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सनातन बोध: प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 5

दुःख-सुख का उल्टा नहीं। उपलब्ध विकल्पों में हम उनको चुनते हैं जिसमें लाभ भले कम हो पर हानि होने के आसार ना हो। हम लाभ से ज्यादा हानि के प्रति सचेत होते हैं। (decision making economics behavioural science)

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2, 3 और  4 से आगे  …

व्यावहारिक अर्थ शास्त्र का विकास पिछली अर्द्धसदी में में तेजी से हुआ। पचास वर्षों से भी कम समय में मनोवैज्ञानिकों ने सैकड़ों संज्ञानात्मक पक्षपातों (cognitive biases) का खोज किया। मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र के साथ साथ आधुनिक उपभोक्ता प्रवृत्ति अध्ययन, निर्णय सर्जन और नियोजन, नीति निर्माण जैसे कई क्षेत्रो में हो रहा है। ये खोज मनोविज्ञान के लिए और खासकर अर्थशास्त्र के लिए क्रांतिकारी हैं। परन्तु साथ में ये भी सत्य है कि इन सिद्धांतों का इतनी तेजी से खोज होने का एक बड़ा कारण यही है कि ये नए खोज नहीं है उनका अर्थ शास्त्र की दृष्टि से इस्तेमाल जरूर नया है।

अर्थशास्त्र की दृष्टि से ये इतने महत्त्वपूर्ण होते गये क्योंकि अर्थशास्त्र का अध्ययन ही एक गलत सिद्धांत के साथ होता रहा है – और ये सिद्धांत है कि मनुष्य सारे निर्णय विवेकपूर्ण और तर्कसंगत (rational) करता है। अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांत (rational choice theory) के अनुसार हर मनुष्य सीमित संसाधनों के बीच रहता है और अनेक विकल्पों में से वो विकल्प चुनता है जो उसकी उपयोगिता (utility) में सर्वाधिक वृद्धि करता है। यानी हर संभव विकल्प को न्यायसंगत तर्क की कसौटी पर परखने के बाद निर्णय लेता है। व्यक्तिगत स्तर से ऊपर समाज के स्तर पर यही निर्णय सामाजिक कल्याण की वृद्धि के लिए होता है। वर्षों से अर्थशास्त्र के अध्ययन का अर्थ ही रहा मनुष्य के हितों और सामाजिक कल्याण की वृद्धि करने वाले कारको का आदर्श आकलन (optimization)। संसाधनों का आदर्श वितरण (Pareto optimal) ये मानते हुए कि मनुष्य सारे फैसले अपना लाभ हानि सोचकर तर्कसंगत तरीके से करता है।

मनोवैज्ञानिकों ने मानव व्यवहार का अध्ययन करने के बाद अर्थशास्त्र के इस मूल सिद्धांत को नकार दिया। इस नए सिद्धांत के अनुसार मनुष्य पूर्व अनुभवों से बने अचेतन (cognitive heuristics) और अंतर्ज्ञान (intuition) से प्रभावित पक्षपातों से फैसले लेता है जो हमेशा न तो तर्कसंगत ही होते हैं न उनसे समाज कल्याण या स्वयं के हितों की वृद्धि ही होती है। इस सिद्धांत को मान्यता मिली १९७९ में डेनियल काहनेमैन और अमोस ट्वेरस्की के प्रॉस्पेक्ट थिओरी के प्रकाशन के बाद। जिसमें उन्होंने कहा कि हानि या हार का दुःख, लाभ और जीतने की ख़ुशी से ज्यादा होता है। दुःख सुख का उल्टा नहीं होता। इस सिद्धांत के अनुसार लाभ से होने वाले सुख का फलन अवतल होता है और हानि से होने वाले दुःख का उत्तल अर्थात हानि को हम बढ़ा कर देखते हैं। हानि से होने वाले दुःख उसी परिणाम में होने वाले फायदे से होने वाले सुख के उलटे से ज्यादा होता है। इस सिद्धांत का निष्कर्ष ये होता है कि निर्णय लेते समय हम लाभ से ज्यादा हानि को लेकर सचेत होते हैं – हमारी प्रकृति है हानि प्रतिकूल (loss aversion)। उपलब्ध विकल्पों में से हम उन्हें चुनते हैं जिसमें लाभ भले कम हो पर हानि होने के आसार ना हो।

प्रोफ़ेसर लाज्लो जॉलनाइ इस सिद्धांत के बारे में लिखते हैं कि मनुष्य की प्रवृत्ति है ‘हानि प्रतिकूल’ होना तो लाभ की वृद्धि की जगह हानि को कम (minimization of loss) करने की बात अर्थशास्त्र में होनी चाहिए। फिर हानि का अर्थ सिर्फ मौद्रिक ही तो नहीं है और न ही ये सिद्धांत सिर्फ मनुष्यों तक सीमित है। अगर इस बात को सार्वभौमिक तरीके से देखें तो फिर ये संसार के दुःख से पीड़ित होने और बुद्ध के दुःख के निवारण की बात प्रतीत होती है। इस दृष्टि से देखें तो अर्थशास्त्र की संकीर्णता को दूर करने वाले प्रॉस्पेक्ट थियोरी का सिद्धांत बुद्ध के दर्शन की विशेष स्थिति (special case) प्रतीत होता है। बात फिर वहीँ आ जाती है – खुश रहने का अर्थशास्त्र – माध्यमिक मार्ग। सुख की खोज के साथ इच्छा की कमी का ऑप्टिमिजेशन। ‘स्मॉल इज ब्यूटीफुल’ में प्रोफ़ेसर शूमाकर इसी बात को अलग तरीके से बौद्ध सिद्धांतों का उदहारण देते हुए कहते हुए कहते हैं कि हमने अब तक अर्थशास्त्र को समझा ही गलत है। सुख की खोज और बड़े लाभ की जगह समाज कल्याण के लिए लक्ष्य दुःख का निवारण होना चाहिए।

प्रॉस्पेक्ट थिओरी के सिद्धांत के बाद सिलसिला सा चल पड़ा संज्ञानात्मक पक्षपातों (cognitive biases) के अध्ययन का। यहाँ ध्यान देने की बात ये है कि जितने नए सिद्धांत आये वो इसलिए आये की अर्थशास्त्र की शुरूआती अवधारणा ही गलत थी। जैसे जब ये अवधारणाएं थी कि धरती समतल है या सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा करता है तब कई सिद्धांत थे पर जैसे ही ये अवधारणायें गलत साबित हुई हजारों नए सिद्धांत आते गए। अगर हम शुरू ही सही अवधारणाओं से करें तो ये नित नए आने वाले सिद्धांत ही अर्थहीन हैं। अर्थशास्त्र का नीति और मानव व्यवहार से साथ अध्ययन शुरू से हुआ होता तो ये अविष्कार अलग से पैबंद की तरह नहीं आते। व्यवहारिक अर्थशास्त्र के आलोचक ये भी कहते हैं कि गलत सिद्धांत को सही कर देने के लिए एक-एक कर सैकड़ों सिद्धांतों को देने की जगह एक नए सिरे से मानव व्यवहार को समझना बेहतर तरीका होगा।

इस नए विषय का सबसे प्रसिद्ध नाम नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रोफ़ेसर डेनियल काहनेमैन। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘थिंकिंग फ़ास्ट एंड स्लो’ के सार के रूप में वो कहते हैं- “हम अपने अंधेपन के बारे में अंधे होते हैं। हम अपनी अज्ञानता के बारे में अनभिज्ञ हैं। हमें इस बात के बारे में बहुत कम पता है कि हम कितना कम जानते हैं। हमें उसके लिए डिजाइन ही नहीं किया गया। अर्थात अक्सर हमें नहीं पता होता कि हम क्या कर रहे होते हैं।”

अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान में क्रांति लाने वाले शोध का ये सार आपको पहचाना नहीं लगता? सांख्य की त्रिगुणात्मक प्रकृति हो या भ्रम में डालती माया। अचेतन व्यवहार के सिद्धांतों की व्याख्या विकासवाद से तो जुड़ती है। विकासवाद से भ्रमित जल जा रहा पतंगा हो या भर्तृहरि का अज्ञान – अजानन्दाहात्भ्यं पततु शालभे दीपदहने स मीनोऽप्यज्ञानाद्वडियुतमश्नातु पिशितम्। सनातन बोध में न सिर्फ इस अज्ञानता का वर्णन है इसके निवारण का भी वर्णन है। जहाँ आधुनिक अर्थशास्त्र इस अज्ञानता को समझ उसके दोहन की बात करता है वहीँ प्राचीन मनीषा ने इसके निवारण की बात की।

अगले अंक में चर्चा करेंगे प्रोफ़ेसर काहनेमैन के मनुष्य के सोचने के तरीके के सिद्धांत और कुछ संज्ञानात्मक पक्षपातों की।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 4

प्रतीत्यसमुत्पाद का सिद्धांत कहता है कि ब्रह्माण्ड में सब कुछ केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान है।

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2 और  3 से आगे  …

विकासवादी मनोविज्ञान की ही तरह आधुनिक जीव विज्ञान की व्याख्या सनातन सिद्धांतों से कुछ पश्चिमी विद्वानों ने की है। यहाँ ध्यान देने की बात है कि हिन्दू धर्म की बात हो या बौद्ध – इन धर्मों में धर्म से अधिक दर्शन की बातें हैं, अन्वेषण की बातें हैं। दर्शन और विज्ञान जब मिलते हैं तो उनके मिलन में कभी विरोधाभास नहीं होता। वे एक दूसरे के पूरक होते हैं। नये उद्घाटित सत्य ज्ञात सत्य को परिष्कृत करते हैं। चेतना से उपजे सत्य को प्रयोग से पूर्णता मिलती है।

जैसे विकासवादी मनोविज्ञान और बुद्ध के दर्शन एक दूसरे के पूरक लगते हैं, दोनों से एक ही निष्कर्ष निकलता है, वैसे ही ऐसे कई प्रश्न जिनके उत्तर अभी मानवता के पास नहीं है उनके संभावित उत्तर भी सनातन दर्शनों से जुड़े दिखते हैं। जब हम प्रकृति से महत्, महत् से अहंकार, अहंकार से मन और इंद्रियाँ इत्यादि का जन्म पढ़ते हैं या बुद्ध के अनुशय को संसार का मूल तो यह समझ में नहीं आता कि मनोवृत्तियों से किसी चीज या जीव की उत्पत्ति कैसे हो सकती है पर चेतना से जुड़े हाल के शोध को देखें तो इस सोच के तार उस सनातन सोच से जुड़े दिखते हैं, जैसे एक ही चीज पर दूसरी दिशा से प्रकाश डाला जा रहा हो।

‘मैं’ को नकारते हुए बुद्ध ‘अनात्मा’ की बात करते हैं और आधुनिक विज्ञान की एक परंपरा भी वही कहती हुई दिखती है। जीव वैज्ञानिक डेविड बाराश अपनी पुस्तक ‘बुद्धिस्ट बायलोजी’ में इसी बात का वर्णन इस प्रकार करते हैं कि मानव एक जीवविज्ञानी प्रक्रिया के परिणाम मात्र हैं और कुछ नहीं। जीव विज्ञान के अनुसार मनुष्य ऐतिहासिक और परिवर्तनशील संरचनाओं (संस्कारों) का संकलन भर है। बुद्ध के ‘अनात्मा, अनित्यता और सह-अस्तित्व’ को जीव विज्ञान के संदर्भ से देखते हुए वह दोनों सिद्धांतों में एकरूपता दिखाते हैं।  आधुनिक जी

व विज्ञान के सिद्धांतों को वह एक एक करके बुद्ध के दर्शन से जोड़ते हैं – दर्शन और विज्ञान में यहाँ कोई विरोधाभास नहीं. दोनों एक दूसरे में अन्तर्निहित।

बुद्ध के ‘अनात्मा’ को वह जीवविज्ञान की दृष्टि से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि किसी भी जीव की संसार से अलग अपनी कोई सत्ता नहीं है। जीवविज्ञान और पारिस्थितिकी दोनों के गणित से हर जीव दूसरे जीवों पर निर्भर और उनसे परस्पर जुड़ा हुआ है,  एक के बिना दूसरे का कोई अस्तित्व नहीं। सह-अस्तित्व यदि जीव विज्ञान का निष्कर्ष है तो इससे सनातन ग्रन्थ भी भरे पड़े हैं अर्थात जीवों का परस्पर संबंध जीव विज्ञान के अनुकूलन का भी निष्कर्ष है और सनातन दर्शन का मूल भी। जीव विज्ञान के अनुसार जीवों का अस्तित्व सदियों के अनुकूलन से और एक दूसरे के साथ चिरकालिक अन्योन्याश्रित सम्बन्ध से बना रहा। पारिस्थितिकी (इकोलॉजी, ecology) का मूल भी यही है कि सृष्टि में कोई भी जीव स्वतंत्र रूप से नहीं रह सकता। पर्यावरण का अध्ययन करने वालों को जीवविज्ञान से अधिक लाभ बुद्ध के करुणा और सनातन सह-अस्तित्व को पढ़ने से होगा। पारिस्थितिकी और सनातन बोध में यहाँ अद्भुत रुप से समानता है।

‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ का सिद्धांत कहता है कि ब्रह्माण्ड में सब कुछ  केवल दूसरी घटनाओं के कारण ही एक जटिल कारण-परिणाम के जाल में विद्यमान है –  कॉज एंड इफ़ेक्ट (Cause and effect)। सब कुछ सब कुछ पर निर्भर। कर्म और संस्कार – अनंत चक्र; कारण-कार्य की शृंखला – पीढ़ी दर

पीढ़ी; एक को चुनने के बाद दूसरे को चुनने का अधिकार नहीं रहना – दूसरे का होना अनिवार्य परिणति होती है।

बुद्ध की अनित्यता का आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से विश्लेषण यह भी है कि वस्तुयें निरंतर परिवर्तनशील हैं।  यहाँ तक कि गुणसूत्रों में भी रूपांतरण  और उत्परिवर्तन (mutation, म्यूटेशन) होता है।  संसार के हर सजीव, निर्जीव पदार्थ में एक जैसे ही अणु हैं जो एक दूसरे के रूप में परिवर्तित होते रहते हैं, निरंतर परिवर्तनशील – अनित्य और परस्पर सम्बद्ध। हर जीव को अंततः निर्जीव संसार में चले जाना है। वही अणु-परमाणु जो आज हमारे भाग हैं कल कुछ और होंगे। कल जो पौधे, पत्थर और तारे थे वे आज हम है। जिसे अंततः पुनः पुनर्चक्रण हो कुछ और हो जाना है। हम पदार्थ और ऊर्जा के मिश्रण मात्र हैं जिन्हें पुनः उसी में मिल जाना है। यह बात कोई पारिस्थितिकी विज्ञानी (ecologist, इकोलॉजिस्ट) कहे, भौतिक विज्ञानी कहे तो भला इसमें क्या नया है?

विकासवाद और कर्म चक्र को डेविड बराश एक ही सिद्धांत के दो पहलू मानते हैं, कारण-परिणाम का नियम। कर्म चक्र को वह जीवविज्ञान की दृष्टि से परिभाषित करते हुए कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने जो किया और हम जो कर रहे हैं सबका परिणाम आने वाली पीढ़ियाँ होंगीं। हर जीव अस्थायी है पर समय के साथ हर जीव के रूप का क्षय और परिवर्तन होता रहता है।

पिछले पचास साथ वर्षों में लोकप्रिय हुए एक विषय व्यवहारिक अर्थशास्त्र (behavioural economics, बिहेवियरल इकोनॉमिक्स) यानी अचेतन व्यवहार (irrational behavious, इर्रेशनल बिहेवियर) और पक्षपातों (cognitive bias, कॉग्निटिव बायस) का अध्ययन भी विकासवादी दृष्टिकोण और सनातन दृष्टिकोण में समानता की ही तरह ही है। इस नए विषय के तार यूँ तो विकासवाद से भी जुड़े हुये हैं पर ऐसे अध्ययनों का विस्तृत परिचय हजारों साल पुराने ग्रंथों में मिलता है, न केवल भारतीय बल्कि पश्चिमी दार्शनिक परम्पराओं में भी।

(इस विषय की चर्चा अगली कड़ी में)


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha