके से लोगों के व्यवहार और सोच में कितना परिवर्तन आता है वह किसी भी आर्थिक लाभ/घाटे से कई गुना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
व्यवहार में परिवर्तन और सरल प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण हो सकती है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है यूरोपीय देशों में अंग दान करने वाले लोगों की संख्या। मैं आशा करता हूँ कि इस फैसले से ऐसे दूरगामी परिवर्तन होंगे।
उपसंहार
एकमात्र समस्या – क्रियान्वयन। बाकी सारी समस्यायें या तो लघु काल के लिये है या उन्हें संतुलन करने वाले अन्य आर्थिक कारक हैं। इसलिये मुद्रा बदलने की प्रक्रिया जितनी जल्दी पूरी हो यह योजना उतनी ही ज्यादा सफल होगी।  यह फैसला अर्थव्यवस्था को रिसेट करने की तरह है पर इसका दूरगामी असर तभी संभव है जब एक बार पुनः अर्थव्यवस्था वापस अपनी गति पर आये तो सिलसिलेवार सुधार हों – बेनामी संपत्ति, चुनाव, विदेशों में जमा धन। ५०० और १००० के नोटों पर प्रहार तो बस एक तरीका था! सिलसिलेवार सुधार नहीं हुये तो सोना, डॉलर, बेनामी संपत्ति, दो हजार के नोट आदि के उपयोग द्वारा लोग नये तरीके निकाल ही लायेंगे।
रिसेट के बाद फर्मवेयर अपडेट करने की जरूरत है नहीं तो कुछ सालों में वापस सब कुछ वैसे ही हो जायेगा। फिर सिस्टम हैंग ! यह निर्णय आने वाले सुधारों की शृंखला का एक संकेत होना चाहिये। इनमें सबसे आवश्यक है – कराधान की नीतियों में सुधार ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग टैक्स भरें। जितने अधिक लोग मुख्यधारा में शामिल होंगे अर्थव्यवस्था उतनी मजबूत होगी। बेहतर नीतियाँ और पारदर्शी व्यवस्था किसी भी सजा से अधिक कारगर होंगी । काला धन इतनी बड़ी समस्या हो जाने के पीछे भी बीते समय में लिये गये निर्णय ही जिम्मेदार हैं। बेहतर नीतियाँ और उत्कृष्ट सरकारी संस्थायें रही होतीं तो काला धन आज इतनी बड़ी समस्या हुई ही नहीं होती।
 
 दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एक बात सबके लिये सच है, और वह है शक्तिशाली, उत्कृष्ट और पारदर्शी संस्थायें जिनके होने के लिये भ्रष्टाचार समाप्त होना सबसे आवश्यक है। जब तक वह नहीं होता देश ऐसी समस्याओं से जूझता रहेगा। यह उस दिशा में लिया गया मात्र एक पर बहुत महत्त्वपूर्ण कदम है। इस अचानक और साहसिक फैसले से आम जनता का प्रसन्न होना स्वाभाविक है। जो खुश नहीं हैं उनका न होना भी – जाकी रही भावना जैसी विमुद्रीकरण देखी तिन्ह तैसी।

विमुद्रीकरण (Demonetisation) – 1

‘विमुद्रीकरण’ समझने के लिये पहले समझते हैं उन बातों को जिनसे उस पर किये जा रहे विश्लेषण और दिए जाने वाले तर्कों को समझने में आसानी होगी।  
अर्थशास्त्र
अमेरिकी  राष्ट्रपति हेनरी ट्रूमैन ने अर्थशास्त्रियों से परेशान होकर कहा था,”मुझे एक हाथ वाला अर्थशास्त्री चाहिए. जितने अर्थशास्त्री हैं वे कहते हैं ऑन वन हैण्ड… फिर कहते हैं ऑन दी अदर हैण्ड…”। (संभवतः ट्रूमैन को कोई वामपंथी अर्थशास्त्री नहीं मिला होगा क्योंकि वे अक्सर एक ही हाथ के होते हैं।) 
अर्थशास्त्र विज्ञान है या कला, यह बहस का मुद्दा है।
 अर्थशास्त्र को कला कहने वालों के अनुसार बाजार और इंसानों का व्यवहार बता पाना बहुत कठिन है, उन्हें उसे किसी नियम में नहीं बाँधा जा सकता।  इसलिये उन्हें अनुभवी लोगों के हाथ में छोड़ देना चाहिए।
 अर्थशास्त्र को विज्ञान कहने वालों के अनुसार आर्थिक व्यवहार में भी एक वैज्ञानिक, गणितीय सम्बन्ध – एक पैटर्न होता है जिसके लिये नियम और सूत्र बनाए जा सकते हैं, जिनकी सहायता से आर्थिक समस्याओं का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और आर्थिक निर्णयों के प्रभाव का पता लगाया जा सकता है।
वास्तविकता इन दोनों के बीच कहीं होती है। परन्तु अर्थशास्त्री प्राय: वैसे ही भविष्यवाणी करते हैं जैसे ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ हिलेरी क्लिंटन के जीतने की सम्भावना गणना शुरू होने के कई घंटो बाद तक ९५% बताता रहा। अर्थशास्त्र के सिद्धांत दर्शन-कला-राजनीति की तरह हैं – मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना। इसमें गलत कुछ नहीं, पर इस बात को पहले कह देने का अर्थ मात्र यह बताना है कि यदि कोई किसी आर्थिक सिद्धांत का सन्दर्भ देकर भविष्यवाणी कर रहा है तो उसके ठीक विपरीत मत का समर्थन करने वाले सिद्धांत भी मिल जायेंगे।  
ऐसा नहीं है कि अर्थशास्त्र का कोई उपयोग नहीं है पर भारत में विमुद्रीकरण के बाद जो कुछ पढ़ने को मिला वह प्राय: ऐसा लगा जैसे हाथी की केवल पूँछ देखकर बता देना कि हाथी कैसा होता है!  अर्थशास्त्र का हवाला देकर तर्क देते समय हम भूल जाते हैं कि मानवीय व्यवहार प्रकृति के नियमों की तरह स्थिर और पूर्वानुमानित नहीं होते। लगभग सारे आर्थिक सिद्धांत इस मान्यता के साथ प्रारम्भ होते हैं कि मानव हमेशा तर्कसंगत फैसले लेता है (वैसे पारंपरिक अर्थशास्त्र से भिन्न स्वभावजन्य अर्थशास्त्र – बिहैव्यरल इकोनॉमिक्स  एक उभरती हुई शाखा है)। फिर आप समझ ही सकते हैं कि वे कितने सच होते होंगे। यही कारण है कि इतिहास के सबसे बड़े आर्थिक निर्णयों, योजनाओं, संकटों और सुधारों पर आज भी अर्थशास्त्री सहमत नहीं हो पाते कि क्या सही हुआ, क्या गलत! और क्या होना चाहिए, क्या नहीं।  विज्ञान की तरह यहाँ प्रयोग नहीं किये जा सकते और कुछ प्रयोग हुये भी तो उनकी संख्या इतनी अधिक नहीं कि उनसे निष्कर्ष निकाले जा सकें। इस स्तर का और इस विधि से विमुद्रीकरण इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। 

फ्रेडेरिक बस्त्या ने सिलेक्टेड एसेस ऑन पोलिटिकल इकोनोमी  में लिखा है: 
अर्थव्यवस्था की दृष्टि से, किसी कार्यवाही, क़ानून, आदत, संस्था का एक ही प्रभाव नहीं होता बल्कि प्रभावों की एक शृंखला होती है। इन प्रभावों में सबसे पहला प्रभाव तात्कालिक होता है जो कार्यवाही के साथ साथ होता है और तुरंत दिखने लगता है। बाकी प्रभाव बाद में  उभर कर आते हैं। वे पहले से नहीं दिखते। यदि हम भाग्यशाली हुये तो इन प्रभावों का पूर्वानुमान कर पाते हैं। अच्छे और बुरे अर्थशास्त्रियों में केवल एक अंतर होता है – बुरे अर्थशास्त्री अपने आपको सिर्फ दिखने वाले प्रभाव तक सीमित कर लेते हैं जबकि अच्छे दोनों का विचार करते हैं, वे प्रभाव जो तुरंत दिख जाते हैं और उन प्रभावों का भी जिनका अनुमान लगाया जा सकता हो। वैसे यह अन्तर ज़बर्दस्त होता है क्योंकि लगभग हमेशा ही या तो परिणाम तुरंत लाभदायक होते हैं और बाद के विनाशकारी या इसके उलट।
बुरे अर्थशास्त्री ऐसी नीतियों का अनुसरण करते हैं जो भविष्य के विनाशकारी परिणामों के बावजूद तुरंत अच्छे नतीजे दिखायें। एक अच्छा अर्थशास्त्री उन नीतियों का अनुसरण करता है जो वर्तमान की छोटी कठिनाइयों के बावजूद भविष्य में महान कल्याणकारी हों।
मुद्रा (मनी): 
मुद्रा – करेंसी यानी विनिमय का माध्यम, लेन देन का माध्यम। 

मुद्रा की अवधारणा और लक्ष्य है – विनिमय। उसका मूल्य सिर्फ इसलिये होता है कि सबको भरोसा होता है कि सभी उस कागज़ के टुकड़े को भुगतान के रूप में स्वीकार करेंगे। इस विश्वास के अतिरिक्त मुद्रा का कोई मूल्य नहीं होता। जब मुद्रा नहीं थी तब वस्तु-विनिमय (Barter) था। मुद्रा का संक्षिप्त इतिहास कुछ यूँ है – वित्तीय संस्थायें (बैंक) लोगों को नोट वितरित करती थी। उन दिनों बैंकों का दायित्त्व होता था कि उस नोट पर अंकित मूल्य के बदले वे नोट लाने वाले को सोना दें। इस तरह जितने नोट वितरित होते, बैंक को उतना सोना रखना पड़ता। पर धीरे धीरे बैंक लोगों को सोने से कहीं ज्यादा नोट (ऋण) देने लगे। यह कोई समस्या नहीं थी क्योंकि शायद ही कभी एक साथ सभी लोग अपना सोना वापस लेने आते।  वस्तु विनिमय और सोने की जगह मुद्रा का लेन देन आसान था और जिस किसी के पास वह कागज़ का टुकड़ा हो वह जब चाहे बैंक से सोना वापस ले सकता था। सोना क्यों? केवल भरोसे के चलते! सब का भरोसा कि सोना मूल्यवान होता है या फिर यह धारणा कि लोग सोना चाहते हैं, उसकी उपयोगिता के कारण नहीं। सोचें तो सोने से कुछ नहीं हो सकता पर लोगों की जो भी धारणा रही हो कि सोना सुन्दर है, मूल्यवान है, सभी उसे पाना चाहते हैं आदि आदि। मुद्रा की तरह ही इस भरोसे के अलावा सोने की कोई कीमत नहीं होती। 

कालांतर में मुद्रा का प्रचलन इतना बढ़ा और सोना ही क्यों, कितना सोना? जैसे प्रश्नों के कारण (मुद्रा छापने के लिये) सोने की आवश्यकता समाप्त कर दी गयी। भरोसा सोने से कागज की मुद्रा पर स्थान्तरित हो गया। सोने का स्थान बैंक के खाते में होने वाली एक प्रविष्टि ने ले लिया। सोना रखने की बाध्यता छोड़कर अब भी व्यवस्था वही रही। अब कितनी मुद्रा हो वह देश की अर्थव्यवस्था और कई अन्य बातों पर निर्भर करती है। एक मुद्रा, दूसरी की तुलना में कितनी होगी यह भी अर्थव्यवस्था की मजबूती, माँग और आपूर्ति जैसी बातों पर निर्भर हो गयी।
मुद्रा या नोट के बिना अर्थव्यवस्था संभव नहीं। कारोबार, खरीद, बिक्री, लेन-देन सबकुछ इसी से चलता है। मुद्रा कैसे काम करती है, प्राय: हम इस बात पर ध्यान नहीं देते पर अर्थव्यवस्था के लिये इससे जरूरी कुछ नहीं। मुद्रा के जरिये ही चीजें और सेवाएं एक हाथ से दूसरे हाथ में जाती हैं। मुद्रा का इस्तेमाल आर्थिक गतिविधि के साथ धन संचय के लिये भी होता है।  
(अमेरिकी डॉलर की सोने पर निर्भरता हटाने के पीछे एक बड़ा कारण वह अवधारणा थी कि अमेरिकी डॉलर महँगा होने से अमेरिका को व्यापार में घाटा हो रहा था। हालाँकि इस कदम से कोई ख़ास लाभ नहीं हुआ था।)
ऋण (क्रेडिट):  अर्थव्यवस्था में ऋण मुद्रा से कई गुना ज्यादा होता है। अर्थव्यवस्था मुद्रा से कहीं अधिक ऋण से चलती है। मुद्रा और ऋण अर्थव्यवस्था की मूलभूत इकाइयाँ हैं क्योंकि इन्हीं दोनों के जरिये सब कुछ होता है। जैसे हम मुद्रा बैंक में रखते हैं, बैंक उसे किसी को लोन देता है। मान लीजिये किसी ने कार ख़रीदा उससे कार कंपनी की बिक्री बढ़ी। कार कंपनी में काम करने वालों को वेतन मिला। वेतन का एक हिस्सा वापस बैंक में गया। कुछ इस तरह मुद्रा और ऋण से अर्थव्यवस्था चलती रहती है। छोटे से छोटा, बड़े से बड़ा, आम आदमी से व्यवसाय तक अर्थव्यवस्था लेन देन से बनती है और लेन देन के माध्यम मुद्रा या ऋण। मुद्रा और ऋण अर्थव्यवस्था रूपी मशीन के स्नेहक (लुब्रिकेंट)  हैं। 
द्रवता (लिक्विडिटी): द्रवता यानी कितनी आसानी से किसी चीज को खरीदा या बेचा जा सके। अगर किसी चीज को बेचने के लिये खरीदार ढूँढना पड़े या कीमत बहुत कम करनी पड़े तो उसे इल्लिकुइड कहेंगे। घर, कार, व्यवसाय, कृषि उत्पाद; हर चीज जो जितनी सरलता से मुद्रा में परिवर्तित हो सके उसकी द्रवता उतनी अधिक। स्वाभाविक है अगर मुद्रा कम हो तो अर्थव्यवस्था में द्रवता भी कम हो जायेगी। 
वित्तीय नीतियाँ और मुद्रा आपूर्ति: मुद्रा की आपूर्ति (और क्रेडिट का स्तर) केन्द्रीय बैंक की जिम्मेवारी होती है। मुद्रा की आपूर्ति बढ़ने का अर्थ है आर्थिक विस्तार किंतु आर्थिक विस्तार-संकुचन-महँगाई और मंदी में एक नाजुक संतुलन होता है।
अधिक मुद्रा का मतलब अधिक आर्थिक गतिविधि और अधिक व्यय। अधिक व्यय का मतलब किसी न किसी की आय में वृद्धि। आय में वृद्धि से लोगों द्वारा क्रय अधिक और क्रेडिट की क्षमता भी अधिक (कोलेटरल अधिक)। माँग अधिक तो उत्पादन अधिक पर साथ में महँगाई भी अधिक।
किंतु यदि महँगाई आय से अधिक होने लगे तो यही क्रम उल्टा हो जाता है। लोग कम खरीदने लगते हैं और फिर एक से दूसरा प्रभावित होता हुआ पूरा क्रम उलट जाता है, मंदी आ जाती है। जब मंदी (डिफ्लेशन) हो तो आर्थिक गतिविधियाँ कम हो जाती है। लोग खर्च कम कर देते हैं। जब भविष्य में कीमतें कम होने जा रही हों तो चीजें कोई नहीं खरीदता (जब तक अति आवश्यक न हो)।  कहने का अर्थ यह कि लेन देन/विनिमय अर्थव्यवस्था की मूलभूत इकाई है और हर लेन देन एक दूसरे से जुड़ा हुआ है, एक दूसरे को प्रभावित करता है। जब लोग अधिक धन बैंक में रखते हैं और बैंक उसे लोन के रूप में वितरित करते हैं तो भी मुद्रा आपूर्ति बढ़ती है। सरकार की राजस्व (फिस्कल) नीतियाँ जैसे टैक्स दर में कमी, मनरेगा जैसी योजनायें भी मुद्रा आपूर्ति करती हैं किंतु आपूर्ति के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण  होती हैं मौद्रिक (मोनेटरी) नीतियाँ जैसे ब्याज दर, सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद-बिक्री इत्यादि। उदाहरण के लिये देखें तो जब केन्द्रीय बैंक को मुद्रा आपूर्ति बढ़ानी होती है तो वह ब्याज दर में कटौती करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में क्रेडिट बढ़ता है। मुद्रा प्रसारण में वृद्धि होती है। इसके विपरीत अगर ब्याज दर बढ़े तो लोग और व्यवसायी कम लोन लेंगे, नये व्यवसाय कम चालू होंगे। वृद्धि कम होगी। आय कम  होगी। कम चीजें बनेंगी। कीमतें कम होंगी। 
ये नीतियाँ  अर्थव्यवस्था के लीवर की तरह काम करती हैं। एक को नियंत्रित करने से एक सिलसिला प्रारम्भ होता है जो पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है।  (वैसे वास्तविकता में ऐसा इतना सरल नहीं होता वरना ब्याज दर बढ़ाने और घटाने से ही महँगाई और मनचाही विकास दर प्राप्त हो जाती।)
इसका एक साधारण सिद्धांत है – मुद्रा की गति MV = PY।  
M = मुद्रा आपूर्ति। V = मुद्रा की गति। P = मूल्य और Y = उत्पाद। अर्थात कीमतें मुद्रा आपूर्ति के समानुपाती होती हैं।
 (अर्थशास्त्र के  बाकी सिद्धांतों की तरह यह भी विवादित है। )
मूलतः केंद्रीय बैंक के तीन काम होते है – महँगाई को नियंत्रित रखना, वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और विकास को बढ़ावा देना। जिनके लिये उसके पास सीमित साधन होते हैं – मुद्रा आपूर्ति का संतुलन इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। 
मौद्रिक प्रक्रिया:
प्रक्रिया – यानि बृहत्अर्थशास्त्र की यांत्रिकी  
अर्थव्यवस्था में सब कुछ अन्योन्याश्रित है, एक दूसरेसे जुड़ा हुआ – एक दूसरेपर निर्भर। आपकी आमदनी किसी और का खर्च होती है और यह हर स्तर पर होता है – सरकार, बैंक, कम्पनियाँ। अगर इसे एक यंत्र की तरह समझना चाहें तो आर्थिक लेन देन और मनुष्य की प्रकृति इन दो बातों से पूरी आर्थिक प्रक्रिया की मशीन चलती है। मुद्रा और क्रेडिट से होने वाले सारे लेन देन (ट्रांजैक्शन) को मिला दें तो वह होता है अर्थव्यवस्था का कुल व्यय –  हमारे एक अकेले से लेकर, व्यवसाय हो या सरकार सबके लिये ही मुद्रा-क्रेडिट-विनिमय-उत्पादन। इतने में अर्थव्यवस्था की मशीन सिमटी हुई है।
कुल व्यय से शुरू करते हैं। खर्च है तो वे किसी की आमदनी होगी ही। आमदनी होगी तो फिर खर्च होगा। अधिक आय से ऋण लेने की योग्यता बढ़ेगी। अधिक ऋण वापस आयेगा तो ऋण देने वाले सहज होंगे और साख बढ़ेगी, साख बढ़ने से ऋण आयेगा – यह क्रम बनता है – चक्र (साइकल)। इससे उत्पादन में वृद्धि और विकास होता है। आर्थिक विस्तार – लहर प्रभाव (रिप्पल इफ़ेक्ट) – एक से दूसरा।
इस क्रम में उतार चढ़ाव भी होता है – आर्थिक संकुचन। छोटे उतार हों तो रिसेशन, बड़े हों तो डिप्रेशन। और बड़े हों तो ग्रेट डिप्रेशन!
 चढाव हो तो बूम!!  ये उतार चढ़ाव इसलिये  होते हैं कि अर्थव्यवस्था में मुद्रा के अलावा क्रेडिट भी होता है। केवल मुद्रा होती तो हम उतना ही खर्च कर पाते जितना हम कमाते हैं। हम ऋण ले घर नहीं खरीद पाते, गाड़ी नहीं खरीद पाते, व्यवसायी अपनी क्षमता के बाहर कारोबार नहीं कर पाते और उत्पादन ही विकास का एकमात्र उपाय होता। व्यय केवल एक ही विधि होता, मुद्रा के द्वारा।
क्रेडिट होने के चलते हम भविष्य से उधार लेकर उसे अभी खर्च कर पाते हैं और एक क्रम में यदि सभी यही करें यानि पूरी अर्थव्यव्स्था में जितना कमाते हैं उससे ज्यादा खर्च करें तो कभी न कभी हमें अपनी आय से कम खर्च भी करना पड़ेगा। जब क्रेडिट का उपयोग अर्थव्यवस्था में ऐसी चीजों के लिये होता है जिससे भविष्य में आमदनी नहीं हो सकती तो ये साइकल उलटती है और मंदी आती है। 
अधिक आर्थिक विस्तार हो जाय तो बुलबुला (बबल) बनता है। अर्थव्यवस्था में कितना क्रेडिट हो ये केन्द्रीय बैंक निर्धारित करते हैं। जब रिसेशन आता है तब केन्द्रीय बैंक आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देने के लिये ब्याज दर कम करते हैं पर यदि डिप्रेशन हो तो अधिकतर यह विधि काम नहीं करती क्योंकि तब ब्याज दर न्यूनतम पहले से ही हो चुके होते हैं। उसके बाद खर्च में कटौती, बैंक और संस्थायें दिवालिया (डिफौल्ट) होती हैं, अधिकाधिक नोट छापने पड़ते हैं, बेल-आउट इत्यादि। इसे अनुत्तोलन (डीलेव्रेजिंग) कहते हैं। क्रेडिट और मुद्रा आपूर्ति को वापस लाने के लिये केन्द्रीय बैंक प्राय: एक साथ कई उपाय अपनाते हैं। जैसे यदि केवल खर्च में कटौती हो तो अर्थव्यवस्था में संकुचन होगा जिससे क्रेडिट कम होगा। पुन: खर्च कम होगा। कीमतें गिरेंगी, आदि आदि। पर केन्द्रीय बैंक के पास इन उपायों के अलावा कोई और तरीका नहीं होता।
ऐसे समय में राजस्व और मौद्रिक नीतियाँ स्फीति दर बढ़ाने वाली (इन्फ्लेश्नरी), प्रोत्साहन (स्टिमुलस) और विस्तार वाली (एक्सपेंशनरी) होती हैं। सरकार का बजट घाटा बढ़ता है। अर्थशास्त्री मानते हैं कि ये लघु अवधि देनदारी (शोर्ट टर्म डे’ट) साइकिल और दीर्घ अवधि देनदारी (लॉन्ग टर्म डे’ट)  चक्र हर अर्थव्यवस्था में होते रहते हैं। परन्तु इन चक्रों के परे उत्पादन में वृद्धि होती रहनी चाहिये क्योंकि अर्थव्यवस्था का वास्तविक तत्व वही है।  
यह यांत्रिकी कई कारकों का एक भंगुर संतुलन है जिनमें राजनीति भी एक है। केन्द्रीय बैंक और सरकार के पास इनमें से मात्र कुछ को ही नियंत्रित करने के सीमित उपाय होते हैं। मनुष्य की प्रकृति और देश की संस्कृति बदलने के लिये कोई निर्धारित उपाय तो हैं नहीं! कहने का अर्थ यह कि मात्र एक या कुछ कारकों को देख बाकी को अनदेखा करना अर्थहीन है। 
मुद्राहीन (कैशलेस) समाज
मुद्राहीन समाज कम से कम निकट भविष्य में तो संभव नहीं है किंतु ‘कम से कम मुद्रा’ समय की आवश्यकता भी है और श्रेष्ठतर भी। पश्चिमी अर्थशास्त्रियों में केनेथ रोगोफ्फ़ मुद्राहीन अर्थ व्यवस्था की वकालत करते रहे हैं। अपनी पुस्तक “द कर्स ऑफ़ कैश” में उन्होंने अपराध, आतंक और टैक्स चोरी जैसी समस्याओं से निपटने के लिये बड़े नोटों को समाप्त करने की वकालत की है। 

हालाकि उन्होंने पश्चिमी विकसित अर्थव्यवस्थाओं को लक्ष्य कर पुस्तक लिखी थी और उनकी प्रणाली भी बहुत भिन्न थी किंतु लक्ष्य और सन्देश एक ही थे – बड़े नोट से जो भी विकास होता है वह मुख्यतः भूमिगत अर्थव्यवस्था में। उन्होंने एक निष्पक्ष और सुरक्षित दुनिया के लिये कम और छोटे नोटों की वकालत की। अमेरिका, जापान और यूरोप के उदाहरण देते हुये उन्होंने कहा कि बड़े नोटों को हटा कर भ्रष्टाचार, टैक्स चोरी, आतंक, जाली नोट और अन्य गैर क़ानूनी गतिविधियों को कम किया जा सकता है। पेरिस की आतंकवादी घटना के पश्चात ५०० यूरो के नोट बंद किये गये। स्थिति ऐसी थी कि ५०० यूरो के नोटों को बिन-लादेन कहा जाने लगा था!

बड़े नोटों के बिन लादेन हो जाने से बचाव के अतिरिक्त भी इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग और डिजिटल मुद्रा के कई लाभ हैं। व्यक्तिगत तौर पर अगर मैं यात्रा नहीं कर रहा होता हूँ तो मेरे पास किंचित ही कभी एक नोट होता है। यात्रा करते समय भी जहाँ कहीं भी कार्ड चल सकता है मैं कभी नोट लेकर नहीं जाता। झंझट नहीं, विनिमय् दर की चिंता नहीं और हिसाब रखने की आवश्यकता नहीं, पारदर्शिता तो होती ही है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव संभवतः बिन-लादेन नोटों के अनुभव का विपरीत छोर है ।
भारत मुद्राविहीन (कैशलेस) अर्थव्यवस्था और डिजिटल मुद्रा से अभी बहुत दूर है। कैश और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का अनुपात तुलनात्मक अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक है किंतु यह स्थिति उस दिशा में अग्रसर होने का अवसरहै। पुन: यदि अपना अनुभव कहूँ तो क्रेडिट कार्ड, मोबाइल, नेट बैंकिंग, स्क्वायर जैसी कम्पनियों और लेवल अप जैसे ऐप से मेरा सारा काम हो जाता है। चेक तक फ़ोन से जमा हो जाता है।  जिन्हें लगता है कि भारत में यह सब संभव नहीं, उन्हें भारत में मोबाइल फ़ोन और ई-कॉमर्स की सफलता देखनी चाहिए। 
डिजिटल मुद्रा की सुरक्षा से जुडी हुई अपनी समस्यायें हैं किंतु एक  संतुलन बन सकता है। भारतीय अर्थव्यवस्था अभी उस संतुलन से बहुत दूर है। पर उसे एक विकल्प के रूप में देखे जाने की आवश्यकता है। वास्तव में हम नोटों को भुगतान का माध्यम समझने के स्थान पर धन संचय का माध्यम समझ लेते हैं। धन संचय की जगह बैंक या संपत्ति होने चाहिये।
मुद्रा केवल भुगतान का माध्यम है लेकिन उसकी जगह भी हमें संतुलन को डिजिटल भुगतान की ओर मोड़ना  चाहिये।