प्रीतिः मंजरीषु इव

वह आनंद-बोध ही क्या जिससे हम स्वयं भी रिक्त रहें तथा हमारा परिसर भी रिक्त रह जाये? जो गगन को आपूरित नहीं कर सकता वह गीत तथा जो मन को आपूरित नहीं कर सकता वह उत्सव व्यर्थ है! यह आपूरण विधि-निषेधों से परे है। यह न आदेश देने पर आता है, न रोकने पर रुक ही सकता है। यह तो जातीय-प्रवाह है! जिस “जाति” की शिराओं में गाढ़ा लाल रक्त प्रवाहमान रहे उस जाति के लिये आपूरण के क्षण आये बिना नहीं रह सकते। जिस जाति ने अनंगोत्सव तथा रंगोत्सव की कल्पना की, योजना बनायी, परम्परा चलायी, वह तपश्चर्या से, संयम से तथा चिंतन से सामाजिक मर्यादा का वास्तविक मूल्य भली-भाँति जानती थी; किन्तु वह लोक-धर्म भी पहचानती थी, इसीलिये वसंतोत्सव को उसने लोकोत्सव का रूप दिया।

आया बसन्त, अब मत सो

हिमाद्रेः संभूता सुललित करैः पल्लवयुता
सुपुष्पामुक्ताभिः भ्रमरकलिता चालकभरैः
कृतस्थाणुस्थाना कुचफलनता सूक्ति सरसा
रुजां हन्त्री गंत्री विलसति चिदानन्द लतिका।

अमेरिका में हिन्दी

अमेरिका में हिन्दी शिक्षण की एक बड़ी ज़िम्मेदारी ऐसी संस्थाओं द्वारा उठाई जा रही है जिन्हें आमतौर पर हिन्दी सेवी श्रेणी में नहीं गिना जाता है। इन संस्थाओं में भारतीय संस्कृति से लेकर धर्म और अध्यात्म के लिये काम करने वाली संस्थायें हैं।

रामजन्म, सहस्रो वर्ष और चार कवि

श्रीराम जन्म का वर्णन वाल्मीकि से प्रारम्भ हो मराठी भावगीत तक आते आते आह्लाद और भक्ति से पूरित होता चला गया है। भगवान वाल्मीकि बालकाण्ड में संयत संस्कृत वर्णन करते हैं: कौसल्या शुशुभे तेन पुत्रेण अमित तेजसा ।  यथा वरेण देवानाम् अदितिः वज्र पाणिना ॥ १-१८-१२ जगुः कलम् च गंधर्वा ननृतुः च अप्सरो गणाः ।…