सनातन कालयात्री

सनातन कालयात्री

जी हाँ इसी नाम में वो आकर्षण था जिसने मुझे फेसबुक के आभासी संसार से तनिक आगे बढ़कर यथार्थ के धरातल पर कुछ कार्य करने के लिए प्रेरित किया था। पहले तो फेसबुक के माध्यम से ही वार्तालाप होता था लेकिन समय के साथ दूरभाष पर होने लगा।

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हास्यबोध वाला यह व्यक्ति

इतने अच्छे हास्यबोध वाला यह व्यक्ति एक छटपटाहट से जूझ रहा है। छटपटाहट, जो किसी व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं थी अपितु इसलिए थी कि अपना धर्म, राष्ट्र, सँस्कृति पुनः अपना खोया हुआ गौरव प्राप्त कर सके। …मैंने फोन करके कहा कि आप बहुत लोड ले रहे हो और मुझे आपकी चिन्ता हो रही है। हँसते हुए बताने लगा कि कितना कुछ हार्ड ड्राईव में सँजो रखा है और कितना अभी व्यवस्थित करना शेष है।

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सोऽहं हंसः

सोऽहं हंसः — मुख से मन की बात न पूछो

हंस से जुड़ी रूढ़ियाँ अनगिन हैं तथा प्रत्येक रूढ़ि एक कोमल किन्तु सुदृढ़ रहस्य का प्रतीक है। और इन रूढ़ियों की यही कोमल रहस्यात्मकता इसे भारतीय साहित्य, कला, दर्शन एवं तन्त्र में एक महत्वपूर्ण अवयव के रूप में स्थापित करती है। सांस्कृतिक रूप से समृद्ध तथा भावप्रवण भारतीय चिन्तना ने जितने भी प्रतीक गढ़े हैं उनमें हंस शब्द के रहस्य का घनत्व एवं विस्तार दोनों ही सबसे अधिक है।

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एक कालयात्री जो सनातन था

गिरिजेश राव जी की कई फेसबुक प्रोफाइल थीं और वे बदल-बदल कर उपयोग करते थे ऐसे में उनको ढूंढना पड़ता था। पहले तो ढूँढने में कठिनाई होती थी किन्तु धीरे-धीरे उनकी शैली को पहचाने लगा।

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The catalyst who helped many to realize the eternal travel (सनातन कालयात्रा)

I confess that some of the best life-learnings for my this life, came in last 20 years by this medium. I had many opportunities to learn, unlearn and grow with the help of selfless guidance by like-minded travelers. Girjesh ji has special place in these travelers and I will forever live indebted to him until I travel on the same path and act as enabler for many fellow-travelers. I mean it, I don’t want to live life in debt. I will walk on the same path!

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भैया जी

एक निरुद्देश्य भटकने वाले यायावर को आपने एक उद्देश्य दिया। जिन विषयों के बारे में मैंने केवल सुना भर था, आपने “उत्प्रेरक” का कार्य कर मुझे उन विषयों में गहराई में जाने के लिए प्रेरित किया।

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अथातो ब्रह्म जिज्ञासा

गिरिजेश जी के प्रयासों में भी मूल भावना जिज्ञासा ही थी। हम भी इस जिज्ञासा की यज्ञाग्नि प्रज्वलित रखें तथा उन्हीं के सदृश ओरों को भी इसी मार्ग के यात्री बनने में सहायता करें। यही उनके प्रति वास्तविक श्रद्धाञ्जलि होगी।
जब ज्ञान प्राप्ति एवं सनातन धर्म की रक्षा के मार्ग कण्टकाकीर्ण लगें तो यह तथ्य आत्मसात करें कि मार्ग में मिलने वाले वृक्षों की छाया यात्री का पथ्य नहीं होती।

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आत्मीय। अद्भुत। अद्वितीय। विलक्षण।

पढ़ाई और पेशे से अभियन्ता, आईआईटियन, और वेदपाठी। वेद, पुराण, उपनिषद, खण्डहरों, और मूर्तियों पर लिखते तो लिखते ही चले जाते। लोक गीतों, जीउतिया और नाग पञ्चमी जैसे पर्वों के अस्तित्व और उद्भव पर कैसी-कैसी अद्भुत बातें बतायी उन्होंने। कैसी अद्भुत दृष्टि!

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सखा गिरिजेश

गिरिजेश की चिन्ताओं में एक बड़ी चिन्ता हमारी आगामी पीढ़ियों की चिन्ता थी और यह अपने बच्चों तक सीमित नहीं थी। गिरिजेश आगामी पीढ़ियों के लिये पहले से अधिक सुघड़ संसार छो‌ड़ने के पक्षधर थे और इसके लिये अपनी पूरी क्षमता से लगे रहे और विनम्रता इतनी कि कइयों पर अकेले भारी पड़ने वाले व्यक्ति, अनेक पत्थरों को छूकर स्वर्ण करने वाले पारस के ब्लॉग का नाम “एक आलसी का चिट्ठा” है क्योंकि गिरिजेश एक जीवन में कई जीवनों का कार्य पूर्ण करना चाहते थे।

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