gerontology जराविज्ञान

Gerontology जराविज्ञान व वृद्धावस्था : सनातन बोध – ८०

Gerontology जराविज्ञान – अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशोबलं ॥… देहे कौमारं यौवनं जरा।

Boredom बोरियत नीरसता ऊब

Boredom बोरियत नीरसता ऊब : सनातन बोध – ७९

Boredom बोरियत नीरसता ऊब – नीरसता, विरक्ति जैसे पर्याय मिल सकते हैं पर boredom जैसी चिरकालिक मानसिक अवस्था का सनातन दर्शन में अभाव ही रहा।

Do Animals have Moral मानवेतर जीव-चेतना

Do Animals have Moral मानवेतर जीव-चेतना? : सनातन बोध – ७८

क्या अन्य जीवों को भी अनुभूति होती है? क्या वो भी सोच पाते हैं? ये प्रश्न या तो अन्य परम्पराओं में उठे ही नहीं या इनका उत्तर सकारात्मक नहीं रहा। वहीं इन प्रश्नों का उत्तर सनातन दर्शन में सहज ही स्पष्ट है।

Default bias or Status Quo Bias यथास्थिति पक्षपात

Default Bias यथास्थिति पक्षपात – उपदेश असाध्य स्वभाव : सनातन बोध – ७७

Default Bias यथास्थिति पक्षपात – विषयों के सम्बंध में इंद्रियों को राग-द्वेष रहते ही हैं। उनके वश में न हों क्योंकि वे मनुष्य के शत्रु हैं।

Curse of Expertise विशेषज्ञ दम्भ की सङ्‌कीर्णता

Curse of Expertise विशेषज्ञ दम्भ की सङ्‌कीर्णता [दुरत्यया दुर्गम्‌]

प्रतिष्ठित विशेषज्ञ भी बहुधा अतार्किक बातें करने लगते हैं तथा प्रायः विशेषज्ञ स्वयं के ज्ञान के दम्भ में इस प्रकार सङ्‌कीर्ण होते जाते हैं कि उनके क्षेत्र में अन्वेषित नवीन सिद्धान्तों को ग्रहण करने के प्रति उनकी सहनशीलता में भी ह्रास हो जाता है।

Reiki - Emotional Intelligence

Emotional intelligence भावात्मक प्रज्ञा : सनातन बोध – ७५

भावात्मक बुद्धि के उदाहरण सरल हैं -दूसरों की अवस्था समझना और यह समझना कि दूसरे जो कर रहे हैं, वैसा क्यों कर रहे हैं। और कोई भी क्षणिक प्रतिक्रिया देने से पहले वस्तुस्थिति को समझना। हमारे स्वयं की भावनाओं (संवेगों) को समझने तथा नियंत्रित  करने की योग्यता के साथ साथ दूसरों की भावनाओं एवं संवेगों को समझना और उन्हें सम्मान देना भी महत्वपूर्ण हैं जिससे निर्णय लेते समय हम उनसे प्रभावित न हों ।

Consciousness चैतन्य व योगवासिष्ठ : सनातन बोध – ७४

Consciousness चैतन्य व योगवासिष्ठ समुद्र-तरंग, सर्प-रस्सी, घट-आकाश, यन्त्र पुतली, अनेक स्वाँग धरने वाला नटुआ, वर्षाकाल का एक ही मेघ नानारूप। वस्तुओं और घटनाओं का स्वरूप मस्तिष्क द्वारा निर्मित होता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे वस्तुयें हैं नहीं परंतु यह है कि वे हमारे मस्तिष्क के लिए उस आभासी रूपों में हैं जिनमें उन्हें वह देखना चाहता है।