History of Indian Science भारतीय विज्ञान का इतिहास

भारतीय साहित्य हमें विज्ञान के इतिहास के सम्बन्ध में उपयुक्त एवं स्तरीय साक्ष्य उपलब्ध करवाता है। इस इतिहास की कालानुक्रमिक समय रेखा पुरातात्विक अभिलेखों से प्राप्त होती है। जिसका अनुरेखण लगभग ७००० ईसा पूर्व की एक अविभक्त परम्परा द्वारा प्रस्तुत किया जा चुका है।

Babylonian and Indian Astronomy बेबिलॉन एवं भारतीय ज्योतिष – अन्तिम भाग

प्रतीत होता है कि सौर राशि चिह्नों को आज जैसा हम जानते हैं, उनका उद्भव भारत में हुआ जहाँ उनका सम्‍बन्‍ध नक्षत्रों के अधिष्ठाता देवताओं से है।

Babylonian and Indian Astronomy बेबिलॉन एवं भारतीय ज्योतिष – 3

बेबीलॉन गणित साठ (60) पर आधारित गणना पर निर्भर करता है, जिसका अर्थ है कि उसमें स्थानिक मान तंत्र का आधार 60 है। बेबीलॉन की गणितीय परंपरा की यह मुख्य विशेषता मानी जाती है। बेबीलॉन नववर्ष वसन्‍त विषुव के साथ अथवा उसके अनन्‍तर आरम्भ होता है।

Babylonian and Indian Astronomy बेबिलॉन एवं भारतीय ज्योतिष – 2

भारत के प्रारम्‍भिक वर्षों में शतवर्षीय पञ्चाङ्ग का अस्तित्व था, जिसका 2700 वर्षों का चक्र होता था। इसे सप्तर्षि पञ्चाङ्ग कहा जाता था।

Babylonian and Indian Astronomy बेबिलॉन एवं भारतीय ज्योतिष – 1

वे सभी विचार मिथ्या सिद्ध हो जाते हैं जो कहते हैं कि भारतीय ज्योतिष मेसोपोटामिया या ग्रीस से भारत में प्रसारित हुई किसी धारा पर आधारित है। ज्योतिष के प्रसिद्ध विद्वान बी एल वान देर वैरडेन ने 1980 के एक पत्र Two treatises on Indian astronomy में इस विवाद पर अपने विचार प्रस्तुत किए ।

AI, Consciousness and the Self कृत्रिम प्रज्ञान, चेतना एवंं आत्मा

यह बात सब जानते हैं कि यन्त्रों का क्रमिक विकास (Evolution) जैविक क्रमिक विकास से कहीं तीव्र है, अत: यह आशङ्का है कि मनुष्य चेतनापूर्ण मशीनों की गति से प्रतियोगिता करने में सक्षम नहीं है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि बहुत सी वैज्ञानिक एवं तकनीकी मेधायें दृढ़ता पूर्वक कह रही हैं कि कृत्रिम प्रज्ञान (Artificial Intelligence) मानवता को विध्वंस की ओर धकेल रहा है।

Gundestrup Cauldron

Gundestrup Cauldron Indian Connection गूण्डेस्ट्रप भगौने का भारत से सम्बन्ध

भारत से पश्चिम की दिशा में दो प्रमुख पथ थे। पहला ईरान तथा आगे की ओर, जहाँ सीरिया के संस्कृत नामधारी मितानी (Mitanni) शासक शताब्दियों तक राज्य करते रहे। दूसरा पथ यूरेशियन समभूमि तक जाने वाला मार्ग था जहाँ जाट और अन्य शक थे जो बौद्ध ग्रंथों का प्रसार चीन में, तथा पश्चिम दिशा में यूरोप में वैदिक ज्ञान का प्रसार किये।