कनकधारा स्तोत्र – आदिशङ्कराचार्य की परदु:खकातरता

अद्भुत संकल्पनाओं की आश्चर्यचकित कर देने वाली, पुलक से भर देने वाली, अनुभूतियों से हृदय को झकझोर देनेवाली महानिशा को हम दीपावली कहते हैं, हर वर्ष उस अनमोल ऊर्जा के उत्स आख्यान से आपादमस्तक उत्साह में स्नात, नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा की अंतरगुहा की आह्लाद यात्रा पर निकल पड़ते हैं।   बाह्य स्वरूप में तो केवल दियों, मिठाइयों…

आदिकाव्य रामायण से – 18 : सुंदरकाण्ड [विवेकः शक्य आधातुं]

इस सुषमा बीच भी मारुति चैतन्य थे। उन्हें रावण फुफकारते नाग समान लगा – नि:श्वसन्तम् यथा नागम् रावणम्, उद्विग्न और सभीत हो पीछे हट गये। वह वैसा ही लग रहा था जैसे स्वच्छ स्थान पर ऊड़द का ढेर पड़ा हो, जैसे गङ्गा की धारा में कुञ्जर सोया हो, माष राशिप्रतीकाशम् नि:श्वसन्तम् भुजङ्गवत्। गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥

आदिकाव्य रामायण से – 17 : सुंदरकाण्ड [मार्गमाणस्तु वैदेहीं सीतामायतलोचनाम्]

आदिकाव्य रामायण से – 16 से आगे … गंध प्रतिमा अनिल द्वारा प्रेरित हो अंत:पुर में हनुमान जी के प्रवेश से पहले वाल्मीकि ने सुंदर प्रयोग किये हैं। उस भवन का विस्तार बताने के लिये ‘आयत’ शब्द का प्रयोग करते हैं, एक योजन लम्बा और आधा योजन चौड़ा – अर्धयोजनविस्तीर्णमायतं योजनं हि तत्! 1:2 का…

आदिकाव्य रामायण से – 16

नथुनों में पेय और भक्ष्य अन्न पदार्थादि की दिव्य गंध के झोंके प्रविष्ट हुये जैसे कि स्वयं अनिल देव ने गंध रूप धर लिया हो। मधुर महा सत्त्वयुक्त गंध युक्त देव पुकार कर बता रहे थे – यहाँ आओ, यहाँ आओ! रावण यहाँ है। हनुमान को लगा जैसे कोई बंधु अपने बहुत ही प्रिय बंधु से कह रहा हो!

संस्कृत गल्पवार्ता (सम्प्रतिवार्ता न)

संस्कृत गल्पवार्ता अलंकार शर्मा इयं आशाकवाणी, गल्पवार्ता पठ्यन्ताम्। प्रलेखकः अलङ्कारः। अद्य प्रातःकाले सूर्यः न उदित स्म, बहवः अभ्राः सूर्यस्य मार्गं अवरुद्धः कृता। सूर्यः उदिते अशक्नोत् एतेषां अभ्राणां कारणेन। संपूर्ण जगते अन्धकारस्य शासनः अस्ति उलूकाः प्रत्येक वृक्षस्य शाखोपरि स्थिताः च। अस्य उद्यानस्य का स्थिति भविष्यति इति दर्शनीयः। अद्य हारुलगान्धीवर्यः अमेरिका देशस्य नोबेलपुरस्कारविजेता वैज्ञानिकानां संभाषणं भारतीय वेद-शास्त्र-दर्शन…

अरण्यानी देवता – ऋग्वेद Araṇyānī Devatā – Ṛgveda 10.146

गिरा दिया वृक्ष किसी ने हाँक पार रहा कोई गैया
उतरी साँझ में वनबटोही समझ रहा चीख किसी की!
वनदेवी कभी न हनती जब तक न आये अरि हत्यातुर
खा कर सुगन्धित इच्छित फल जन लेते विश्राम ठहर।

संस्कृते अङ्कानांसंख्यानांच प्रयोगः (गताङ्कतः अग्रे)

त्रि (3) + त्रय(3) + अङ्ग(6) + पञ्च(5) +अग्नि(3) + कु(1) + वेद(4) + वह्नय(3); शर(5) + ईषु(5) + नेत्र(2) + अश्वि(2) + शर(5) + इन्दु(1) + भू(1) + कृताः(4)। वेद(4) + अग्नि(3) + रुद्र(11) + अश्वि(2) + यम(2) + अग्नि(3) + वह्नि(3); अब्धयः(4) + शतं(100) + द्वि(2) + द्वि(2) + रदाः(32) + भ (नक्षत्र) + तारकाः।