Did Rama eat meat during his exile?

Did Rama eat meat during his exile?

Did Rama eat meat’ will be a long article in many parts as it will examine the whole Vālmīkīya Rāmāyaṇa (VR), not being speculative to the maximum extent possible, to find out what exactly comes out about the oft raised issue of meat eating in general and by Rāma during exile in particular. The article will be a ‘dynamic one’ as I’ll be revising and refining it basis new and relevant findings in other sources and new insights. Meat here should be taken as ‘cooked animal flesh’ taken as diet.

Sundarkand रामपत्नीं यशस्विनीम्

Sundarkand रामपत्नीं यशस्विनीम् : रामायण – ५५

Sundarkand रामपत्नीं यशस्विनीम् – – मैंने पिघले कञ्चन के समान सुंदर वर्ण वाली सीता को देखा। उन कमलनयनी का मुख उपवास के कारण कृश हो गया था।

Sundarkand सुंदरकांड दृष्टा सीता – ५४ : [सर्वथा कृतकार्योऽसौ हनुमान्नात्र संशयः]

दिष्ट्या दृष्टा त्वया देवी रामपत्नी यशस्विनी॥ दिष्ट्या त्यक्ष्यति काकुत्स्थश्शोकं सीतावियोगजम्। यह सौभाग्य की बात है कि तुम श्रीराम की पत्नी यशस्विनी देवी सीता के दर्शन कर आये, अब देवी सीता के वियोग से उपजा काकुत्स्थ राम का शोक दूर हो जायेगा, यह भी सौभाग्य की बात है।

Sundarkand सुंदरकांड उत्तरं पारं – ५३ : [रामदर्शनशीघ्रेण प्रहर्षेणाभिचोदितः]

हनुमान सागर को एक विशाल जलपोत की भाँति पार कर रहे हैं। आकाश, क्षितिज और सागर मिल कर कैसा दृश्य उपस्थित कर रहे हैं!
सूर्य और चन्द्र दोनों दिख रहे हैं।

Sundarkand सुंदरकांड

Sundarkand सुंदरकांड – ५२ : विदा दें [सा निर्दहेदग्निं न तामग्निः प्रधक्ष्यति]

Sundarkand सुंदरकांड – ५२ : स्वयं को धिक्कारते चले गये, यदि दग्धा त्वियं लङ्का नूनमार्याऽपि जानकी। दग्धा तेन मया भर्तुर्हितं कार्यमजानता॥

Sundarkand सुंदरकांड

लंकादहन की भूमिका – सुंदरकांड [प्रदीप्तलाङ्गूलस्सविद्युदिव तोयदः] – ५१

लंकादहन की भूमिका – किरणों के घेरे में परम तेजस्वी सूर्य सम प्रकाशित मारुति द्वारा चलाये जाते परिघ का सम्पूर्ण बिम्ब भासमान हो उठता है।

Fire ordeal अग्निपरीक्षा

Fire ordeal अग्निपरीक्षा सुंदरकांड [यदि चास्त्येकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः] – ५०

यदि चास्त्येकपत्नीत्वं शीतो भव हनूमतः । शिशिरस्य इव सम्पातो लाङ्गूल अग्ने प्रतिष्ठितः!  …
जो देवी सीता हैं न, हम सबकी आदर्श, उनके सतीत्व की अग्निपरीक्षा यह है। कोई और अग्निपरीक्षा कभी नहीं हुई। युद्ध पश्चात जो अग्निपरीक्षा का क्षेपक है, वह किसी की कल्पना मात्र है।

Valmikiya Ramayan प्रमदावन विध्वंसक हनुमान

विभीषण सुंदरकांड [धर्मार्थविनीतबुद्धिः परावरप्रत्ययनिश्चितार्थः] – ४९

विभीषण सुंदरकांड – आप कुछ को आदेश दें कि शत्रु पर आप की शक्ति दर्शाने हेतु वे अभियान करें, उन दो राजपुत्रों को पकड़ लायें।

Valmiki Ramayan Sundarkand Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण

रामायण सुंदरकांड [उत्तरं कर्म यच्छेषं निमित्तं तत्र राघवः] – ४८

रामायण सुंदरकांड – वीरभाव से अत्यंत सौष्ठव के साथ व्यक्त हनुमान के अप्रतिम वचन सुन कर दशानन के नेत्र मारे क्रोध के वक्र हो गये।

Valmiki Ramayan Sundarkand Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण

वाल्मीकि रामायण – ४७ : सुंदरकाण्ड से [दूतोऽहमिति विज्ञेयो राघवस्यामितौजसः]

वाल्मीकि रामायण – एक वानर, एक मनुष्य; दो नितांत भिन्न राजवंशों का, उनकी मैत्री की साखी बना उनका संयुक्त दूत कह रहा है, सुनो प्रभु!

Valmikiya Ramayan प्रमदावन विध्वंसक हनुमान

sundarkand व्यर्थ ब्रह्मास्त्र : वाल्मीकीय रामायण – ४६ [हरीश्वरस्य दूत:]

अस्त्र से मुक्त होने पर भी हनुमान ने दर्शाया नहीं तथा राक्षस उन्हें घसीटते एवं बंधन में पीड़ित करते चले। वे क्रूर उन्हें लाठियों व मुक्कों से पीटते हुये रावण तक घसीट ले गये।

Valmikiya Ramayan प्रमदावन विध्वंसक हनुमान

Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण-४५, [अक्षकुमार वध]

अक्षकुमार वध – भुजायें, जङ्घायें, कटि एवं गला टूट गये, अस्थियों का चूर्ण बन गया, आँखें निकल आईं। संधियों के भङ्ग होने के साथ साथ देहबन्ध भी ढीले पड़ गये।

Valmikiya Ramayan प्रमदावन विध्वंसक हनुमान

Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण-४४, [दासोऽहं कोसलेन्द्रस्य]

काञ्चन मृग हो या ऐसे खर, रामायण अपनी प्राचीनता के अन्तर्साक्ष्य बारम्बार प्रस्तुत करता है। रामायण में वैदिक देवताओं के सन्दर्भ विपुल हैं तथा इन्द्र, वायु, मरुद्गण आदि की बड़ी महत्ता है।

Valmikiya Ramayan प्रमदावन विध्वंसक हनुमान

Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण-43, [अहिरेव अहेः पादान्विजानाति]

Valmikiya Ramayan अत्याचारी स्वामी के सेवक उसकी मानसिक दुर्बलताओं एवं आशंकाओं का प्रयोग उसे मतिभ्रमित कर समस्या से ध्यान हटा स्वयं को बचाने हेतु करते हैं।

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Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण-42, सुन्‍दरकाण्ड [समर्थोऽर्थसाधने]

Valmikiya Ramayan : लघुतम कर्म की भी सिद्धि के लिये भी कोई एकल साधक हेतु नहीं। किसी कार्य को जो बहुविध सिद्ध करना जानता हो, कार्यसाधन में वही समर्थ होता है।

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Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण-41, [शिवश्च तेऽध्वास्तु हरिप्रवीर]

अल्पशेषमिदं कार्यं दृष्टेयमसितेक्षणा देवी सीता का दर्शन तो कर लिया, अब मेरे इस कार्य का अल्प अंश शेष रह गया है। त्रीनुपायानतिक्रम्य चतुर्थ इह दृश्यते…

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Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण-40, सुन्‍दरकाण्ड [समाधानं त्वं हि कार्यविदां वरः]

शत्रु की सामर्थ्य एवं सुदृढ़ स्थिति के योग्य प्रतिरोधी समक्ष थे, सीता सब जान लेना चाहती थीं, अपनी सेना की सामर्थ्य, सबसे पहले यह कि सेना इस पार आयेगी कैसे?

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Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण -39, सुन्‍दरकाण्ड [ त्वया नाथवती नाथ ह्यनाथा इव दृश्यते]

विवाहिता नारी द्वारा बहुधा जो बातें पति से नहीं कही जातीं, देवर के माध्यम से बता दी जाती हैं – प्रियो रामस्य लक्ष्मणः, यथा हि वानरश्रेष्ठ दुःखक्षयकरो भवेत्।

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Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण -38, सुन्‍दरकाण्ड [सामर्थ्यादात्मन: च]

देवी सीता के वचन सुन कर वाक्यविशारद कपिश्रेष्ठ हनुमान को सन्तोष हुआ एवं कहने लगे,” हे शुभदर्शना देवी ! आप ने जो कुछ कहा वह एक साध्वी एवं विनयसम्‍पन्न स्त्री के स्वभाव अनुसार है। पीठ पर अधिष्ठित हो विस्तीर्ण शतयोजनी सागर पारने में एक स्त्री समर्थ नहीं ही होगी।

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Valmikiya Ramayan वाल्मीकीय रामायण -37, सुन्‍दरकाण्ड [कुरुष्व मां हर्षिताम्]

मारुति हनुमान ने सीता के वचन सुने तथा सोचने लगे कि यह तो मेरा नया तिरस्कार हो गया ! कवि ने उनके लिये लक्ष्मीवान् (लक्ष्मी – लक्ष्-इ मुट् च) संज्ञा का भी प्रयोग किया है क्यों कि वे सम्पदा से युक्त थे। सम्पदा क्या थी?