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सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1

आपने कभी ऐसी दो कवितायें पढ़ी हैं जिन्हें पढ़ने के बाद लगा हो कि एक कवि ने दूसरे की कोई महीन चोरी कर ली हो? अंतर हो तो केवल भाषा का या देश-काल का पर कविता वही, शैली अलग? कई बार ऐसा होता है कि मूल कविता बहुत कम लोगों ने पढ़ी होती है पर नयी कविता अमर हो जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि एक ही बात चाहे जितनी बार, जिस विधि कही जाय, हर बार नयी ही लगती है। पुनः पढ़ते हुए आपकी यह अनुभूति कि आपने इसे पहले भी पढ़ा है, अर्थहीन सी हो जाती है। कई महान लेखकों की पंक्तियाँ भी ऐसी होती हैं जिन्हें पढ़ते हुए लग जाता है कि सब कुछ कहीं न कहीं किसी रूप में पढ़ा है, दो नितांत भिन्न स्रोतों से एक ही बात। ऐसा प्राय: दो ही स्थितियों में संभव होता है – एक, स्पष्टतया एक ने दूसरे से प्रभावित होकर लिखा या चोरी की; दो, जब किसी सार्वकालिक शाश्वत सत्य की बात होती है जो देश काल से परे होती है, एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति वाला सत्य, विज्ञान, कला, दर्शन के संगम का सत्य, वह सत्य जो एक दार्शनिक की सोच और वैज्ञानिक के प्रयोग दोनों में समान रूप से दिखे। भौतिकी हो या बुद्ध का दर्शन दोनों के मूल में वही बात दिखे, अनुभूति का सत्य, सर्वनिष्ठ अनुभूति।

पृथ्वी पर जीवों और मानव के क्रमिक विकास के समांतर एक और प्रक्रिया चली – ज्ञान के कृत्रिम विकासवाद की – अनुभवों के संरक्षण की। मनुष्य अन्य जीवों से आगे निकला क्योंकि उसमें क्षमता थी और वह अपने अनुभवों को छान कर, निथार कर श्रुतियों, स्मृतियों, ऋचाओं, ग्रंथो, पुस्तकों और शोधपत्रों में सहेजता गया जिससे आने वाली पीढ़ियों को उन्हें पुन: वैसे ही न सोचना पड़े और वे उससे आगे बढ़ कर सोच सकें। आने वाली पीढ़ियाँ उसे परिष्कृत करती गयीं। प्रकृति जीवों के लिये अगली पीढ़ी में जाने योग्य गुणसूत्रों का चयन करती गयी, मनुष्य ज्ञान का चयन करता गया। यही कारण है कि जो वैज्ञानिक सिद्धांत अपने युग के चमत्कार रहे, वे आने वाले युगों में  जन साधारण की बात बन गये। इस परंपरा में ज्ञान, सिद्धांतों और नीतियों की कोई अंतिम किताब नहीं होती, ज्ञान का उद्भव और क्रमिक विकास होता है और इस क्रम में जो शेष रह जाता है वही सनातन सत्य है। अगर किसी नये शोध को पढ़ते हुये किसी प्राचीन ग्रन्थ की बात स्मृति में आये पर उस नये शोध में प्राचीन पुस्तक का नाम नहीं दिखे तो कहीं न कहीं हमने ज्ञान को सहेजने और परिष्कृत करने की परंपरा को भुला दिया, हमने सहेजा नहीं और हमें फिर से वही सोचना पड़ रहा है। जिस सभ्यता में यह परंपरा बंद हो जाती है, वह सभ्यता अपने आप कुछ वर्षों पीछे चली जाती है।

ऐसे ही कुछ सत्यों से अनायास ही सामना हो जाता है।  आपने कभी जाड़ों में पौधा लगाने का प्रयास किया है? वे पौधे जो लाख प्रयास करने पर भी उस समय नहीं लगते, सूर्य के उत्तरायण होने पर स्वयं ही लहलहा उठते हैं। इस सहज काम को अगर आपने किया है तो उसके बाद एक अनुभूति अवश्य हुई होगी कि कैसे शताब्दियों पहले ऋषियों ने सूर्य को प्रणाम कर ऋचाओं की रचना कर दी होगी? सूर्योदय देखते हुये मानव का सिर स्वतः ही नमन को झुक गया होगा -‘येना पावक चक्षसा भुरण्यंतम् जनाँ अनु। त्वं वरुण पश्यसि।’ तब प्रकाश संश्लेषण और सौर ऊर्जा जैसे शब्द नहीं थे पर प्रकृति तो तब भी काम उसी विधि से करती थी। सत्य और प्रकृति तो हमारी समझ पर निर्भर नहीं है। उस युग की मनीषा इसे अपने तरीके से यूँ समझती थी:

पुरा सृष्टानि भूतानि पीड्यन्ते क्षुधया भृशम्।
ततोऽनुकम्पंयां तेषां सविता स्वपिता यथा॥
गत्वोत्तसयणं तेजो रसानुद्धृत्य रश्मिभिः।
दक्षिणायनमावृत्तो महीं वर्षति वारिणा॥
क्षेत्रभूते ततस्तस्मिन्नोषधीरोषधीयतिः।
रवेस्तेजः समुद्धृत्य जनयामास वारिणा॥
निषिक्तश्चन्द्तेजोभिः सूयते जगतो रविः।
ओषध्यः षड्रसा मेध्यास्तदन्नं प्राणिनां भुवि॥
एवं भानुमयं ह्यन्नं भूतानां प्राणधारणम्।
नाथोऽयं सर्वभूतानां तस्मात्तं शरणं व्रज॥
(महाभारत,  अरण्यपर्व)

कालांतर में यही बात  परिष्कृत रूप में, एक अलग विधि से, विज्ञान की भाषा में प्रकाश संश्लेषण (photo synthesis) के नाम से जानी गयी। जगदीश चंद्र बोस ने पौधों और निर्जीव वस्तुओं द्वारा उद्दीपन पर प्रतिक्रिया के अपने प्रसिद्ध आविष्कार को ब्रिटेन में प्रस्तुत करते हुए कहा था:

‘It was when I came upon the mute witness of these self-made records, and perceived in them one phase of a pervading unity that bears within it all things – the mote that quivers in ripples of light, the teeming life upon our earth, and the radiant suns that shine above us – it was then that I understood for the first time a little of that message proclaimed by my ancestors on the banks of the Ganges thirty centuries ago – ‘They who see but one, in all the changing manifoldness of the universe, unto them belongs Eternal Truth, unto none else, unto none else!’

सत्य के अन्वेषण की यह प्रक्रिया हर क्षेत्र में होती है। आयुर्विज्ञान में मनीषियों ने प्राचीन काल से वनस्पतियों के औषधीय गुणों को पहचाना।  उन्होंने औषधियों की आणविक संरचना नहीं बनायी पर औषधियों के स्वामी चन्द्रमा द्वारा वनस्पतियों में रस संचित किया जाता है, यह मानते हुए वे उसी सत्य  पर पहुँचे। सर्पगंधा के औषधीय गुण पहचानने वाले नोबेल पुरस्कार और पेटेंट के युग से बहुत पहले के थे।  सर्पगंधा से निकले अणु को को उन्होंने रेसर्पिन (https://en.wikipedia.org/wiki/Reserpine ) नाम तो नहीं दिया पर पहचाना अवश्य था। उन्हें पहचान पर नयी भाषा में गढ़ मान्यता दिलाने वाले  आर एन चोपड़ा (www.insa.nic.in/writereaddata/UpLoadedFiles/IJHS/Vol43_2_4_HSingh.pdf) जैसे औषधविद कम अवश्य हुये पर उन्होंने यह प्रमाणित किया कि सदियों पुरानी जड़ी बूटी की मान्यतायें सत्य थीं, अंधविश्वास नहीं।  ऋषियों और आचार्यों ने संभवतः चूहों पर प्रयोगशालाओं में परीक्षण नहीं किये और न ही अपने विचारों का पेटेंट कराया। प्रकृति के निरीक्षण और अपनी साधना से उपजे अनुभवों को लिखने से पहले उन्होंने लोगों के बीच सर्वेक्षण नहीं किया, पर उन्होंने अपने अनुभवों को देश-काल से परे ज्ञान में परिणत अवश्य किया।

ऋग्वेद के भाष्य में सायण सूर्य की स्तुति करते हुए आधे निमिष में 2202 योजन चलने की बात लिखते हैं – योजनानां सहस्रं द्वे द्वे शते द्वे च योजने एकेन निमिषार्धेन क्रममाण नमोऽस्तुते। यह बात अविश्वसनीय लगती है कि प्रकाश की गति का अनुमान वैदिक युग में रहा होगा पर यह परिकल्पना करना ही अपने आप में अद्भुत है। मौलिक भौतिकी की प्रसिद्ध पुस्तक में प्रो एच सी वर्मा  एक योजन में 4 कोस और श्रीमद्भागवत पुराण  से निमिष की परिभाषा को 15 निमिष से एक  काष्ठा, 15  काष्ठा में एक लघु, 30 लघु में एक मुहूर्त, और 30 मुहूर्त में एक दिवा रात्रि करते हुए आधे निमिष में 2202 योजन का अर्थ निकाला है 3 x 108 मीटर प्रति सेकेण्ड! लगभग वही जो हम आज जानते हैं। कार्ल सागन ‘कॉसमॉस’ में लिखते हैं:

‘The Hindu religion is the only one of the world’s great faiths dedicated to the idea that the Cosmos itself undergoes an immense, indeed an infinite, number of deaths and rebirths. It is the only religion in which the time scales correspond to those of modern scientific cosmology. Its cycles run from our ordinary day and night to a day and night of Brahma, 8.64 billion years long. Longer than the age of the Earth or the Sun and about half the time since the Big Bang.’

इसी महीने प्रकाशित एक लेख में गहरी साँस लेने के लाभ बताये गये। क्या यह बताने के लिये कि गहरी साँस लेने के लाभ सदियों से पता हैं, किसी श्लोक के उद्धरण की आवश्यकता है ?! हाल में कोशिकाओं, न्यूरॉन के अध्ययन और कुछ चूहों को प्रताड़ित कर वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसा साबित किया (https://www.nytimes.com/2017/04/05/well/move/what-chill-mice-can-teach-us-about-keeping-calm.html?_r=0) जिसे युगों से योगी कहते रहे हैं। यह तो हल्दी के पेटेंट कराने जैसी बात हो गयी!  न्यूरॉन, कोशिकाओं और परीक्षणों के बिना यह सनातन सत्य सदियों से प्रचलित रहा है; देश, काल, प्रयोगों और शब्दावलियों से परे का सत्य।

हम विज्ञान से परे दो आधुनिक विषयों व्यावहारिक अर्थशास्त्र (behavioral economics) और विकासवादी मनोविज्ञान (evolutionary psychology) की बात करेंगे। दोनों अत्यंत रोचक विषय हैं। रोचक इसलिये क्योंकि मानव व्यवहार से जुड़ी ऐसी कई बातें जिन्हें समझने में हमें कठिनाई होती हैं  उनके बड़े सरल उत्तर इन सिद्धांतों से मिल जाते हैं। पर इन्हें पढ़ते हुए कई बातें जानी पहचानी लगती हैं और यह अनायास ही नहीं है। यह वैसे ही है जैसे अर्थशास्त्र में गणित और भौतिकी। पिछली सदी के उत्तरार्द्ध में अर्थशास्त्र दर्शन और नीति के विषय से बाहर निकल गणितीय विश्लेषण का विषय बना और अर्थशास्त्र में एक के बाद एक गणित और भौतिकी के कई सिद्धांतों का सीधा प्रयोग हुआ। इनमें से कई विश्लेषकों को इसके लिए नोबेल पुरस्कार मिला।

वित्तीय गणित का सबसे प्रसिद्ध सूत्र ब्लैक शॉल्स और मेर्टन भौतिकी का ऊष्मा समीकरण भर है। इस वित्तीय समीकरण का भौतिकी में होना केवल संयोग नहीं है।  एक जैसी प्रक्रिया का एक ही हल होने से इसे मौलिक आविष्कार तो नहीं कहा जा सकता? ठीक इसी तरह व्यावहारिक अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान को पढ़ते हुए कई सिद्धांत जाने पहचाने लगते हैं। इनके सन्दर्भ केवल प्रसिद्ध ग्रंथों में ही नहीं मिलते बल्कि इनसे बचपन में सुनी लोक कथाओं, सुभाषितों और कहावतों की भी याद आती है जिनसे पता चलता है कि नीति की पुस्तकों में, बुद्ध के दर्शन में और अनुभवी प्रेरक लोक कथाओं में बड़े विश्वविद्यालयों के ठप्पे और बेस्ट सेलिंग के टैग के बिना भी खरा ज्ञान होता है। ऐसे कितने आधुनिक शोध जो प्रयोगों, निरीक्षणों और चूहों पर किये गए प्रयोगों के बाद आये, जन मानस में सदियों से प्रचलित रहे हैं। हम अगले अङ्कों में ऐसे ही कुछ सिद्धांतों की चर्चा करेंगे, जो नये नामों से प्रसिद्ध होने से बहुत पहले सहेजे जा चुके थे।


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha

शून्य – 5

शून्य – 1, शून्य – 2 , शून्य – 3, शून्य – 4 से आगे …

शून्य के वर्तमान गोले के रूप में लिखे जाने की परंपरा कब से आरम्भ हुई इसका ठीक ठीक पता नहीं पर ग्वालियर के चतुर्भुज मंदिर में अंकित शून्य ही प्रथम लिखित शून्य  के रूप में मान्य है वैसे शून्य के लिए ‘ख’ अक्षर का प्रयोग और ‘खगोल’ शब्द से पता चलता है कि यह परंपरा उतनी ही पुरानी रही होगी जितना ‘खगोल’ शब्द – ख-गोल अर्थात शून्य-गोल, हर बिंदु से आरंभ हर बिंदु पर अंत।

इसकी चर्चा की यात्रा आरम्भ हुई थी पाणिनि-पिंगल के युग से। उस युग से इस युग की लंबी यात्रा में शून्य के रूप का परिवर्तन देखना चाहें तो वो बहुत अधिक नहीं है। आज भी वही रूप है। समय के साथ शून्य की महत्ता बढ़ती गयी और उससे बने संसार का विस्तार होता गया। शून्य जो अमूर्त था उसे हम बेहतर तरीके से समझते गए। यह यात्रा शुद्ध गणित के हर उस यात्रा की तरह है जिसकी परिकल्पना करने वाले मनीषियों के मस्तिष्क में उसका कोई उपयोग नहीं होता। अमूर्त-दार्शनिक सिद्धांत अक्सर प्रकृति के नियमों का निरीक्षण कर बनाये जाते हैं और कई बार केवल विशुद्ध अंतःकरण से उपजी दार्शनिक परिकल्पना होते हैं जो कालांतर में जनजीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं। गणित का स्वरुप ही यही है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने ऐसे ही गणितीय सिद्धान्तों पर कहा:

How can it be that mathematics, being after all a product of human thought which is independent of experience, is so admirably appropriate to the objects of reality?

भास्कराचार्य के बाद शून्य का स्वरुप बहुत कम बदला। शून्य से विभाजन का अपरिभाषित होना ही शून्य से विभाजन की परिभाषा बन गयी। लिमिट अर्थात शून्य की जगह अति सूक्ष्म अंक के इस्तेमाल ने कलन और आधुनिक गणनाओं को संभव किया जिनके रूप आज भी वही हैं। शून्य के आधुनिक उपयोग में बाइनरी अंको की चर्चा करें तो वहां भी सैद्धान्तिक गणक की परिकल्पना के बहुत बाद कम्प्यूटर का जन्म हुआ। छंद शास्त्र के जनक पिंगल ने छंदों के लिए दो अंको का इस्तेमाल कर पहली बार उस पद्धति का उल्लेख किया था जिसे आज हम बाइनरी कहते हैं। बाइनरी यानी द्विआधारी अंक पद्धति- केवल शून्य और एक से बनी अंक पद्धति जिससे बना है आज का डिजिटल संसार जो शून्य के बिना असंभव है। हजारों साल पहले जिस तरह इसकी परिकल्पना कठिन थी उसी तरह आज शून्य के बिना संसार की कल्पना संभव नहीं।

यह शृंखला आरम्भ हुई थी भारतीय अंको और शून्य के अरब होते हुए पश्चिम जाने से। भारतीय अंक और शून्य यात्रियों और व्यापारियों के साथ पश्चिम ही नहीं चीन भी पहुंचे। अरबी में आज भी अंको को ‘रकम-अल-हिन्द’ कहते हैं। पर हमें यह भी नहीं पता होता कि संस्कृत का शून्य ही अरब के सिफर या जिफर हुआ जहाँ से आगे वो लैटिन जेफिरम होता हुआ आज का जीरो बना।

हम बगदाद के गणितज्ञ मुहम्मद इब्न मूसा अल-ख़्वारिज़्मी के बारे में पढ़ते हैं जिसके अल-जबर से अलजेब्रा शब्द बना तथा जिसके नाम से ही आज का अल्गोरिथम शब्द बना। पर यह नहीं पढ़ते कि अल-ख़्वारिज़्मी की कई गणितीय और खगोलीय पुस्तकें सिंद-हिंद पर आधारित थी। सिंद-हिन्द और अल-अरकंद नामक पुस्तकें ब्रह्मगुप्त के ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के थोड़े परिवर्तनों के साथ अनुवाद भर थी।

अल-ख़्वारिज़्मी ने भारतीय गणित पर ‘अल जमवाल तफ़रीक़ बि हिसाब अल-हिन्द’ (हिन्दू अंकों से गणना की किताब) नामक किताब भी लिखी थी। जिसका लैटिन में ‘लिबेर अल्गोरिज्मी डे न्यूमेरो इंडोरम’ (अल-ख़्वारिज़्मी की भारतीय अंकों पर पुस्तक) नाम से अनुवाद हुआ। अल-ख़्वारिज़्मी ने भारतीय अंक पद्धति का वर्णन करते हुए स्पष्ट रूप से लिखा है कि नौ अंको के साथ शून्य के लिए छोटे से वृत्त के उपयोग से भारतीय किसी भी अंक को लिख देते हैं।

शून्यादि अंको के अलावा भी कई गणितीय सिद्धांत भारत से अरब पहुंचे। दूसरे अब्बासी खलीफा, अल-मंसूर (753-774 ई) के काल में सिंध से कई विद्वान बग़दाद गए थे। अल बरुनी ने इन विद्वानों के खगोलीय और गणितीय जानकारी के बारे में कई जगह लिखा है। इसी काल में ब्रह्मस्फुटसिद्धांत के अनुवाद भी सिंधहिन्द और अल-अरकंद के रूप में हुए।  इब्न-अल-अदामी  ने भारतीय खगोलीय विद्या के आधार पर खगोलीय सारणी की एक पुस्तक लिखी जिसकी प्रस्तावना में उसने बग़दाद में एक ऐसे भारतीय से मिलने की बात लिखी जो अपने साथ ग्रहों के समीकरण लेकर आया था। जिसे ग्रह-नक्षत्रों की गति, सूर्य और चंद्र ग्रहणों की पूरी जानकारी थी। कई अरबी-फ़ारसी पुस्तकों में कनक नामक गणितज्ञ का उल्लेख आता है। जिसके बारे में यह मान्यता  है कि भारतीय गणितज्ञों और खगोलविदों का प्रभाव अरब संसार में कुछ इस तरह था कि गणक से बना कनक केवल एक व्यक्ति नहीं था। कनक शब्द भारतीय गणितज्ञों और खगोलविदों को संबोधित करने के लिए प्रयुक्त होने लगा था।

अंकों के यूरोप आगमन पर उन दिनों यूरोपीय संस्कृति के केंद्र फ्लोरेंस शहर राज्य ने इस्लामी प्रभाव को रोकने और रोमन अंको के इस्तेमाल को जारी रखने के लिए व्यापारियों द्वारा लाये गए  इन अंको पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। पर 1202 ई. में छपी पिसा के फिबोनाची की पुस्तक लिबेर अबाचि ने यूरोप को एक से नौ तक के अंक और ज़ेफिरम से परिचय कराया जिसके साथ भारतीय, हिन्दू, बौद्ध और जैन धार्मिक दर्शनों से बनी मनीषा की उपज भारतीय अंक और शून्य, जिनके एक छोर पर शून्य और दूसरे छोर पर अनंत थे, नए नामों के साथ पूरी दुनिया में विस्तार पा गये।

यह आश्चर्य भी है और बिडम्बना भी कि भारत में प्राथमिक से लेकर उच्चतर गणित तक की पुस्तकों में भारतीय गणितज्ञों का नाम नहीं आता। श्रीधर आचार्य का एक फुटनोट में उल्लेख के अलावा मैंने गणित की किसी भी शैक्षणिक पुस्तक में किसी भारतीय गणितज्ञ का नाम नहीं पढ़ा। पाइथागोरस प्रमेय को चीन में गौगु थ्योरम कहते हैं। संसार में पाइथागोरस थियोरम का पहला उल्लेख मिस्र में मिलता है।

सटीक गणितीय परिभाषा का पहला वर्णन बौधायन ने किया। और पहला गणितीय प्रमाण चीन में – लेकिन नाम पाइथागोरस का।  भारतीय मिथ के सामने बौने होते हुए भी मनोविज्ञान में हमें हर ग्रीक मिथ के नाम पर एक सिद्धांत मिलता है।

कई कारण है ऐसा होने के। गणित के अलावा भी कई क्षेत्रों में।

भारतीय ग्रंथों और सिद्धांतों के यथारूप अध्ययन और शोध बहुत कम किये गए। हम भारतीय सिद्धांत अक्सर पश्चिमी विद्वानों के अनुवाद से पढ़ते हैं। शून्य के यात्रा की तरह हम पहले ज़ीरो पढ़ते हैं फिर यह कि उसका अनुवाद शून्य होता है।  यह बिडम्बना है कि या तो कुछ लोग ग्रंथों में क़्वांटम फिजिक्स ढूंढने लग जाते हैं या ग्रंथों की बातें करने वालों को पुरातनपंथी और कट्टर कह कर नकार देते हैं। मेरे एक मित्र ने मैसूर विश्वविद्यालय के पुस्तकालय से कई भोजपत्रों और लकड़ी की पटरियों पर अंकित आलेखों की तस्वीरें भेजी थी। ऐसे कितने ही ग्रन्थ समय के साथ खो गए। कितने उपेक्षित पड़े रह गये।


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha