उत्तिष्ठ हरि शार्दूल लङ्घयस्व महार्णवम्

उत्तिष्ठ हरि शार्दूल। भीरुता की परिपाटी तोड़ने के लिए समय-समय पर नए हनुमान प्रस्तुत करना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। इस देश में हरि शार्दुल तभी पैदा हो पाएंगे।

ऋग्वैदिक पक्थ, एक भारतीय ‘हिन्‍दू पश्तून’ युवती : Tiny Lamps लघु दीप – 23

पीढ़ियाँ बीतीं, समय पहुँचा एक हिंदू पश्तून शिल्पी बत्रा तक जिसे पञ्जाबी बता कर पाला पोसा गया था। भारत आये पुरखों ने अपना अभिजान छिपा लिया था।

नव संवत्सर पर – दूरगामी एवं व्यापक हित हेतु सोच समझ कर मतदान करें।

ऐसी सरकार चुनने हेतु मतदान करें जिस पर आगे के सुधारों हेतु आप दबाव बना सकें — श्रीरामजन्मभूमि पर भव्य मन्‍दिर निर्माण हेतु, भीषण गति से बढ़ती अनुत्पादक जनसंख्या पर अंकुश हेतु, कैंसर बन चुके कश्मीर को सामान्य राज्य बनाने हेतु, शैक्षिक तंत्र में आमूल चूल परिवर्तन हेतु … समस्यायें अनेक हैं, सुलझी सरकार से ही सुलझनी हैं, लॉलीपॉप दे लुभाने वाली अकर्मण्य भ्रष्ट सरकार से नहीं। सरकार अर्थात सर्वकार, मतदान सोच समझ कर करें, अवश्य करें।

हम कभी दीर्घ ‘लाभ’ की नहीं सोचते

चार दिन का है खेला रे; को नृप होंहि हमहिं का हानी को जीते हम दीर्घ लाभ नहीं देखते। संसार के किसी भी वाङ्मय में ऐसा कुछ भी अनूठा नहीं है जो हमारे यहाँ नहीं।

जिहादी मुल्क एवं बनिया देश

चूँकि युद्ध एवं विनाश एक दूसरे के पर्याय हैं, कोई भी विकसित उत्पादक समाज युद्ध नहीं चाहता, जब कि लुटेरा सदैव चाहता है जिसकी युद्ध की अपनी परिभाषा होती है — संरक्षण हेतु नहीं, लूट हेतु। जिहाद उसी प्रकार का युद्ध है।

पुलवामा, कम्युनिस्ट वैचारिकी एवं प्रबुद्ध वर्ग का पतन

आधुनिक भारत की समस्या उसके प्रबुद्ध वर्ग के घोर पतन की है। जन सामान्य सदैव ऐसे ही रहे हैं। वांछित सुखद परिवर्तन प्रबुद्ध वर्ग की उत्कृष्टता में अभिवृद्धि से होते हैं, उनके पतन से देश का पतन होता है। प्रबुद्ध वर्ग निराशा भरा है।

Dynamo, आर्यावर्त एवं भारत

हिन्दी क्षेत्र की असफलता उस चुम्बक-युक्ति में गति के अभाव से समझी जा सकती है जिसमें बल था, क्षमता थी किंतु नहीं थी तो सार्थक गति नहीं थी। आर्यावर्त का Dynamo मात्र पङ्गु ही नहीं है, वरन चलने की उसमें इच्छा ही नहीं है !